Saturday, 13 February 2010

दिल तो बच्चा है जी...............



चली इश्क की हवा चली ... चली इश्क की हवा चली ....अपने दिलबर को दीवाना ... ढूदता दिल गली गली... "बागवान " फ़िल्म का यह गाना आजकल दूकानों में सर चदकर बोल रहा है ....कल की ही बात है ,शाम का समय था ... हम राजधानी के न्यू मार्केट इलाके में टहल रहे थे ...कल यहाँ की दुकानों में आजकल खासी चहल पहल नज़र आ रही थी .... वैसे तो न्यू मार्केट इलाके में पहले भी कभी कभार जाना होता रहता है लेकिन इस बार यहाँ फिजा कुछ बदली बदली सी नज़र आ रही थी ... हमे इस बदलाव का कारण नही सूझ रहा था... .... लिहाजा ,साथ में भी कोई नही था जिससे यह पूछ सकते ...तभी हमारी नज़र एक गिफ्ट सेण्टर पर पड़ी, जहाँ पर खरीददारी हो रही थी .... कुछ युवतिया दूकानदार से बारगेनिंग कर रहे थी ... जो सामान के सही मूल्य लगाने को लेकर की जा रही थी... इस वाकये को मैं बड़ी गौर से देख और सुन रहा था.... कुछ समय बाद पूरा माजरा समझ आ गया ....


दरअसल यह सब वैलेंटाइन डे के लिए किया जा रहा था... युवतियों में इसको लेकर छा रही उत्सुकता ख़ुद ही कहानी को बयां कर रही थी... फिर बागवान फ़िल्म का गाना तो सच्ची तस्वीर को हमारे सामने ख़ुद ही ला रहा था...न्यू मार्केट का जो दृश्य हमारी आँखों ने कल देखा .... यह आज की एक हकीकत है... भोपाल ही क्या हर जगह यही हाल होगा... चाहे आप दिल्ली की चाँदनी चौक में हो या कनाट पैलेस में, या फिर इनके जैसे किसी भी महानगर में ... हर जगह आप ऐसे दृश्यों को देख सकते है जिसका गवाह कल मेरी आँखें न्यू मार्केट में बनी....आज "वैलेंटाइन डे" पर देश के कोने कोने तक ऐसी ही बानगी देखी जा सकती है.... अब तो आलम यहाँ तक है फरवरी को मनाया जाने वाला यह त्यौहार महानगरो के साथ कस्बो में भी मनाया जाने लगा है...



आज का युग बदल गया है... संस्कृति गई भाड में.... तभी तो हर जगह विदेशी संस्कृति पूत की भांति पाव पसारती जा रही है ..... हमारे युवाओ को लगा वैलेंटाइन का चस्का भी इसी कड़ी का एक हिस्सा है... विदेशी संस्कृति की गिरफ्त में आज हम पूरी तरह से नजर आते है ... तभी तो शहरों से लेकर कस्बो तक वैलेंटाइन का जलवा देखते ही बनता है...आज आलम यह है यह त्यौहार भारतीयों में तेजी से अपनी पकड़ बना रहा है...



वैलेंटाइन के चकाचौंध पर अगर दृष्टी डाले तो इस सम्बन्ध में कई किस्से प्रचलित है... रोमन कैथोलिक चर्च की माने तो यह "वैलेंटाइन "अथवा "वलेंतिनस " नाम के तीन लोगो को मान्यता देता है ....जिसमे से दो के सम्बन्ध वैलेंटाइन डे से जोड़े जाते है....लेकिन बताया जाता है इन दो में से भी संत " वैलेंटाइन " खास चर्चा में रहे ...कहा जाता है संत वैलेंटाइन प्राचीन रोम में एक धर्म गुरू थे .... उन दिनों वहाँपर "कलाउ दियस" दो का शासन था .... उसका मानना था की अविवाहित युवक बेहतर सेनिक हो सकते है क्युकियुद्ध के मैदान में उन्हें अपनी पत्नी या बच्चों की चिंता नही सताती ...अपनी इस मान्यता के कारण उसने तत्कालीन रोम में युवको के विवाह पर प्रतिबंध लगा दिया...


किन्दवंतियो की माने तो संत वैलेंटाइन के क्लाऊ दियस के इस फेसले का विरोध करने का फेसला किया ... बताया जाता है की वैलेंटाइन ने इस दौरान कई युवक युवतियों का प्रेम विवाह करा दिया... यह बात जब राजा को पता चली तो उसने संत वैलेंटाइन को १४ फरवरी को फासी की सजा दे दी....कहा जाता है की संत के इस त्याग के कारण हर साल १४ फरवरी को उनकी याद में युवा "वैलेंटाइन डे " मनाते है...



कैथोलिक चर्च की एक अन्य मान्यता के अनुसार एक दूसरे संत वैलेंटाइन की मौत प्राचीन रोम में ईसाईयों पर हो रहे अत्याचारों से उन्हें बचाने के दरमियान हो गई ....यहाँ इस पर नई मान्यता यह है की ईसाईयों के प्रेम का प्रतीक माने जाने वाले इस संत की याद में ही वैलेंटाइन डे मनाया जाता है...एक अन्य किंदवंती के अनुसार वैलेंटाइन नाम के एक शख्स ने अपनी मौत से पहले अपनी प्रेमिका को पहला वैलेंटाइन संदेश भेजा जो एक प्रेम पत्र था .... उसकी प्रेमिका उसी जेल के जेलर की पुत्री थी जहाँ उसको बंद किया गया था...उस वैलेंटाइन नाम के शख्स ने प्रेम पत्र के अन्त में लिखा" फ्रॉम युअर वैलेंटाइन" .... आज भी यह वैलेंटाइन पर लिखे जाने वाले हर पत्र के नीचे लिखा रहता है ...



यही नही वैलेंटाइन के बारे में कुछ अन्य किन्दवंतिया भी है ... इसके अनुसार तर्क यह दिए जाते है प्राचीन रोम के प्रसिद्व पर्व "ल्युपर केलिया " के ईसाईकारण की याद में मनाया जाता है ....यह पर्व रोमन साम्राज्य के संस्थापक रोम्योलुयास और रीमस की याद में मनाया जाता है ... इस आयोजन पर रोमन धर्मगुरु उस गुफा में एकत्रित होते थे जहाँ एक मादा भेडिये ने रोम्योलुयास और रीमस को पाला था इस भेडिये को ल्युपा कहते थे... और इसी के नाम पर उस त्यौहार का नाम ल्युपर केलिया पड़ गया...


इस अवसर पर वहां बड़ा आयोजन होता था ॥ लोग अपने घरो की सफाई करते थे साथ ही अच्छी फसल की कामना के लिए बकरी की बलि देते थे.... कहा जाता है प्राचीन समय में यह परम्परा खासी लोक प्रिय हो गई... एक अन्य किंदवंती यह कहती है की १४ फरवरी को फ्रांस में चिडियों के प्रजनन की शुरूवात मानी जाती थी.... जिस कारण खुशी में यह त्यौहार वहा प्रेम पर्व के रूप में मनाया जाने लगा ....



प्रेम के तार रोम से सीधे जुड़े नजर आते है ... वहा पर क्यूपिड को प्रेम की देवी के रूप में पूजा जाने लगा ...जबकि यूनान में इसको इरोशके नाम से जाना जाता था... प्राचीन वैलेंटाइन संदेश के बारे में भी एक नजर नही आता ॥ कुछ ने माना है की यह इंग्लैंड के राजा ड्यूक के लिखा जो आज भी वहां के म्यूजियम में रखा हुआ है.... ब्रिटेन की यह आग आज भारत में भी लग चुकी है... अपने दर्शन शास्त्र में भी कहा गया है " जहाँ जहाँ धुआ होगा वहा आग तो होगी ही " सो अपना भारत भी इससे अछूता कैसे रह सकता है...? युवाओ में वैलेंटाइन की खुमारी सर चदकर बोल रही है... १४ का सभी को बेसब्री से इंतजार है... इस दिन के लिए सभी पलके बिछाये बैठे है... प्रेम का इजहार जो करना है ?.......



वैलेन्टाइन प्रेमी १४ फरवरी को एक बड़े त्यौहार से कम नही समझते है.... मुझको "अंदाज "का गाना याद आगया है.... " किसी से तुम प्यार करो ..... इजहार करो कही ना फिर देर हो जाए" ..... तभी तो वह इसको प्यार का इजहार करने का दिन बताते है... यूँ तो प्यार करना कोई गुनाह नही है लेकिन जब प्यार किया ही है तो इजहार करने में कोई देर नही होनी चाहिए... लेकिन अभी का समय ऐसा है जहाँ युवक युवतिया प्यार की सही परिभाषा नही जान पाये है... वह इस बात को नही समझ पा रहे है की प्यार को आप एक दिन के लिए नही बाध सकते... वह प्यार को हसी मजाक का खेल समझ रहे है....



सच्चे प्रेमी के लिए तो पूरा साल प्रेम का प्रतीक बना रहता है ... लेकिन आज के समय में प्यार की परिभाषा बदल चुकी है ... इसका प्रभाव यह है की आज १४ फरवरी को प्रेम दिवस का रूप दे दिया गया है... इस कारण संसार भर के "कपल "प्यार का इजहार करने को उत्सुक रहते है...



आज १४ फरवरी का कितना महत्त्व बढ गया है इसका अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है इस अवसार पर बाजारों में खासी रोनक छा जाती है .... गिफ्ट सेंटर में उमड़ने वाला सैलाब , चहल पहल इस बात को बताने के लिए काफी है यह किस प्रकार आम आदमी के दिलो में एक बड़े पर्व की भांति अपनी पहचान बनने में कामयाब हुआ है... इस अवसर पर प्रेमी होटलों , रेस्ताराओ में देखे जा सकते है...


प्रेम मनाने का यह चलन भारतीय संस्कृति को चोट पहुचाने का काम कर रहा है... यूं तो हमारी संस्कृति में प्रेम को परमात्मा का दूसरा रूप बताया गया है ॥ अतः प्रेम करना गुनाह और प्रेम का विरोधी होना सही नही होगा लेकिन वैलेंटाइन के नाम पर जिस तरह का भोड़ापन , पश्चिमी परस्त विस्तार हो रहा है वह विरोध करने लायक ही है ....वैसे भी यह प्रेम की स्टाइल भारतीय जीवन मूल्यों से किसी तरह मेल नही खाती.....


आज का वैलेंटाइन डे भारतीय काव्य शास्र में बताये गए मदनोत्सव का पश्चिमी संस्करण प्रतीत होता है...



लेकिन बड़ा सवाल जेहन में हमारे यह आ रहा है क्या आप प्रेम जैसे चीज को एक दिन के लिए बाध सकते है? शायद नही... पर हमारे अपने देश में वैलेंटाइन के नाम का दुरूपयोग किया जा रहा है ... वैलेंटाइन के फेर में आने वाले प्रेमी भटकाव की राह में अग्रसर हो रहे है.... एक समय ऐसा था जब राधा कृष्ण , मीरा वाला प्रेम हुआ करता था जो आज के वैलेंटाइन प्रेमियों का जैसा नही होता था...


आज लोग प्यार के चक्कर में बरबाद हो रहे है... हीर_रांझा, लैला_ मजनू के प्रसंगों का हवाला देने वाले हमारे आज के प्रेमी यह भूल जाते है की मीरा वाला प्रेम सच्ची आत्मा से सम्बन्ध रखता था ... आज प्यार बाहरी आकर्षण की चीज बनती जा रही है.... प्यार को गिफ्ट में तोला जाने लगा है... वैलेंटाइन के प्रेम में फसने वाले कुछ युवा सफल तो कुछ असफल साबित होते है .... जो असफल हो गए तो समझ लो बरबाद हो गए... क्युकि यह प्रेम रुपी "बग" बड़ा खतरनाक है .... एक बार अगर इसकी जकड में आप आ गए तो यह फिर भविष्य में भी पीछा नही छोडेगा.... असफल लोगो के तबाह होने के कारण यह वैलेंटाइन डे घातक बन जाता है...



वैलेंटाइन के नाम पर जिस तरह की उद्दंडता हो रही है वह चिंतनीय ही है... अश्लील हरकते भी कई बार देखी जा सकती है...संपन्न तबके साथ आज का मध्यम वर्ग और अब निम्न तबका भी आज इसके मकड़ जाल में फसकर अपना पैसा और समय दोनों ख़राब करते जा रहे है... वैलेंटाइन की स्टाइल बदल गई है ... गुलाब गिफ्ट दिए ,पार्टी में थिरके बिना काम नही चलता .... यह मनाने के लिए आपकी जेब गर्म होनी चाहिए... यह भी कोई बात हुई क्या जहाँ प्यार को अभिव्यक्त करने के लिए जेब की बोली लगानी पड़ती है....?


कभी कभार तो अपने साथी के साथ घर से दूर जाकर इसको मनाने की नौबत आ जाती है... डी जे की थाप पर थिरकते रात बीत जाती है... प्यार की खुमारी में शाम ढलने का पता भी नही चलता ....


आज के समय में वैलेंटाइन प्रेमियों की तादात बढ रही है .... साल दर साल यार... इस बार भी प्रेम का सेंसेक्स पहले से ही कुलाचे मार रहा है.... वैलेंटाइन ने एक बड़े उत्सव का रूप ले लिया है... मॉल , गिफ्ट, आर्चीस , डिस्को थेक, मक डोनाल्ड आज इससे चोली दामन का साथ बन गया है... अगर आप में यह सब कर सकने की सामर्थ्य नही है तो आपका प्रेमी नाराज .... बस बेटा ....प्रेम का तो दी एंड समझ लो.... फिर , देवदास के बरबाद होने का सिलसिला चल पड़ता है ...


पारो की याद दिल से नही जा पाती.... दिल टूट जाता है ... हमारी समझ में यह नही आता यह कैसा देवदास जो इस बार का वैलेंटाइन पारो के साथ ... अगली बार चंद्रमुखी.... तो अगली बार किसी और चंदा के साथ मनाता है? यह एक फेक्ट है आप चाहकर भी इसको नकार नही सकते ... हम अक्सर अपने आस पास ऐसे वाकयों को देख चुके है जो हर रोज "रब ने बना दी जोड़ी " वाली एक नई "तानी " जी के पीछे भागते नजर आते है ....



कॉलेज के दिनों से यह चलन चलता आ रहा है ... अपने आस पास कालेजो में भी ऐसे दृश्य दिखाई देते है ..... पदाई में कम मन लगता है.....कन्यायो पर टकटकी पहले लगती है..... पुस्तकालयो में किताबो पर कम नजर लडकियों पर ज्यादा जाती है..... जिधर देखो वहां लडकियों को लाइन मारी जाती है .... प्यार का स्टाइल समय बदलने के साथ बदल रहा है ...... वैलेंटाइन प्रेमी बदलते जा रहे है......कुछ समय पहले तक मनोरंजन का साधन दूरदर्शन हुआ करता था...


९० के दशक में केबल की क्रांति आ गई... चैनलों की बाद आ गई... अपने बोली वुड में फिल्मो की बाढ आई हुई है..... दुर्भाग्य इस बात का है अपने प्रेमी बिरादरी वाले फिल्मो के चरित्र को अपने में उतरने की कोशिस करते है .... वह यह भूल जाते है रुपहले परदे और बुद्धू बक्से में जमीन आसमान का अन्तर होता है .....


हमारे यहाँ की ज्यादातर फिल्मे प्यार के फंडे पर बनी है ... "इश्क विश्क" से लेकर "मै प्रेम की दीवानी हूँ", "कहो ना प्यार है" से लेकर "मोहोबते" सभी प्यार के फंडे पर बनी है ... अगर "रब ने बना दी जोड़ी में शाहरुख़ " सुक्खीपापे" को तानी जी के पीछे दौड़ते हुए दिखाया जा रहा है तो आज प्राईमरी में पड़ने वाला बच्चा भी अपने स्कूल की तानी जी का पीछा करता नजर आएगा... अगर फ़िल्म में " ...हौले हौले हो जाएगा प्यार "बज रहा है तो प्राईमरी का बालक भी इस गाने में अपनी स्कूल वाली तानी जी को ढूदता नजर आता है ....


उसको अपनी स्कूल वाली तानी जी में " रब दिखाई देने लगता है.... फिर हरदम तानी जी की यादो से वह बाहर नही आ पाता .... प्राईमरी में पड़ने वाले न जाने ऐसे कितने लम्पट देवदास शायद यह भूल जाते है भारत में " सत्यम शिवम् सुन्दरम", "राम तेरी गंगा मैली" , जैसी फिल्मे भी किसी ज़माने में बनी है जो लोगो के जेहन में आज भी अपनी जगह बनाये हुए है .... यह सभी सच्चे प्यार का अहसास कराने के लिए काफी है..... आज वैलेंटाइन मनाना सबकी नियति बन चुका है....



कल ही रात में जिस बस से मै हबीबगंज उतरा .... उस बस में कुछ युवक सवार थे .... मैंने इस विषय पर उनकी नब्ज पकड़नी चाही .... जैसा मै सोच रहा था वैसा ही हुआ .... वह अपने मोबाइल में "दिल तो बच्चा है जी " गाना सुन रहे थे.... कहाँ से आ रहे है आप? यह पूछने पर जवाब मिला " १४ फरवरी की .....तैयारी है दादा ..... न्यू मार्केट से गिफ्ट ला रहे है ........



बहरहाल , आज प्यार की परिभाषा बदल गई है .... वैलेंटाइन का चस्का हमारे युवाओ में तो सर चदकर बोल रहा है , लेकिन उनका प्रेम आज आत्मिक नही होकर छणिक बन गया है... उनका प्यार पैसो में तोला जाने लगा है .... आज की युवा पीड़ी को न तो प्रेम की गहराई का अहसास है न ही वह सच्चे प्रेम को परिभाषित कर सकते है... उनके लिए प्यार मौज मस्ती का खेल बन गया है ..... नीचे की "पंक्तिया सटीक है......."

अपने पर गौरव न
गीत पराया गाते हो
मीरा का प्रेम त्यागकरतुम किसे पूजने जाते हो?
अश्लीलता में सने देह है
फिर बोलो कैसा दिल होगा ?
यह प्रेम नही फैशन है भइया
यहाँ हर प्रेमी कातिल होगा
ख़ुद को कहते प्रेमी क्या लाज नही आती तुम्हे
तुम तो तन के दीवाने होमन की सुन्दरता क्या भाती तुम्हे
क्यों आएना लोगो को दिखाते हो?
ख़ुद के चहरे को देखने से कतराते हो
क्यों चीर हरण का दुःखचटखारे लेकर सुनते हो
बहस चर्चाएं आयोजित करते हो?
अश्लीलता को सुंदर गुलाबो से तोलते हो ?
चीर हरण की भूमिका पर
राय शुमारी क्यों नही करते
नारी को कर भोग्य रूप किस कियासंस्कृति कुरूप
उत्तर दो उत्तर दो....?

Friday, 5 February 2010

करिये दिल खोल के बातें........



ऊपर की इस तस्वीर पर मेरी नजर चली गयी....... कल शाम जब सडक पर टहल रहा था.....उस समय अपने कैमरे से इसको उतार लिया.....लिखा है क्या आई डिया है सर जी .... अब मोबाइल की सिम एक रुपये में मिलेगी.....इसको शुभ संकेत मान सकते है....देश में मोबाइल क्रांति की दिशा में यह एक बड़ा कदम है....


भई लोग तो कहा करते हैं आजकल एक रुपये में आता ही क्या है.....? एक रूपया भी बड़ी काम की चीज है.....चिल्लरो की कमी आये दिन हमारे सामने बनी रहती है .... अगर चाय पीने की इच्छा हो तो वह भी अब तीन से बढकर चार रुपये की होने जा रही है.....शरद पवार तो यही करने की तैयारी कर रहे है......महंगाई ने तो सारी हदे तोड़ डाली है...... पानी सर के ऊपर से बह चुका है पर सरकार है कुछ कर ही नही रही......

जो भी हो अब महंगाई के इस दौर में जब सभी चीज महंगी हो रही है तो हमारी जनता जनार्दन के लिए यह बात राहत देने वाली है कि अब मोबाइल की सिम सस्ती हो रही है.... सिमो की कीमतों में ऐसी गिरावट पहले कभी नही देखी गयी....... मुझको अच्छी ढंग से याद है जब मोबाइल क्रांति का बाजा बजना शुरू हुआ था तो उस समय मोबाइल सेट भी बहुत महंगे हुआ करते थे ..... तब सिम भी काफी ऊँची कीमतों में बिका करती थी.....सिमो की कीमते अब सैकडे से गिरकर इकाई के अंको तक आ गयी है..... व्हट अन आईडिया सर जी..... ?


पिछले साल जब दिवाली में अपने गाव गया तो महसूस हुआ तो... संचार क्रांति का बाजा कितनी तेजी से बजा है ? गावो में बिजली नही है... सड़क भी नही पहुची है ..... लेकिन मोबाइल सेवा सबके घरो में पहुच चुकी है ....हर घर में मोबाइल सेट घनघना रहे है....चौकने की बात तो यह है गावो में अभी एक बड़ी आबादी ऐसी है जिसको मोबाइल के इस्तेमाल की सही जानकारी भी नही है..... वह केवल दो फंक्शन जानते है.... लाल से डायल करो..... हरे से फोन काट दो ......


कहते है अपने देश में गरीबो की आबादी तेजी से बद रही है ....सुरेश तेंदुलकर का नया आंकड़ा सामने आया है गरीब ३७ परसेंट है.... पर मेरा यह कहना है जितने गरीब हमारे देश में है उनमे से हर किसी के पास आज मोबाइल तेजी से पहुच रहा है .....इसके लिए भी सरकार को कोई समिति बनानी चाहिए.... एक रिक्शा चलाने वाले से लेकर एक जंक डीलर के पास तक आज मोबाइल पहुच चुका है.... ....


आस पास आप भी ऐसे वाकयो को देख चुके होंगे.....मुझको तो लगता है अगर यही सब चलता रहा तो आने वाले समय में मोबाइल के दाम और भी कम हो जायेंगे.....कुछ समय बाद मोबाइल सस्ते गल्लो की दुकानों में पेन की तरह मिलने लगेंगे..... चिंता मत करिए.....


Friday, 29 January 2010

जीत की लहर में फिर से सवार हुए राजपक्षे...................................




श्री लंका में एक बार फिर राजपक्षे की जीत का डंका बज गया है..... दूसरी बार उन्होंने लंका की कमान संभाल ली है ..... लेकिन विपक्षी पार्टी के प्रत्याशी फोंसेका उनकी जीत को नही पचा पा रहे है... जीत के बाद भी वह इस बात को उठा रहे है यह जीत नही, धांधली हुई है... श्री लंका के इस आम चुनाव में बड़े पैमाने पर धांधलियो के चलते राजपक्षे की जीत की राह आसान हुई है.....ऐसा कहना है फोंसेका का॥


मतों के लिहाज से बात करे तो यह राजपक्षे ५८ और फोंसेका को ४० परसेंट मत है ..... जो यह बता रहे है , आज भी राजपक्षे की लोकप्रियता का ग्राफ कम नही हुआ है.... राजपक्षे २००५ में लंका के रास्ट्रपति निर्वाचित हुए थे....राष्ट्रपति के रूप में उनका कार्यकाल अभी २ साल से ज्यादा का बचा हुआ था.....पर उन्होंने समय से पहले चुनाव करवा लिए....... संभवतया इसका एक कारन अभी वहां पर लिट्टे के पतन की पट कथा रही ..... इसके नायक बन्ने की होड़ राजपक्षे और फोंसेका में लगी रही.....


दरअसल वहां पर राजपक्षे और फोंसेका के बीच सम्बन्ध पिछले कुछ समय से अच्छे नही चल रहे थे ..... प्रभाकरन की मौत के बाद से संबंधो में तल्खी कुछ ज्यादा ही हो गयी... सेना ने जैसे ही लिट्टे के छापामार अभियान में सफलता प्राप्त कर ली वैसे ही राष्ट्रपति राजपक्षे ने फोंसेका की सेना अध्यक्ष पद से विदाई कर दी ....... उनके लिए चीफ ऑफ़ डिफेन्स स्टाफ नामक नया पद सृजित कर दिया गया...


यह मसला फोंसेका के लिए प्रतिष्टा का मसला बन गया... क्युकि उन्ही के सेनापति रहते सेना ने तमिल चीतों के विरुद्ध संघर्ष तेज किया जिसके चलते श्री लंका से तमिल चीतों को मुह की खानी पड़ी ...पर वहां के रास्ट्रपति राजपक्षे इस जीत के बाद खुद को नायक मानने पर तुले थे ....शायद इसी कारन उन्होंने अपने कार्यकाल के पूरा होने से पहले ही चुनाव मैदान में आने का मन बना लिया.............


अपने को वाजिब सम्मान न मिले पाने के चलते फोंसेका ने भी रास्ट्रपति पद के प्रत्याशी के रूप में अपने को उतार लिया...... राज्य की तमिल नेशनल अलायिंस समेत कई पार्टियों ने भी फोंसेका को चुनावो के दौरान अपना समर्थन दे दिया......परन्तु फोंसेका जीत का स्वाद नही चख पाए......अब अपनी हार के बाद धांधली पर जोर दे रहे है.....


श्री लंका लम्बे समय से गृह युद्ध की आग में जल रहा था..... १९४८ में श्री लंका की आज़ादी के बाद से ही वहां पर सिहली और तमिलो के बीच रिश्तो में तनातनी रही है.... वहां की २ करोड़ की आबादी में १२ प्रतिशत से अधिक तमिल है ... तमिलो को उतने अधिकार नही दिए गए जिसके चलते उनमे मायूसी साफ़ देखी जा सकती है ..... इसको महसूस करने की कोशिश फोंसेका के साथ राजपक्षे ने भी इस चुनाव बखूबी की ..... सिहली के साथ दोनों के द्वारा तमिलो का ट्रम्प कार्ड भी फैका गया.....परन्तु सफलता राजपक्षे के हाथ लगी.......


इस जीत के बाद सभी को इस बात की आशा है श्री लंका में सब कुछ ठीक हो जायेगा.....लेकिन कई लोगो का मानना है राजपक्षे की असली परीक्षा अब शुरू होगी ... देखना होगा ऐसे हालातो में वह लंका के विकास के लिए किस ढंग से अपना खाका बुनते है?



वर्तमान में श्री लंका की अर्थव्यवस्था उतर चुकी है... रोजगार के नए अवसर नही मिले पा रहे है.... महंगाई सातवे आसमान पर है.....आम आदमी का कोई पुरसा हाल नही है....मानवाधिकारों का हनन होता रहा है... इन सबके चलते वहां पर रास्ट्रपति के सामने चुनोतियो का बड़ा पहाड़ खड़ा है.....


सबसे मुख्य बात तमिलो को लेकर है... उनको देश की मुख्य धारा में लाने के लिए उनको काफी मशक्कत करनी होगी..... २६ साल के इस संघर्ष में सबसे ज्यादा उनके अधिकारों का हनन हुआ.... अब कोशिश होनी चाहिए सभी समुदायों के बीच कोई बैर नही रहे..... वैसे भारत की बात करे तो तमिलो का मुद्दा सीधे हमें भी प्रभावित करता है..........


श्री लंका में होने वाली कोई भी घटना से तमिलनाडू की राजनीती प्रभावित होती है...... इन सबको ध्यान रखते हुए कोशिश होनी चाहिए की तमिलो के अधिकारों की रक्षा की जानी चाहिए..... सिहली बिरादरी से आने वाले राजपक्षे भी अब शायद इस बात को बखूबी महसूस करेंगे की अब समय आ गया है जब तमिल हितों को वह प्राथमिकता के साथ मिल बैठकर सुलझाएंगे.......


राजपक्षे विश्थापित तमिलो के पुनर्वास की बात तो अंतराष्ट्रीय मंचो पर दोहराते रहे है लेकिन यह इस बात को भी भूल जाते है कि आज भी तमिल श्री लंका की सेना और सिहली बिरादरी के निशाने पर है ...यह घटना भारत के लिए भी चिंताजनक है ... अगर तमिलो का मुद्दा अभी भी नही सुलझता है तो इससे भारत की परेशानिया तेज हो सकती है....



भारत की जहाँ तक बात है तो श्री लंका में चीन की बदती उपस्थिति निश्चित ही चिंताजनक है... ड्रेगन ने लंका को लिट्टे के विरुद्ध संघर्ष में हथियार और सहायता प्रदान की .... यही नही भारत के धुर विरोधी पाकिस्तान ने भी वहां कि सेना को सटीक बमबारी के प्रशिक्षण के लिए साजो सामान मुहैया करवाया....


यह सब देखते हुए भारत की मजबूरी भी लंका को मदद करने की बन गयी.... लेकिन अब राजपक्षे के आने से भारत को इस बात का ध्यान रखना होगा कैसे पाकिस्तान और चीन का दखल लंका में कम किया जाए॥? वैसे भारत और श्री लंका के बीच शुरू से मधुर सम्बन्ध रहे है ... ड्रेगन और पाकिस्तान के बड़ते दखल को हमारे नीति नियंता नही पचा पा रहे है ....पड़ोस में इनकी उपस्थिति से भारत की चिंताए कम होने का नाम नही ले रही है......शायद तभी राजपक्षे को हमारी प्रतिभा ताई के द्वारा सबसे पहले बधाई भिजवाई गयी ....


राजपक्षे के मुख्य विपक्षी उम्मीदवार फोंसेका हार के बाद विचलित है .... हार के बाद इस बात की सम्भावना बन गयी है नयी सरकार फोंसेका की देश से विदाई करने के मूड में है...उनके समर्थको ने इस बात के आरोप लगाने चुनाव परिणामो के बाद ही लगाने शुरू कर दिए थे कि फोंसेका की जान को आने वाले दिनों में बड़ा खतरा है...


एक होटल के बाहर उनको कुछ सेनिको के द्वारा चुनाव परिणामो के बाद घेरा जा चूका है जो इस सम्भावना को पुख्ता साबित कर देती है....खुद सेना के प्रवक्ता नानायक्करा ने इस बात को स्वीकार किया है.. ऐसे में देखने वाली बात होगी अब फोंसेका का क्या होता है ?

खैर जो भी हो , इन परिणामो ने एक बार फिर राजपक्षे की लोकप्रयता का ग्राफ ऊँचा किया है॥ १८ लाख से अधिक वोटो के साथ वह जीत की लहर में सवार हुए है ...


श्री लंका की गाडी को वह वापस ट्रेक पर लायेंगे ऐसे उम्मीद की जा सकती है ..... लंका में सुख शांति लाने की दिशा में भी वह मजबूती से आगे बढेंगे ऐसी उम्मीद लोग कर रहे है॥ अधिकाधिक रोजगार के अवसरों को बडाने की भी बड़ी चुनोती उनके सामने इस समय है... लम्बे समय से लंका में चली अशांति के चलते वहां पर निवेशको ने भी कोई रूचि नही दिखायी है ॥


इसको ध्यान में रखते हुए राजपक्षे को यह बात भी महसूस करने की जरूरत है कैसे निवेशको को लंका में आकर्षित किया जा सके..... यह सब श्री लंका की ख़राब अर्थव्यवस्था की सेहत के लिए टोनिक का काम कर सकता है..... अब देखना होगा राजपक्षे अपने इस दुसरे कार्यकाल में अपने कदम कैसे बदाते है?



Saturday, 23 January 2010

विकास की गति अपेक्षा से कम हुई है------- ऐरी



उत्तराखंड क्रांति दल उत्तराखंड का एक मात्र रीजनल दल है.......वह निशंक सरकार को अपना समर्थन दे रहा है...... उसके शीर्ष नेता काशी सिंह ऐरी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की विधान सभा में चार बार प्रतिनिधित्व कर चुके है..... राज्य निर्माण आन्दोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले ऐरी राज्य में उत्तराखंड क्रांति दल का बड़ा संगठन खड़ा नही कर पाए..... अपनी साफ और ईमानदार छवि को वह पार्टी के वोट बैंक को बढाने में इस्तेमाल नही कर पाए.....पृथक राज्य के लिए चले जन आन्दोलन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है.....परन्तु इसके बाद भी उनका दल लोगो का विश्वास जीतने में कामयाब नही हो पाया है..उक्रांद के कमजोर सांगठनिक ढांचे का फायदा राज्य में भाजपा और कांग्रेस ने उठाया...



उत्तराखंड के वरिष्ट नेता काशी सिंह ऐरी मानते है उत्तराखंड राज्य आन्दोलन के प्रमुख मुद्दे रसातल में है.....९ वर्ष बीतने के बाद भी राज्य की स्थितिया अच्छी नही कही जा सकती...पहाड़ो से पलायन बदस्तूर जारी है..जल ,जमीन, जंगल जैसे मुद्दे हाशिये पर है.....जिसके चलते जनता अपने को ठगा महसूस कर रही है...


राज्य गठन के ९ वर्ष पूरे होने के मौके पर ऐरी से मैंने विशेष संवाद अभी कुछ समय पहले किया ........ उसी के कुछ मुख्य अंश आपके सामने प्रस्तुत हैं..........




राज्य गठन के ९ साल पूरे हो चुके है? राज्य निर्माण आन्दोलन में भागीदार के तौर पर इन ९ सालो को आप कैसे देखते है?

--- देखिये हर्ष जी, राज्य बन गया है और ९ वर्ष का समय भी बीत गया है.....लेकिन राज्य में जैसी स्थितिया आज है वह बहुत अच्छी नही कही जा सकती ... जिस आशाओ और आकांशा को लेकर यह राज्य बना था वह पूरी नही हुई है ....पर्वतीय इलाकों से पलायन आज भी जारी है ... हमने पिछली सरकार से भी कहा
वर्तमान सरकार से भी कह रहे है पर्वतीय इलाकों के विकास के लिए एक विशेष ओद्योगिक नीति बनाये.....जिससे पहाड़ो से पलायन कम हो पर इस दिशा में गंभीरता से विचार नही हुआ है......


कांग्रेस का कहना है वर्तमान भाजपा की सरकार विकास के मोर्चे पर पूरी तरह से विफल साबित हुई है? इस बाबत आपका क्या कहना है?
-----कांग्रेस क्या कहती है मैं उस पर नही जाऊँगा, लेकिन इतना जरुर है विकास की गति अपेक्षा से कम हुई है......जिस तेजी से विकास होना चाहिए था वह नही हुआ है.......


तिवारी जी का शासन हमने देखा ....फिर खंडूरी जी आये.... दोनों की काम करने की जो बुनियादी शैली थी उसमे क्या फर्क नजर आता है आपको ?
----तिवारी जी का अपना अलग अनुभव था....उनकी काम करने की अलग शैली थी....देश की राजनीति पर उनकी जो पकड़ थी उसकी वजह से जैसा भी था विकास योजनाये आगे बड़ी........ खंडूरी जी के शासन में विकास को गति नही मिली.... खंडूरी जी विकास का पैसा सही जगह लगाना चाहते थे ताकि करप्शन न हो.....अभी नए मुख्य मंत्री निशंक आये है लोगो को उनसे काफी उम्मीदें है......


स्थायी राजधानी के मुद्दे पर दीक्षित आयोग की रिपोर्ट आ चुकी है ....आपकी पार्टी गैरसैण को नए राज्य की राजधानी बनाने की बात करती है..... मुझको याद है एक बार १५ जनवरी १९९२ को आपने बागेश्वर में सरयू नदी के तट पर गैरसैण को नए राज्य की राजधानी बनाने का संकल्प लिया था.......लेकिन दीक्षित आयोग की रिपोर्ट देखकर ऐसा लगता है राजधानी को देहरादून से हटाना संभव नही है....उक्रांद का गैरसैण पर क्या स्टैंड है ?उक्रांद पर अपने मूल मुद्दों से भटकने के आरोप भी लगते रहे है ?
----गैरसैण को राजधानी बनाना आज भी हमारे एजेंडे में है ....हम वहां राजधानी बनाकर दिखायेंगे....गैरसैण से पूरे राज्य का कांसेप्ट लगा हुआ है.....चाहे वह पहाड़ हो या मैदान राजधानी तो ऐसी जगह पर होनी चाहिए जो बीच में हो और हर जगह से उसका लिंक हो......गैरसैण हमारी जिद नही है ॥ गैरसैण हमारे लिए राज्य की मूल अवधारणा का केंद्र बिंदु है ॥ हमारा दल इससे नही भटका है......


कभी तीसरा मोर्चा बनाने की बात करने वाला आपका दल आज प्रदेश की भाजपा सरकार में खुद सत्ता की मलाई चाट रहा है ....ऐसे में तीसरे मोर्चे के कांसेप्ट का क्या होगा ऐरी जी?
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ऐसा नही है...तत्कालीन समय की राजनीतिक आवश्यकताएं अलग थी ......कोई सरकार नही बन रही थी.....प्रदेश में दुसरे चुनाव होने की आशंका भी बन रही थी ... कुछ विधायको की खरीद फरोख्त का भी मामला चल रहा था....ऐसे में अस्थिरता को समाप्त करने के लिए हमने अपने संवेधानिक कर्तव्यों का पालन किया .....और भाजपा को अपना समर्थन दिया... तीसरा मोर्चा ख़त्म हो गया है यह कहना सही नही है ......हम जनता के मुद्दों को उठाते रहते है ..आगे भी उठाएंगे.....


राज्य में कांग्रेस के शासन में उद्योगों में सत्तर फीसदी रोजगार स्थानीय लोगो को दिए जाने का शासनादेश जारी हुआ था॥ उस समय जितने भी मजदूर रखे गए उनका न्यूनतम मजदूरी देकर शोषण किया गया ... आज भी भाजपा के शासन में कमोवेश यही स्थितिया है?
------निश्चित तौर पर यह शासनादेश जारी है कि राज्य में लगने वाले उद्योगों में सत्तर फीसदी रोजगार स्थानीय लोगो को मिलना चाहिए लेकिन जहाँ तक इसके अनुपालन का सवाल है तो स्थिति बड़ी ख़राब है ॥ सत्तर फीसदी रोजगार सीधे डायरेक्ट होना चाहिए......हम इस मांग को सरकार के सामने रखेंगे......

विकास का प्रथम सोपान रेल यातायात है ... पहाड़ो में रेल चलने से विकास कार्य तेजी से हो सकते है .....राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री तिवारी ने तो एक बार कह दिया था पहाड़ो में रेल की कोई आवश्यकता नही है ....आपका इस सम्बन्ध में क्या कहना है ?
----जहाँ तक रेल की बात है तो पूरे विश्व में रेल कि महत्ता बनी हुई है ....पहाड़ के पिछड़ेपन को दूर किया जाना चाहिए.....इस सम्बन्ध में कई आन्दोलन भी चले....टनकपुर से पंचेश्वर, धारचुला, बागेश्वर , कर्णप्रयाग,तक तीन चार लाइन बिछाई जानी चाहिए......रेल सेवा महत्वपूर्ण है इसलिए यह कहना पहाड़ में रेल की कोई जरुरत नही है यह उचित नही है.......


ऐरी जी अगर आपकी पार्टी भविष्य में सत्ता में आती है तो आपकी प्राथमिकता क्या होगी?
----विकास का ढर्रा बदलना ,रोजगार के अधिकाधिक अवसर देना , राज्य के संसाधनों का अधिकाधिक उपयोगकरना और करप्सन दूर करना हमारी प्राथमिकता में रहेगा..... पानी का सवाल हो या फिर जल जमीन जंगल का इन सभी मुद्दों पर जनता को केंद्र में रखकर नीतिया लागू की जायेंगी......

ऐरी जी अंतिम प्रश्न , जनता से आप क्या उम्मीद रखते है ?
---जनता ने उत्तराखंड के अलग राज्य के कांसेप्ट को स्वीकारा ...जनता हर आन्दोलन में हमारे साथ थी और आगे भी रहेगी.....राज्य के नव निर्माण में वह फिर हमारा साथ देगी .... ऐसी आशा करता हूँ ........

Tuesday, 19 January 2010

महिला सशक्तिकरण............


वीमेन इम्पावरमेंट ..... भैया इसको देखकर क्या सोचेंगे लोग.......? हम तो यही सोच रहे है........ पत्रकारिता करते करते कल जब खबरों की खोज खबर कर रहा था..... तो अचानक मेरी नजर इस बोर्ड पर पड़ी......झीलों के शहर भोपाल में अब महिलाओं का इम्पावरमेंट होना शुरू हो गया है ..... आपको बता दू अभी महीने पहले भोपाल नगर निगम की महापौर की कुर्सी पर कृष्णा गौर काबिज हुई है ...... कृष्णा गौर नगरीय प्रशासन मंत्री बाबू लाल गौर की बहू है...... देखा इसे कहते है महिला हित के प्रति संवेदनशीलता......... कुर्सी मिलते ही भोपाल में महिलाओं के लिए एक अलग से पार्क बना डाला.......... पार्क भी ऐसा जहाँ पुरुष भी ना फटक सकते ....और तो और ३ साल से ज्यादा उम्र के बच्चो के घुसने पर भी पाबन्दी है.........

Friday, 8 January 2010

मध्य प्रदेश भाजपा का नया "गडकरी" कौन?



मध्य प्रदेश भाजपा में इन दिनों नए भाजपा के गडकरी के लिए मंथन चल रहा है...... हालाँकि वर्तमान प्रदेश भाजपा अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह तोमर को पंचायत चुनाव निपटने तक अभयदान दे दिया गया है परन्तु राज्य में नए "गडकरी" की खोज के लिए जोर आजमाईश शुरू हो चुकी है......


सूत्रों की माने तो नए अध्यक्ष के चयन में शीर्ष नेतृत्व "शिव" की राय पर अपनी मुहर लगा सकता है..... पार्टी के हबीबगंज मुख्यालय से आ रही खबरों के अनुसार पार्टी की मौजूदा हालत पर मंथन किया जा चूका है... गौरतलब है अभी कुछ समय पहले विदिशा से सांसद और लोक सभा में विपक्ष कि नेता सुषमा स्वराज का भोपाल में आगमन हुआ था... वह कृष्णा गौर की महापौर की कुर्सी जीतने के बाद भोपाल पधारी थी.....तभी से नए नेता के चयन को लेकर पार्टी में चर्चा चल रही है... इसी दरमियान उनके सामने नए "गडकरी" कि खोज के मिशन पर खासी चर्चा भी हुई है... अगर इन खबरों पर यकीन करे तो इस बात को भी नजरअंदाज नही किया जा सकता है कि नए "गडकरी " के चयन में उनकी राय की इस बार अनदेखी की जायेगी...


बताया जाता है दिल्ली में नए नेता कि खोजबीन जारी है॥ इस समय कई नाम हवा में तैर रहे है जिनका दावा नरेन्द्र सिंह तोमर की जगह पर पुख्ता है.... इस सूची में सबसे आगे जिनका नाम चल रहा है वह है भाजपा के राष्ट्रीय सचिव प्रभात झा का... पर बताया जाता है वह शिवराज की पहली पसंद नही है॥ हाँ, इतना जरुर है उनकी संघ के अन्दर मजबूत पकड़ है...संघ के सर कार्यवाह सुरेश सोनी का उन पर खासा वरदहस्त भी रहा है ...पिछले कुछ समय से मध्य प्रदेश में उनकी सक्रियता भी बनी हुई है जो यह बताती है वह मध्य प्रदेश की "पिच" पर बैटिंग करने को बड़े उतावले है.... ब्राहमण होना उनके लिए फायदे का सौदा बन सकता है...


अनूप मिश्र के समर्थक भी अब प्रभात झा को अध्यक्ष की दोड से बाहर करने की कोशिसो में लग गये है॥ बताया जाता है वह अपना दावा दिल्ली में मजबूती से रख रहे है॥ साथ में उन्हें अपने समर्थको का समर्थन मिलने के साथ ही खुद शिव राज का भी बराबर समर्थन हासिल है.... खुद शिव राज चाहते है वह ऐसे व्यक्ति को अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठाना चाहते है जिसकी ट्यूनिंग तोमर जैसी मैच करे... ऐसे हालातो में अनूप मिश्रा का दावा मजबूत नजर आ रहा है ... बताया जाता है उनके नाम पर सुषमा भी मुहर लगा देंगी...


कप्तान सिंह सोलंकी का नाम भी प्रदेश भाजपा के नए गडकरी के रूप में सामने आ रहा है॥ अगर ऊपर के किसी नाम पर सहमती नही बन पाती है तो "शिव " अपनी पसंद के "सोलंकी " का दाव खेल सकते है...सोलंकी की मराठा लोबी से खासी निकटता रही है॥ अभी भाजपा में मराठा लोबी का "सेंसेक्स" चरम पर है... गडकरी जैसे कई लोगो की इस समय पार्टी में खूब चल रही है ..ऐसे हालातो में सोलंकी की अध्यक्ष की डगर आसान लग रही है॥

अगर सोलंकी पर सहमती नही बन पाती है तो शिव अपनी पसंद के "लक्ष्मी कान्त शर्मा" का नाम आगे कर सकते है...वैसे हाल के मंत्रिमंडल विस्तार में लक्ष्मी कान्त को वजनदार मंत्रालय शिव के द्वारा आवंटित किये गए...जिससे यह अनुमान लगाया जा सकता है शिव के दरबार में उनकी क्या पकड़ है...?बताया जाता है इस समय लक्ष्मी कान्त कि गिनती शिव के सबसे विश्वास पात्रो में की जाती है....संगठन के महत्वपूर्ण कामो में शिव लक्ष्मी कान्त की राय लिया करते है॥ ऐसे में उनका दावा भी कमजोर नही है.... विदिशा से होना उनके लिए माईनस पॉइंट साबित हो सकता है....

इन सबसे इतर इंदौर से सांसद सुमित्रा महाजन का नाम भी भावी अध्यक्ष के लिए सामने आ रहा है ..."शिव राज" मामा बनकर महिला सशक्तिकरण के नारे जोर शोर से लगाते रहते है ...पर महत्वपूर्ण पद पर महिलाओं को उचित सम्मान नही दिया गया है...सुमित्रा को आगे कर शिवराज एक तीर से कई निशाने साध सकते है॥ उनके नाम का चयन होने से यह सन्देश जाएगा कि महत्वपूर्ण पद पर भाजपा में महिलाओं को उचित सम्मान मिलता है.... वैसे अभी सुषमा स्वराज के नेता प्रतिपक्ष पद पर होने से सुमित्रा के नाम पर गौर किया जा सकता है.... शिव राज के द्वारा हाल में किये गए मंत्रिमंडल विस्तार में अर्चना चिटनिस से कई मलाईदार मंत्रालय ले लिए गए जिससे यह सन्देश गया है कि राज्य कि भाजपा सरकार महिलाओं कि सच्ची हितेषी नही है... इंदौर में कैलाश विजय वर्गीज और सुमित्रा के बीच का ३६ का आंकड़ा जगजाहिर है... इस बार शिव राज ने अपने मंत्रिमंडल विस्तार में सुमित्रा के चहेते हार्डिया को अपने मंत्रिमंडल में जगह डी है... राजनीतिक विश्लेषको का मानना है इससे कैलाश विजय वर्गीज का कद कम हो गया है... यह घटना बताती है कि आज पार्टी में सुमित्रा कि राय कि अनदेखी नही की जा सकती है... इससे सुमित्रा की अध्यक्ष पद कि संभावनाओं को भी बल मिल रहा है ....

अध्यक्ष पद के लिए कोशिसे जारी है....मध्य प्रदेश भाजपा को भी नए अध्यक्ष पद का बेसब्री से इन्तजार है .....नए अध्यक्ष के सामने सत्ता और संगठन को साथ लेकर चलने की चुनौती है....अब देखना है इस पद पर किसकी ताजपोशी हो पाती है.....? वैसे सूत्रों से मिले रही खबरे बता रही है के नए अध्यक्ष का नाम अभी से तय किया जा रहा है ... इंदौर में पार्टी की १७ फरवरी को हो रही रास्ट्रीय कार्यकारणी कि बैठक के समापन के मौके पर नए अध्यक्ष की घोषणा की जायेगी....इंदौर में बैठक होने के कारण सुमित्रा का दावा भी कमजोर नजर नही आ रहा है...अब देखते है इन नामो में से किसका चयन किया जाता है या फिर कोई नया " डार्क होर्स " बेक डोर से इंट्री मारेगा .......... तो कीजिये कुछ इन्तजार फिल्म अभी बाकी है दोस्त.........



Friday, 1 January 2010

निकाय चुनावो में भी दिखा "शिव" का दम.........,.


मध्य प्रदेश में नगर निगम चुनावो के परिणाम सामने आ गए.... इन चुनावो में भाजपा ने एक बार फिर से बाजी मार ली.... लोक सभा चुनावो में भाजपा की घटी सीटो ने "शिव राज" की चिंताओं को बदा दिया था....पर इन चुनावो के परिणामो के बाद मुख्य मंत्री शिवराज चैन की बंसी बजा सकते है॥ आज के वोटर के मिजाज को परखना बड़ा मुश्किल है लिहाजा शिव राज को भी बचे चार साल के कार्यकाल में फूक फूक कर कदम रखने की जरुरत है ... राज्य के वोटरों का यही साफ़ सन्देश है ....


भोपाल नगर निगम पर कृष्णा गौर ने आभा सिंह को १५००० से अधिक वोटो से पराजित किया .... भोपाल नगर निगम पर पिछले दस वर्षो से कांग्रेस का कब्ज़ा था... भोपाल में महापौर की कुर्सी तो गौर को मिल गयी पर परिसद में कांग्रेस की धमक रहेगी... भाजपा की राजधानी में घटी सीटें "शिव" महाराज के लिए खतरे की घंटी बजा रही है.....


"मिनी मुंबई" के नाम से जाने जाने वाले इंदौर में भाजपा के कृष्ण मुरारी मोघे ने सफलता कायम की.....यहाँ पर कांग्रेस के पंकज संघवी को हार का मुह देखना पड़ा... संघवी ने इस चुनाव में पैसा पानी की तरह बहा दिया था पर इसके बाद भी वह नही जीत सके.... ग्वालियर, रीवा , खंडवा, जबलपुर, बुरहानपुर के नगर निगम पर भाजपा काबिज हुई.... खंडवा में भावना शाह की जीत हुई ॥ उनके पति देव विजय शाह राज्य की भाजपा सरकार में मंत्री है.....जबलपुर में भी भाजपा के प्रभात साहू ने भाजपा का झंडा फहरा दिया..... रीवा में शिवेंद्र पटेल की जीत हुई..... रतलाम में भाजपा के आगन में किल्कारिया गूंजी....बुरहानपुर में माधुरी का जलवा चला.... सबसे चौकाने वाला परिणाम सागर में रहा जहाँ किन्नर कमला की बम्पर वोट से जीत हुई .... यहाँ पर भाजपा शुरू से मजबूत रही है ....


बसपा का हाथी भले ही पूरे देश में अपनी चदायी नही कर पा रहा हो पर इस बार सिगरोली ,सतना के नगर निगम बसपा के खाते में गए... वही कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी बज गयी है ... लोक सभा चुनाव में अच्छी सीट जीतने के बाद जहाँ वह उत्साहित नजर आ रही थी वही इस बार उसके दिग्गज नेताओं के गद खुद सलामत नही रहे... कमलनाथ, ज्योतिरादित्य , अरुण यादव, सईद अहमद के इलाको में कांग्रेस के हाथ सत्ता फिसल गयी.... कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष पचौरी के लिए खतरे की घंटी बज गयी है ... इन चुनावो के बाद उनका सिंहासन खतरे में पड़ता नजर आ रहा है ... कांग्रेस के साथ एक बड़ी बीमारी गुटबाजी की लग गयी है जो हर चुनाव में उसका खेल ख़राब कर देती है ... इस बार भी ऐसा ही हुआ है...


८ सीट जीतने के बाद शिव राज ने साबित कर दिया है मध्य प्रदेश में उनका राज किसलिए चलता है.....इस जीत के बाद केन्द्रीय स्तर पर उनका कद एक बार फिर बद गया है ... प्रदेश में अब नरेन्द्र सिंह तोमर का नया उत्तराधिकारी खोजा जाना है .... संभवतया केन्द्रीय नेतृत्व अब ऐसे व्यक्ति को कुर्सी सोपे जो शिव की पसंद का हो...... कांग्रेस को चाहिए वह बचे पांच सालो में मजबूती से विपक्ष की भूमिका निभाए....अन्यथा शिवराज अकेले उनकी लुटिया डुबोने की " कैपेसिटी " रखते है..... इस बात पर कांग्रेस को गंभीरता से विचार करना चाहिए.......