Thursday, 16 June 2011

माम्मू का अधूरा सपना ..........................

वह कसाब को फासी पर चढाने की राह लम्बे समय से देखता रहा लेकिन हमारे देश के नेताओ की वोट बैंक की राजनीती के कारण मुंबई पर हमला करने वाले आतंकी अजमल आमिर कसाब को फासी पर नही चढ़ाया जा सका ......कसाब को फासी पर चदाये जाने की कसक माम्मू के दिल में व्याप्त थी लेकिन माम्मू की तमन्ना अधूरी रह गई.....

आज जिस माम्मू नाम के शख्स की बात आपसे कर रहा हू ,वह कोई मामूली आदमी नही है...वह देश का एकमात्र जल्लाद था जो उन लोगो को फासी पर लटकाया करता था जिनकी मृत्युदंड की याचिका राष्ट्रपति के द्वारा ख़ारिज कर दी जाती थी...मीरत के टी पी नगर में रहने वाला माम्मू जल्लाद उत्तर प्रदेश जेल का कर्मचारी था जिसने कई दर्जन लोगो को फासी पर लटकाया था......

माम्मू को करीब से जानने वालो का कहना है कि माम्मू हर दिन कसाब को फासी पर चढाने की राह देखता रहा लेकिन उसका सपना पूरा नही हो सका ....माम्मू का पूरा खानदान अरसे से जल्लाद का काम करता आ रहा था ... माम्मू देवेन्द्र पाल सिंह भुल्लर की दया याचिका खारिज होने के बाद सुर्खियों में आया .......अगर भुल्लर की सजा पर कोई फैसला नही आता तो शायद माम्मू भी सुर्खिया नही बटोरता ..... बहुत कम लोग ये जानते होंगे माम्मू देश का आखरी जल्लाद था और अब उसकी मौत के बाद देश में जल्लादों का संकट पैदा हो गया है ....

अपनी मौत से पहले उसने जेल के अधिकारियो से कई बार यह विनती की कसाब को जल्दी फासी पर लटकाया जाए जिससे उसकी तमन्ना पूरी हो सके लेकिन हमारे देश की घिनोनी राजनीती के चलते उसकी मुराद पूरी नही हो सकी और वह खुदा को प्यारा हो गया.....६६ साल का माम्मू पिछले कुछ समय से बीमार चल रहा था जिसका पता जेल प्रशासन को भी था पर कसाब को फासी पर लटकाने का फैसला जेल वालो को नही बल्कि राष्ट्रपति को करना था ...

माम्मू का पूरा खानदान जल्लादी के काम से था....उसके पिता और दादा भी इस काम को कर चुके थे.... उसके पिता कालू ने तो इंदिरा गाँधी के हथियारे कहर सिंह और बलवंत सिंह को फासी पर लटकाया था .... पिता की मौत के बाद माम्मू ने कई लोगो को अपने हाथो से फासी पर लटकाया ...

माम्मू के दादा राम अंग्रेजो के दौर में जल्लाद का काम किया करते थे ... आज़ादी के दौर में कई क्रांतिकारी भी हस्ते हस्ते फासी के तख़्त पर चढ़ गए जिन्हें माम्मू के दादा ने ठिकाने लगाया ... इनमे भगत सिंह , सुखदेव, राजगुरु जैसे क्रांति कारी भी शामिल थे ......

आज़ादी के महानायकों को फासी पर चढाने का जो काम माम्मू के दादा ने किया था उससे वह बहुत शर्मिंदा था क्युकि माम्मू के दादा ने यह सब काम फिरंगियों के दबाव में किया था और अंग्रेजी हुकूमत काली चमड़ी वालो से किस तरह बर्ताव करती थी इसकी मिसाल इतिहास में आज भी पढने को मिल जाती है....

माम्मू बार बार कसाब को फासी पर जल्द चदाये जाने की बातें इसलिए करता था क्युकि उसे लगता था अगर उसने इस आतंकी को फासी पर चढ़ा दिया तो उसके पुरखो के सारे पाप मिट जायेंगे और उसको प्रायश्चित करने का एक सुनहरा मौका मिल जाता .....लेकिन माम्मू की ख्वाइश अधूरी ही रह गई......

Thursday, 9 June 2011

उमा की वापसी के बाद अब कतार में गोविन्दाचार्य.....

"जैसे उडी जहाज को पंछी पुनि जहाज पर आवे"..... २ दिन पहले भारतीय जनता पार्टी में अपनी वापसी पर इस साध्वी ने कुछ इन्ही पंक्तियों में अपनी वापसी को मीडिया के खचाखच भरे समारोह में बयां किया ......पार्टी के आला नेताओं के तमाम विरोधो के बावजूद भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी उमा को पार्टी में लाने में कामयाब हो गए..... इस विरोध का असर उनकी प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी देखने को मिला जिसमे पार्टी के जेटली, स्वराज, जैसे कई बड़े नेता शामिल तक नही थे .......इन सभी की गिनती उमा के धुर विरोधियो के रूप में की जाती थी.....

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और पार्टी के भाजपा प्रदेश अध्यक्ष अध्यक्ष प्रभात झा तक को इसकी जानकारी नही लगी... प्रभात झा का तो यह हाल था कि उमा की वापसी से २ घंटे पहले जब उनसे पार्टी में उनकी वापसी के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा इस पर कुछ नही कहना है ॥ परन्तु २ घंटे बाद वही झा और मुख्यमंत्री ने इस विषय पर गेंद केन्द्रीय नेताओं के पाले में फेकते हुए कहा जब भी कोई नेता पार्टी में आता है तो उसका स्वागत होता है...... घर वापसी को लेकर उमा के पक्ष में माहौल लम्बे समय से बन रहा था लेकिन भाजपा के अन्दर एक तबका ऐसा था जो उमा की पार्टी में वापसी का विरोध कर रहा था ॥

दरअसल उमा की वापसी का माहौल जसवंत सिंह की भाजपा में वापसी के बाद बनना शुरू हो गया था... उस समय उमा भारती भैरो सिंह शेखावत के निधन पर जसवंत के साथ राजस्थान गई थी.....संघ ने दोनों की साथ वापसी की भूमिका तय कर ली थी लेकिन उमा विरोधी खेमा उनकी वापसी की राह में रोड़े अटकाते रहा .......

पिछले साल उमा भारती छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह के मुख्यमंत्री के पिता की तेरहवी में आडवानी और राजनाथ सिंह के साथ नजर आई तो फिर उमा की पार्टी में वापसी को बल मिलने लगा ......इसके बाद पार्टी में गडकरी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद उनका मोहन भागवत के साथ मुलाकातों का सिलसिला चला ॥ खुद भागवत ने भी पार्टी से बाहर गए नेताओं की वापसी का बयान दिया तो इसके बाद उमा की वापसी की संभावनाओ को एक बार फिर बल मिलना शुरू हुआ ...... लेकिन मध्य प्रदेश के भाजपा नेता खुले तौर पर उनकी वापसी पर सहमति नही देते थे क्युकि उनको मालूम था अगर उमा पार्टी में वापसी आ गई तो वह मध्य प्रदेश सरकार के लिए खतरा बन जाएँगी......

उमा ने राम रोटी के मुद्दे पर भाजपा से किनारा कर लिया था ...कौन भूल सकता है जब उन्होंने आज से ६ साल पहले भरे मीडिया के सामने आडवानी जैसे नेताओं को खरी खोटी सुनाई थी और पार्टी को मूल मुद्दों से भटका हुआ बताया था .....लेकिन इस दौर में उन्होंने संघ परिवार से किसी भी तरह से दूरी नही बड़ाई .....शायद इसी के चलते संघ लम्बे समय से उनकी पार्टी में वापसी का हिमायती था ...


वैसे भी उमा भारती पार्टी में कट्टर हिंदुत्व के चेहरे की रूप में जानी जाती रही है ......कौन भूल सकता है अयोध्या के दौर को जब साध्वी के भाषणों ने पार्टी में नए जोश का संचार किया था .....उमा की इसी काबिलियत को देखकर पार्टी हाई कमान ने उनको २००३ में मध्य प्रदेश में उतारा जहाँ उन्होंने दिग्विजय सिंह के १० साल के शासन का खात्मा किया ..... इसके बाद २००४ में हुबली में तिरंगा लहराने और सांप्रदायिक सौहार्द को नुकसान पहुचाने के कारण उनके खिलाफ वारेंट जारी हुआ और उन्होंने सी ऍम पद से इस्तीफ़ा दे दिया....

भरी सभा में भाजपा के नेताओं को कैमरे के सामने खरी खोटी सुनाने के बाद उमा ने मध्य प्रदेश में अपनी अलग भारतीय जनशक्ति पार्टी बना ली..... २००८ के चुनावो में इसने ५ सीटे प्रदेश में जीती ..... उम्मीद की जा रही थी कि उमा की पार्टी बनने के बाद भाजपा को बड़ा नुकसान उठाना पड़ेगा परन्तु ऐसा नही हुआ .... इसके बाद से उमा के भविष्य को लेकर सवाल उठने लगे ... हर बार उन्होंने मीडिया के सामने भाजपा को खूब खरी खोटी सुनाई परन्तु कभी भी संघ को आड़े हाथो नही लिया....शायद इसी के चलते संघ में उनकी वापसी को लेकर खूब चर्चाये लमसे समय से होती रही .........


प्रदेश के मुख्यमंत्री शिव राज सिंह चौहान और उमा भारती में शुरू से छत्तीस का आकडा रहा है ......उमा की वापसी का विरोध करने वालो में उनके समर्थको का नाम भी प्रमुखता के साथ लिया जाता रहा है.... शिव के समर्थक उनकी वापसी के कतई पक्ष में नही थे इसी के चलते उनकी वापसी बार बार टलती रही... लेकिन केन्द्रीय नेतृत्व के आगे शिव के समर्थको की इस बार एक नही चली......इसी के चलते पार्टी के किसी नेता ने खुलकर उनकी वापसी पर ख़ुशी का इजहार नही किया.....


उमा की वापसी पर सबसे ज्यादा चिंता मध्य प्रदेश में थी..... राजनीतिक विश्लेषको का मानना था अगर उमा भाजपा में वापस आ गई तो शिवराज का सिंहासन खतरे में पढ़ जायेगा .....

खुद शिवराज को गौर के समय जब सिंहासन सौपा गया था तो उमा ने केन्द्रीय नेताओं के इस फैसले का खुलकर विरोध किया था.......अब उमा की वापसी से शिवराज के समर्थको की चिंता बढ़ गई है ... उनके पार्टी में आने के बाद बैखोफ होकर शासन चला रहे मुख्यमंत्री शिवराज के लिए आगे की डगर आसान नही दिख रही..... क्युकि प्रदेश में शिव के असंतुष्टो का एक बड़ा खेमा मौजूद है ....जो किसी भी समय उमा के पाले में जाकर शिवराज के लिए खतरा उत्पन्न कर सकता है.....मध्य प्रदेश में आज भी उमा के समर्थको की कमी नही है .....पार्टी हाई कमान भले ही उनको उत्तर प्रदेश के चुनावो में आगे कर रहा है लेकिन साध्वी अपने को मध्य प्रदेश से कैसे अलग रख पायेगी यह बड़ा सवाल बन गया है ......


उमा की वापसी में इस बार नितिन गडकरी और संघ की खासी अहम भूमिका रही है.... पार्टी ने उन्हें उत्तर प्रदेश के मिशन २०१२ की कमान सौपी है ...यहाँ भाजपा का पूरी तरह सफाया हो चुका है...कभी उत्तर प्रदेश की पीठ पर सवार होकर पार्टी ने केंद्र की सत्ता का स्वाद चखा था... आज आलम ये है कि यहाँ पर पार्टी चौथे स्थान पर जा चुकी है ..... १६ वी लोक सभा में दिल्ली के तख़्त पर बैठने के सपने देख रही भाजपा ने उमा को "ट्रम्प कार्ड" के तौर पर इस्तेमाल करने का मन बनाया है......

उत्तर प्रदेश में अब उमा भारती राहुल गाँधी को सीधे चुनौती देंगी.......अपनी ललकार के दवारा वह मुलायम और माया के सामने हुंकार भरेंगी..... अगर उत्तर प्रदेश के कुछ नेताओं का साथ उमा को मिला तो वह पार्टी की सीटो में इस बार इजाफा कर सकती है ... लेकिन उत्तर प्रदेश में भी भाजपा गुटबाजी की बीमारी से ग्रसित है......पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष सूर्य प्रताप साही की राह अन्य नेताओं से जुदा है ......कलराज मिश्र के हाथ चुनाव समिति की कमान आने को राज्य के पार्टी के कई नेता नही पचा पा रहे है.....मुरलीमनोहर जोशी, राजनाथ सिंह जैसे नेता केंद्र की राजनीती में रमे है ऐसे में उमा को मुश्किलों का सामना करना होगा..... सबको साथ लेकर चलने की एक बड़ी चुनौती उनके सामने है......उत्तर प्रदेश की जंग में उमा के लिए विनय कटियार और वरुण गाँधी और योगी आदित्यनाथ जैसे नेता निर्णायक साबित होंगे..... आज भी इनका प्रदेश में अच्छा खासा जनाधार है॥ हिंदुत्व के पोस्टर बॉय के रूप में यह अपनी छाप छोड़ने में अहम् साबित हो सकते है....

भले ही प्रेक्षक यह कहे कि भाजपा छोड़कर चले गए नेता जब दुबारा पार्टी में आते है तो उनकी कोई पूछ परख नही होती ... साथ ही वे जनाधार पर कोई असर नही छोड़ पाते लेकिन उमा के मामले में ऐसा नही है.... वह जमीन से जुडी हुई नेता है.... अपने ओजस्वी भाषणों से वह भीड़ खींच सकती है.....कल्याण सिंह के जाने के बाद वह पार्टी में पिछडो के एक बड़े वोट बैंक को अपने साथ साध सकती है.....

उमा की वापसी के बाद अब गोविन्दाचार्य की भाजपा में वापसी की संभावनाओ को बल मिलने लगा है.... उमा के आने के बाद अब संघ गोविन्दाचार्य को पार्टी में वापस लेने की कोशिशो में लग गया है.... गडकरी कई बार उनकी वापसी को लेकर बयान देते रहे है परन्तु उमा की वापसी न हो पाने के चलते आज तक उनकी भी पार्टी में वापसी नही हो पायी.....

गोविन्दाचार्य को साथ लेकर पार्टी कई काम साध सकती है ... वह अभी रामदेव के काले धन से जुड़े मसले पर उनके साथ केंद्र सरकार से लम्बी लडाई लड़ रहे है.....इस समय केंद्र सरकार के खिलाफ व्यापक असंतोष है .... भाजपा आम जनमानस का साथ इस समय लेना चाहती है... इसी के चलते संघ रामदेव का पीछे से साथ दे रहा है... क्युकि उसे लगता है भ्रष्टाचार का मुद्दा उसे केंद्र की सवारी करा सकता है... ऐसे में संघ परिवार अपने पुराने साथियों को पार्टी में वापस लेना चाहता है ....उमा की वापसी के बाद अब संघ परिवार गोविन्दाचार्य को अपने साथ लाने की कोशिसो में जुट गया है.....हरिद्वार के एक महंत की माने तो उमा के आने के बाद अब भाजपा में गोविन्दाचार्य की जल्द वापसी हो सकती है.....खुद उमा को इसके लिए संघ मना रहा है ..... अगर सब कुछ ठीक ठाक रहा तो गोविन्दाचार्य भी भाजपा में होंगे.....

उमा को गंगा प्रकोष्ठ का संयोजक बनाकर भाजपा ने अपने इरादे एक बार फिर जता दिए है ... उत्तर प्रदेश पर गडकरी की खास नजरे है ...पार्टी हिंदुत्व की सवारी कर पिछड़ी जातियों की पीठ पर सवार होकर यू पी में अपना प्रदर्शन सुधारने की कोशिशो में लग गई है...... देखना होगा उमा में चमत्कार का अक्स देख रहे भाजपा हाई कमान की उम्मीदों में वह इस बार कितना खरा उतरती है?

Sunday, 8 May 2011

शर्मा जी, क्रिकेट और उनके बर्फ के गोले.......



शर्मा जी और उनके बर्फ के गोलों को भूल नही सकता .... कम से कम जब तक मैं भोपाल में हूँ तब तक तो नही.... दरअसल जिन शर्मा जी की बात मैं अपने ब्लॉग में कर रहा हू....उनसे अपनी मुलाकात एक कवरेज के दौरान भोपाल के बोट क्लब में हुई..... उसके पास शर्मा जी अपना ठेला हर दिन लगाया करते है .......

शर्मा जी क्रिकेट का बड़ा शौक रखते है..... उनसे मेरी पहली मुलाकात वर्ल्ड कप के मैचो के दौरान हुई....उन दिनों देश वासी भारत की जीत के लिए जहाँ कामना किये जा रहे थे वही शर्मा जी ने टीम इंडिया के वर्ल्ड कप जीतने पर अपनी दुकान का सारा सामान तक फ्री कर दिया था.... मुकेश शर्मा वर्षो से भोपाल में आइस क्रीम बेचने का काम किया करते आ रहे है.... शादियों के मौसम में आप शर्मा जी की इस आइस क्रीम का लुफ्त उठाये बिना नही रह सकते॥ हमारे बोट हाउस वाले शर्मा जी भी अपनी आइस क्रीम की सेवा शादियों के सदाबहार मौसम में दिया करते है.....

शर्मा जी की क्रिकेट की दीवानगी को देखकर मैं भी चौक गया .... बचपन में कभी मैं क्रिकेट का कीड़ा हुआ करता था..... लेकिन मैच फिक्सिंग के बाद मेरा खेल को लेकर लगाव ख़त्म सा हो गया .... लेकिन वर्ल्ड कप के मैचो को लेकर मेरा दीवानापन फिक्सिंग के बाद भी कम नही हुआ क्युकि पिता जी से लड़ झगड़कर एक कलर टीवी की व्यवस्था उस दौर में घर में करवा ली....शायद ये ८ साल पहले की बात होगी.... टी वी देखने पर घर वाले डांट दिया करते थे.....कहते थे पदाई लिखाई नही करनी है क्या? हर समय क्रिकेट क्रिकेट करते हो.... टी वी से चिपके रहते हो या हर समय पेपर पड़ते रहते हो .... दरअसल हमारे पूरे परिवार में पत्रकारिता को लेकर किसी के मन में उतना लगाव नही था... क्युकि उत्तराखंड जैसे राज्य में सेना के अलावा किसी फील्ड में बेहतर सम्भावना नही दिखती थी..... ...उस समय उम्र कच्ची थी इसी कारन अक्ल का कमजोर था... समझ नही पाया मेरे जैसे कई लोग है इस देश में जो क्रिकेट को लेकर उत्सुकता रखते है.... आज बड़ा होने पर जब शर्मा जी का शौक देखा तो अपने बचपन की यादो में कही खो सा गया........

शर्मा जी ने भारत की टीम के वर्ल्ड कप जीतने पर भोपाल वासियों को निशुल्क आईस क्रीम की सौगात देने की बात कही .....जिसे उन्होंने पूरा भी किया.... बोट क्लब में फ्री में खाने वालो की लाइन लग गई....मुकेश से जब मैंने बात की तो उसने बताया उसे बचपन से क्रिकेट का शौक है ....सचिन की टीम में खेलने की तमन्ना थी वह तमन्ना तो पूरी नही हो पायी अब क्रिकेट के नाम पर आईस क्रीम का कारोबार कर गुजर बरस कर रहा है ..... आई पी एल जैसी स्पर्धाओ में भी शर्मा जैसे क्रिकेट के शौकीनों का खवाब पूरा नही हो पाया....भले ही टीम इंडिया के लिए खेल नही पाये लेकीन आई पी एल के मैचो में अपना स्टाल लगाकर अपना शौक पूरा कर लेते.... 20- २० के दौर में जहाँ तमाशा क्रिकेट खेली जा रही हो वहां खिलाडियों की तो मंडियों में बोली लग रही है शर्मा जी की कोई पूछ होगी क्या ?

शर्मा १९८३ में भारत की टीम के जीत के नज़ारे को नही देख पाये लेकिन इस बार २८ साल के जीत को उन्होंने अपनी आखो के सामने देखा तो ख़ुशी के आंसू छलक आये.....जब युवराज सचिन अपने को नही रोक पाये तो भला शर्मा जी जैसे लोगो की क्या बिसात जिन्होंने अपने रोल मॉडल नायक के लिए आईस क्रीम के सेण्टर तक खोल डाले और उनके वर्ल्ड कप जीतने की ख़ुशी में सबको आईस क्रीम खिलवाये जा रहे थे.....

मुझे भी शर्मा जी ने अपनी दुकान से उस दिन आईस क्रीम खिलवायी.....इस आईस क्रीम की याद और क्रिकेट के प्रति ऐसे जूनून को कभी नही भूल पाऊंगा .....कम से कम जब तक भोपाल में हूँ और झील की छठा का आनंद लूँगा तब तक शर्मा जी की याद मेरे जेहन में बसी रहेगी .... ये अलग बात है ललित के साथ देहरादून की गलियों में शर्मा जी की मिठास वाली आईस क्रीम अपन को नसीब नही हो सकेगी ......साथ ही शब्बन चौराहे और लिली टाकीज के पास मिलने वाले केले और पपीते मुझे नसीब नही हो पाएंगे .....हाँ हरिद्वार में गंगा के घाट पर आध्यात्मिक शांति जरुर मिलेगी.......


वर्ल्ड कप जीतने के बाद जब भी शर्मा जी के ढाबे में जाता हूँ तो वह बड़ी आत्मीयता से आज भी मुझे आईस क्रीम और कोल्ड ड्रिंक पिलाते है .....बदले में जब रुपये देता हू तो लेने से इनकार कर देते है.... शर्मा जी की इस कहानी तो मैंने सभी समाचार चैनलों और पेपरों में पहुचाने की कोशिश की .... एक आध चैनलों को छोड़कर किसी ने उनकी खबर नही चलायी......

दरअसल हमारा मीडिया भी बिकाऊ हो गया है..... अपना विवेक ठीक कहता है पेड़ न्यूज़ का जमाना है......जनसरोकारो वाली पत्रकारिता नही हो रही है......राखी सावंत की चुम्मा चाटी और हसी के रसगुल्लों वाली पत्रकारिता आज हो रही है .....ऐसे में शर्मा जी की खबर को सुर्खिया नही मिल पाती है ..... लेकिन इन सब के बाद भी शर्मा जी के मन में किसी तरह की निराशा नही है... कुछ लोग होते है जिन्हें प्रचार की जरुरत होती है परन्तु कुछ ऐसे होते है जो प्रचार प्रसार माध्यमो के मोहताज नही होते ... वह अपना काम बेरोकटोक करते रहते है.... शर्मा जी की इसी अदा का मै कायल हो गया हूँ ..........मीडिया को कवरेज के लिए प्रलोभन देने वाले लोगो को शर्मा जी से आज प्रेरणा लेने की जरुरत है........

Saturday, 9 April 2011

भोपाल नगर निगम से रूठे शनि देव ......




शनि देव इस समय पूरे देश में "ग्लोबल" हो गए है.... साईं के बाद अगर कोई देव हाल के वर्षो में "ग्लोबल " हुआ है तो बेशक वह देव शनि देव ही है...देश में हर जगह उनको पूजने वाले भक्तो की संख्या में इजाफा होता जा रहा है.....लेकिन भोपाल के शनि देव इनदिनों नगर निगम से रूठ गए है....भोपाल के शनि देव की परेशानी को नगर निगम के एक फैसले ने बदा दिया है.....


शनि देव ने कभी सपने में भी नही सोचा होगा कि भोपाल नगर निगम को उनकी नजरे इतनी नागवार गुजरेंगी कि उनकी आँखों के ठीक सामने एक काला सा बोर्ड लगा दिया जायेगा....चौकिये नही भोपाल के बड़े तालाब को सूखे के प्रकोप से बचाने के लिए नगर निगम ने एक तुगलकी फरमान इनदिनों जारी किया है.... आलम ये है कि नगर निगम स्थानीय लोगो और मंदिर कमेटी के विरोध के बावजूद इस बोर्ड को ना हटा पाने की अपनी जिद पर कायम है ......


शनि देव से भले ही पूरी दुनिया खौफ खाती हो लेकिन भोपाल के कमला पार्क के शनि मदिर इनदिनों नगर निगम भोपाल से खौफजादा है .... दरअसल शनि देव की दृष्टी तालाब में ना पड़े इसलिए नगर निगम ने उनकी आँखों के सामने एक काला सा बोर्ड लगा दिया है.... नगर निगम का तर्क है कि पिछले साल बड़ा तालाब सूख गया था जिसके पीछे शनि देव की कोप दृष्टी जिम्मेदार है ...


बीते दिनों एक खबर के सिलसिले में शनि महाराज के दर्शन करने की इच्छा हुई .... मंदिर के दर्शन कर प्रसाद लिया और वहाँ पर मौजूद कुंजबिहारी नाम के पुजारी से मेरी मुलाक़ात हुई...... पहला सवाल यही पूछ डाला महाराज शनि देव भोपाल के बड़े तालाब को क्यों सुखा रहे है.?.. ऐसा पूछते ही पुजारी हस पड़े ...उनको देखकर मै भी अपनी हसी नही रोक सका ....उन्होंने कहा यह तर्क बिलकुल गलत है.... शनि महाराज इस बड़े तालाब को क्यों सुखायेंगे ?


भोपाल नगर निगम से पूरी मंदिर कमेटी परेशान हो चुकी है.... लिहाजा वह शनि देव को कमरे में कैद करने की योजना बना रही है....स्थानीय लोगो में नगर निगम के पार्टी आक्रोश है....उनका भी यही कहना है यह आस्था के साथ खिलवाड़ है......


भले ही नगर निगम अपने फैसले पर कायम हो लेकिन ये वाकया यह बताने के लिए काफी है आज भी हम २१ वी सदी में अंधविश्वास के सहारे जी रहे है जहाँ हम ऐसी बातो पर यकीन कर रहे है जो आज के वैज्ञानिक युग में कही से कही तक संभव ही नही हो सकती...... इस बारे में बातचीत के लिए मैं नगर निगम भी गया लेकिन नगर निगम के आला अधिकारियो ने कुछ भी कहने से साफ़ इंकार कर दिया......मामले से ही कन्नी काट ली...................


Saturday, 12 March 2011

सूखे की चपेट में भोपाल का बड़ा तालाब.........


भोपाल की पहचान झीलों के शहर के रूप में रही है ... इसकी खूबसूरती में भोपाल की बड़ी झील चार चाँद तो लगाती ही है साथ ही इस झील को शहर की लाइफ लाइन भी कहा जाता है ... परन्तु पिछले कुछ समय से बड़ी झील में पानी का स्तर तेजी से गिरने लगा है जिस के चलते गर्मी के मौसम में यहाँ के लोगो को पानी की समस्या से जूझना पढ़ सकता है......
"तालो में भोपाल की ताल बाकी सब तलैया ".... भोपाल की पहचान इस बड़े तालाब ने झीलों के शहर के रूप में बनायीं है .... यहाँ के लोगो को पानी की सप्लाई इसी बड़ी झील से होती रही है.... परन्तु पिछले कुछ समय से इसका जल स्तर तेजी से घटने लगा है ... यदि पेयजल के लिए यही स्थिति रही तो आने वाले दिनों में जल स्तर में कमी आने की सम्भावना है .......
बड़ी झील में पानी का स्तर नीचे चले जाने से जहाँ भोपाल के लोगो को पानी की सप्लाई प्रभावित हो सकती है वही झील में मछली पकड़कर रोजी रोटी कमाने वाले मछुवारो के सामने अभी से रोजी रोटी का संकट पैदा हो गया है .....
अमित जहांगीराबाद के इलाके में ही रहते है... पिछले दिनों रिपोर्टिंग के दौरान उनसे मुलाकात का मौका मिला....पहले तो उन्होंने बोलने से मना किया .... आख़िरकार मैंने कैमरे के सामने बाईट के लिए उन्हें मना ही लिया ... अमित ने कहा पिछले साल इसी झील से पानी लोगो को मिला था वह भी एक एक दिन छोड़कर... इस बार ऐसे हालत ऐसे नजर नही आते .....इसका एक बढ़ा कारन झील बचाव अभियान भी थे .... इस बार तो झील का बढ़ा हिस्सा सूख चूका है...अभियान भी नही चल रहे है......
कल्लू नाम के मछवारे से मिला तो वह भी खासा परेशान दिखा ....आप बीती सुनाते हुए उसने कहा साहब नवाबी दौर से मछली पकड़ने के काम में लगा हुआ हूँ... पूरा परिवार इन्ही मछलियों के सहारे पलता है ... आज आलम ये है कि तालाब में मछलिया मुश्किल से मिल पाती है ... ऐसे में गुजर बसर कर पाना मुश्किल है.....
गर्मी ने अभी से अपने तेवर दिखने शुरू कर दिए है ....इस समय झील में पानी का स्तर न्यूनतम जल स्तर से मात्र 2 फीट ज्यादा है...जबकि अभी गर्मी की शुरुवात ही हुई है ....नगर निगम भोपाल की माने तो इस समय झील से २ ऍम जी दी पानी हर दिन निकाला जा रहा है... अगर यही सिलसिला जारी रहा तो जल्द ही यह झील सूख जायेगी....
इस बारे में जब मैंने उपनेता महापौर परिसद जल कार्य अशोक पांडे से बात की तो उन्होंने कहा मेरी चिंता जायज है...इसी को ध्यान में रखते हुए इस बार बड़े तालाब के बजाए नगर निगम कोलार और केरवा डेम से पानी की ज्यादा सप्लाई करने की दिशा में विचार कर रहा है....
पिछले साल भोपाल की बड़ी झील ने राजधानी भोपाल के लोगो की प्यास बुझाई थी परन्तु इस बार उम्मीद कम है ... बेहतर होगा नगर निगम जल्द से जल्द बड़ी झील के पानी को बचाने की दिशा में गंभीरता से विचार करे...

Tuesday, 1 March 2011

मजबूरी का नाम मनमोहन...............




दिल्ली से ताल्लुक रखने वाले मेरे एक करीबी मित्र देश के मौजूदा हालातो को लेकर खासे चिंतित है.... बीते दिनों फ़ोन पर बतियाते हुए उन्होंने अपने देश में बढ रहे भ्रष्टाचार की पीड़ा को मेरे सामने उजागर किया... उन्होंने इस बात को दोहराया कि आज हमारे देश को भी एक तहरीर चौक की आवश्यकता है... मौजूदा दौर में बढ़ते भ्रष्टाचार के प्रति मेरे मित्र की पीड़ा को बखूबी समझा जा सकता है... आज हमारे देश के आम जनमानस इसको लेकर खासा व्यथित है... इस पीड़ा का एहसास शायद हमारे प्रधान मंत्री मनमोहन को भी है ....तभी बीते दिनों अपने आवास पर मनमोहन ने पत्रकार वार्ता बुलाई और भ्रष्टाचार को लेकर हमेशा की तरह अपना दुखड़ा सुनाया......

मनमोहन सिंह ने पत्रकारों से कहा वह गठबंधन धर्म के आगे लाचार है ..... इस दरमियाँ प्रधान मंत्री ने गठबंधन धर्म की तमाम मजबूरियां भी गिना डाली....साथ ही वह यह कहने से नही चुके कि वह इस बार का कार्यकाल भी सफलता पूर्वक पूरा कर लेंगे....... राजनीती संभावनाओ का खेल है ... यहाँ समीकरण बन्ने और बिगड़ने में देरी नही लगती.... ऐसे में पूर्वानुमान लगा पाना मुश्किल है क्या यू पी ऐ २ अपना कार्यकाल सफलता पूर्वक पूरा कर पायेगी....?

यू पी ऐ १ से ज्यादा भ्रष्ट्र यू पी ऐ २ नजर आता है ....एक से बढकर एक मंत्रियो की टोली मनमोहन सिंह की कबिनेट को सुशोभित कर रही है.... यू पी ऐ २ ने तो भ्रष्ट्राचार के कई कीर्तिमानो को ध्वस्त कर दिया है..... पी ऍम की छवि भी इससे ख़राब हो रही है....इसके अलावा सी वी सी पर थोमस की नियुक्ति से लेकर बोफोर्स में "क्वात्रोची " को क्लीन चित देने और महंगाई के डायन बन्ने तक की कहानी यू पीए २ की विफलता को उजागर कर रही है..... आदर्श सोसाइटी से लेकर कोमन वेल्थ , २ जी स्पेक्ट्रुम से लेकर इसरो में एस बैंड आवंटन तक के घोटाले केंद्र की सरकार की सेहत के लिए कतई अच्छे नही है .....

एक मछली पूरे तालाब को गन्दा कर देती है .... फिर भी हमारे देश के मुखिया मनमोहन अपनी लाचारी जताने में लगे हुए है...जबकि इस समय कोशिश इस बात की होनी चाहिए यू पी ऐ को कैसे मौजूदा चुनोती के दौर से बाहर निकाला जाए ....? मनमोहन भले ही अच्छे अर्थशास्त्री हो.....परन्तु वह एक कुशल राजनेता की केटेगरी में तो कतई नही रखे जा सकते ...... मैं तो उन्हें जननेता भी नही मानता .... ना ही वह भीड़ को खींचने वाले नेता है.....१५ वी लोक सभा चुनावो से पहले भाजपा के पी ऍम इन वेटिंग आडवानी ने मनमोहन के बारे में कहा था वह देश के सबसे कमजोर प्रधान मंत्री है.....उस समय कई लोगो ने आडवानी की बात को हलके में लिया था , आज मनमोहन सिंह पर यह बात सोलह आने सच साबित हो रही है ....

मनमोहन सारे फैसले खुद से नही लेते है....सत्ता का केंद्र दस जनपद बना रहता है .... मनमोहन को अगर मैं सोनिया का "यस बॉस" कहू तो गलत कुछ भी नही होगा..... व्यक्तिगत तौर पर भले ही मनमोहन की छवि इमानदार रही है परन्तु दिन पर दिन ख़राब हो रहे हालातो पर प्रधान मंत्री की चुप्पी से जनता में सही सन्देश नही जा पाटा ... "इकोनोमिक्स की तमाम खूबियाँ भले ही मनमोहन सिंह में रही हो पर सरकार चलाने की खूबियाँ तो उनमे कतई नही है.....

कुछ समय पहले उन्होंने अपना मंत्री मंडल विस्तार भी कर डाला.... उम्मीद थी भ्रष्ट नेताओ के पर कतरे जायेंगे.... पर ऐसा कुछ भी नही हुआ.... कई मंत्रियो को भारी भरकम मंत्रालय दे दिए गए ....नयी बोतल में पुराणी शराब दिखाई दी....इस पर सोनिया गाँधी ने भी अपनी कोई प्रतिक्रिया नही दी..... इसी तरह काला धन एक बदा मुद्दा है.... सुप्रीम कोर्ट की कड़ी फटकार के बाद भी हमारे प्रधानमंत्री इसे वापस लाने की दिशा में कोई प्रयास करते दिखाई दे रहे है..... उल्टा नाम सार्वजनिक किये जाने की बात पर " प्रणव बाबू " खासे नाराज हो जाते है.......

यू पी ऐ २ पर इस समय पूरी तरह से दस जनपद का नियंत्रण बना है.... मनमोहन को भले
ही सोनिया का "फ्री हैण्ड" मिला हो पर उन्हें अपने हर फैसले पर सोनिया की सहमती लेनी जरुरी हो जाती है.... दस जनपद में भी सोनिया के सिपैहसलार पूरी व्यवस्था को चला रहे है.... मनमोहन की साफ़ छवि घोटालो से ख़राब हो रही है ... साथ ही कांग्रेस को भी इससे बड़ा नुकसान झेलना पद रहा है...

मनमोहन की साफ़ छवि घोटालो से ख़राब हो रही है.....साथ ही कांग्रेस को भी इससे नुकसान पहुच रहा है.....बेहतर होता अगर हमारे प्रधान मंत्री गठबंधन धर्म पालन के बजाए राजधर्म का पालन बखूबी से करते.... हमारे प्रधानमंत्री को अटल बिहारी की सरकार से सीख लेनी चाहिए जिन्होंने १९९८ से २००४ तक २४ दलों की गठबंधन सरकार का नेतृत्व कुशलता पूर्वक किया..... बल्कि कभी किसी के दवाब में काम नही किया.....

मुझे याद है एक बार जयललिता ने उस दौर में अटल आडवानी से उस दौर में करूणानिधि सरकार को भंग करने का दवाब डाला था ... परन्तु वाजपेयी जयललिता की मांग के आगे बेबस नही हुए थे .... अटल की सरकार भले ही एक बोट से गिर गयी परन्तु अगले चुनाव में वह भारी सीट लेकर आये .....

यही नही तहलका जैसे प्रकरण के बाद उन्होंने जॉर्ज को कुछ समय रक्षा मंत्री के पद से मुक्त रखा था...परन्तु यहाँ तो मजबूरी का नाम मनमोहन बन गए है... वह न तो बदती कीमतों पर अंकुश ला सकते है और ना ही भ्रष्टाचार के आकंठ में डूबे मंत्रियो से इस्तीफ़ा दिलवा सकते है.... उनके सामने गठबंधन धरम पालन की सबसे बड़ी मजबूरी है .....और मनमोहन की इसी अदा का फायदा ऐ राजा जैसे लोग उठा जाते है.....और मनमोहन धृत राष्ट्र की भांति आँखों में पट्टी बांधे रह जाते है..... ऐसी सूरत में देश का आम आदमी निराश और हताश नही हो तो क्या करे........?
"दुष्यंत " के शब्दों में कहू तो --------------

"कैसे कैसे मंजर सामने आने लगे है
गाते गाते लोग अब चिल्लाने लगे है
अब तो इस तालाब का पानी बदल दौ
यह कवल के फूल कुम्हलाने लगे है "