Wednesday, October 3, 2012

आपदा से सहमा उत्तराखंड .................

"  इस साल अगस्त महीने की वो काली रात आज भी याद आती है जब हम रात का खाना खाकर सो ही रहे थे कि घरो के बाहर भीषण बरसात ने जनजीवन बुरी तरह प्रभावित कर दिया  | वैसे भी पहाड़ो  में बरसात के मौसम में दिन बड़े कष्टप्रद रहते हैं | रात एक बजते बजते भीषण जल प्रलय ने लोगों की जिन्दगी तबाह कर दी और प्रकृति का ऐसा कहर   टूटा कि आज भी वो काली याद का दर्दनाक          मंजर  मैं नहीं भूला हूँ | "       

                       उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में रहने वाले मान सिंह ने जब ४ अगस्त की सुबह का आँखों देखा मंजर मुझे बताया तो उसकी आँखों से आंसू  छलक आये |  किसी आपदा में अपनों के खोने का गम क्या होता है यह मान सिंह का दर्द बताने के लिए काफी है जिसने उस रात अपने आस  पास के कई गाँवों को तबाह होते देखा |  उत्तराखंड के लिए हर साल अगस्त, सितम्बर , अक्टूबर का महीना भयानक विनाश बरसाता  रहा है | यूँ तो इस इलाके में आपदाए सत्तर और अस्सी के दशक  के दौरान भी आई हैं लेकिन इस साल आपदा से हुई  तबाही का मंजर अन्य वर्षो से ज्यादा खतरनाक रहा है |  आज  आपदा की   भयावहता  इतनी भीषण है कि लोग अपने सगे सम्बन्धियों, रिश्तेदारों ,पड़ोसियों का पता नहीं लगा पा रहे जो आपदा के चलते जमीदोंज हो गए हैं | लोग इस हादसे को अभी भूले भी नहीं थे कि सितम्बर के मध्य में गढ़वाल मंडल के रुद्रप्रयाग जिले के उखीमठ और कुमाऊ मंडल के बागेश्वर जनपद में  कई  लोग बादल फटने की घटना के चलते काल के गाल में समा गए | उत्तराखंड की जो सुरम्य वादियाँ अपने नैसर्गिक सौन्दर्य के कारण देश दुनिया में जानी पहचानी जाती थी बादल फटने का कहर उन पर ऐसा टूटा कि दर्जनों गाँवों का नामोनिशान  ही मिट गया | बिजली ,पानी  , सड़क की  सुविधा बहाल  होना तो दूर आज चुन्नी, मंगली , किमाड़ा सरीखे  गाँव जो उखीमठ वाले इलाके में आते हैं ये कई साल पीछे चले गए मालूम पड़ते  हैं | रास्तो का नामोनिशान मिट चुका है | संचार तो बहुत दूर की गोटी है | हर तरफ सन्नाटा ही सन्नाटा पसरा है |  कभी यह गलियां शोर से सरोबार हो उठती थी लेकिन आज ये वीरान हैं क्युकि अपनों के खोने का गम आज भी यहाँ के लोगो को आज भी सताता है  




            उत्तरकाशी ,रुद्रप्रयाग,बागेश्वर  जिले की आपदाएं उत्तराखंड के लिए नई नहीं हैं  | १९७८ में जहाँ जीवनदायनी भागीरथी ने यहाँ कहर बरपाया था तो वहीँ १९८० में उत्तरकाशी के ज्ञानसू में बादल फटने से सैकड़ो लोगो की मृत्यु हो गई थी | १९९१ में उत्तरकाशी के भूकंप की यादें आज भी यहाँ के लोगो के जेहन में हैं जो  मन में सिहरन पैदा कर देती हैं |  राज्य गठन के बाद यहाँ पर आपदाओ के ग्राफ में तेजी से इजाफा हुआ |   २४ सितम्बर २००३ को वरुणावत पर्वत से रुक रुक कर हुए भूस्खलन ने  सैकड़ो लोगों की जिन्दगी को ग्रहण लगाया था | यही नहीं बीते दस बरस में राज्य के सीमान्त जनपद पिथौरागढ़  के  मुनस्यारी इलाके के  बरम, तल्ला जोहार , मल्ला जौहार, नामिक इलाको और बागेश्वर जनपद के कपकोट , सुमगढ़ में बादल फटने और भूस्खलन की कई घटनाएं हो चुकी हैं जो राज्य के लोगों के लिए कहर बनकर आई |

                प्राकृतिक आपदाओ की दृष्टि से संवेदनशील माने जाने वाले उत्तराखंड राज्य में बादल फटने , बाढ़, भूस्खलन ,भूकंप की घटनाये लगातार हो रही है लेकिन भयानक तबाही का मंजर  देखने के बाद भी यहाँ आपदा प्रबंधन नाम की कोई तैयारी शासन की ओर से नहीं की गई है | उत्तराखंड में इस साल प्राकृतिक  आपदा से जान माल का  व्यापक  नुकसान हुआ  है | उखीमठ में बादल फटने का कहर जहाँ ६ गाँवों में बादल फटने से टूटा वहीँ आपदा से सबसे ज्यादा प्रभावित जिलो में रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी, बागेश्वर और पिथौरागढ़   जनपद रहे | सरकारी आंकड़ो पर अगर गौर फरमाए तो आपदाओ से इस साल तकरीबन ४० हक्टेयर कृषि योग्य भूमि 
को  नुकसान पंहुचा साथ ही ३०० से ज्यादा मोटर  मार्ग और दर्जनों पैदल मार्ग जिनमे लोगो की आवाजाही होती थी बुरी तरह से प्रभावित हुए हैं | बीते ६ बरस में सरकारी आंकड़ो में जहाँ २०७ हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि प्रभावित बताई जा रही है वहीँ २२ हजार के आस पास मकान इस दौर में जमींदोज हो गए |
                                             
                                          बेहद संवेदनशील माने जाने वाले उत्तराखंड में इन आपदाओ से मुकाबले के लिए अलग से आपदा प्रबंधन मंत्रालय गठित किया जा चुका है परन्तु राज्य गठन के बाद से आज तक इसका नतीजा सिफर ही रहा है | हर साल इसका प्रबंधन फेल रहता है | यह तभी हरकत में आता है जब आपदा घट जाती है और बचाव कार्य शुरू होते हैं | इस साल भी सूबे में आपदा राहत  के  नाम  पर हवा हवाई काम हो रहे हैं | सत्ता पक्ष और विपक्ष के लोग आपदा राहत  के नाम पर भी अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने में ही लगे हुए हैं | आपदा 
राहत  के नाम पर जमकर धन की बंदरबाट भी हो रही है  |  आपदा से प्रभावित  इलाको की  जमीनी सच्चाई से उत्तराखंड के राजनेताओ का कोई सरोकार नहीं रहा  है | आपदा की इस संकट घडी में गिले शिकवे भुलाने के बजाय वह एक दुसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाने से बाज नहीं आ रहे हैं | दिल्ली से पैराशूट मुख्यमंत्री के रूप में उतारे गए विजय बहुगुणा आपदा की इस  घडी में जहाँ हवाई दौरे कर  लोगो का उपहास आपदा आई है तो भजन कीर्तन करो कहकर उडा रहे हैं वहीँ आपदा प्रभावित ज्यादातर इलाको में कांग्रेस और भाजपा का कोई   प्रतिनिधि नहीं पंहुचा है | आपदाओ से मुकाबला करने के लिए कोई बड़ी कार्ययोजना तैयार करने के बजाय सारी नौकरशाही  सरकारी आंकड़ो की फर्जी बाजीगिरी  और केंद्र  सरकार से पत्र व्यवहार करने में ही लगी हुई है | आज भी असलियत यह है कि आपदा से प्रभावित इलाको में सरकारी तंत्र की पोल खुल रही है | लोगो को तो दो समय का भोजन,पानी भी  ठीक से नहीं मिल पा रहा है |   

                                                         सरकारी आंकड़ो के लिहाज से उत्तराखंड के २३३ गाँव विस्थापन के मुहाने पर खड़े हैं | इनका विस्थापन  किया जाना जरुरी है लेकिन आज तक राज्य की दोनों सरकारें इस दिशा में कोई ठोस पहल नहीं कर पाई | ऐसे सबसे अधिक ७१ गाँव जहाँ पिथौरागढ़ जिले में हैं वहीँ चमोली में ४२ तो बागेश्वर में भी ४२ हैं |  अब उखीमठ ,भागीरथी 
घाटी , सुमगढ़ जैसे इलाके भी इसमें शामिल हो गए हैं | ऐसे इलाको में अधिकांश इलाके नगरीय इलाको से सटे हुए हैं जिसके चलते शासन प्रशासन के सामने मुश्किलों का पहाड़ ही खड़ा हो गया है | सरकारे इन इलाको में पुनर्वास के नाम पर मोटे बजट के खर्च होने का रोना रोती  रहती हैं | इन २३३ गाँवों में से अभी तक बमुश्किल १०० गाँवों का ही सर्वे हो पाया है | पुनर्वास तो बहुत दूर की  गोटी है |  राज्य का आपदा प्रबंधन विभाग किस कछुआ चाल से चल रहा है यह इस बात से पता लगता है कि आज तक किसी भी गाँव का पुनर्वास नहीं हो पाया है | तत्कालीन भाजपा सरकार ने जहाँ विस्थापन नीति को अपने शासन में अमली जामा पहनाया वहीँ कांग्रेस सरकार आने के बाद इसकी रफ़्तार थम सी गई है | मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा  का पूरा जोर भाजपा के कार्यकाल में शुरू की गई योजनाओ के नाम बदलने में लगा हुआ है  जिसको उन्होंने बाकायदा शुरू भी कर दिया है | विस्थापन  के मसले पर मौजूदा सरकार  केंद्र सरकार  की ओर ताक़ रही है | उसका कहना है केंद्र सरकार से मोटे पैकेज की  मांग की जा रही है |

                            उत्तराखंड में प्राकृतिक आपदाए लगातार बढ़ रही हैं  | भूगर्भीय दृष्टि से यहाँ के पहाड़ मौजूदा दौर में बेहद कमजोर हो चले हैं जिनका बरसात में दरकना आम बात हो चुकी है | लगातार बढ रही आबादी ने पहाड़ के प्राकृतिक असंतुलन को बढ़ाने का काम हाल के वर्षो में किया है | जहाँ  वनों के कटान पर अंकुश नहीं लग पाया वहीँ माफियाओ, नौकरशाहों ओर राजनेताओ के कॉकटेल  ने पहाड़ो को खोखला  कर दिया है | राज्य बनने के बाद यहाँ रिजोर्ट , खनन, बाँध बनाने का कारोबार खूब फला फूला है  | अवैध खनन के इस कारोबार ने जहाँ पहाड़ की सुन्दरता पर ग्रहण लगाया वहीँ माफियाओ की भी खूब चांदी हुई है क्युकि प्रशासन माफियाओ के आगे नतमस्तक रहता है |   इस दरमियान  पर्यावरणीय  मानको   की जहाँ लगतार अनदेखी अपने पहाड़ो में हो रही है वहीँ धड़ल्ले से एन ओं सी प्राप्त करने का धंधा चल पड़ा है | राज्य के तराई इलाको में स्टोन क्रेशर बड़ी आबादी वाले स्थानों में चल रहे है जिनमे तमाम मानको की अनदेखी हुई है | दुर्भाग्य है जनता के हितो की बात करने वाले सामाजिक संगठन  जो कभी जल , जमीन , जंगल का सवाल अपने आंदोलनों के जरिये उठाते थे  वह आज पहाड़ो को बचाने के मसलो पर अपना मुह नहीं खोल रहे | इसका बेहतर नमूना भाजपा शासन के कार्यकाल में कई हाइड्रो  परियोजनाए हैं जिन पर निशंक के राज में कई समाजसेवियों , आन्दोलनकारी संगठनो के दबाव में रोक लग गई थी | आज  दिल्ली से पैराशूट मुख्यमत्री के रूप में उतारे गए विजय  बहुगुणा ने कॉरपरेट  लाबी के दबाव में उनको फिर से शुरू करने का ऐलान एक झटके में कर दिया तो यह सारे समाजसेवी और आन्दोलनकारी ख़ामोशी की चादर ओड़ लिए है |  राज्य की कृषि योग्य भूमि आने पौने दामो पर बेचीं जा रही है | यह स्थिति तब है जब  भूगर्भ विज्ञानी मान चुके हैं  कि उत्तराखंड के सैकड़ो गाँव आज आपदा के बड़े  ढेर में बैठे हैं |  
                    
                    हाल में आई  प्राकृतिक आपदा ने बता दिया है कि राज्य में आज पानी कितना सर से उपर बह चुका है | पहाड़ो का मौसम चक्र तो गड़बड़ा ही चुका है साथ ही  यहाँ  की पारिस्थिकी  भी नाजुक दौर में है | अगर समय रहते इस दिशा में कारगर प्रयास नहीं किये गए तो इसकी कीमत पहाड़ वासियों को किसी भी बड़े हादसे के रूप में चुकानी पड़  सकती है | आपदा के बाद आज उत्तराखंड में राहत कार्य के नाम पर केवल राजनीती हो रही है और प्रभावित स्थल नेताओ के लिए पिकनिक स्पॉट बन गए हैं  | ऐसे में प्रभावितों को कितनी मदद मिलेगी या मिल रही है इसका अनुमान लगाना  आसान  है | राज्य के नेताओ का आज पहाड़ से कोई सरोकार भी नहीं रहा | अधिकांश विधायक या मंत्री राजधानी देहरादून में डटे रहते है | अपने विधान सभा इलाको से वह दूर हो रहे हैं | वहीँ राज्य के पैराशूट सी ऍम विजय बहुगुणा का भी बीता ६ महीने का समय दिल्ली में पार्टी से जुड़े मसले सुलझाने में ही बीता है |  कुछ कर गुजरने की तमन्ना जिस खंडूरी सरीखे शासक में है उसे निशंक सरीखे लोग भीतर घात से हरा देते हैं | चुनाव निपटने के बाद भी भीतरघातियो पर कार्यवाही तक नहीं होती 
जो   बतलाता है स्थितिया इस दौर में कितनी बेकाबू हो गई हैं | नौकरशाही  , माफिया खंडूरी के राज में खौफ खाते थे जिसके चलते उत्तराखंड में विकास कार्य कभी उतना प्रभावित नहीं हुए जितना बहुगुणा के शासन में हो रहे हैं | मुख्यमंत्री बहुगुणा   की सारी कवायद अपनी कुर्सी बचाने में लगी हुई है क्युकि उनकी पार्टी के नेता, विधायक उनकी नाक में दम किये   हुए है | ऐसे में विकास कार्य सीधे प्रभावित हो रहे हैं क्युकि नौकरशाहों पर मुख्यमंत्री का कोई नियंत्रण नहीं रहा | खुद मुख्यमंत्री बहुगुणा जज के अपने अन्तर्मुखी आवरण से बाहर  नहीं निकल पा रहे है  | ऐसे में समझा जा सकता है उत्तराखंड किस राह में जा रहा है  ?
 
                        सरकार अगर ईमानदारी से आपदा के मुकाबले के लिए कोई कारगर योजना तैयार करती है तो उत्तराखंड में बहुत कुछ हो सकता है| राहत कार्यो में तेजी आ सकती है |लेकिन इसे राज्य का दुर्भाग्य ही कहेंगे यह राज्य अब नौकरशाहों , राजनेताओ , माफियाओ की अवैध कमाई का अड्डा बन चुका है | जिन लोगो  के मन में उत्तराखंड को अलग राज्य बनाने को लेकर कोई पीड़ा नहीं थी उनके नुमाइंदे आज शासन कर रहे है | इन दिनों राज्य में केंद्र सरकार से राहत पैकेज  मांगने का नया चलन चल रहा है | केंद्र में  कांग्रेस की सरकार होने के बाद भी विजय बहुगुणा  आपदा राहत के नाम पर कोई बहुत बड़ा पैकेज राज्य के लिए नहीं ला सके हैं | अपने घर में डिजास्टर मैनेजमेंट खुद 
फेल  हो रहा है | आपदा के नाम पर केंद्र से पैसा मांगने से नेताओ की राजनीती तो चमक सकती है लेकिन मान सिंह सरीखे लोगो का दर्द हवाई दौरों से नहीं समझा जा सकता जिसने अपनी आँखों के सामने कई परिवारों को उजड़ते देखा है | लेकिन क्या किया जाए जब मौजूदा दौर में हर व्यवस्था भ्रष्टाचार और लूट खसोट की पोषक बन चुकी है | ऐसे में जनता बेहाल होकर अगर किसी तारणहार को ना ताके तो और करे भी क्या क्युकि नेताओ की सारी बिसात  तो राजनीती और अपनी कुर्सी बचाने ,चमकाने और आरोप प्रत्यारोप पर ही  टिक गई है | ऐसे में उत्तराखंड की  आपदा राहत  की लकीर भी भला  इससे अछूती कैसे रह सकती है ?


1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

मार्मिक दृश्य..