रविवार, 6 अप्रैल 2014

एन्टी इनकम्बेंसी के बीच हरियाणा में कांग्रेस को हुड्डा का सहारा






" हुड्डा ने काम तो बहुत कराये ..  सड़कें बनवाई ..  चमचमाते फ्लाई ओवर भी बनाये .. लेकिन इस चकाचौंध का असर रोहतक, सोनीपत , झज्जर तक ही सिमटा जिसके चलते कई इलाके आज भी विकास की बाँट जोह रहे हैं । बेरोजगारो में भारी निराशा है । घोटालो और भ्रष्टाचार के बाद भी हम इस चुनाव में हुड्डा को ही वोट करेंगे  क्युकि वो अपना भाई है अपनी बिरादरी का है । "

एनसीआर से सटे रोहतक इलाके से ताल्लुक रखने वाले एक वोटर नवीन से जब चुनावी चर्चा की तो उसके जवाब ने यह संकेत तो दे ही दिया एंटी इंकम्बेंसी फैक्टर के बीच कांग्रेस के हाथ का एक मात्र सहारा  हरियाणा  के मुख्यमंत्री भूपेन्दर सिंह हुड्डा हैं शायद यही वजह है बीते एक दशक में हरियाणा में एक जुमला  'हरियाणा इज हुड्डा' , 'हुड्डा इज  हरियाणा' खूब  चला है जो इस चुनावी बरस में भी इंदिरा गांधी वाले दौर की यादें ताजा कर देता है तब इंदिरा गांधी कांग्रेस का पूरे देश में सहारा हुआ करती थी । कम से कम हरियाणा में पूरे देश में कांग्रेस  विरोधी लहर के बाद भी अगर हुड्डा की तारीफो के कसीदे वोटरों  से सुनने को मिल रहे  हैं  तो यह कांग्रेस के लिए अच्छे संकेत की तरफ इशारा कराता है । 

   लोक सभा की रणभेरी बज चुकी है । हरियाणा के चुनावी महासमर में सभी   दलों ने चुनाव प्रचार के अंतिम दिनों में पूरी ताकत झोंक दी है । 10 अप्रैल को पहले चरण के मतदान में जिन सीटो पर सबसे ज्यादा नजर हैं उसमे हरियाणा प्रमुख है । दिल्ली से सटे होने के चलते हरियाणा में इस समय कांग्रेस के सामने अपना पिछला इतिहास दोहराने की तगड़ी चुनौती तो है साथ में हुड्डा की साख इस चुनाव में सीधे दांव पर है क्युकि उनके सामने कांग्रेस की पुरानी सीटो पर हाथ को मजबूत बनाने की तगड़ी जिम्मेदारी  है । वही ओम  प्रकाश चौटाला के सामने भी अपनी पार्टी का अस्तित्व और वजूद बचाने की  चुनौती है क्युकि जेबीटी शिक्षक  घोटाले में  जेल की हवा खाने के चलते उनके पुराने वोटर पाला  बदलने  की तैयारी में दिखायी देते हैं । हरियाणा में कांग्रेस हुड्डा के नाम के आगे अपने वोट मांगती  दिख रही है लेकिन यू पी  ए सरकार के प्रति लोगो में थोडा बहुत गुस्सा भी साफ़ दिखाई देता है । दिसंबर में दिल्ली की जमीन से रुखसत  कांग्रेस के सामने अब पडोसी राज्य हरियाणा में हुड्डा के विकास की कहानी लोगो तक  पहुचाने की जिम्मेदारी है क्युकि  भारी गुटबाजी और एंटी इंकम्बेंसी का  अंदेशा राज्य की 10  संसदीय सीटों के गणित को सीधे प्रभावित कर  रहा है लेकिन हरियाणा में विपक्ष के बिखराव का सीधा लाभ लेने के लिए हुड्डा अपनी बिसात मजबूत करते नजर आ रहे हैं जिसके चलते वह सब पर भारी पड़  रहे हैं । पिछले एक दशक में हुड्डा ने विकास कार्यो के बूते विकास की जो गंगा बहायी है उसकी नाव में सवार होकर कांग्रेस अपने लिए लोक सभा चुनावो के साथ राज्य में होने  विधान सभा चुनावो में भी अपनी बिसात अपने अनुकूल बिछाती नजर आ रही है । 

                                           मौजूदा दौर में  हरियाणा में 10 सीटो की सीधी  लड़ाई में कांग्रेस के सामने  इनलो ,भाजपा, हजका सीधे खड़ी हैं लेकिन दिल्ली से सटे होने के चलते इस लोक सभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने कई इलाको में माहौल को रोचक बना दिया है । इनलो को सहानुभूति की लहर का सहारा है तो वहीँ भाजपा और हजका नमो लहर से बड़े करिश्मे की उम्मीद लगाये बैठी है । वहीँ केजरीवाल के हरियाणा से होने के कारण आम आदमी पार्टी  दिल्ली सरीखे करिश्मे की उम्मीद  कर  रही है । भाजपा हजका नमो को तारणहार के रूप में देख रहे हैं वही पंजाब में भाजपा की सहयोगी  अकाली दल के लोग इनलो के चुनाव प्रचार में साथ भागीदारी कर भाजपा हजका  की मुश्किलो को सीधे बढ़ाने का काम कर रहे हैं । अगर एकमुश्त पंजाबी वोट इनलो अपने पाले में लाने में कामयाब हो जाती है तो  इससे भाजपा हजका को परेशानी कई सीटो पर पेश आ सकती है । 
               
                       15  वी लोक सभा में कांग्रेस ने हुड्डा के करिश्मे के बूते 10  में से 9  सीटें जीतकर विपक्षियों के तोते ही उड़ा दिए थे ।  उस दौर  को याद करें तो जेहन में भजनलाल का नाम आता है जिनकी गिनती देवीलाल और बंसीलाल की तरह तीसरे हरियाणा के लाल के रूप में होती रही लेकिन 2011 में उनकी मौत के बाद उनके बेटे कुलदीप बिश्नोई ने   अजय चौटाला को  तकरीबन छह हजार मतों से धूल चटाई । हिसार में कुलदीप बिश्नोई पर  सबकी नजर हैं । उनके सामने इस बार दुष्यंत चौटाला हैं । कुलदीप के पिता और पूर्व सीएम भजनलाल ने 1998 में फरीदाबाद, 1984 में करनाल और 2009 में हिसार सीट पर जीत दर्ज कराई थी। कुलदीप ने 2004 में भिवानी सीट से चुनाव जीतकर संसद में प्रवेश किया। पिता के निधन के कारण हिसार उपचुनाव में कुलदीप जीते थे।इस बार भी कुलदीप हजका   भाजपा गठबंधन   के आसरे हिसार में ताल ठोक  रहे हैं जहाँ उनके सामने अजय चौटाला के बेटे दुष्यंत चौटाला हैं । वही इस सीट पर कांग्रेस ने संपत सिंह को आगे किया है जिससे  मुकाबला त्रिकोणीय हो गया है । रोहतक की बात करें तो यहाँ दीपेन्दर हुड्डा की लहर साफ़ दिख रही है । अपने पिता के विकास कार्यो का लाभ उनको मिलता दिखायी दे रहा है । भाजपा के ओमप्रकाश धनकड़ उनको कोई ख़ास चुनौती देते नहीं दिख रहे हैं तो वहीँ इनलो और आप का भी इलाके में कुछ खास असर देखने को नहीं मिलता । 

कुरुक्षेत्र के  रण में मुकाबला त्रिकोणीय है। तीसरी बार सांसद बनने का सपना देख रहे कांग्रेस के नवीन जिंदल  के सामने  राजकुमार सैनी और  इनेलो के बलबीर सैनी  हैं। यहां सर्वाधिक जाट मतदाता हैं लेकिन लंबे समय से इस समुदाय का कोई सांसद नहीं बना है। 2004 में तो जाट नेता अभय चौटाला पराजित हो गए थे। इस बार भी इस समुदाय का कोई प्रत्याशी मजबूत  नजर नहीं आ रहा।  तय  है कि जाट जिसका साथ देंगे हवा का रुख तभी पता लगेगा ।कुरुक्षेत्र लोकसभा क्षेत्र में कईकैबिनेट मंत्री  दिग्गजों की साख दांव पर है। नवीन जिंदल के सामने कोलगेट बड़ी कार्पेट बिछा रहा है तो वहीँ संसदीय इलाके से उनकी बेरुखी पर मतदाता नाराज चल रहे हैं । ऐसे में चुनाव  दिलचस्प बन गया है ।भिवानी-महेंद्रगढ़ संसदीय क्षेत्र में इस बार भी कड़ा मुकाबला होने जा रहा है।  मुख्य रूप से मुकाबला कांग्रेस, भाजपा, इनेलो, आम आदमी पार्टी व बसपा के बीच चल रहा है। कांग्रेस की श्रुति चौधरी, भाजपा के धर्मबीर सिंह व इनेलो के राव बहादुर सिंह  चुनावी समीकरण रोचक बनाये हुए हैं  जबकि आम आदमी पार्टी के ललित कुमार अग्रवाल तथा बहुजन समाज पार्टी के वेदपाल तंवर भी मुकाबले को बहुकोणीय बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। कांग्रेस की श्रुति चौधरी इस बार भी अपने स्वर्गीय दादा पर्व मुख्यमंत्री बंसीलाल के अलावा अपनी मां व राज्य की जनस्वास्थ्य मंत्री किरण चौधरी द्वारा कराए गए विकास कार्यो के अलावा अपने सांसद काल में कराए गए विकास कार्यो का हवाला देकर लोगों से वोट मांग रही हैं। जबकि उनके साथ समस्या गुटबाजी , भितरघात की  है। कांग्रेस के विधायक खुलकर उनके साथ आने से कतरा रहे हैं। भाजपा में शामिल हुए धर्मबीर के साथ भी पार्टी नेताओं व कार्यकर्ताओं को लेकर स्थिति ठीक  नहीं हैं फिर भी चुनाव में नमो  मंत्र  सबसे बड़ा सहारा है।  इंडियन नेशनल लोकदल के राव बहादुर सिंह को जहां इनेलो विधायकों व पार्टी समर्थकों की पूरी मदद मिल रही हैं।  

 कांग्रेस ने करनाल में डॉ. अरविंद शर्मा को  तीसरी बार उतारा है।  पंजाबी वोट को ध्यान में रखकर भाजपा ने अश्विनी चोपड़ा को आगे किया है ।  पूर्व केन्द्रीय मंत्री आईडी स्वामी भी यहां से भाजपा की टिकट चाहते थे लेकिन मिला नहीं ।  पूर्व कृषि मंत्री जसविंदर संधू पहली बार इनेलो प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ रहे हैं। वहीं आम आदमी पार्टी के प्रत्याशी परमजीत सिंह भी पहला चुनाव लडऩे उतरे हैं। बसपा के  टिकट पर चुनाव लड़ चुके मराठा वीरेंद्र वर्मा इस बार फिर पार्टी से उम्मीदवार हैं। फिर भी कांग्रेस को इस सीट से बडी  आस है । गुड़गांव में कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल राव इंद्रजीत सब पर भारी पड़  रहे हैं । इंद्रजीत ने 1998, 2004 और 2009 का चुनाव जीतकर हैट्रिक लगाई। इस बार वे चौधर के नाम पर वोट मांग रहे हैं।आप की  तरफ से योगेन्द्र  यादव सामने जरुर हैं लेकिन राव की इस इलाके में भारी  पैठ देखते हुए  लगता नहीं है आप , इनलो यहाँ कुछ ख़ास कर पाएंगे । पिछले लोकसभा चुनाव की तुलना में इस बार करीब साढे़ पांच लाख तदाता इस संसदीय क्षेत्र में जुड़े हैं। इनमें ‘युवा वर्ग’ की तादाद अच्छी खासी हैं।देखने वाली बात यह होगी यह युवा एकमुश्त वोट किसके पक्ष में करते है। चंडीगढ़ में तमाम कयासों के बीच  पूर्व रेल मंत्री पवन बंसल के सामने बॉलीवुड है जहाँ भाजपा की तरफ से किरण खैर  और आप की  तरफ से गुल पनाग सियासी अखाड़े में अपनी ताल ठोंक  रही हैं। पवन बंसल को मजबूत माना जा रहा है और साथ ही स्थानीय होने का लाभ उन्हें मिलने की पूरी  सम्भावनाएं दिख रही हैं । भाजपा में किरण को कार्यकर्ताओ का पूरा समर्थन ना मिलने के चलते यहाँ कमल खिलने में परेशानी पेश आ सकती है । 


 सोनीपत  में जाटों  की तादात ज्यादा है लेकिन भाजपा ने यहाँ से ब्राह्मण रमेश कौशिक को आगे किया है जिससे प्रदीप  सांगवान  नाराज हो गए हैं । कांग्रेस प्रत्याशी जगबीर सिंह मलिक का पलड़ा इस सीट पर भारी बताया जा रहा है । चुनाव प्रचार के अंतिम दिनों में हुड्डा की रैलियो ने यहाँ कांग्रेस के पक्ष में समीकरण बैठा दिए हैं । विनोद शर्मा के कांग्रेस छोड़ने के बाद अम्बाला में कांग्रेस की राह आसान नहीं कही जा सकती । भाजपा प्रत्याशी रतन लाल कटारिया इनलो को कड़ी टक्कर देते दिखायी दे रहे हैं । सिरसा में कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर को हजका भाजपा गठबंधन के प्रत्याशी डा. सुशील इदौरा से तगड़ी चुनौती  मिल रही है ।  इनेलो प्रत्याशी चरणजीत रोड़ी के आने से  मुकाबला दिलचस्प  बन गया है।  सिरसा में डेरा सच्चा सौदा के अनुयायियों की  बड़ी तादात हार जीत के समीकरणों को प्रभावित कर सकती है साथ ही पंजाब से सटे होने के चलते सिरसा में शिरोमणि  अकाली  दल के इनलो के साथ आने से पंजाबी वोट बाँटने का अंदेशा बना हुआ है ।   फरीदाबाद में  पंजाबी और गुर्जर समुदाय के मत ही निर्णायक होते हैं। चूंकि यह क्षेत्र नए परिसीमन के बाद  यहां कांग्रेस का सिक्का  है। पंजाबी बिरादरी का झुकाव यहां आजादी के बाद से ही कांग्रेस के प्रति रहा है।  यहां पंजाबी, गुर्जर समुदाय के मत ही निर्णायक होते हैं। चूंकि यह क्षेत्र नए परिसीमन के बाद एनआइटी और मेवलामहाराजपुर क्षेत्र से निकले हिस्से का बना है इसलिए यहां कांग्रेस का वर्चस्व रहा है।  शहरी क्षेत्र में भाजपा को इनेलो से टक्कर मिल रही है तो देहात में कांग्रेस प्रत्याशी से लेकिन मुस्लिम वोट यहाँ भी अहम है   । दिल्ली से सटे होने के चलते आप यहाँ कितना असर छोड़ पाती है यह भी देखने लायक होगा । लेकिन आज के खामोश वोटर के मिजाज को पढ़ पाना इतना आसान नहीं है । 

जो भी हो हरियाणा में हुड्डा के विकास कार्यो का लाभ कांग्रेस को मिलता तो  दिख  रहा है लेकिन राज्य कांग्रेस में शैलजा , बीरेंद्र सिंह , फूल मुलाना का गुट चुनाव में हुड्डा को सबक सिखाने के लिए एक हो गया है । इन  सभी का ऐसा मानना कि हुड्डा का विकास कुछ जिलो तक सिमट कर  गया जिसमे दक्षिणी हरियाणा  की उपेक्षा की गई । विकास का पैमाना जो हुड्डा ने नियत किया उससे कई कांग्रेसी कार्य कर्ताओ के मन में नाराजगी है जिसका परिणाम लोक सभा चुनाव में उन्हें उठाना  पड़  सकता है लेकिन इन सबके बीच यह  सच भी शायद किसी से छुपा है जाटलैंड में हुड्डा की तूती पहले  भी बोलती  थी और आज भी बोलती है तो यह हुड्डा के करिश्मे को बयां करने के लिए काफी है ।  हाल ही में केंद्र  सरकार द्वारा जाटों को सरकार नौकरियों में आरक्षण का  जो नया  पासा फैंका गया वह हुड्डा के लिए हरियाणा के विकेट पर  चुनावी बरस में नए  मास्टर स्ट्रोक से कम नहीं है  शायद यही वजह है हरियाणा के इस चुनाव में हुड्डा का स्ट्राइक रेट सही चल रहा है और नमो की ताबड़तोड़ रैलियो के बाद भी हरियाणा मे कीचड़ में कमल खिलना दूर की गोटी दिख रहा है । 

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