Thursday, 26 October 2017

'आबेनॉमिक्स' की छाँव तले जापान



जापान के मध्यावधि चुनाव में प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने ऐतिहासिक विजय प्राप्त की है |  आबे के एलडीएफ नेतृत्व वाले गठबंधन को संसद के निचले सदन में  मिली   शानदार जीत में  दो तिहाई से अधिक बहुमत हासिल हुआ है ।  पिछले दिनों आबे  की रेटिंग में जबरदस्त गिरावट देखने को मिली जिसके चलते उन्हें अचानक चुनाव कराने  का जुआ खेलने को मजबूर होना पड़ा । इस  जीत से आबे ने अपने विरोधियों को भी करारा जवाब दिया है |  आबे की अचानक चुनाव कराने की रणनीति काम कर गई  और विपक्ष को करारी हार का सामना करना पड़ा। मध्यावधि चुनाव करने का शिंजो का यह दांव  सही समय में काम आया  इससे विपक्षी दलों के पास खुद को संभालने का वक्त  नहीं  मिला  और उन्होंने सशक्त विकल्प के अभाव में  में आबे को ही वोट दिया। 

आबे की एलडीपी और उसके गठबंधन सहयोगी न्यू कोमितो ने 121 सीटों पर चुनाव लड़ा था जिसमें 76 उनके हिस्से में आई |  ऊपरी सदन की कुल 242 सीटों में 135 पर अब इसी गठबंधन का कब्जा है |  शिंजो  दिसंबर 2012 से जापान के प्रधानमंत्री पद पर बने हुए हैं। इन्होंने 2006 - 2007 तक के दौर में भी  जापान के प्रधानमंत्री पद की सत्ता को संभाला  था । जब अबे जापान की राष्ट्रीय संसद  'डाइट'   के विशेष सत्र में  2006  में पहली बार प्रधानमंत्री पद के लिए चुने गए, तब  वह  द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जापान के सबसे कम उम्र के प्रधानमंत्री बने। साथ ही आबे  द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जन्मे पहले प्रधानमंत्री हैं |
 
2006 में सुधारवादी प्रधानमंत्री जूनीचीरो कोइजूमी की पांच साल का कार्यकाल पूरा होने के बाद इस जीत ने आबे के लिए प्रधानमंत्री के रूप में लंबे कार्यकाल की उम्मीद भी मजबूत कर दी हैं | आबे के पास इस पारी में लम्बे समय तक पी एम पद पर टिके  रहने का शानदार मौका है क्युकि आने वाले दौर में वह नई इबारत गढ़ने जा रहे हैं |  वह जापान में सबसे लंबे समय तक पद पर रहने वाले प्रधानमंत्री बन जाएंगे। दूसरे विश्वयुद्घ के बाद से जापान में प्रधानमंत्रियों का औसत कार्यकाल दो वर्ष के करीब रहा है। वर्ष 2012 में उनके प्रधानमंत्री बनने से पहले के छह वर्ष में जापान में छह प्रधानमंत्री हुए। 

जापान  में संसद के ऊपरी सदन में जीत के साथ प्रधानमंत्री शिंजो  की सत्ता की मजबूत ठसक बरक़रार रही है |  इस दौर में जापान के सामने कई  मुश्किलें बाएं  खड़ी हैं | बेशक जापान की  अर्थव्यवस्था कुलांचे मार रही है और रोजगार  भी पैदा  हुए हैं लेकिन  भारी बहुमत मिलने के बाद  नई  पारी में आबे अपनी राष्ट्रवादी सोच तले  जापान को एक नई  दिशा दे सकते हैं | इस नई  पारी में  उनकी प्राथमिकता आर्थिक कार्यक्रमों को तेज करने की होगी   |  मौद्रिक नीति, सरकारी खर्चे में कमी और आर्थिक सुधार ऐसे पहलू  हैं जिस  पर उनके रुख पर  सबकी नजर रहेगी | इस चुनाव का ख़ास पहलू युवाओं का रुझान था जिसने जापान  की सियासत को अपने वोट से पहली बार नई दिशा दी  और सियासत के रुख को ही बदल दिया |  इस चुनाव को लेकर सबसे बड़ी दिलचस्पी शिंजो आबे के ‘राष्ट्रवादी’ एजेंडे और संविधान में एक खास संशोधन के उनके घोषित इरादे की वजह से रही । पिछले दिनों उत्तर कोरिया ने  मिसाइल दागी जो  जापान के होक्काइयो द्वीप से सीधे समुद्र में समां गई | इसके बाद से जापान और उत्तर कोरिया के रिश्तों को लेकर प्रेक्षक अपना नया  आकलन करने लगे थे | यूँ तो जापान की पहचान एक शांतिप्रिय देश की रही है और उसके उत्तर कोरिया के साथ किसी तरह के राजनीतिक और आर्थिक सम्बन्ध नहीं हैं  लेकिन इस नई पारी में शिंजो का उत्तर कोरिया के प्रति रुख क्या होता है इस पर सबकी नजर रहेगी |  इस तरह की रिपोर्टें आ रही हैं इस पारी में आबे  संविधान के शांतिप्रिय  अनुच्छेद नौ में संशोधन करना चाहते हैं जिससे सुरक्षा के मोर्चे और उत्तर कोरिया की मिसाइल चुनौती से वह बखूबी निपट सकें | लेकिन क्या वह ऐसा कर पाएंगे यह बड़ा सवाल है |  यूँ तो इस जीत के बाद प्रधानमंत्री शिंजो आबे को विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने और उत्तर कोरिया पर उनके पहले से कड़े रूख को मजबूत करने में मदद  मिलने  की बात कही है लेकिन चुनावी मोड में  तो राजनेता तमाम तरह की घोषणाएं करते रहते हैं | चुनाव निपटने के बाद कथनी और करनी का पता चल पाता है | ऐसे में देखना दिलचस्प होगा शिंजो क्या नई लकीर खींच पाएंगे ? 

जापान के सामने पहली चुनौती नॉर्थ कोरिया से परमाणु हमले का खतरा है। यही मुद्दा चुनाव में भी छाया रहा। देश की जनता ने भी किम जोंग-उन के खिलाफ आबे के सख्त कदमों के समर्थन में उन्हें एकमुश्त वोट किया। जीत के बाद अपने संबोधन में आबे ने कहा वह जापान की जनता की खुशहाली को कायम रखने के लिए प्रतिबद्ध  हैं | उन्होंने  कोरिया के मिसाइल, परमाणु और अपहरण के मामलों के लिए निर्णायक और सशक्त कूटनीति  का जिक्र कर इस बात को तो जतला ही दिया है आने वाले दिनों में  नॉर्थ कोरिया पर  कड़ा रुख जापान की तरफ से देखने को मिल सकता है | जहां तक भारत और जापान के रिश्तों का सवाल है, शिंजो आबे के अब तक के कार्यकाल में दोनों देशों के संबंध  प्रगाढ़ ही हुए हैं।  शिंजो  का वापस आना हमारे लिए  अहम है | भारत और जापान ऐसी अर्थव्यवस्थाएं हैं, जिनमें अनेक पूरक पहलू हैं। मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया और स्मार्ट सिटी , बुलेट ट्रेन  योजनाओं को लेकर जापान के  कारोबारी  उत्साहित हैं | द्विपक्षीय संबंधों को नई ऊंचाईयों पर ले जाते हुए भारत और जापान के बीच  रक्षा और परमाणु ऊर्जा जैसे प्रमुख क्षेत्रों और बुलेट ट्रेन नेटवर्क निर्माण सहित कई समझौतों पर काम शुरू हो  चुका  है |   हमने  जापान के साथ असैन्य परमाणु ऊर्जा  सहयोग पर भी  हस्ताक्षर किए हैं  जो वाणिज्य एवं स्वच्छ ऊर्जा के लिए अहम है । भारत संभावनाओं का देश है और  जापान की तकनीक उसकी  ताक़त है और  ऐसे में अगर शिंजो और मोदी की गलबहियां आने वाले दिनों में कोई नया गुल खिलाती हैं तो पूरी दुनिया की नजर रहेगी | 

कुल मिलाकर आबे का सत्ता में मजबूती से वापस आना कई वजहों से बेहतर है। इस दौर में  जापान  भारत  की दोस्ती खूब परवान चढ़ी  है और जापान ने छोटे  भाई की तरह भारत का हर संभव सहयोग किया है | जापान की  स्थिरता रक्षा, व्यापार और बुनियादी ढांचागत सुधार  में भारत के लिए बेहतर होगी। दो एशियाई ताकतों जापान और भारत का साथ  आने से अब चीन की परेशानी और अधिक बढ़ सकती है | भारत और जापान  दोनों ही चीन की बढ़ती आर्थिक व सैन्य ताकत तथा सतत आर्थिक विकास की साझा रणनीतिक चुनौतियों से जूझ रहे हैं। इन चुनौतियों से निपटने के लिए भारत और जापान का साथ आना आज की नई जरूरत बन गई  है | । लुक  ईस्ट पॉलिसी पूर्व एशियाई क्षेत्र में मजबूती हासिल करने की भारत की सामरिक आर्थिक नीतियों में से एक है जिसके  तहत भारत का प्रयास है इस क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को रोका जा सके और दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों के साथ सामरिक , आर्थिक संबंधों को मजबूत किया जा सके | इस नीति पर चलते हुए भारत ने बीते कुछ बरसों में श्रीलंका, सिंगापुर, थाईलैंड  सरीखे देशों के साथ अपने सम्बन्ध मधुर किये हैं और अब इस कड़ी में  जापान भारत के लिए अहम कड़ी साबित हो सकता है  जिससे भारत जापान सम्बन्ध के आने वाले दिनों में  और प्रगाढ़ होने की उम्मीद बंध रही है | 

Thursday, 19 October 2017

आस्था का प्रतीक दिवाली


हिन्दू  परंपरा में त्यौहार से आशय  उत्सव और  हर्षोल्लास से लिया जाता है ।  अपने देश की बात  की जाए  तो यहाँ मनाये जाने वाले त्योहारों में विविधता में एकता के दर्शन होते हैं । यहाँ मनाये जाने वाले सभी त्योहार कमोवेश परिस्थिति के अनुसार अपने रंग , रूप और आकार में भिन्न हो सकते हैं लेकिन इनका अभिप्राय आनंद की प्राप्ति ही होता है । अलग अलग धर्मों में त्यौहार मनाने के विधि विधान भिन्न हो सकते हैं लेकिन सभी का मूल मकसद बड़ी आस्था और विश्वास  का संरक्षण होता है । सभी त्योहारों से कोई न कोई पौराणिक कथा जुडी हुई है  जिनमे से सभी का सम्बन्ध आस्था और विश्वास से है । यहाँ पर यह भी कहा जा सकता है इन त्योहारों की  पौराणिक कथाएँ भी प्रतीकात्मक होती हैं । कार्तिक मॉस की अमावस के दिन दीवाली का त्यौहार मनाया जाता है । दीवाली का त्यौहार महज त्यौहार ही नहीं है इसके साथ कई पौराणिक गाथाए भी  जुडी हुई हैं  ।

दीवाली की शुरुवात आमतौर पर कार्तिक मॉस की कृष्ण पक्ष त्रयोदशी के दिन से होती है जिसे धनतेरस कहा जाता है । इस दिन आरोग्य के देव धन्वन्तरी की पूजा अर्चना का विधान है । इसी दिन भगवान  को प्रसन्न  रखने के लिए नए नए बर्तन , आभूषण खरीदने का चलन है । यह अलग बात है मौजूदा दौर में  बाजार अपने हिसाब से सब कुछ तय कर रहा है और पूरा देश चकाचौंध के साये में जी रहा है जहां अमीर के लिए दीवाली ख़ुशी का प्रतीक है वहीँ गरीब आज भी दीवाली उस उत्साह और चकाचौध के साये में जी कर नहीं मना  पा रहा है जैसी उसे अपेक्षा है क्युकि समाज में अमीर और गरीब की खाई दिनों दिन गहराती ही जा रही है । 

 धनतेरस के दूसरे दिन नरक चौदस मनाई जाती है जसी छोटी दीवाली भी कहते हैं । इस दिन किसी पुराने दिए में  सरसों के तेल में पांच  अन्न के दाने डालकर घर में जलाकर रखा जाता है जो दीपक यम दीपक कहलाता है । ऐसा माना जाता है इस दिन कृष्ण ने नरकासुर रक्षक का वध कर उसके कारागार से तकरीबन 16000 कन्याओं को मुक्त किया था । तीसरे दिन अमावस की रात दीवाली का त्यौहार उत्साह के साथ मनाया जाता है । इस दिन गणेश जी और लक्ष्मी की स्तुति की जाती है । दीवाली के बाद अन्नकूट मनाया जाता है । लोग इस दिन विभिन्न प्रकार के व्यंजन बनाकर गोवर्धन की पूजा करते हैं । पौराणिक मान्यता है कृष्ण ने नंदबाबा और यशोदा और ब्रजवासियों को इन्द्रदेव की पूजा करते देखा ताकि इन्द्रदेव ब्रज पर मेहरबान हो जाये तो उन्होंने ब्रज के वासियों को समझाया कि जल हमको गोवर्धन पर्वत से मिलता है जिससे प्रभावित होकर सबने गोबर्धन को पूजना शुरू कर दिया । यह बात जब इंद्र को पता चली तो वह आग बबूला हो गए और उन्होंने ब्रज को बरसात से डूबा देने की ठानी  जिसके बाद भारी वर्षा का दौर बृज में देखने को मिला ।  सभी  रहजन कृष्ण के पास गए और तब कान्हा ने तर्जनी पर गोबर्धन पर्वत उठा लिया । पूरे सात दिन तक  भारी वर्षा हुई पर ब्रजवासी गोबर्धन पर्वत के नीचे सुरक्षित रहे । सुदर्शन चक्र ने उस दौर में बड़ा काम किया और वर्षा के जल को सुखा दिया । बाद में इंद्र ने कान्हा से माफ़ी मांगी और तब सुरभि गाय ने कान्हा का दुग्धाभिषेक किया जिस मौके पर 56 भोग का आयोजन नगर में किया गया । तब से गोबर्धन पर्वत और अन्नकूट की परंपरा चली आ रही है । 


 शुक्ल द्वितीया को भाई दूज मनायी जाती है । मान्यता है यदि इस दिन भाई और बहन यमुना में स्नान करें तो यमराज आस पास भी नहीं फटकते । दीवाली में दिए जलाने की परंपरा उस समय से चली आ रही है जब रावन की लंका पर विजय होने के बाद राम अयोध्या लौटे थे । राम के आगमन की ख़ुशी इस पर्व में देखी जा सकती है । जिस दिन मर्यादा पुरुषोत्तम राम अयोध्या लौटे थे उस रात कार्तिक मॉस की अमावस थी और चाँद बिलकुल दिखाई नहीं देता था । तब नगरवासियों में अयोध्या को दीयों की रौशनी से नहला दिया । तब से यह त्यौहार धूमधाम से  मनाया जा रहा है । ऐसा माना जाता है दीवाली की रात यक्ष अपने राजा कुबेर के साथ हस परिहास करते और आतिशबाजी से लेकर पकवानों की जो धूम इस त्यौहार में दिखती है वह सब यक्षो की ही दी हुई है । वहीँ कृष्ण भक्तों की मान्यता है इस दिन कृष्ण ने अत्याचारी राक्षस नरकासुर का वध किया था । इस वध के बाद लोगों ने ख़ुशी में घर में दिए जलाए । एक पौराणिक कथा के अनुसार भगवान् विष्णु ने नरसिंह रूप धारण कर हिरनकश्यप का वध किया था और समुद्र मंथन के पश्चात प्रभु धन्वन्तरी और धन की देवी लक्ष्मी प्रकट हुई जिसके बाद से उनको खुश करने के लिए यह सब त्योहार के रूप में मनाया जाता है । वहीँ  जैन मतावलंबी मानते हैं कि जैन धरम के 24 वे तीर्थंकर महावीर का निर्वाण दिवस भी दिवाली को हुआ था । बौद्ध मतावलंबी का कहना है बुद्ध के स्वागत में तकरीबन 2500 वर्ष पहले लाखो अनुयायियों ने दिए जलाकर दीवाली को मनाया । दीपोत्सव सिक्खों के लिए भी महत्वपूर्ण है । ऐसा माना जाता है इसी दिन अमृतसर में स्वरण मंदिर का शिलान्यास हुआ था और दीवाली के दिन ही सिक्खों के छठे गुरु हरगोबिन्द सिंह को कारागार से रिहा किया गया था । आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद  ने 1833 में दिवाली के दिन ही प्राण त्यागे थे । इस लिए  उनके लिए भी इस त्यौहार का विशेष महत्व है । 



भारत के सभी  राज्यों में दीपावली धूम धाम के साथ मनाई जाती है । परंपरा के अनुरूप इसे मनाने के तौर तरीके अलग अलग बेशक हो सकते हैं लेकिन आस्था की झलक सभी राज्यों में दिखाई देती है । गुजरात में नमक को लक्ष्मी का प्रतीक मानते हुए जहाँ इसे बेचना शुभ माना जाता है वहीँ राजस्थान में दीवाली के दिन रेशम के गद्दे बिछाकर अतिथियों के स्वागत की परंपरा देखने को मिलती है । हिमाचल में आदिवासी इस दिन यक्ष पूजन करते हैं तो उत्तराखंड में थारु आदिवाई अपने मृत पूर्वजों के साथ दीवाली मनाते  हैं । बंगाल में दीवाली को काली  पूजा के रूप में मनाया जाता है ।  देश के साथ ही विदेशों में भी दीवाली की धूम देखने को मिलती है । ब्रिटेन से लेकर अमरीका तक में यह में दीवाली  धूम के साथ मनाया जाता है ।  विदशों में भी धन की देवी के कई रूप देखने को मिलते हैं । धनतेरस को लक्ष्मी का समुद्र मंथन से प्रकट का दिन माना जाता है । भारतीय परंपरा उल्लू को लक्ष्मी का वाहन मानती है लेकिन महालक्ष्मी स्रोत में गरुण अथर्ववेद में हाथी को लक्ष्मी का वाहन बताया गया है  । प्राचीन यूनान की महालक्ष्मी एथेना का वाहन भी उल्लू ही बताया गया है लेकिन प्राचीन यूनान में धन की अधिष्ठात्री देवी के तौर पर पूजी जाने वाली हेरा का वाहन मोर है । भारत के अलावा विदेशों में भी लक्ष्मी पूजन के प्रमाण मिलते हैं । कम्बोडिया में शेषनाग पर आराम कर रही विष्णु जी के पैर दबाती एक महिला की मूरत के प्रमाण बताते हैं यह लक्ष्मी है ।   प्राचीन यूनान के सिक्कों पर भी लक्ष्मी की आकृति देखी जा सकती है । रोम में चांदी  की थाली में लक्ष्मी की आकृति होने के प्रमाण इतिहासकारों ने दिए हैं । श्रीलंका में भी पुरातत्व विदों  को खनन और खुदाई में कई भारतीय देवी देवताओं की मूर्तिया मिली हैं जिनमे लक्ष्मी भी शामिल है । इसके अलावा थाईलैंड , जावा , सुमात्रा , मारीशस , गुयाना , अफ्रीका , जापान , अफ्रीका जैसे देशों में भी इस धन की देवी की पूजा की जाती है । यूनान में आइरीन , रोम में फ़ोर्चूना , ग्रीक में दमित्री को धन की देवी एक रूप में पूजा जाता है तो  यूरोप में भी एथेना मिनर्वा औरऔर एलोरा का महत्व है ।  

   समय बदलने के साथ ही बाजारवाद के दौर के आने के बाद आज बेशक इसे मनाने के तौर तरीके भी बदले हैं लेकिन आस्था और भरोसा ही है जो कई दशकों तक परंपरा के नाम पर लोगों को एक त्यौहार के रूप में देश से लेकर विदेश तक के प्रवासियों को एक सूत्र में बाँधा है । बाजारवाद के इस दौर में  घरों में मिटटी के दीयों की जगह आज चीनी उत्पादों और लाइट ने ले ली है लेकिन यह त्यौहार उल्लास का प्रतीक तभी बन पायेगा जब हम उस कुम्हार के बारे में भी सोचें  जिसकी रोजी रोटी मिटटी के उस दिए से चलती है जिसकी ताकत चीन के सस्ते दीयों ने  आज छीन ली है ।  हम पुराना वैभव लौटाते हुए यह तय करें कि कुछ दिए उस कुम्हार के नाम  इस दीवाली में खरीदें जिससे उसकी भी आजीविका चले और उसके घर में भी खुशहाली आ सके । इस त्यौहार में भले ही महानगरों में आज  चकाचौंध का माहौल है और हर दिन अरबों के वारे न्यारे किये जा रहे हैं लेकिन सरहदों में दुर्गम परिस्थिति में काम करने वाले जवानों के नाम भी हम एक दिया जलाये जो दिन रात सरहदों की निगरानी करने में मशगूल हैं  और अभी भी दीपावली अपने परिवार से दूर रहकर मना  रहे हैं । इस दीवाली पर हम यह संकल्प भी करें तो बेहतर रहेगा यदि इस बार की दीवाली हम पौराणिक स्वरुप में मनाते हुए स्वदेशी उत्पादों का इस्तेमाल करें । पटाखों के शोर से अपने को दूर करते हुए पर्यावरण का ध्यान रखें और कुम्हार के दीयों से  अपना घर रोशन ना करें बल्कि समाज को भी नई राह दिखाए  तो तब कुछ बात बनेगी ।

Tuesday, 29 August 2017

गुरुनानक के पिता कालू मेहता ने जब अपने बेटे नानक को व्यापार करने के लिए 20 रुपये दिए तो गुरूजी ने उन पैसों से व्यापार का सौदा न खरीदकर भूखे साधुओं को भोजन करा दिया था | पिता के थप्पड़ मारने पर गुरुनानक ने कहा था  मैं दुनिया में कोई झूठा सौदा भी  नहीं करना चाहता हूँ | उन रुपयों से साधुओं की भूख मिटाकर मैंने सच्चा सौदा किया है लेकिन किसे पता था  सच्चे  सौदे और गुरु के नाम पर खुद को राम रहीम और इंसा कहने वाला गुरुमीत एक दिन अपनी काली करतूतों से न केवल खुद को बल्कि पूरी मानवता  को शर्मसार कर देगा | धर्म के मायावी तिलस्म में आस्था के दुष्‍परिणाम क्या होते हैं, यह हमने  रामपाल के डेरे में देखा | यही नहीं खुद को बड़ा बापू बताने वाला आसाराम भी किस तरह अपनी मायावी दुनिया के मोहपाश में महिलाओं को यूज करता था यह भी हम देख चुके हैं |  बीते बरस से ही बापू  अपने बेटे नाराणस्वामी के साथ सलाखों की हवा खा रहे हैं | आशाराम बापू,  राधे मां , गुरुमीत , इच्छाधारी  सरीखे  धर्मगुरूओं ने धर्म और नैतिकता के नाम पर जो कुछ भी किया है वह अक्षम्य है  और  कभी संत महात्माओं के लिए जाना जाने वाला भारत आज  इन राम रहीम  सरीखे पाखंडी बाबाओं के कारण शर्मसार हो रहा है | 

खुद को संत मानने वाला  बाबा गुरमीत राम-रहीम के बारे में कल सुनारिया जेल में सजा का बड़ा फैसला आ गया जिसमें साध्वियों से उत्पीड़न के दो अलग अलग मामलों में उसे  10 -10  बरस की सजा सुनाई गयी है | शुक्रवार को जैसे ही पंचकूला में वह बलात्कार के दोषी पाए गए उसके बाद से ही हरियाणा , पंजाब और दिल्ली में हिंसा का जैसा तांडव मचा उसने पहली बार राजनेताओं और बाबाओं की साठगांठ  के चेहरे को सही मायनों  में सबके सामने उजागर कर दिया | पंचकूला , सिरसा सरीखे शांत शहर हिंसा की आग में जैसे झुलसे उसने हरियाणा की मनोहर लाल सरक़ार को भी कटघरे में खड़ा किया | बाबा के समर्थकों ने जिस अंदाज में तांडव मचाया उसकी मिसाल देखने को नहीं मिलती | पार्क से लेकर रेल , बस से लेकर निजी वाहन हर किसी को आग के हवाले कर दिया गया | लोग अपने घरों में दुबक कर रहने लगे | बाजार बंद हो गया तो शहर में कर्फ्यू सरीखा माहौल देखने  को मिला |  बाबा के समर्थकों ने गिरफ्तारी के नाम पर सडकों में हिंसा का जैसा नंगा नाच पुलिस और प्रशासन के सामने किया उसने सभ्य कहे जने वाले भारतीय  आचरण पर सवाल खड़े कर दिए | लोकतंत्र के चौथे सतम्भ पत्रकारों  को भी बाबा के अनुयायियों  ने कहीं का नहीं छोड़ा और मीडिया कर्मियों से अभद्रता की और कई ओ बी वैन को फूंक दिया | पंचकूला  सरीखा हरियाणा का शांत माना जाने वाला शहर कुछ ही घंटों में ख़ाक हो गया | 

 बाबा ने अपने फैसले के आने से  पहले ही उत्तेजक माहौल बनाकर देश की न्याय प्रणाली को यह चेतावनी देने की कोशिश की कि यदि निर्णय उनके  खिलाफ आया तो देश अराजकता के हवाले कर दिया जाएगा। उसके  सभी भक्त भारत का नामोनिशॉन  मिटा देंगे। किसी जीवंत  लोकतंत्र में ऐसी हिंसा किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं की जा सकती जहाँ न्यायपालिका के निर्णय को ठेंगा दिखाते हुए लोग कानून को अपने हाथ में ले लें |  शुक्रवार को जब अदालत ने बाबा गुरमीत को दोषी करार दिया तो पांच मिनट के भीतर हरियाणा समेत दिल्ली, हिमाचल, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में अनेक जगहों से आगजनी व तोड़फोड़ की घटनाएं सामने आने लगीं। देखते-देखते करोड़ों की संपत्ति नष्ट कर दी गई और नियंत्रण के उपाय में पुलिस व सुरक्षाबलों की गोलीबारी में 38  लोगों की मौत हुई और एवं 250 से अधिक लोग घायल हो गए। किसी भी सभ्य समाज में ऐसी हिंसा नहीं होनी चाहिए | बाबा के बलात्कार मामले में फैसला आने से ठीक पहले से ही पंचकूला में बाबा के समर्थक इकट्ठा  होने शुरू हो गए थे | इस मामले में  हरियाणा की मनोहरलाल सरकार ने पिछली घटनाओं से सबक नहीं लिया | रामपाल और जाट आंदोलन के दौरान भी हमने देखा किस तरह सरकार इससे निपटने में नाकाम साबित हुई और बाबा रामरहीम के मसले पर भी पूरी सत्ता , पुलिस और प्रशासन बाबा के आगे नतमस्तक हुई दिखी | जबकि चंडीगढ़ के डी  जी पी ने 22 अगस्त को ही  डेरा के अनुयायियों के इरादों को भांप लिया था | सरकार चाहती तो वह फैसले से पहले  ख़ामोशी से अपना काम डेरा समर्थकों को पंचकूला  कूच  करने से पहले रोक सकती थी लेकिन ऐसा नहीं हुआ पंचकूला में बाबा के सैकड़ों समर्थकों  ने बड़ी बड़ी गाड़ियों  में अपना शक्ति  प्रदर्शन  किया |   डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख राम रहीम पर यौन शोषण का आरोप सिद्ध हुआ तो उनके सर्मथकों ने उत्तरी भारत में हिंसा का तांडव रचकर जता दिया  कि अदालती आदेश के उनके लिए कोई मायने नहीं हैं और अदालत उनके बाबा पर फैसला नहीं कर सकती क्युकि उनका बाबा गॉड ऑफ़ मेसेंजर है | 

हैरानी की बात यह है कि चंडीगढ़ प्रशासन और हरियाणा एवं पंजाब की सरकारों को पता था कि 24 अगस्त को यह फैसला आना है और उनके समर्थक तीन दिन पहले से ही पंचकूला में धारा 144 लगाए जाने के बाबजूद लाखों की संख्या में आना शुरू हो गए तब उनको नियंत्रित क्यों नहीं किया गया। बड़ी संख्या में पुलिस के अलावा अर्ध-सैनिक बलों 15 हजार जवान तैनात थे। थल सेना गश्त कर रही थी। बाबजूद बाबा के समर्थक लाठी, हथियार और पेट्रोल व डीजल, ऐ के 47  लेकर संवेदनशील क्षेत्रों में घुसे चले आए। खुफिया एजेंसियां को भी इनकी मंशा की भनक तक नहीं लग पाई। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि एजेंसियों के अधिकारी-कर्मचारियों ने क्षेत्र में जाकर न तो समर्थकों से बातचीत की और न ही उनकी तलाशी ली। यहाँ तक की डेरा अनुयायियों ने एक रणनीति के तहत अपने लोगो के खाने पीने के पूरे बंदोबस्त किये हुए थे | 

डेरा मामले में  खुफिया एजेंसियों की बड़ी चूक है  साथ ही सरकार की डेरा से निकटता के चलते पुलिस भी तमाशबीन बानी रही  इसलिए उन्हें भी इस हिंसा के लिए दोषी ठहराए जाने की जरूरत है। धारा 144 लगाने का मतलब  है 4  से  5 लोग एक ग्रुप में साथ साथ नहीं रह सकते |लेकिन हरियाणा के पर्यटन मंत्री पंडित रामविलास शर्मा  ने तो हद ही कर दी | मीडिया  के सामने आकर उन्होंने यह  कहा 144  धारा  डेरा अनुयायियों पर लागू  नहीं होती | वह तो शांतिप्रिय लोग हैं और उनके खाने पीने की व्यवस्था करना सरकार का काम है | राजनीती कैसे इन बाबाओं के सामने नतमस्तक हो जाती है यह  इस  प्रकरण से हम बखूबी समझ सकते हैं | साफ़ है खट्टर सरकार भी अपने वोट बैंक के मद्देनजर डेरा अनुयायियों पर सख्ती नहीं बरती  | यहाँ तक कि पुलिस भी डेरा  से आने वाले लोगों की आवभगत में जुटी रही | इससे ज्यादा  शर्मनाक बात क्या हो सकती है इस पूरे मामले में हरियाणा सरकार को कड़ी फटकार कोर्ट की तरफ से पड़ी जिसमे उसने साफ़ किया सरकार इस मामले पर सख्ती दिखाए और अगर वह ऐसा नहीं करती तो क्यों ना डी जी पी को ही बर्खास्त  कर दिया जाए | कोर्ट ने तो हिंसा करने वालों को सीधे गोली मारने के आदेश भी दिए थे लेकिन इसके बाद भी सरकार अगर रेंग नहीं पायी तो इसे  वोट बैंक के आईने में देखना होगा जहाँ भाजपा ,  कांग्रेस , इनेलो सब डेरे के आसरे अपनी चुनावी बिसात हर चुनाव में अपने अनुकूल बिछाते रहे | पंजाब की तकरीबन  27 तो हरियाणा  की तकरीबन तीन  दर्जन सीटों पर डेरा का ख़ास प्रभाव है | पडोसी राज्य राजस्थान में गंगानगर संभाग भी पूरी तरह डेरा के वोट से घिरा हुआ है जहाँ राम रहीम के बिना  चुनाव में पत्ता भी नहीं हिलता |  डेरा हर चुनाव में जिस पार्टी की ओर इशारा करता है हवा का रुख उस पार्टी की तरफ मुड़  जाता है और वह पार्टी सत्ता का सुख भोगती है | सरकार खट्टर की रही हो या चौटाला या हुड्डा की गाहे बगाहे डेरा के आगे हरियाणा  की पूरी सरकारें नतमस्तक रही हैं | 

1948 में शाह मस्ताना ने डेरा सच्चा सौदा की नीव रखी | 90  के दशक में गुरमीत राम रहीम ने जब से गद्दी  संभाली तब से डेरा में पांच सितारा संस्कृति न केवल हावी हुई बल्कि गुरमीत का डेरा विवादों से चोली दामन का साथ रहा | सिरसा में डेरा सच्चा सौदा का ये आश्रम करीब सात सौ एकड़ में फैला हुआ है। सबसे खास बात ये है कि इस आश्रम के अंदर ही सबकुछ है। गुरमीत राम रहीम का मायालोक ऐसा है जहां एक तरफ आस्था का आश्रम है और दूसरी तरफ ऐश का अड्डा। 700 एकड़ में बसा एक ऐसा शहर, जहां पत्ता भी डोलता है तो राम रहीम के इशारे पर। यह अपने आप में एक शहर से कम नहीं। आश्रम में एक हवाई पट्टी भी है, जिसपर बाबा राम रहीम का प्लेन लैंड और टेकऑफ करता है। महंगी बाइक और इंपोर्टेड कार गुरमीत बाबा राम रहीम के लिए मानो जिद की हद तक के शौक हैं। उसकी ऐशगाह में उनके पास महंगी कारों का एक लंबा चौड़ा काफिला है। बड़ा स्टेडियम भी है जहाँ  सुविधाएं हैं | इस पाखंडी बाबा के गैराज में मर्सडीज, बीएमडब्ल्यू, ऑडी, लेक्सस और टोयोटा जैसी कई कारें  हैं | जिस एसयूवी से राम रहीम बाहर सड़कों पर निकलते हैं, वो गाड़ी  बुलेटप्रूफ भी है और उसमें जैमर भी लगा हुआ है।यही नहीं बाबा को सरकार  ने जेड प्लस की सुरक्षा भी मिलती  थी | यह बाबा मॉडर्न है | विलासिता और अय्याशियों का शौक ऐसा जिसकी गुफा में महिलाएं ही महिलाएं हैं | बाबा की दुष्कर्म की दुनिया  ऐसी जहाँ उनके दुष्कर्म को पिताजी की माफ़ी कहा जाता था | बाबा ने अपने इस आश्रम में अपनी रसूख और सरकार में दखल का फायदा उठाने का कोई मौका नहीं छोड़ा |  

 डेरा सच्चा सौदा की शुरुआत 1948 में एक संत शाह मस्ताना ने की थी। लेकिन 1990 में डेरा की सत्ता संभालने के बाद ये राम रहीम की जागीर बन गया। 1998 में बेगू गाँव के एक बच्चे की डेरा के वाहन की चपेट में आने से मौत हो गई | तब डेरा  प्रमुख ने खबर छापने पर खासा बवाल किया था|   2002 में बाबा के खिलाफ उनकी शिकायत पर दुष्कर्म व यौन उत्पीड़न का प्रकरण दर्ज किया गया था।  तब साध्वियों ने तत्कालीन प्रधानमंत्री वाजपेयी को पत्र लिखकर बाकायदा शिकायत की थी | वाजपेयी  को लिखी उस गुमनाम चिठ्ठी ने डेरा की संगीन दीवारों का सच सबके सामने  लाने का काम किया | यही नहीं 2002 में डेरा समिति के अहम् सदस्य  रणजीत सिंह का क़त्ल भी किया गया | कहा गया  रणजीत ने ही साध्वियों से चिट्ठी लिखवाई |   | उस दौर में  वाजपेयी ने चिट्ठी को सर्वोच्च न्यायलय के न्यायाधीश के पास भेज दिया था जिसके बाद सिरसा के मजिस्ट्रेट को जांच के आदेश दिए गए |  2002 में साध्वियों की आवाज को नई धार पूरा सच   अखबार में देने वाले रामचंद्र  छत्रपति  ने दी  |  बलात्कार की खबर छपने के बाद बाबा  के   समर्थकों ने 5 गोलियां मारकर उनकी  हत्या कर दी और अपोलो अस्पताल में 28  दिन जिंदगी और मौत से जूझते छत्रपति के बयान पुलिस तक ने दर्ज नहीं करवाया इससे बड़ी त्रासदी इस सिस्टम की क्या हो सकती है जब राजनेता और डेरा प्रमुख मिलकर समानांतर सरकारें चलाया करते हो | 2007 में ही डेरा प्रमुख राम रहीम ने गुरु गोबिंद सिंह की वेशभूषा पहनकर अपने शिष्यों को अमृतपान करवाया था जिससे सिख समाज बड़ा आहत भी हुआ था | यही नहीं राम रहीम पर कई लोगों को नपुंसक बनाए जाने के आरोप भी लगे हैं जिन पर फैसला आना अभी बाकी है | साथ ही पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की हत्या की अहम् सुनवाई भी अब 25  सितम्बर को है जहाँ उन्हें न्याय मिलने की उम्मीद है | साध्वी बलात्कार के मामले में राम रहीम जेल की सलाखों के पीछे हैं इसके पीछे पूरा सच अखबार की सबसे बड़ी भूमिका है | सलाम रामचन्द्र छत्रपति को जिन्होंने सिरसा के अपने छोटे से अखबार में राम रहीम की काली करतूतों  और बाबा की गुफा के सच को अपने अखबार के माध्यम से उजागर किया | अखबार कोई भी बड़ा या छोटा नहीं होता है शायद यही काम रामचंद्र की खबर ने  पूरा  सच  अखबार में  लिखकर कर दिया | इसके बाद 2005 -06 में सी बी आई  के अधिकारी बदलते रहे और जांच सही से शुरू नहीं हो पायी | उस दौर में हरियाणा में चौटाला की सरकार थी जिनकी निकटता डेरा के साथ थी जिसके  चलते जांच शुरू नहीं हो पायी | चौटाला के बाद हुड्डा भी रामरहीम के साथ वोट बैंक के आसरे गलबहियां करते रहे जिसके चलते  मामले को सी बी आई के सामने रफा दफा करने की और प्रलोभन देने की  कोशिशें की गयी | वो तो शुक्र रहा सी बी आई  के अफसर सतीश डागर का जिन्होंने  बिना दबाब के मामले को अंजाम तक पहुंचा दिया | उन्होंने न केवल साध्वियों को  गवाही के लिए तैयार किया बल्कि अम्बाला से यह केस पंचकूला तक  विशेष सी बी आई अदालत तक पहुंचा दिया | 3  बरस बाद ट्रायल इस मामले में शुरू हुआ |  2016 में पूरे 52 गवाह  , 15 वादी और 37 प्रतिवादी सामने आये और  पीड़ित साध्वियों के बयान  2009 -10  में दर्ज हुए  | राम  रहीम को दोषी ठहराने के लिए दो पीड़ित साध्वियों ने 15 साल कानूनी लड़ाई लड़ी जिसके लिए उनको भी सलाम | सच में इस फैसले ने  तो साबित ही कर दी है कानून के हाथ बहुत लम्बे  होते हैं और कोई भी अपराधी पुलिस की पकड़ से बहार नहीं जा सकता  चाहे उसकी रसूख कितनी ही ऊँची क्यों ना हो | 

25 अगस्त 2017 के दिन को हमेशा याद रखा जाएगा क्युकि  विशेष सीबीआई जज जगदीप सिंह ने राम रहीम  को बलात्कार के मामले में दोषी पाया और 28 अगस्त  2017  भी हमेशा याद रखा जायेगा जहाँ सुनारिया जेल में ही कोर्ट  लगा और बाबा को 10-10  साल की सजा हुई | साध्वियों के बयानों और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर यह  इल्जाम सही साबित हुआ। बाबजूद समर्थकों ने पीड़ित साध्वियों का पक्ष लेने की बजाए उस बाबा का साथ दिया, जिसने बाबा का रूप रखकर जघन्य अपराध किया था। भारत में यह बेहद दुखद  स्थिति है कि भक्तगण धर्म के मायालोक में इतने अंधविश्वासी हो जाते हैं कि वे अपना सही-गलत का विवेक तो खोते ही हैं, कानून भी अपने हाथ में लेकर, अपने ही पैरों में कुल्हाड़ी मारने का काम कर देते हैं। खद बात यह है बलात्कार  में दोषी पाए जाने के बाद भी भक्तों की नज़रों में  राम रहीम जैसे  विलासी लोग दैवीय शक्ति के  प्रतीक बन जाते हैं। नतीजतन इनके सम्मोहन में आकर लोग अंधेपन का शिकार होकर अपने जीवन को पंगु बना देने का काम कर डालते हैं।   राम रहीम जैसे बाबाओं को महिमामंडित करने का काम हमारे राजनेता भी उनकी शरण में जाकर करते हैं। इस कारण आम जनता का मानस इन्हें चमत्कारी मानने का भ्रम पाल लेती है। मिसाल देखिये 25  अगस्त  को राम रहीम पर फैसले आने से पहले हरयाणा के तो ताकतवर मंत्री रामविलास शर्मा , अनिल विज बाबा के डेरा में सिरसा में मिले भी थे जहाँ 51 लाख का चंदा हरियाणा सर्कार की तरफ से उन्होंने दिया |  2014 में मोदी  के सत्ता में आते आखिरी पलों में डेरा ने खुलकर भाजपा को वोट देने का ऐलान अपने समर्थकों के बीच किया था जिसका असर यह हुआ केंद्र और राज्य के चुनाव में भी भाजपा का कमल हरियाणा में खिला | 

सुनारिया जेल में कल  सीबीआई अदालत ने जो फैसला राम रहीम पर  सुनाया है उसने एक साथ कई चेहरों से नकाब उठा दिया। धर्म के इस  पाखंडी बाबा  का धर्म  से कोई लेना देना नहीं है और ना ही आध्यात्म से। लोगों की भावनाओं और आस्था को भड़काकर इस शख्स ने अय्याशी का साम्राज्य खड़ा किया है। यह शख्स खुद को आस्था का अवतार, लोगों का भगवान कहता था। फिल्में दिखाकर कुछ भी कर गुजरने का दावा करता था। सीबीआई की विशेष अदालत के एक फैसले ने साबित कर दिया कि लोगों की आस्था ने जिसे अब तक एक पहुंचा हुआ बाबा माना था, वो असल में  बलात्कारी से ज्यादा कुछ भी नहीं था ।

Tuesday, 22 August 2017

जिनपिंग की ब्रांडिंग की चीनी चाल




चीन अपनी बड़ी अर्थव्यवस्था के चलते दुनिया में ताकतवर बनने का सपना  कमोवेश हर  दिन देखता ही  जा रहा है और शायद यही वजह है इस दौर में  उसकी  दबंगई भी पूरी दुनिया में  बढ़ती जा रही है।  दुनिया की सबसे बड़ी ताकत के रूप में स्थापित करने की चीन की ये शातिर चालबाजियां  जगजाहिर है। चीन के अपने सभी पड़ोसी देशों के साथ इस समय सीमा विवाद है | पूरी दुनिया इस समय चीन की विस्तारवादी नीति की जोर शोर से चर्चा तो है लेकिन इन सब विवादों को हवा देने के पीछे चीन की अंदरूनी राजनीति की भी जड़  है | असल  में  इसी बरस  चीन की सत्ता में  बड़ा बदलाव  तय माना जा रहा है | कहा तो यह भी जा रहा है  शी जिनपिंग  राष्ट्रवाद तले  किसी तरह अपने दूसरे कार्यकाल को बरकरार रखने की जुगत में हैं लेकिन दूसरे कार्यकाल के लिए भी उनकी कुर्सी तभी बरकरार रह पायेगी जब वह पार्टी के महासचिव चुने जायेंगे |   इसी के साथ हाल के कुछ महीनों में  पोलित ब्यूरो की स्टैंडिंग कमेटी और  सदस्यों का चुनाव भी होना है । शी पोलित ब्यूरो में अपनी स्थिति दिनों दिन  मजबूत रखना चाहते हैं।  सुन जेंगसई ने इस दौर में शी  की परेशानियों को बढ़ाया हुआ है क्युकि चीन की सत्ता के गलियारों में जिनपिंग का उत्तराधिकारी माना जाता था। चीनी सत्ता के केंद्र 25 सदस्यीय पोलित ब्यूरो के वह सबसे युवा सदस्य थे। इस बार उनका सात सदस्यीय स्टैंडिंग कमेटी में जाना तय था  लेकिन जिनपिंग ने इससे पहले ही उनकी राजनीति को झटके में  खत्म कर दिया। उन्होंने अधिवेशन से पहले ही  जेंगसई को  हटा दिया । यही नहीं उनके खिलाफ पार्टी नियमों के खिलाफ काम करने के आरोप में जांच भी बिठा दी । जिनपिंग चीन में  अब हर दिन अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत कर रहे हैं। दुनिया  के साथ विवाद के दौरान राष्ट्रवाद  तले वह अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने में लगे हुए हैं ।

2012 के बरस में भी  राष्ट्रपति बनने के बाद जिनपिंग ने  लोकप्रिय नेता बो जिलाई को हटा कर जेल में डलवा दिया था। उन्हें भी जिनपिंग का उत्तराधिकारी माना जा रहा था।  मौजूदा दौर में भी  भारत के साथ सीमा विवाद और दुनिया के तमाम विवादों के बीच शी  अपने अगले कार्यकाल के रास्ते की बाधा को हटाने की पूरी कोशिश करते देखे जा सकते हैं |  चीन की ओर से उसका सरकारी मीडिया दुनिया  के खिलाफ  आक्रामक माहौल बनाने में जुटा है ताकि  शी  की छवि को और अधिक उभारा जा सके | 

जिनपिंग अपनी ब्रांडिंग किस तर्ज पर कर रहे हैं यह इस बात से समझा जा सकता है चीनी  अर्थव्यवस्था की खस्ता माली हालत के बीच हाल ही में चीन ने भारत के पड़ोसियों को साथ लेकर  वन बेल्ट वन रोड की शुरुआत की जिसमें सौ से अधिक देश के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया | चीन कूटनीतिक रास्ते के आसरे विस्तारवादी अपनी पुरानी नीति पर चल रहा है जिसमें वहां का मीडिया शी के साथ कदमताल कर रहा है | इससे चुनाव के मोर्चे पर खुद जिनपिंग की मजबूत स्थिति हो रही है |  डोकलाम विवाद में भी भारत ने चीन को पटखनी दी है| हमारे सैनिक वहां भूटान के साथ मिलकर चीन के सड़क निर्माण पर सवाल उठा रहे हैं  और  दुनिया चीन के हर कदम को उसकी विस्तारवादी नीति के अक्स में देख रही है | चीन की विस्तारवादी नीति के कारण दुनिया के कई देश उससे परेशान हैं |  

भारत चीन के बीच डोकलाम सीमा पर पिछले कई महीने से चल रहा विवाद थमने के कगार पर पहुँच रहा है लेकिन चीनी मीडिया लगातार भारत को युद्ध की धमकी दे रहा है लेकिन हाल के दिनों में अब  चीन के वाटर बम को लेकर कयासों का बाजार गरम है |  चीन की विस्तारवादी नीति के अक्स में अगर झांकें तो यह आशंकाएं निर्मूल हैं  |  असल में  मीडिया में ऐसी खबरें सरकारी मीडिया को साधकर प्लांट की जा रही हैं कि चीन भारत से निपटने के लिए अब  'वॉटर बम' जैसी साजिश रच रहा है, जिससे भारत के बड़े इलाके को तबाह किया जा सके|  अपने सरकारी मीडिया को साधकर चीन एस माहौल बना रहा है जैसे  चीन के  ऊंचाई पर बने हुए बड़े-बड़े बांध भारत के लिए कभी भी  तबाही का मंजर खड़ा कर सकते हैं | 

 तिब्बत से निकलकर  कई नदियां भारत में बहती हैं|  इन नदियों पर चीन ने बड़े-बड़े बांध बना रखे हैं इसलिए  चीन डोकलाम से ध्यान हटाने के लिए अब मीडिया को साधकर वाटर बम का नया दाव खेलने में लगा हुआ है |  अब तक इस बाते के कोई संकेत या सबूत तो नहीं मिले हैं जिससे ऐसा लगा हो  चीन अपने बांधों के दरवाजे खोलकर भारत में जल प्रलय लाने की साजिश रच रहा है, लेकिन  चीन सीधे युद्ध के बजाय मीडिया में शी के राष्ट्रवाद को ढालने में लगा हुआ है | इसके अक्स में देखें तो यहाँ भी उसकी विस्तारवादी नीति में राष्ट्रवाद का तड़का है और इससे सीधे युद्ध की आहट भले ही ना हो लेकिन चुनावी बरस में जिनपिंग अपनी खुद की स्थिति चीन  के सामने मजबूत कर लेंगे जिससे चुनावी बरस में वह अपनी छवि चीन के एक मजबूत नेता के तौर पर बना लेंगे |

कुछ महीने पहले चीन  की सेना अपना 90वां स्थापना दिवस मनाया जिसमें   चीन में पहली आर्मी डे परेड का आयोजन किया गया |  चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी दुनिया की सबसे बड़ी फौज है जिसने  अगस्त 2017 को  90 बरस पूरे कर लिए | इस मौके पर सैन्य दस्तों को संबोधित करते हुए जिनपिंग ने कहा, आज चीन को एक आधुनिक सेना की ज़रूरत पहले के मुकाबले कहीं ज़्यादा है. उन्होंने सेना से अपनी युद्धक क्षमता और बढ़ाने तथा राष्ट्रीय रक्षा व्यवस्था आधुनिक बनाने को कहा | यही नही जिनपिंग ने कहा पीएलए चीनी सीमा में घुसने वाली किसी भी सेना को हराने और चीन की संप्रभुता, सुरक्षा व राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने में सक्षम है| ऐसे संकेतों को भी अगर हम डिकोड करें तो साफ़ है शी राष्ट्रवाद के आईने में खुद को मजबूत नेता के तौर पर फिट करना चाहते हैं जिससे अगले बरस वह एक और कार्यकाल के लिए अपना रास्ता साफ़ कर सकें | चीनी राष्ट्रपति अक्सर राष्ट्रवाद की बात दोहराते हैं |  

चीन के साथ  अभी पूर्वी और दक्षिणी चाइना सी में भी काफ़ी विवाद है लेकिन  चीन ने साफ़ संकेत दिया है कि वह अहम क्षेत्रीय हितों को लेकर अपना क़दम पीछे नहीं खींचेगा | चीन अभी दुनिया के किसी देश के खिलाफ कोई बड़ा कदम नहीं उठाना चाहता  | चीन अगर कुछ गलत  करता है तो दुनिया में उसकी आलोचना होगी और महाशक्ति बनने के उसके सपनों को पंख नहीं लग पाएंगे इसलिए फिजा में राष्ट्रवाद की महक है और चीन का सरकारी मीडिया युद्ध के माहौल के बीच जिनपिंग की नए सिरे से ब्रांडिंग करने में लगा हुआ है | नजरें 2018 की तरफ लगी हैं |  यह तो वही बात है कहीं पे तीर कही पे निशाना | 

Sunday, 16 July 2017



रवि शास्त्री जब भारतीय क्रिकेट टीम के नए कोच बने तो सभी को उम्मीद थी पिछले कुछ समय से भारतीय टीम में चल रहा विवाद आखिरकार थम जाएगा, लेकिन सीएसी और रवि शास्त्री के बीच विवाद कम होने की जगह बढ़ता ही जा रहा है | असल में बीते दिनों बीसीसीआई ने रवि शास्त्री  को भारतीय क्रिकेट टीम का नया मुख्य कोच नियुक्त किया जबकि पूर्व दिग्गज तेज गेंदबाज जहीर खान को दो साल के लिए नया गेंदबाजी कोच और राहुल द्रविड़ को  विदेशी दौरे के लिए बल्लेबाजी सलाहकार नियुक्त किया । रवि शास्त्री तीसरी बार  भारतीय क्रिकेट टीम के साथ जुड़े हैं। इससे पहले वह  2004  में बांग्लादेश दौरे के दौरान क्रिकेट मैनेजर थे और इसके बाद अगस्त 2014  से जून 2016  तक उन्हें टीम निदेशक बनाया गया जिस दौरान भारत ने श्रीलंका के खिलाफ उसकी सरजमीं पर टेस्ट श्रृंखला जीती और 2015 में   विश्व कप तथा 2016  विश्व टी 20  के सेमीफाइनल में जगह बनाई।

कोच की दावेदारी में टक्कर शास्त्री  और वीरेंद्र सहवाग के बीच कांटे की  थी लेकिन शास्त्री  के पूर्व कार्यकाल को लेकर कप्तान विराट कोहली की सिफारिश के कारण मामला पूर्व भारतीय कप्तान के पक्ष में गया। अब शास्त्री 2019 विश्व कप  तक भारतीय टीम के कोच के  रूप में जुड़े रहेंगे | शास्त्री ने यह जिम्मेदारी  तरह सबको  साथ  लेकर चलने के  जैसे दावे किये उससे एक  बारगी ऐसा लग रहा था  अब भारतीय खिलाडी पुरानी बातों  को भूलकर नए सिरे से टीम भावना के साथ खेलेंगे लेकिन किसे पता था  कुछ दिनों बाद शास्त्री अपने  खुद किए  दावों  की  हवा निकाल देंगे |

असल में शास्त्री अपने साथ राहुल और जहीर खान जैसे अनुभवी खिलाडियों को नहीं देखना चाहते |  सचिन , सौरभ और  लक्ष्मण सरीखे महान  खिलाडियों से सजी  सीएसी ने  शास्त्री  को कोच बनाकर औपचारिकता निभाई लेकिन द्रविड़ और जहीर को भी सलाहकार बनाकर शास्त्री के पर क़तर दिए जो शास्त्री  नागवार गुजरा |  शास्त्री भी  टीम इंडिया के  सपोर्ट स्टाफ में अपने भरोसेमंद अरुण भारत को बॉलिंग कोच के रूप में  लेना चाहते थे  जिसके बाद   सुप्रीम कोर्ट की बनाई प्रशासकों की समिति के हेड विनोद राय ने  कहा  कि चीफ कोच के सपोर्ट स्टाफ पर आखिरी फैसला रवि शास्त्री  के हिसाब  से तय होगा जिसके बाद भरत अरुण को  श्रीलंका दौरे पर टीम इंडिया के गेंदबाजी की कमान दे दी गई  | इस फैसले ने  एक बार फिर कोच , सपोर्टिंग स्टाफ और सीएसी की जंग को सतह पर ला दिया है |  

सचिन तेंदुलकर, सौरव गांगुली और वीवीएस लक्ष्मण की क्रिकेट एडवायजरी कमेटी  ने रवि शास्त्री के साथ-साथ बतौर गेंदबाजी कोच जहीर खान और बतौर बल्लेबाजी कंसल्टेंट राहुल द्रविड़ के नाम की सिफारिश पर अपनी मुहर लगा दी थी तो सवाल है जब तीनों महान खिलाडियों ने अपना फैसला सुना दिया था तो फिर  फैसले पर विनोद राय सामने ऐसी  मजबूरी आन  पड़ी जो वह शास्त्री  मनमाकिफ़ स्टाफ चुनने की आज़ादी देने लगे और शास्त्री के भी दुबारा कोच बनने  के बाद भी खिलाड़ियों को मैदान के बाहर  खुली छूट देने के बयान देने की आवश्यकता क्यों पड़ीं ? असल में इस पूरे प्रकरण में बी सी सी आई  की ही किरकिरी हुई है | जिस शर्मनाक ढंग से विराट और बोर्ड की मिलीभगत से कुंबले जैसे महान खिलाडी और कोच को बाहर का रास्ता दिखाया गया ऐसा  बहुत कम बोर्ड में ही होता है कि शानदार प्रदर्शन कर रही टीम के कोच को बदल दिया जाए। वह  भी तब जब  उसके आसपास तक फटक भी न  सके  लेकिन दुनिया में ऐसा कोई अगर कर सकता है तो वो है बीसीसीआई जिसके पास अकूत कमाई है जो न केवल विश्व के क्रिकेट बोर्डों को  खरीद सकता है बल्कि एक कोच के साथ दर्जनों  भारी भरकम स्टाफ रख सकता उसे मुंहमांगी कीमत दे सकता है |

 पैसे  की रईसी  तले बीसीसीआई को ऐसा हेड कोच मौजूदा दौर में  चाहिए जो कप्तान की बीन पर नाचे |  खिलाड़ियों को खुली छूट दे | सब कुछ  ओपन  इकॉनमी तले,  मैदान और मैदान से  बाहर पूरी तरह हो |  ड्रेसिंग  रूम  भी मस्ती में  डूबा  रहे तो कोई गम नहीं  | कमाई मैच  दर मैच बन  रही है | जब इस दौर में   कप्तान ही सब कुछ है तो कोच  की क्या  बिसात | यह दौर ऐसा है जहाँ खिलाडी कोच को सिखाते हैं | द्रोणाचार्य वाला दौर अब मिटटी में ख़ाक हो चुका है |आज भारतीय क्रिकेट  कप्तान और  बोर्ड के  नेक्सस नेटवर्क से चल रहा है जहाँ कप्तान सबसे बड़ा हो चला है, कोच  भूमिका सीमित  कर दी गई  है |   बात दिग्गज कुंबले की करें तो बीते एक बरस में  उनका कोचिंग रिकॉर्ड शानदार रहा |  पांच में से पांच टेस्ट सीरीज में जीत, 17 टेस्ट मैचों में से 12 जीत, 4 ड्रॉ और सिर्फ एक हार। कुंबले के कार्यकाल के दौरान ही टीम इंडिया ने आईसीसी रैंकिंग में नंबर-1 पायदान हासिल किया।  ऐसे ही नहीं जम्बो को  बेहतरीन स्पिनर और शानदार खिलाड़ी की संज्ञा दी गई । ये रिकॉर्ड खुद बताते थे  कि बतौर कोच कुंबले की पारी कितनी शानदार रही लेकिन भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड  को कुंबले का यह शानदार प्रदर्शन नहीं दिखा। दिखा तो बस अपने कप्तान के प्रति उनका अनुशासनात्मक रवैया।  कुंबले के अनुभव को कोई चुनौती  नहीं  दे सकता  |

दुनिया का हर  खिलाडी  कुंबले का मुरीद रहा |  कुंबले का जिक्र  होते ही जेहन में 2002 में भारत-वेस्टइंडीज के बीच खेला गया  टेस्ट  याद  आता है जब मर्वन ढिल्लन की बाउंसर उनके सिर और जबड़े में  लगी और अनिल कुंबले को मैदान से बाहर ले जाया गया मगर  सिर से लेकर जबड़े तक पट्टी बांध  उन्होंने 14 ओवर गेंदबाजी की। इस दौरान जंबो ने महानतम बल्लेबाज ब्रायन लारा का भी विकेट लिया। मैच के बाद पता चला कि कुंबले के जबड़े में फ्रैक्चर था। यही नहीं टेस्ट मैच की एक पारी में  4 फ़रवरी 1999 को आरंभ हुए दिल्ली टेस्ट की चौथी पारी में अपने 26.3 ओवरों में 9 मेडन रखते हुए 74 रन देकर सभी 10 विकेट लेने का कारनामा कर दिखाया।  जिम लेकर के बाद विश्व के पहले ऐसे खिलाड़ी कुंबले  ही रहे | भारत की ओर से टेस्ट मैचों में सर्वाधिक विकेट लेनेवाले गेंदबाज कुंबले  रहे जिन्होंने  1990 से 2008 के बीच टेस्ट  जीवन में खेले 132 टेस्ट मैचों में  18355 रन देकर 29.65 की औसत से 619 विकेट लिए   कुंबले ने पाकिस्तान के विरूद्ध उनसे पहले इंग्लैंड के जिम लेकर ने ऑस्ट्रेलिया के विरूद्ध 26 जुलाई 1956 को आरंभ हुए मैनचेस्टर टेस्ट की कुल तीसरी पारी में और ऑस्ट्रेलिया की दूसरी पारी में 51.2 ओवरों में 23 मेडन रखते हुए 53 रन देकर एक टेस्ट पारी में सभी दसों विकेट लेनेवाले पहले गेंदबाज बने थे।

आईपीएल में आरसीबी कुंबले की कप्तानी में 2009 के सीजन में फाइनल तक पहुंची, फाइनल में उसे 6 रनों से हार का सामना करना पड़ा था। अगले सीजन में कुंबले टीम को सेमीफाइनल तक ले गए। उसके बाद कुंबले ने आईपीएल से संन्यास ले लिया। तब से अब तक टीम की कमान कोहली के पास है। कोहली की कप्तानी में आरसीबी केवल एक बार ही फाइनल में पहुंच पाई । कुंबले से कभी तेंदुलकर, द्रविड़, श्रीनाथ, गांगुली और लक्ष्मण जैसे खिलाड़ियों को समस्या नहीं हुई  लेकिन विराट की टीम से कुंबले से  अनबन  क्यों हुई यह गंभीर सवाल है |

पिछले  कुछ समय से टीम इंडिया और कोच लेकर  से  जिस तरह से विवाद हुआ उसने भद्र जन के  बीच  खेल की साख तार तार  जरूर हुई है |  शास्त्री  को  खिलाडियों  और विराट भले ही अपने  में  ढाल  लिया हो लेकिन शास्त्री पर कुंबले से बेहतर रिजल्ट देने का दवाब जरूर होगा | शास्त्री का दौर कुंबले से अलग इस मायने में  होने  जा रहा है क्युकि आने वाले बरसों  में टीम इंडिया  श्रीलंका , ऑस्ट्रेलिया , इंग्लैंड , अफ्रीका , न्यूजीलैंड जैसे देशों दौरे करेगी जहाँ  टीम के कप्तान और  कोच की जोड़ी की  असली परीक्षा होगी | भारतीय टीम  घर में तो शेर है  लेकिन यही टीम विदेशी उछाल  लेनी वाली पिचों पर ढेर  जाती  है |

 देखना होगा कप्तान और कोच की यह नई  जोड़ी कैसे टीम इंडिया  आगे  जाती है वह भी तब जब कुंबले टीम इंडिया  नयी ऊंचाई पर ले  जा रहे थे और टीम  इंडिया उनकी कप्तानी में जीत  गौरवगाथा  लिख रही थी और  सीएसी  समिति कुंबले के पक्ष में डटकर खड़ी  थी | आने वाले दिन विराट  कोहली के लिए भी मुश्किल रहेंगे  क्युकि एशिया  बाहर  भारत  खिलाडियों  ट्रेक रिकॉर्ड अच्छा नहीं रहा  है  और विराट भी  अभी उसी खेत  मूली हैं | देखना होगा  विराट और उनकी टीम आने वाले दिनों में देश से बाहर कैसा व्यक्तिगत प्रदर्शन करती है ?  अनुशासन , धैर्य ,  दृढ़ संकल्प , बड़ों  प्रति सम्मान किसी खिलाडी को महान बनाते  हैं |  विराट शायद अभी यह नहीं समझते  कि  सचिन , सौरभ , लक्ष्मण , द्रविड़ , कुंबले , जहीर ऐसे नहीं बना जाता  |

Monday, 10 July 2017

भारत चीन सम्बन्धों में तनाव की छाया




भारत और चीन के बीच तनाव और टकराव की स्थिति अभी भी कायम है | 1962 की भारत-चीन लड़ाई के बाद यह पहला मौका है जब सिक्किम से लगी सीमा पर भारत और चीन के बीच गतिरोध अपने चरम पर है | यह भी तब है जब हैम्बर्ग मे जी 20 समिट में दोनों मुल्कों के ताकतवर नेता मोदी और शी मुस्कुराहट के बीच मिल चुके हैं |  इसके बाद भी रिश्तों मे तल्खी थमने का नाम नहीं ले रही है | बीजिंग की सरकारी मीडिया ने हाल के दौर में जिस तरह के बयान दिये हैं उससे फिलहाल भारत और चीन के बीच वाकयुद्ध थमने के आसार नहीं दिखाई दे रहे हैं | ग्लोबल टाईम्स ने अपने संपादकीय मे साफ लिखा भारतीय फौज के मुक़ाबिल चीनी सेना ज्यादा ताकतवर है | धमकी भरे अंदाज मे उसने लिखा यदि भारतीय सेना सम्मानपूर्वक वापिस नहीं गई तो चीनी सेना उसे खदेड़ आएगी | 

बीजिंग के विदेश मंत्रालय के ऐसे बयान काफी दुर्भाग्यपूर्ण हैं वह भी तब जब भारत के साथ चीन का व्यापार बरस दर बरस कुलांचे मार रहा है और चीन के उत्पादों के लिए भारत एक बड़ा बाजार बना हुआ है | चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गैंग शुआंग ने तो हद ही कर दी | उन्होने धमकी भरे अंदाज मे कहा भारत को डोकलाम इलाके से अपनी सेना हटाने के लिए अब कड़े कदम उठाने ही होंगे | दोनों देशों के सैनिको की आवाजाही पूरे इलाके मे नजर आ रही है | भारत ने डोकलाम में जो सैनिक भेजे हैं, उन्हें नॉन काम्बैटिव मोड में तैनात किया है वहीं चीनी सेना तो घात लगाकर पूरे इलाके की सघन घेराबंदी करने मे जुटी हुई है मानो यह नए युद्ध की आहट हो चली है | चीन के लाख दबाव के बाद भी भारतीय सैनिक वहाँ से हटने को तैयार नहीं दिख रहे हैं |

 सिक्किम की सीमा पर स्थित डोकलाम  एक ऐसा इलाका है, जहां चीन, भारत और भूटान तीनों की सीमा मिलती है| असल मे जिस इलाके मे चीन सड़क बना रहा है उसका तीनों देशों के लिए विशेष सामरिक महत्व है | भारत की बात करें तो यह इलाका भूटान मे बेशक है लेकिन सड़क अगर बन जाती है तो यह तिब्बत की चुंबी घाटी तक करीब आ जाएगी ऐसे मे चीन की भारत पर पकड़ मजबूत हो जाएगी |  

आंतरिक सुरक्षा के लिहाज से भी देखें तो तो अगर ऐसा हो जाता है तो चीन भारत के बेहद करीब आ जाएगा और भविष्य मे उसके लिए भारत पर चढ़ाई करना बहुत आसान हो जाएगा | भारतीय सेना के जानकार भी मानते हैं हिमालय में यही एकमात्र ऐसी जगह है जिसे भौगोलिक तौर पर भारतीय सेना भलीभांति समझती है और इसका सामरिक फ़ायदा ले सकती है | ये वही इलाका है जो भारत को सेवन सिस्टर्स नाम से जानी जाने वाली उत्तर पूर्वी राज्यों से जोड़ता है और सामरिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है | भारत और चीन के बीच 2 अहम दर्रे नाथुला और जेलपा भी यही खुलते हैं और इसी घाटी के ठीक नीचे है है सिलीगुड़ी का गलियारा जो भारत को नॉर्थ स्टेट से सीधे जोड़ता है | शायद भारत इस दौर मे इस इलाके के महत्व को समझ रहा है तभी उसने 16 जून से मुखर होकर चीन को आईना दिखाते हुए इस मसले पर भूटान का साथ दिया है | चीन की भारत की सीमा पर सड़क निर्माण की योजना को उसकी विस्तारवादी नीति का एक हिस्सा माना जा सकता है जहां उसकी कोशिश भारत को घेरने की रही है |

असल मे आज के दौर मे भारत की विदेश नीति जिस मोदिनोमिक्स की छाँव तले आगे जा रही है और वैश्विक  स्तर पर नया आकार ले रही है उससे चीन बौखलाया हुआ है जिसकी काट के लिए वह सीमा विवाद को नए सिरे से हवा देने की कोशिश कर रहा है | चीन दुनिया में अपनी धौंस दिखाते हुए भारत को हमेशा नीचा दिखाने की कोशिशें अरसे से करता रहा है | बीते दिनों दलाई लामा के अरुणाचल दौरे को लेकर भी उसने सवाल उठाए | इससे पहले उत्तराखंड के सीमावर्ती इलाकों पर भी उसके सैनिकों की आवाजाही देखी गई |  कुछ बरस पहले शी के भारत दौरे के समय भी सीमा विवाद चरम पर पहुँच गया था लेकिन शी की यात्रा पूरा होते ही सब पहले जैसा हो गया लेकिन इस बार का माजरा कुछ और है | 

भारत जिस तरह से अभी वैश्विक स्तर पर कदमताल मोदी की अगुवाई मे कर रहा है उससे चीन परेशान है | हाल के बरस मे भारत के पश्चिम के कई मुल्कों के साथ रिश्ते जहां मजबूत हुए हैं वही अरब देशों के साथ भी मोदी ने नई कदमताल कर विदेश नीति के मोर्चे पर नई इबारत गढ़ने का काम किया है | यही नहीं पीएम की लुक ईस्ट पॉलिसी ने भी चीन के नाक मे दम किया हुआ है जहां जापान , फिलपीन्स , इन्डोनेशिया , मलेशिया, सिंगापुर जैसे अहम चीन के विरोधी देशों को साधकर मोदी ने नया कूटनीतिक दांव खेला है जो अपना असर दिखा रहा है इससे चीन परेशान है क्युकि भारत आज एशिया मे बड़ी ताकत के तौर पर उभर रहा है और दुनिया के लिए बड़ा बाजार है इससे चीन की चिंता बढ़नी लाज़मी है |

मौजूदा दौर मे चीन भूटान और भारत से बहुत खफा है तो इसकी बड़ी वजह ओबीआर गलियारा है जिसमें दोनों देश शामिल नहीं हैं | चीन किसी तरह से भूटान को इस विशाल परियोजना मे शामिल करने पर ज़ोर दे रहा था जिसका भूटान ने मुखर होकर विरोध किया जबकि श्रीलंका , म्यांमार और नेपाल तक को इसमे शामिल कर चीन ने भारत की बड़ी घेराबंदी करने का प्लान तैयार किया है |  वह एशिया मे भारत को नीचा दिखाने के लिए भारत के सभी पड़ोसियो को अपने पाले मे लाने की कोशिश अरसे से करता रहा है जिसमे पाक उसका बड़ा सहयोगी है |

 पूरी दुनिया भले ही पाक प्रायोजित आतंकवाद की कड़े शब्दों मे निंदा करती हो लेकिन चीन पाक के प्रति हमदर्दी दिखाने से बाज नहीं आता | वह जैश , हिजबुल, लश्कर के आकाओं के खिलाफ एक शब्द भी नहीं उगलता और एन एस जी और सुरक्षा परिषद मे भारत की सदस्यता पर जबरन अड़ंगा लगाता रहता है | 

नेपाल , बांग्लादेश , म्यांमार , श्रीलंका की कई आर्थिक योजनाओं मे वह बड़ा साझीदार जहां है वहीं वियतनाम से लेकर फिलीपींस तक अपनी विस्तारवादी योजनाओं को नए पंख लगाने मे लगा हुआ है | जापान, ताइवान, भूटान , इन्डोनेशिया , वियतनाम , थाईलैंड सरीखे देशो के साथ चीन की तनातनी हाल के दौर मे काफी बढ़ी है | दक्षिणी चीन सागर पर तो चीन अपना मालिकाना हक जताता रहा है | वह भी तब जब अंतर्राष्ट्रीय अदालत का  फैसला उसके खिलाफ गया है | दुनिया की सुनने के बजाय वह दक्षिणी चीन सागर में कई आयलेन्ड्स भी बना रहा है जिसमें उसकी नजरें वहाँ की अकूत खनिज सम्पदा पर जा टिकी है |

 भारत की साख जिस तरह बीते कुछ बरस मे दुनिया मे बढ़ी है उससे चीन की चिंता बढ़नी लाज़मी ही है क्युकि मोदी की कूटनीति हर मोर्चे पर चीन के विरोधी देशों को जहां साध रही है वही अमरीका के साथ भारत के मजबूत होते रिश्तों को भी चीन नहीं पचा पा रहा और तो और अब भारत के रिश्ते इज़राइल के साथ दशकों के बाद जिस तरह से प्रगाढ़ हो रहे हैं और डिफेंस सेक्टर मे जिस तर्ज पर वह भारत के साथ सैनिक साजो सामान की बड़ी डील करने जा रहा है उससे ड्रैगन की चिंता और अधिक बढ़ गई है | 

इसी हफ्ते मालबार मे भारत, जापान और अमरीकी सेना का संयुक्त अभ्यास चल रहा है | यह भी चीन के लिए परेशानी की बड़ी वजह बन रहा है क्युकि चीन हिन्द महासागर मे भी अपने जहाज़ी बेड़े तैनात कर चुका है | अब इस संयुक्त युद्धाभ्यास से अमरीका और जापान भारत के करीब आ गए हैं तो चीन का नाराज होना लाज़मी है क्युकि एशिया मे वह खुद के अलावे किसी को बड़ी ताकत के रूप मे उभारते हुए नहीं देखना चाहता है |  इसी कड़ी में उसने हालिया दिनों मे भूटान के सड़क तीर के आसरे भारत को अपना निशाना बनाया है | भारत और भूटान के बीच गहरे संबंध रहे हैं जबकि चीन और भूटान के बीच कुछ खास राजनयिक संबंध नहीं हैं | 

विदेश नीति के हर मसले पर भूटान भारत से दिशा निर्देश लेता रहा है | दोनों देशों के बीच इस तरह की एक संधि भी है जिसके चलते भारत से भूटान ने मदद मांगी और भारत ने तत्काल अपने परम मित्र देश को सैनिको की मदद भेजी | चीन की कोशिश थी किसी भी तरह इस मसले पर भूटान पर हावी हुआ जाएँ लेकिन यहाँ पर उसका दांव उल्टा पड गया | भारत चीन की हालिया तनातनी 16 जून से शुरू हुई जब डोकलाम इलाके में चीन को भारत ने सड़क बनाने से रोक दिया जिससे उसकी परेशानी बढ़ गई |  इसके बाद चीनी सेना ने भारत के दो बंकर नष्ट कर दिए और इस घटना के बाद से बयानों का दौर जारी है | हालात कब तक सामान्य होंगे इस बारे में कुछ भी कहा नहीं जा सकता |

  इस मसले पर भूटान ने भारत की मदद से चीन के सामने अपनी चिंता ज़ाहिर की क्योंकि चीन और भूटान के बीच राजनयिक संबंध नहीं है | इस बीच चीन ने भी  भारत से सेना की गतिविधि को लेकर आधिकारिक शिकायत दर्ज कराई |  डोकलाम पठार से सिर्फ 10-12 किमी पर ही चीन का शहर याडोंग है, जो हर मौसम में चालू रहने वाली सड़क से जुड़ा है जबकि डोकाला पठार नाथूला से महज 15 किमी की दूरी पर है | 

भूटान सरकार भी डोकलाम इलाके में चीन की मौजूदगी का विरोध कर चुकी है, जो कि भूटान सेना के बेस से बेहद करीब है | चीन का आरोप है भारत की सेना इस इलाके मे दाखिल हुई लेकिन सच्चाई ये है कि 16 जून को चीनी सेना ने डोकलाम में सड़क बनाने की कोशिश की तो  भूटानी सेना के गश्ती दल ने उन्हें रोकने की कोशिश की जिसके बाद भूटान ने चीन से विरोध दर्ज कराया और कहा यह डोकलाम में सड़क निर्माण समझौते का उल्लंघन है | तब भूटानी सेना के साथ डोकाला में मौजूद भारतीय सेना के लोग वहां पहुंचे और इन सबके  बीच चीन अपनी  सरकारी मीडिया के जरिये आक्रामक बयान दे रहा है।

अब चीन ने कहा है कि चीन अपनी सीमा की संप्रभुता बरकरार रखने के लिए कटिबद्ध है और इसके लिए वह युद्ध भी कर सकता है | दोनों देशों की सेनाओं के बीच 1962 के बाद ये सबसे लंबा गतिरोध है। इस एपिसोड़ का और अधिक लंबा चलना दोनों देशों के लिए घातक होगा | देखना होगा रिश्तों में यह तल्खी कब तक जारी रहती है ?

Friday, 7 July 2017

राजनीति की बिसात , हिट विकेट लालू प्रसाद






लालू प्रसाद यादव का नाम जेहन में आते ही बिहार को लेकर एक अलग तरह की छवि बनती है ।  सामाजिक न्याय और पिछड़ों के मसीहा कहलाने वाले लालू प्रसाद  को  अलहदा पहचान जे पी छाँव तले  मिली जब नीतीश , जॉर्ज , सुशील मोदी, शरद यादव, रविशंकर प्रसाद सरीखे नेताओं के साथ आपातकाल में उन्होंने बड़ी भूमिका निभाई। जेपी आंदोलन के बाद लालू की राजनीति ऐसे  उफान पर रही जिसने मंडल कमंडल दौर में उनको बिहार का सरताज बना डाला । यह सच भी शायद किसी से छिपा हो उनके और राबड़ी देवी  के  कार्यकाल में  बिहार सबसे बुरे दौर में  कई बरस  पीछे  चला गया । माफिया  गुंडों की लालू  प्रसाद के दौर में जहाँ तूती  बोलती थी  वही अपहरण , रंगदारी , लूटपाट , गुंडागर्दी , रेप  की घटनाएं  उस समय आम बात थी । कानून व्यवस्था लुंज पुंज थी । पुलिस के पास आप अगर प्राथमिक रिपोर्ट दर्ज करवाने जाते थे तो रजिस्टर  में वह दर्ज भी नहीं हो पाती थी |  अपने कार्यकाल में उन्होंने जहाँ  करोड़ों  के वारे न्यारे किये वहीँ  उन्होंने कानून व्यवस्था  को तार तार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी  । बिहार  उनके समय से ही पलायन का दंश झेल रहा है । उस दौर में लालू के खिलाफ जब घोटालों का जिन्न आता है  तो जेहन में सबसे पहले चारा घोटाले का जिक्र होता है जिसने 90 के दशक में लालू को चर्चित कर दिया। लालू प्रसाद  की राजनीती उस राजनीति की देन है जिसे बतौर प्रधानमंत्री वी पी ने हवा दी और  मंडल कमीशन को देश भर में लागू कर दिया गया। पिछड़ी राजनीति का यह तोहफा  लालू प्रसाद को  बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में मिला। यही नहीं आडवाणी के रथ को रोक और उन्हें गिरफ्तार कर लालू प्रसाद ने अपनी सांप्रदायिकता विरोधी छवि को देश में  जरूर मजबूत किया। उस दौर की शासन व्यवस्था का जिक्र करें तो उनका  कार्यकाल बिहार के लिए सबसे बुरे  दौर के रूप में  जाना जाता है जिसने लालूराज को जंगलराज से जोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी ।

गोपालगंज में एक यादव परिवार में जन्मे लालू यादव ने राजनीती का ककहरा जेपी आंदोलन से सीखा । उस दौर को याद करें तो  रैली के दौरान ही जब जेपी पर लाठियां बरसाई जाने लगीं तो लालू उन्हें बचाने के लिए उनकी पीठ पर लेट गए। कहा जाता है कि उनकी इस सूझ बूझ को देखते हुए उन्हें पहली बार लोकसभा का टिकट थमा दिया गया लेकिन लालू यादव का असल राजनीतिक सफर आपातकाल के बाद से शुरू हुआ जब वह पहली बार बिहार के छपरा से सांसद बने। बिहार के मुख्यमंत्री रहने के बाद वह केंद्र सरकार में रेल मंत्री भी बनें। बिहार में लालू जब सत्ता में थे तब  साधु, सुभाष, राबड़ी और लालू (ससुराल)  के इर्द-गिर्द ही सत्ता  घूमती  थी। ठेठ गवई, चुटीली  राजनीति करने वाले लालू प्रसाद ने उस दौर में एक नई परंपरा गढ़ी जब बिहार का नाम देश दुनिया में घोटालों ने ख़राब कर दिया । 1996 में जब चारा घोटाला सामने आया था तो मीडिया ने इसे खूब लपका । देश के कोने कोने में ऐसा पहली बार हुआ जब  जानवरों के चारे तक में घोटाले की बात सामने आई । तब इसे लेकर लालू पर खूब चुटकुले भी बने । 

लालू पर  90  के दशक  में मौजूदा झारखंड की चाईबासा ट्रेजरी से लाखों  रुपए निकालने का केस चल रहा था। तब चाईबासा बिहार में ही हुआ करता था। लालू यादव पर चाईबासा ट्रेजरी से पैसा निकालकर पशुपालन विभाग में ट्रांसफर कराने का केस था। पूरा चारा घोटाला करीब 950 करोड़ रुपए का था जिसमें ये केस तकरीबन 38 करोड़ रुपए की अवैध निकासी का था। अविभाजित बिहार में जगन्नाथ मिश्र से लेकर लालू यादव के सीएम रहने के दौरान फर्जी बिल के जरिए पशुओं को चारा खिलाने के नाम पर निकाला गया था।  चारा घोटाले के चाईबासा ट्रेजरी केस में लालू यादव के साथ जगन्नाथ मिश्र को भी दोषी पाया गया। 

1997 में लालू के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल होने के बाद जब उन्हें सी एम पद छोड़ना पड़ा  तो वह अपनी पत्नी राबड़ी को सिंहासन  सौंप जेल चले गए और इसी दौर में  आय से अधिक संपत्ति का भी मामला उनके खिलाफ दर्ज हो चुका था ।लालू को कुछ दिनों बाद बेल मिली लेकिन 2000 में आय से अधिक संपत्ति के मामले में लालू और राबड़ी को कोर्ट में सरेंडर करना पड़ा जहाँ  राबड़ी को तो बेल मिल गई लेकिन लालू फिर जेल गए ।  2006 में आय से अधिक संपत्ति के मामले में वह और राबड़ी बरी हो गए । 2013 में लालू में रांची की सीबीआई कोर्ट ने लालू सहित 44 लोगों को सजा सुनाई । इसके साथ ही लालू को लोकसभा की सदस्यता छोड़नी पड़ी थी । वह जेल भी गए और सशर्त जमानत पर बाहर भी आ गए । 
2 बरस पूर्व बिहार चुनावों के समय यह कहा गया लालू यादव की भावी राजनीति की मियाद पूरी हो गई  , लेकिन  सत्ता और चुनाव लड़ने से उनके दूर होने के बाद भी वह बिहार में सबसे अधिक सीट लेकर आये और नीतीश का राजतिलक करवाया | इसी दौर मे  सुप्रीम कोर्ट  ने 21 बरस पुराने 950 करोड़ के चारा घोटाले के सभी चार मामलों में लालू प्रसाद यादव पर अलग-अलग मुकदमे चलाने के निर्देश दिए  साथ ही  जगन्नाथ मिश्र और तत्कालीन ब्यूरोक्रेट सजल चक्रवर्ती पर भी साथ-साथ केस चलाने का ऐलान करके मुश्किलों को बढ़ा दिया । यह वही मामला रहा  जिसमें 2014 में झारखंड उच्च न्यायालय ने यह कहकर रोक लगा दी थी कि एक ही मामले में एक ही व्यक्ति पर समान गवाहों के साथ अलग-अलग केस नहीं चल सकता। 

अदालत ने इस मामले में सारी कार्रवाई तय समय-सीमा में पूरी करने की शर्त भी रखी है।  वैसे अगर देखें  तो लालू प्रसाद की राजनीति पर तब तक कोई खास असर पड़ता नहीं दिखाई देता, जब तक कि वह इन या ऐसे मामलों में सजा पाकर पूरी तरह जेल न चले जाएं। पिछले कुछ महीनों से दोनों मंत्री पुत्रों सहित लालू यादव खुद भी मिट्टी घोटाले के ताजा जिन्न और लालू-शहाबुद्दीन टेलीफोन वार्ता से विपक्ष के निशाने पर थे लेकिन हालिया दिनों मे सी बी आई की रेड में लालू यादव का पूरा कुनबा ही  नई मुसीबत में घिरता दिख रहा है |

लालू यादव पर आरोप है कि उन्होंने रेलमंत्री रहते हुए बड़ी वित्तीय गड़बड़ियां की जिसमें उनकी पत्नी राबड़ी देवी, बिहार के उप मुख्यमंत्री और उनके बेटे तेजस्वी यादव के अलावा चार अन्य लोगों का नाम आया है | सीबीआई ने इस मामले में भ्रष्टाचार का नया केस दर्ज करते हुए पटना में सर्कुलर रोड स्थित राबड़ी देवी के आवास सहित पटना, रांची, गुरुग्राम और भुवनेश्वर में 12 जगहों पर छापेमारी की  जिसके बाद उनकी पार्टी की  कई मुश्किलों में इस फैसले ने इजाफा कर दिया है।  मामले की जड़े  तत्कालीन एनडीए सरकार के उस फैसले तक जाती हैं जब उसने रेलवे के होटलों की कैटरिंग सेवाओं का प्रबंधन आईआरसीटीसी को सौंपने का फैसला किया था |

 रेलवे बोर्ड ने 2001 में फैसला लिया कि कैटरिंग सर्विस और रांची तथा पुरी स्थित रेलवे के होटल बीएनआर का संचालन भारतीय रेलवे से लेकर आईआरसीटीसी को दे दिया जाएगा |  

इसके ठीक बाद जब 2004 में लालू रेलमंत्री बने, तो उन्होंने सुजाता होटल्स के मलिक हर्ष और विनय कोचर, लालू यादव के करीबी पीसी गुप्ता की पत्नी सरला गुप्ता और आईआरसीटीसी के अधिकारियों के साथ मिलकर कथित तौर पर आपराधिक साजिश रची |  इन लोगों ने साजिश के तहत होटलों पर अधिकार पाने के लिए  योजना बनाई | सीबीआई के मुताबिक, इसी साजिश के तहत विनय कोचर ने 25 फरवरी, 2005 को पटना में तीन एकड़ की प्राइम लैंड महज 1.47 करोड़ रुपये में डिलाइट मार्केटिंग को बेच दी, जो कि सर्किल रेट से काफी कम थी | 

 इस कंपनी का मालिकाना हक प्रेमचंद गुप्ता की पत्नी सरला गुप्ता के पास था, लेकिन यह लालू प्रसाद  की ही बेनामी कंपनी थी | इस सौदे के दिन ही रेलवे बोर्ड ने बीएनआर होटल आईआरसीटीसी को सौंपने का ऐलान किया और फिर दोनों होटलों का प्रबंधन कोचर बंधुओं की कंपनी को सौंप दिया गया |  इसके लिए जो टेंडर निकाला गया वह भी गलत था |   इस मामले में तत्कालीन प्रबंध निदेशक पीके गोयल ने कथित रूप से धांधली की | टेंडर की शर्तों में फेरबदल हुआ , ताकि इस टेंडर के लिए सुजाता होटल को एकमात्र दावेदार बनाया जा सके|  

यहां दोनों होटलों के लिए  15 से ज्यादा टेंडर दस्तावेज हासिल किए गए, लेकिन सुजाता होटल के अलावा किसी दूसरी कंपनी का कोई रिकॉर्ड नहीं है | सीबीआई ने दावा किया कि साल 2010 और 2014 के बीच डिलाइट मार्केटिंग का मालिकाना हक भी सरला गुप्ता से लारा प्रोजेक्ट्स के हाथों में चला गया, जिसका स्वामित्व राबड़ी देवी और तेजस्वी यादव के पास है जो नीतीश सरकार मे अभी अहम  उपमुख्य मंत्री पद मे हैं |  पटना की उस जमीन की कीमत भी तब तक सर्किल रेट के अनुसार बढ़कर 32.5 करोड़ रुपये हो गई | 

 सीबीआई का आरोप है कि पीसी गुप्ता के परिवार के सदस्यों ने 32.5 करोड़ रुपये नेटवर्थ की कंपनी का शेयर मात्र 65 लाख रुपये के मामूली दाम पर लालू प्रसाद यादव के परिवार को ट्रांसफर कर दिया सीबीआई ने इस मामले में लालू प्रसाद यादव, राबड़ी देवी, तेजस्वी प्रसाद यादव, सरला गुप्ता, विजय कोचर, विनय कोचर, लारा प्रोजेक्ट्स और आईआरसीटीसी के पूर्व महानिदेशक पीके गोयल के खिलाफ आईपीसी की धारा 420 , 120बी के अलावा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 पीसी एक्ट की धाराओं 13(2) और 13 (डी) के तहत एफआईआर दर्ज किया है |  

रांची और पुरी के चाणक्य बीएनआर होटल जोकि रेलवे के हेरिटेज होटल थे | लालू यादव ने रेल मंत्री रहते हुए इन होटलों को अपने करीबियों को लीज पर बेच डाला जो  होटल अंग्रेजों के जमाने के थे इसीलिए इसका ऐतिहासिक महत्व था पर अब नहीं रहा क्योंकि इन होटल्स को पूरा रेनोवेटेड कर दिया गया है |  लालू प्रसाद एवं उनके परिवार के खिलाफ एक हजार करोड़ की बेनामी संपत्ति का मामला रांची और पुरी से जुड़ा हुआ है | 


लालू प्रसाद जब रेल मंत्री थे तब रेल मंत्रालय ने रांची एवं पुरी के ऐतिहासिक होटल बीएनआर को लीज पर देने का निर्णय लिया | इस लीज के लिए रांची के कुछ होटल व्यवसाइयों के अलावा झारखंड से राज्यसभा के सांसद प्रेमचंद गुप्ता की कंपनी दोनों होटलों को लेने में सफल रहे और रांची के बीएनआर होटल को पटना के प्रसिद्ध होटल चाणक्य के संचालक हर्ष कोचर को 60 साल के लिए लीज पर मिल गया | पहले तो लीज की अवधि 30 वर्ष रखी गयी, परन्तु बाद में इसकी अवधि बढ़ाकर साठ साल कर दी गई |  आरोप है कि इन दोनों होटलों को लीज पर देने की जितनी कीमत राज्य सरकार को मिलनी चाहिए वह नहीं मिली  | 

ताजा फैसला लालू प्रसाद के खिलाफ  हमलों को और धार देगा राजनीतिक उठापटक बढ़ेगी क्युकि दोनों पुत्र इस समय नीतीश सरकार में ताकतवर मंत्री  हैं | यह भी तय है कि फैसला लालू प्रसाद की राजनीति से ज्यादा बिहार के महागठबंधन की राजनीति पर असर डालेगा और यही असल में देखने की बात होगी। कहना न होगा कि हाल में लगे आरोपों के बाद जिस तरह की बातें सामने आईं, जिस तरह महागठबंधन के बड़े साथी लालू प्रसाद के बचाव के बजाय जद-यू अपनी छवि को लेकर सतर्क दिखा है उसने भी भविष्य के संकेत दिए हैं। 


यह फैसला लालू की मुश्किलों को और बढ़ा सकता है क्युकि 2005 के हलफनामे मे उन्होने अपनी संपत्ति 87 लाख के आस पास बताई थी लेकिन सी बी आई की मानें तो लालू के पूरे कुनबे ने 1000 करोड़ से भी अधिक की अकूत बेनामी सम्पत्ति बटोरी है वह भी उस दौर मे जब यूपीए के उस दौर में जब लालू की ठसक से सब कुछ काम  आसानी से हो जाया करते थे | हाल में लालू के  ठिकानों पर आयकर विभाग के ताबड़तोड़ छापों  के बाद तो लालू की मुश्किलें और बढ़ गई हैं ।


 इस घटना के बाद बिहार में राजनीतिक हालत तेजी से बदल रहे हैं । लोग महागठबंधन के भविष्य पर भी अब सवालिया निशान लगा रहे हैं । नीतीश कुमार अब मुश्किल में पड़ते जा रहे हैं |  लालू पर लगातार शिकंजा कसे जाने और  तेजस्वी और तेज प्रताप के भी भ्रष्टाचार के मसले पर घिरने से उनकी पार्टी की भी खूब किरकिरी हो रही है । इधर सुशील मोदी ने भी लालू का साथ छोड़ने का राग कुछ महीनों पहले छेड़कर  भाजपा और जद यू के पास आने की संभावनाओं से इनकार नहीं किया है।

 नीतीश ने भी हाल के दिनों में वह खुद पी एम पद के दावेदार नहीं कहकर एक बड़ा राजनीतिक बयान  दिया है जिसके कई बड़े मायने बिहार की राजनीती में निकाले जा रहे हैं । बिहार में सत्ताधारी जदयू को डर है कि लालू प्रसाद का करियर अगर समाप्त हुआ तो नीतीश की साफ़ सुथरी छवि पर भी ग्रहण लगना  तय है वहीँ लालू प्रसाद जानते हैं कि दोनों बेटों को वारिस बनाकर  उनकी पार्टी एक नई शुरुवात की तरह बढ़ रही थी लेकिन उनके खिलाफ चार केसों पर अगर बड़ा फैसला आ जाता है और आयकर विभाग के हालिया मामलों में भी अलग अलग सजा हुई तो उनको अपने वोट बैंक सेना केवल  हाथ गंवाना पड़  सकता है बल्कि राजद की लालटेन का भी सूपडा बिहार की राजनीति से साफ हो सकता है । साथ ही नीतीश  कुमार भी उनसे दूरी बना सकते हैं ।

इधर लालू के बिना राजद में सब सून सून  होने का अंदेशा भी बन रहा है। अगर ऐसा होता है तो नीतीश के लिए बिहार मे अकेले चलो की लड़ाई आसान नहीं होने वाली |  अब इस मामले में  के ताजा रुख  और आयकर विभाग के तमाम जानकारों की पड़ताल को देखते हुए लालू यादव और कुनबे  को  निर्दोष करार दिए जाने की संभावना नहीं के बराबर बन रही है ।  ऊपर से आय से अधिक संपत्ति मामले में उनकी नई मुश्किल बढती ही जा रही है । 

सबसे बड़ा सवाल अब यह है क्या सुशासन बाबू  तेजस्वी को मंत्री मंडल से बाहर निकालेंगे ? फिलहाल संकेतों को डिकोडे करें तो जेडीयू लालू के खिलाफ चुप्पी को  अपनी ढाल बना रही है | सूत्र बता रहे हैं छापे के बाद पार्टी की हुई आपात बैठक मे भी पार्टी हाई कमान की तरफ से इस मामले पर चुप रहने को कहा गया है | पार्टी प्रवक्ताओं को भी इस मसले पर कुछ भी उगलने से साफ इंकार कर दिया गया है |   जेडीयू  इस वक्त वेट एंड वाच  की मुद्रा मे है | 


 नीतीश कुमार के बारे मे माना जाता है वह पार्टी के बड़े फैसले खुद से लेते हैं | चाहे 2014 मे भाजपा के साथ ना जाने का फैसला रहा हो या नोटबंदी के समर्थन का | हर फैसले मे नीतीश की छाप दिखाई दी है | यह हाल के दौर मे रामनाथ कोविन्द की राष्ट्रपति की उम्मीदवारी के समर्थन मे भी दिखाई दिया है | नीतीश ने ही सबसे पहले विपक्ष की एकजुटता को दरकिनार करते हुए रामनाथ का समर्थन किया था और उनको बधाई देने सीधे राजभवन पहुँच गए | छापे और मुकदमें के बाद अब  नीतीश लालू के खिलाफ सोच समझकर अपना तीर कमान से निकालेंगे | दिल्ली में 23 जुलाई को जेडीयू के राष्ट्रीय़ कार्यकारिणी की बैठक होने जा रही है |  माना जा है कि तब तक गठबंधन की गांठ भी साफ हो जाएंगी |  

बहरहाल जो भी हो आने वाले दिनों में अब लालू  प्रसाद के सामने  भारी संकट खड़ा हो गया है । सुप्रीम कोर्ट का लालू के खिलाफ पहले के फैसलों पर साफ  कहना है  चार अलग-अलग मामलों में लालू पर  मुकदमा चलेगा, फिर सजा का एलान होगा। इस फैसले के बाद अर्णव गोस्वामी के रिपब्लिक चैनल पर आये आडियो टेप ने बिहार मे तहलका मचा दिया  था जहाँ लालू जेल में शाहबुद्दीन से बात करते नजर आ रहे थे । इस टेप ने बिहार के सत्ता गलियारों में लालू  की हनक और नीतीश के लाचार सी एम के सच को दिखाने का काम किया  जिसके बाद जे डी यू  और राजद को ना उगलते बन रहा था ना निगलते ।

रही सही कसर अब आयकर विभाग की हालिया छापेमारी ने बढ़ा दी है जहां लालू का पूरा कुनबा घिरता दिख रहा है । देखना होगा लालू प्रसाद इस मुश्किल से कैसे बाहर आते हैं जहाँ उनकी साख एक बार फिर सवालों के घेरे में है तो दूसरी तरफ राज़द और महागठबंधन के बिखरने का अंदेशा भी नजर आ रहा है । क्या राजनीति की बिसात पर अबकी बार हिटविकेट होंगे लालू प्रसाद ? फिलहाल इस सवाल के जवाब के लिए जुलाई महीने के आखिर तक और इन्तजार करना पड़ेगा ।