शनिवार, 12 जनवरी 2013

करिश्माई व्यक्तित्व के धनी थे विवेकानंद


150 वां जयंती वर्ष  

भारत के कण कण में कभी देवो का वास था और यहाँ की धरा को कभी  सोने की चिड़िया  भी  कहा जाता था ।  इसी धरा को कई महापुरुषों  ने अपने जन्म से धन्य  किया है ।  त्याग, सहनशीलता, गुरु भक्त और देशभक्त  सरीखे गुणों से युक्त महापुरुष इतिहास के  किसी भी कालखंड में मिलना मुश्किल हैं लेकिन विवेकानन्द जिन्हें उस दौर में नरेन्द्रनाथ नाम से पुकारा जाता था एक ऐसा नाम है जिन्होंने  करिश्माई व्यक्तित्व के किरदार को एक दौर में जिया । आज भी लोग गर्व से उनका नाम लेते हैं और युवा दिलो में  वह  एक आयकन  की भांति बसते हैं ।   इतिहास के पन्नो में विवेकानंद का दर्शन उन्हें एक ऐसे महाज्ञानी व्यक्तित्व के रूप में जगह देता है जिसने अपने ओजस्वी विचारो के द्वारा दुनिया के पटल पर भारत का नाम बुलंदियों के शिखर पर पहुँचाया । उनके द्वारा दिया गया वेदान्त दर्शन भारतीय  दर्शन की एक अनमोल धरोहर है । 

                   विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को कलकत्ता में विश्वनाथ और भुवनेश्वरी  देवी के घर हुआ था । बचपन में नरेन्द्रनाथ नाम से जाने जाने वले विवेकानंद काफी चंचल प्रवृति के थे । उनकी माता भगवान की अनन्य उपासक थी लिहाजा माँ के सानिध्य में वह भी ईश्वर प्रेमी हो गए । बचपन में विवेकानंद की माँ इन्हें रामायण की कहानी सुनाती  थी तो इसको यह बड़ी तन्मयता से सुनते थे । रामायण में हनुमान के चरित्र ने उस दौर में इनके जीवन को खासा प्रभावित किया ।   साथ ही अपनी माँ  की तरह वह भी शिवशंकर के अनन्य भक्त हो गए । कई बार वह शिव से सीधा साक्षात्कार करते मालूम पड़ते थे और अपनी माँ से कहा करते कि  उनमे शंकर का वास है । यह सब सुनकर इनकी माँ चिंतित हो उठती कि उनका यह बेटा कहीं बाबा सन्यासी ना बन जाए । 


                बचपन से ही नरेन्द्रनाथ पढाई  लिखाई  में रूचि लेने लगे । पढाई  में यह अव्वल दर्जे के छात्र थे इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है जो चीज एक बार यह पद लेते उसे कभी भूलते नहीं थे ।  गुरुजनों के प्रति इनका सम्मान उस दौर में भी देखते ही बनता था । बड़े होने पर भी गुरु से इनका लगाव बना रहा । विवेकानंद का मानना था कि जीवन में सफल होने के लिए अच्छा  गुरु मिलना जरुरी है क्युकि  गुरु ही अन्धकार से ज्ञान के प्रकाश की तरफ ले जाता है । बचपन से ही गुरु के अलावे आध्यात्मिक  चीजो की तरफ इनका  झुकाव  हो गया और इसी दौरान मुलाकात  राम कृष्ण परमहंस से हुई जिन्होंने इन्हें अपना मानस पुत्र घोषित कर दिया ।  परमहंस की दी हुई हर शिक्षा को विवेकानंद ने अपने जीवन में ना केवल उतारा  बल्कि लोगो को भी इसके जरिये कई सन्देश दिए जिसने आगे बदने की राह खोली ।  जीवन के अंतिम पडाव पर परमहंस सरीखे गुरु ने जब विवेकानंद को अपने पास बुलाया और कहा  अब मेरे जाने की घड़ी  आ गई है तो विवेकानंद बड़े भावुक हो गए लेकिन परमहंस  गुरु ने जनसेवा का जो गुरुमंत्र इन्हें दिया उसका प्रचार , प्रसार विवेकानंद ने देश , दुनिया में किया । विवेकानंद युवा तरुणाई पर भरोसा करते थे और ऐसा मानते थे अगर कुछ नौजवान उनको मिल जाएँ तो वह पूरी मानव जाति  की सोच को बदल सकते हैं ।                                          
            11 सितम्बर  1893 का दिन इतिहास में  अमर है  । इस दिन अमेरिका में विश्व धर्म सम्मलेन का आयोजन किया जिसमे दुनिया के कोने कोने से लोगो ने शिरकत की । उस दौर में भारत के प्रतिनिधित्व की जिम्मेदारी इन्ही के कंधो पर थी । गेरुए कपडे पहने विवेकानन्द ने  अपनी वाणी से वहां पर मौजूद जनसमुदाय को मंत्र मुग्ध कर दिया ।  जहाँ सभी अपना भाषण   लिखकर लाये थे  वहीँ विवेकानंद ने अपना मौखिक भाषण दिया । दिल से जो निकला वही बोला और जनसमुदाय के अंतर्मन को मानो  झंकृत ही कर डाला । उनके शालीन अंदाज ने लोगो  को  उन्हें सुनने को मजबूर कर दिया ।  

धर्म की  व्याख्या  करते हुए वह बोले जैसे सभी नदियां  अंत में समुद्र में जाकर मिलती है वैसे ही  वैसे ही दुनिया में अलग अलग धर्म अपनाने वाले मनुष्य को एक न एक दिन  ईश्वर  की शरण में   जाकर ही लौटना पड़ता है । संसार में कोई  धर्म  न बड़ा है और ना ही छोटा । इस तरह उन्होंने यह कहा संसार के सभी धर्म समान है उनमे किसी भी तरह का भेद नहीं है । इस प्रकार उन्होंने अपने ओजस्वी विचारों के जरिये हिंदुत्व की नई परिभाषा उस दौर में गड़ने का काम किया ।                        

1894 में न्यूयार्क में उन्होंने वेदांत सोसाईटी बनाई तो वहीँ 1900 की शुरुवात में सेन फ्रांसिस्को में भी इसकी एक शाखा खोली ।   भारत आकर रामकृष्ण मिशन की स्थापना भी इनके  प्रयासों से ही हुई । इस दरमियान धर्म के प्रचार और प्रसार के लिए कई दौरे भी  किये  जहाँ अपने वेदांत दर्शन के जरिये उन्होंने लोगो की सोच बदलने का काम सच्चे अर्थो में किया । विवेकानन्द  के द्वारा दिया गया वेदान्त दर्शन एक अनमोल धरोहर है । विवेकानन्द एक कर्मशील व्यक्ति थे और अपने विचारो के जरिये उन्होंने समाज के सोये जनमानस को जगाने का काम किया ।  वह मानते थे प्रत्येक व्यक्ति में अच्छे आदर्शो  और भाव का समन्वय होना जरुरी है साथ ही शिक्षा को परिभाषित करते हुए यह कहा अपने पैरो पर खड़ा होने जो चीज सिखाये वह शिक्षा है । 

विवेकानन्द ने वेदांत को नया रूप देकर उसे मोक्ष में बदलने का काम सही मायनों में करके दिखाया । विवेकानन्द को  आज हम इस रूप में याद करे कि  उनके द्वारा दिया गया दर्शन हम अपने में आत्मसात करें, साथ ही अपने जीवन में कर्म को प्रधानता दें तो कुछ बात बनेगीं  । बेहतर होगा युवा पीड़ी उनके विचारो से कुछ सीखे  और उनको आयकन बनाने के बजाए उनकी शिक्षा को अपने में उतारे और प्रगति पथ पर चले ।

2 टिप्‍पणियां:

Vikesh Badola ने कहा…

विवेकानन्‍द का दर्शन सदा प्रासंगिक है....पर हम उस पर चलें तो।

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

विवेकानन्द का दर्शन ऊर्जस्वित कर देने वाला है, सबके लिये।