Thursday, 22 April 2021

बहुत कठिन है सियासत में 'बचदा' होना

 

   


 

सियासत में बहुत कम ऐसे चेहरे हुए हैं जो अपनी सादगी , सौम्यता , सरलता और जीवंतता के लिए जाने जाते हैं। उत्तराखंड की राजनीति में बची सिंह रावत  'बचदा' उन खास शख़्सियतों में शुमार थे , जो हर मिलने जुलने वाले कार्यकर्ता और आम जन की फरियाद शिद्दत से सुनते थे। बचदा' से हर बार मिलकर एक अलग तरह का अनुभव होता था। नए- नए विषयों पर संवाद करना , अपने इलाके के विकास की हमेशा चिंता करना और जरूरतमंदों की हर संभव मदद करने के मामले में उनका कोई सानी नहीं था। पत्रकारों से संवाद के मामले में भी वह बिना लाग- लपेट कभी पीछे नहीं रहते थे। कई बार चाय की चुस्की के बीच ही हमारी खबर भी बन जाया करती थी। 'बचदा' का यही खास अंदाज हम सबके मन को भी बहुत भाता था और उनको राज्य का आम नेता बनाता था । आज के दौर में  'बचदाहोना आसान नहीं है। वे खुद बने और अनेकों को बनाया ।  हमें एक बात समझने की जरूरत है 'बचदाकिसी की कृपा से नहीं बनते हैं । उसके लिए जनता के दिलों में पैठ बनानी पड़ती है । 'बचदा' ने हर भाजपा के कार्यकर्ता को यह पाठ पढ़ाया है कि आपकी परिस्थितियाँ आपको बड़ा बनने से नहीं रोक सकती अगर आपके भीतर हौंसला है और आप जनता की नब्ज पकड़ना जानते हैं तो राजनीति  में आप नया मुकाम बनाने में कामयाब  जरूर होंगे। उत्तराखंड की राजनीति में हम सबके  दुलारे राजनेता  'बचदा एक ऐसे नायक के रूप में सामने आते हैं जिसने पहाड़ की खुरदुरी जमीन से जनसंघ से अपना सफर शुरू किया। जनता पार्टी से होते हुए वो  भाजपा में गए और उत्तर प्रदेश , उत्तराखंड में अपनी राजनीति से नई लकीर खींची। चार बार सांसद होना, केन्द्रीय मंत्री और  एक बार उत्तराखंड का प्रदेश अध्यक्ष होना किसी राजनेता के लिए इतना आसान नहीं है। वह भी तब जब सामने आपका प्रतिद्वंदी हरीश रावत सरीखा जमीन से जुड़ा नेता हो  ।

बची सिंह रावत 'बचदा'  ने 18 अप्रैल 2021 को अंतिम सांस ली। उन्हें फेफड़ों में संक्रमण होने के कारण हल्द्वानी से एयर एम्बुलेंस  द्वारा एम्स ऋषिकेश में भर्ती कराया गया। रविवार रात से ही उनकी हालत अचानक और बिगड़ गई और रात  8:45 बजे उनका निधन हो गया। जब उन्हें एम्स ऋषिकेश लाया गया था तो उनकी कोविड-19 रिपोर्ट निगेटिव थी लेकिन दोबारा कोरोना की जांच की गई, जिसमें वे संक्रमित पाए गए थे। उनके निधन की खबर सुनते ही मेरा मन उनके साथ हुई पुरानी यादों में खो गया ।

एक रोचक किस्सा 'बचदा'  के नाम से जुड़ा हुआ है। बहुत कम लोगों को ये बात मालूम है उनका असली नाम आनंद सिंह रावत था  जो कि बाद में बदलकर बची सिंह रावत 'बचदा' हो गया।  बची सिंह रावत 'बचदा'  के साथ कई बार इंटरव्यू करने का मुझे मौका मिला। मैंने पहली बार उनका इंटरव्यू तब लिया जब वह रक्षा राज्य मंत्री अटल जी की सरकार में बनाए गए। तब मैंने हँसते हुए एक बार उनसे अपने इस दिलचस्प नाम का किस्सा पूछा तो मुस्कुराकर उन्होनें जवाब दिया  उनका असली नाम आनंद सिंह रावत था। जब वह पैदा हुए तो बहुत बीमार हो गए थे तो उस समय उनके बचने की उम्मीद काफी कम थी। तब ज्योतिषी के कहने पर ही उनके पिता ने उनका नाम बची सिंह रावत रखा। बची सिंह रावत नाम रखने बाद से तो मानो चमत्कार सा हो गया । उनकी खराब तबीयत ठीक हो गयी। तब से ही वह परिवार में बची सिंह रावत 'बचदा' के नाम से ही जाने जाने लगे। बची सिंह रावत 'बचदा' की खासियत यही थी उन्होनें बहुत कम समय में अपनी प्रतिभा और योग्यता के दम पर विधायक , सांसद और प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर देश में नाम कमाया। राजनीतिक आडंबरों , छल प्रपंच से हमेशा दूर रहने  वाले बची सिंह रावत 'बचदा'  की छवि हमारे पहाड़ में एक धीर - गंभीर किस्म के नेता की रही।

    


 'बचदा' सियासत में सौम्यता , गंभीरता और जिम्मेदाराना व्यवहार के लिए जाने जाते थे जिन्हें जनता अल्मोड़ा पिथौरागढ़ संसदीय सीट की जनता का  दुलार प्यार हमेशा मिलता रहा । बची सिंह रावत 'बचदा'  ने अपनी राजनीति में विनम्रता की पूंजी को आजीवन बटोरा। बच्चे , बूढ़े,  जवान , बहनें , माताएँ सब उनके कायल थे। वह सब जगह सुलभ हो जाया करते थे। यही खास  अंदाज और मिलनसारिता का भाव जनता को उनके करीब लाया। उनसे मिलने का हमेशा एक अलग सा हसास होता था और जो एक बार मिल लेता था वह उनका मुरीद हो जाता था। मीडिया के साथ भी वह खूब गलबहियाँ किया करते थे। मुझे याद है एक बार पिथौरागढ़ में एक पत्रकार वार्ता में किसी पत्रकार ने उनसे रक्षा तकनीक पर रक्षा अनुसंधान केंद्र पंडा में एक सवाल पूछ लिया था तब मुखातिब होते होते उन्होनें रक्षा मंत्रालय की कई बातें सार्वजनिक ढंग से कह डाली जिसके बाद उन्हें रक्षा से हटाकर विज्ञान  प्रौद्योगिकी मंत्रालय का जिम्मा सौंपा गया। इस बात से साबित होता है 'बचदा'  कितने सहज , सरल और ईमानदार  थे दिल में कुछ भी नहीं रखते थेबातें  बिना लाग -लपेट के कहने से नहीं हिचकते थे'बचदा' एक सामाजिक कार्यकर्ता भी थे। यह बात बहुत कम लोगों मालूम है वकील होने के साथ ही वह पहाड़ के ग्रामीणों के विकास के लिए काम करने वली ग्रामोत्थान समिति से भी जुड़े थे।

'बचदा'  का जन्म एक अगस्त 1949  को अल्मोड़ा जिले के रानीखेत तहसील क्षेत्र के अंतर्गत पाली गांव में हुआ था । उन्होंने अपनी प्राथमिक शिक्षा अल्मोड़ा में प्राप्त की जिसके बाद लखनऊ विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र विषय में उन्होंने परास्नातक किया ।  'बचदा' 1969 में जनसंघ से जुड़े थे । 1977 में जनसंघ का जनता पार्टी में विलय हुआ तो वे भी उसका अंग बन गए । इसके बाद 1980 में जनता पार्टी टूटी और भाजपा का गठन हुआ  तब 'बचदा'  की भाजपा में सक्रियता बढ्ने लगी । अविभाजित उत्तर प्रदेश में उन्होंने वर्ष 1991 और 1993 में रानीखेत विधानसभा क्षेत्र का  प्रतिनिधित्व किया ।  उत्तर प्रदेश की तत्कालीन कल्याण सिंह की सरकार में वे राजस्व राज्य मंत्री भी रहे । 1996 से 2004 तक अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ संसदीय क्षेत्र से सांसद निर्वाचित हुए । इस दौरान उन्होंने तीन बार काँग्रेस के दिग्गज हरीश रावत और एक बार उनकी पत्नी रेणुका रावत को करारी  चुनावी शिकस्त दी । वह दौर ऐसा  दौर था जब कांग्रेस के कद्दावर नेता हरीश रावत के खिलाफ भाजपा को एक ऐसे चेहरे की तलाश थी, जो उन्हें टक्कर देने के साथ काम से पहचान बनाये। तब रानीखेत के विधायक व उत्तर प्रदेश में राजस्व उप मंत्री रहे बची सिंह रावत 'बचदा'  को भाजपा ने अल्मोड़ा संसदीय क्षेत्र से उतार दिया । अल्मोड़ा संसदीय क्षेत्र के चप्पे -चप्पे से वाकिफ और  हर व्यक्ति के लिए  आम जन के लिए दिन रात सुलभ 'बचदा' ने बतौर सांसद दूरस्थ क्षेत्रों तक विकास की किरण पहुंचाई । उन्होंने गांव -गांव दौरे कर ऐसी लोकप्रियता हासिल की कि अल्मोड़ा संसदीय इलाके के लोगों के दिल में मानो बस से गए। अल्मोड़ा संसदीय क्षेत्र की जनता  की सेवा के लिए हमेशा तत्पर  रहने  वाले 'बचदा' ने बतौर सांसद सीमांत क्षेत्रों तक विकास की किरण पहुंचाई । उन्होंने गांव गांव दौरे कर लोकप्रियता हासिल की। 'बचदा' की बिसात इस इलाके में ऐसी मजबूत बिछी उनके किले का दरकना मुश्किल सा दिखने लगा। इसके बाद हरीश रावत की राजनीति पर ग्रहण लगने की बातें कही जाने लगी। तब  हरीश रावत को  अल्मोड़ा संसदीय सीट के आरक्षित होने के चलते हरिद्वार लोकसभा सीट की तरफ रुख करना पड़ा।

 'बचदा'   अटल सरकार में रक्षा राज्य मंत्री और बाद में  विज्ञान प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री भी बने।  'बचदा' पर जब लिखने बैठ रहा हूँ तो उनसे   से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा मुझे याद आ रहा है  9 नवंबर 2000 को जब अलग उत्तराखंड राज्य का गठन किया गया तो उनको नित्यानन्द स्वामी के स्थान पर सी एम बनाया जा रहा था। तब वह तत्कालीन पी एम अटल जी से मिलने गए तो अटल जी ने उनसे शपथ के लिए तैयार रहने के लिए कहा इसके लिए उन्होने बाकायदा एक ड्रेस भी सिलवा ली लेकिन उसी दिन कुछ घंटे बाद भाजपा की एक बैठक संघ के साथ हुई जिसमें अटल , आडवाणी और डॉ जोशी भी साथ बैठे और उनसे उत्तराखंड के नए सी एम भगत सिंह कोश्यारी के नाम पर सहमति ले ली और संसदीय बोर्ड के इस फैसले के आगे उन्हें नतमस्तक होना पड़ा था लेकिन इसके बाद भी बी सी खण्डूरी के पहली बार राज्य के सीएम बनने के दौर में  उन्हें  2007  से 2010 तक  प्रदेश भाजपा अध्यक्ष का दायित्व भी सौपा गया जिसे ज़िम्मेदारी के साथ उन्होनें निभाया । अपने प्रदेश अध्यक्ष के कार्यकाल में उनके द्वारा कई फैसले लिए गए और बी सी खण्डूरी की सरकार के साथ बेहतर तालमेल बनाने में कामयाब रहे ।

 2008 में अल्मोड़ा सीट आरक्षित होने की वजह से 2009 में नैनीताल-ऊधमसिंहनगर लोकसभा सीट से भाजपा टिकट पर चुनाव लड़े लेकिन कांग्रेस के दिग्गज केसी सिंह बाबा से  रिकार्ड मतों से चुनाव हारे लेकिन तब 'बचदा' अब अपनों से ही बुरी राजनीतिक मात खा गए । 'बचदा' ने कई दशकों तक उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपनी सक्रिय भूमिका निभाई लेकिन 2014 में मोदी को प्रधानमंत्री उम्मीदवार बनाए जाने के बाद से  लोकसभा टिकट आवंटन में उनका नाम तक पैनल में नहीं रखा गया । इस कारण एक बार  वे पार्टी नेतृत्व से बेहद खफा से हो गए। नैनीताल में एक मुलाक़ात में उन्होनें इसका जिक्र मुझसे किया था । तब उन्होनें मुझसे कहा था भाजपा से रूठने का सिर्फ यही कारण है कि मेरा नाम नैनीताल-ऊधमसिंहनगर लोकसभा सीट के लिए पैनल में नहीं रखा गया ।  उस दौर में प्रत्याशी चयन समिति की एक बैठक हुई थी । उसमें चुनाव समिति ने तीन नाम तय किए थे जिनमें  भगत सिंह कोश्यारी , बची सिंह रावत  और बलराज पासी का नाम शामिल था । ये तीनों नाम बाकायदा रजिस्टर में दर्ज किए गए । तब कहा गया था कि इन तीनों ही नामों को चयन समिति संसदीय बोर्ड के सामने रखेगी लेकिन जब अखबार में पढ़ा कि पैनल में सिर्फ भगत सिंह कोश्यारी का नाम था तो बची सिंह रावत को  यह बात बुरी तरह खल गई। इसके बाद उन्होनें पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा देने का फैसला किया।  मैंने जब 'बचदा' से पूछा इसे  आप राज्य भाजपा नेताओं का षड्यंत्र मानते हैं तो  उन्होनें कहा मैं तब से भाजपा का सदस्य हूं जब 25 पैसे की सदस्यता दी जाती थी । मैं वर्ष 1969 से पार्टी की राजनीति कर रहा हूं । 25 पैसे की सदस्यता लेकर जनसंघ से जुड़ा था । वरिष्ठ की श्रेणी में होने के बावजूद भी मुझे साइड लाइन क्यों किया गया यही सोचकर आज मैं काफी परेशान हूं।  तब उन्होनें यह कहा मुझे लगता है यह सब प्रदेश के नेताओं के इशारों पर हुआ है। उन्होंने यह सब एक व्यक्ति विशेष को लाभ पहुंचाने के लिए किया है । इसके लिए केंद्रीय नेतृत्व के सामने यह दिखावा किया गया कि एक ही नाम इस सीट से आया है जिससे लगे सभी भाजपा नेताओं की इसमें सहमति है । इससे मैं बहुत अधिक  आहत हुआ हूं । हालांकि बाद में समझा बुझाकर वह मान गए ।


जब मैंने एक
प्रश्न और पूछा 2009 में आप चुनाव नहीं लड़ना चाहते थे लेकिन कोश्यारी जी के दबाव में आपको लड़ना पड़ा? इस पर भी ऑफ द रिकॉर्ड उन्होने लंबी बात की और पूरा माजरा मुझे  समझाया।  उन्होनें  यहाँ तक कहा 2009 में लोकसभा चुनाव से पूर्व मेरी  उनसे बात हुई थी। मैंने उनसे कहा था कि आप नैनीताल से चुनाव लड़ें । तब उन्होंने मना कर दिया था। उस वक्त प्रदेश अध्यक्ष और मेरा छह माह का कार्यकाल बचा था । राज्यसभा की एक सीट का चुनाव भी छह माह बाद होना था। मैंने कहा था कि छह माह बाद मैं अपना कार्यकाल भी पूरा कर लूंगा और राज्यसभा भी चला जाऊंगा लेकिन तब कोश्यारी जी को पता था कि नैनीताल की राह आसान नहीं है । इसके चलते ही उन्होंने मेरा नाम यहां से प्रस्तावित करा दिया और बाद में खुद राज्यसभा चले गए। चाय पर चर्चा के दौरान  इतना सटीक जवाब सुनकर में भी भौचक्का रहा गया था । राजनीति में ऐसा साफ दिल राजनेता मैंने बहुत कम देखे हैं ।

'बचदा' से बात करते हुए हमेशा जो भी अनुभव हुए हैं वे विलक्षण थे। सत्ता में रहें या नैनीताल से लोकसभा चुनाव हार गए , उन्होनें जिस अंदाज में अपनी राजनीतिक बिसात पहाड़ों में बिछाई आज के दौर में ऐसा कर पाना असंभव है । बची सिंह रावत की विनम्रता, सादगी और वायदा पूरा करने के गुणों  के चलते लोग  उनके कायल रहे।  उनकी खूबी यह थी वो अपने मूल्यों की राजनीति किया करते थे । जिसे साथ चलना हो चले , जिसे बाहर जाना हो जाए , वे अपना रास्ता खुद बनाया करते थे और कई बार आलाकमान को भी ठसक के आईना दिखा दिया करते थे। ऐसा मैंने उन्हें नैनीताल सीट के टिकट आवंटन वाले दौर में देखा था। इन सबके बाद भी बचदा सहज , सरल व्यक्तित्व के धनी होने के साथ ही मृदुभाषी, विनम्र और वादा पूरा करने वाले व्यक्ति थे। आज के दौर में खोजकर भी आपको ऐसे नेता नहीं मिल सकते यही नहीं 'बचदा' उत्तराखंड की ब्राह्मण ठाकुर की राजनीति की  संकीर्णता से हमेशा दूर रहे और समाज के हर तबके के लिए हमेशा सुलभ रहे। 'बचदा' समाज के हर तबके के बीच इतने लोकप्रिय थे कि अपनी सौम्यता के चलते  लगातार चुनाव जीतकर अल्मोड़ा में हैट्रिक लगाने में सफल  रहे ।

बात 'बचदा' ही चली है तो उनसे जुड़ा एक किस्सा और दिलचस्प है 1999 के लोकसभा चुनाव में पिथौरागढ़ के देव सिंह मैदान में भाजपा की एक रैली हुई जिसमें भाजपा के स्टार प्रचारक और  प्रमोद महाजन मंच पर 'बचदा' के साथ थे 'बचदा' के साथ उस समय वर्तमान भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता सुरेश जोशी भी उस बड़ी जनसभा में साथ थे तब भाजपा के टेक्नोक्रेट रहे प्रमोद महाजन ने जनसभा के मंच से खुद कहा था पिथौरागढ़ जाने से पहले मैं प्रधान मंत्री अटल जी से मिला था मैंने बताया  'बचदा' के लिए जनसभा करने  पिथौरागढ़ जा रहा हूँ तब अटल जी ने ये कहा ये बच्चा ('बचदा')  मेरे लिए बहुत लकी रहा है ये बच्चा ('('बचदा')  जब पहली बार 1996 अल्मोड़ा पिथौरागढ़ संसदीय सीट से सांसद निर्वाचित हुआ तो मेरी सरकार 13 दिन चली , बच्चा ('बचदा')  जब दूसरी बार 1998 में  इस संसदीय सीट से सांसद बना तो मेरी सरकार 13 महीने चली अब इस बार 1999 में अगर इस बच्चे ('बचदा')  की अल्मोड़ा पिथौरागढ़ संसदीय सीट से हैट्रिक लगती है तो मेरी सरकार पूरे पाँच साल चलेगी और हुआ भी ऐसा ही तब प्रमोद महाजन के ऐसा कहते ही पूरा देव सिंह मैदान तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा था इस वाकये से समझ सकते थे 'बचदा' सभी के लिए  कितने सरल और सुलभ थे

केंद्रीय राज्य मंत्री रहे 'बचदा' ने अपने कार्यकाल में अनेक स्थानों पर केंद्रीय विद्यालयों की स्थापना की। 2004 में आर्य भट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान एरीज नैनीताल को केंद्रीय दर्जा दिलाने में तत्कालीन मुख्यमंत्री एनडी तिवारी, तत्कालीन मानव संसाधन मंत्री डॉ मुरली मनोहर जोशी के साथ महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1954 में उत्तर प्रदेश राजकीय वैधशाला की स्थापना हुई थी जिसे बाद में 'बचदा' के रहते अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली केंद्र के अधीन जाने के बाद एरीज को पर्याप्त बजट मिला जिससे नई खोजों और शोध , नवाचार में आसानी हुई 'बचदा' के रहते एरीज में 3.6 मीटर के टेलिस्कोप की स्थापना हो सकी जो नैनीताल के लिए किसी उपलब्धि से कम नहीं है केंद्रीय राज्य मंत्री के साथ बतौर सांसद 'बचदा' ने हर साल अपनी सांसद निधि के साथ ही अपने प्रयासों से किये कामों के अलावा संसद में उठाये गए सवालों व उनके जवाब की किताब प्रकाशित करने की एक नवीन परंपरा शुरू की। उस किताब को अल्मोड़ा संसदीय क्षेत्र के गावों और  शहरों में बांटा जाता था। 'बचदा' ने अलग उत्तराखंड राज्य निर्माण के लिए लोकसभा में निजी विधेयक भी पेश किया था। साथ ही अलग राज्य निर्माण का मामला अनेक बार संसद की पटल पर उठाया। 'बचदा' हर किसी से आत्मीयता के साथ मिलते थे और किसी को भी निराश नहीं करते थेएक मुलाक़ात में ही वो आपका नाम याद रख लेते थे और बड़ी भीड़ में भी पहचान जाते थे और नाम लेकर पुकारते थे शायद इसका कारण ये थे जो जमीन से जुड़े जनसंघ के नेता थे

आज जब वे इस दुनिया से जा चुके हैं तो मेरा यही कहना है बहुत कठिन सियासत में  'बचदा'   होना।  बहुत कठिन । आज के दौर में हम राजनेताओं को कोसते हैं लेकिन जनता की नजर में एक काबिल नेता बन पाना बहुत मुश्किल है। मैंने कई बार उन्हें  पहली बार सांसद बनने पर भी कई बार लैंडलाइन नंबर पर फोन किएकेन्द्रीय मंत्री बनने के दौरान भी कई मसलों पर उनकी बाइट लेनी चाही लेकिन हमेशा वह फोन लाइन पर हमेशा उपलब्ध रहे कई बार उनके पीए फोन उठाते थे बात नहीं हो पाती थी तो पीए खुद कहा करते थे अभी भाई साहब  उपलब्ध नहीं हैं  आप रात में या सुबह बात कीजिएगा दिन में बहुत व्यस्तता रहती है लेकिन बात निश्चित ही हो जाती थी आज के दौर में ऐसा हो पाना असंभव है आप किसी नेता के साथ फोन पर बात करें ऐसा सोच भी नहीं सकते अधिकारी ही आजकल मोबाइल फोन नहीं उठाते और बैक काल तक नहीं करते फिर नेता तो नेता हैंआज तो नेताजी की चरण वंदना करने वाले वाहन चालक तक में गुरूर आ जाता है पी ए तो बहुत  दूर की बात है

कुल मिलाकर कहा जा सकता है मौजूदा दौर में  'बचदा'  होना आसान नहीं है। वे खुद बने और अनेकों को बनाया । एक बात समझनी होगी 'बचदा'  किसी की कृपा से नहीं बनते हैं । उसके लिए जनता के दिलों में पैठ बनानी पड़ती है और कार्यकर्ता को दुत्कारना पड़ता है वह जनसंघ के दौर के ऐसे नेता थे कभी भी उन पर सत्ता की ठसक हावी नहीं हुईप्रदेश अध्यक्ष बने तब भी वैसे ही सहज और विनम्र रहे उनसे मिलने के लिए कभी घंटों लाइन में नहीं लगना पड़ा शायद यही जनसंघ के पुराने संस्कार ही थे जो बचदा को विनम्र बनाए हुए थे नहीं तो  आज के दौर में तो कुर्सी के साथ नेताजी के रंग बदलते जा रहे हैं मंत्री बनने के बाद नेताजी  कार्यकर्ताओं को नहीं पूछ रहे फिर हम पत्रकार तो पत्रकार हुएवैसे भी आज सोशल मीडिया का दौर हैहर नेता मीडिया के सामने आने से बचना चाहता हैअब तो दौर मीडिया मैनेजरी  का है वही प्रेस नोट बनाकर सभी मीडिया को दे रहा है  'बचदा'  इतने शालीन नेता रहे कभी उनका नाम किसी विवाद में नहीं आया। 2014 के बाद भी वह पहले जैसे ही रहेवह चाहते तो अपने लिए पार्टी से और भी बहुत कुछ मांग सकते थे कभी अपने बेटे या पत्नी के लिए टिकट नहीं मांगा ना ही राज्यपाल के पद को पाने के लिए किसी तरह की लाबिंग की शायद अपनी ईमानदारी  और सरल स्वभाव के चलते वह जन -जन में बेहद लोकप्रिय थे । मेरे साथ एक बार एक इंटरव्यू में उन्होनें खुद सांसद रहते कहा था अब मैं हमेशा सांसद या मंत्री थोड़ी रहूँगा इंसान को किसी पद का मोह कभी नहीं होना चाहिए सत्ता का नशा नहीं होना चाहिए नेताओं को विनम्र होना चाहिए तभी तरक्की की सीढ़ियां चढ़ी जा सकती हैं 'बचदा'  का असमय चला जाना उत्तराखंड भाजपा के लिए एक बड़ी क्षति है। भाजपा को अभी आपके  अनुभवों का लाभ और लेने की जरूरत थी । 'बचदा' , आप बहुत जल्दी चले गए । भला इतनी जल्दी भी कोई जाता है । मेरी विनम्र अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि

 

Wednesday, 21 April 2021

सावधान ! कोरोना अभी जिंदा है

 




कोरोनारूपी महामारी से जुड़ी हर मुश्किल घड़ी का सामना लाकडाउन में  हमने भले ही मुस्कुराते हुए किया हो , लेकिन अनलाक में  कोरोना अब  अधिक  दुर्गम सार्वजनिक चुनौती बन रहा है  और रुला  रहा है । कोरोना को लेकर सरकारी घोषणा एवं आकलन भी चुनावी घोषणा पत्र की तरह लगने लगे हैं। भारत में जब कोरोना के मामले नगण्य थे, सरकार और प्रशासन बहुत जागरूक था। जब मामले चरम पर थे, सरकारें निस्तेज हो गयी थी, यह कैसी विडम्बना एवं विरोधाभास है? कोरोना का खतरा  एक  बार फिर डरा रहा है, कोरोना पीड़ितों की संख्या  फिर बढ़ने लगी है।  कोरोना महामारी की दूसरी लहर  में लापरवाही बहुत घातक साबित हो सकती है ।  दूसरी लहर में रोजाना सामने आने वाले नए मामलों की संख्या 20 हजार से 1 लाख पार करने में महज 25 दिन लगे जबकि पहली लहर में मात्र 76 दिनों में आंकड़ा 1 लाख पहुंचा था । इस दौर में 8 राज्य कोरोना से सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं और 80 फीसदी से अधिक मामले  इन्हीं राज्यों में पाये गए हैं ।  इन बढ़ती कोरोना पीड़ितों की संख्या से केवल सरकार के चिन्तित होने से काम नहीं चलेगा, आम जनता को जागरूक एवं जिम्मेदार होना होगा। लोगों की थोड़ी-सी लापरवाही खतरे को बढ़ाती चली जा रही है।  इस साल की शुरुवात में  जनवरी फरवरी के महीने में ऐसा लगने लगा था कि अब कोरोना जाने वाला है, नए मामलों की संख्या 11,000 के पास पहुंचने लगी थी, लेकिन अब नए मामलों की संख्या रोजाना 50 हजार के पार कर चुकी है। रविवार को तो देश में 93 हजार से ज्यादा नए कोरोना संक्रमित मामले सामने आए हैं जिसने  सभी के माथे पर फिर से चिंता की लकीरें खींच दी हैं । 9-10 सितंबर 2020 के आसपास हमने कोरोना का चरम देखा था, जब मामले रोज 97,000 के पार पहुंचने लगे थे। इसमें दुखद तथ्य यह है कि तब भी महाराष्ट्र सबसे आगे था और आज भी 60 प्रतिशत से ज्यादा मामले अकेले इसी राज्य से आ रहे हैं।

हम वही देखते हैं, जो सामने घटित होता है। पर यह क्यों घटित हुआ या कौन इसके लिये जिम्मेदार है? यह वक्त ही जान सकता है। आदमी तब सच बोलता है, जब किसी ओर से उसे छुपा नहीं सकता, पर वक्त सदैव ही सच को उद्घाटित कर देता है। देश के लिए यह सोचने का समय है, ताकि पिछले साल की तरह कोरोना संक्रमण वापसी न कर सके। आंखें खोलकर  एक पर आंकड़ों को गौर से नए चश्में से  देखना होगा। यक्ष प्रश्न है कि आखिर कोरोना को परास्त करते-करते क्यों दोबारा से कोरोना पीड़ितों की संख्या बढ़ने लगी हैं इसलिये हमें कोरोना महामारी के दूसरे दौर के लिये अधिक सतर्क , सावधान एवं दायित्वशील होना होगा।

देश अभी भी कोरोना की मार से पस्त है। एक तरफ कोरोना सप्ताह दर सप्ताह नए-नए रिकॉर्ड बना रहा है तो दूसरी तरफ लापरवाही पहले की तुलना में कई गुना अधिक बढ़ गई है।   आज  लोगों में लापरवाही भी बढ़ रही है। लोग भीड़भाड़ वाले इलाकों में जाने से अब परहेज नहीं कर रहे हैं । मास्क और सेनिटाइजर का उपयोग हमारे  दैनिक जीवन में कम होता जा रहा है । आए दिन बैंकों , बाज़ारों में लोगों की भारी भीड़ उमड़ रही है जहां पर सोशल डिस्टेन्सिंग तार तार हो रही है। कोरोना का खतरा अभी टला नहीं है । खुद देश के प्रधानमंत्री अनलाक के दौरान देश के नाम अपने संदेश में ये कह चुके हैं जब तक सभी को  दवाई नहीं तब तक ढिलाई नहीं । इसके बावजूद भी जनता सब घोर लापरवाही बरत रहे हैं । निजी वाहनों , सरकारी वाहनों और रोडवेज की बसों में तो बहुत बुरा हाल है । इन सब जगहों पर सामाजिक दूरी है नहीं , अधिकांश यात्री , चालक और परिचालक मास्क तक  मास्क नहीं लगा रहे और खुले आम घूम रहे हैं । पढ़े लिखे लोगों की इसी जमात की लापरवाही  जिले में कोरोना के एक बार फैलने का बड़ा कारण बन सकती है  । यदि ऐसी ही लापरवाही आगे भी चलती रही तो  देश में कोरोना की दूसरी लहर विकराल हो जाएगी  ।

कोरोना से बचने के लिए कुछ नियमों का पालन जरूरी है । इसमें निश्चित दूरी का पालन और चेहरे पर मास्क लगाना अनिवार्य है । इन्हीं कुछ नियमों के साथ सवारी वाहनों को चलने की छूट दी गई थी । शुरुवात में तो वाहन चालकों और आम लोगों ने इन नियमों का पालन किया लेकिन धीरे धीरे सभी ने इनकी अनदेखी करना शुरू कर दिया । अब  देश के किसी भी रूट पर देख लें , नियमों का कहीं कोई पालन नहीं हो रहा । लोग  बेरोकटोक घूम रहे हैं , सामाजिक दूरी का पालन नहीं कर रहे हैं और बिना मास्क पहने एक दूसरे से मिल रहे हैं ।  ट्रेन , बस में यात्रा करने अधिकांश यात्रियों के चेहरे बिना मास्क के साफ देखे जा सकते हैं । सब्जी  और ठेले वालों की दुकानों का भी यही हाल है ।  दुकानदार बिना गलब्ज  और मास्क के सामान दे रहे हैं और लोग दुकानों में टूट पड़ रहे हैं  । कमोवेश  यही हाल निजी वाहनों में सवारी करने वाले यात्रियों का भी है । जो थोड़े बहुत लोग मास्क लगा भी रहे हैं वो भी गलत तरीके से । यात्री तो छोड़िए खुद वाहनों के चालक तक अपने चेहरे पर मास्क नहीं लगा रहे हैं और वाहनों और बसों के कंडक्टर बगैर मास्क के ही टिकट काट रहे हैं । हालत कितने गंभीर हैं समझे जा सकते हैं और ऐसे बसों और वाहनों में कोई कोरोना संक्रमित हो तो कई लोगों को वह अपनी चपेट में ले सकता है ।  देश में जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों  के हालात  भी बुरे हैं । मास्क लगाना ये अपनी शान के खिलाफ समझते हैं ।  स्कूलों और कालेज में भी छात्र , छात्राएँ बगैर मास्क के आवाजाही कर रहे हैं ।  इन हालातों को देखते हुए देश में तो कोरोना वायरस पर नियंत्रण की उम्मीद करना बेमानी है । इस तरह से तो किसी भी हालात में कोरोना का खतरा नहीं टल पाएगा।

लाकड़ाउन के बाद जब देश अनलाक हुआ तों बाज़ारों में भीड़ उमड़ने पर संक्रमण का खतरा था। संक्रमण न फैले इसके लिए सरकार ने मास्क और शारीरिक दूरी का पालन कराने की बात भी कही थी। कुछ दिन तक तों इसका शुरुवाती असर दिखाई दिया लेकिन अब बाज़ारों में सारे नियम टूट चुके हैं। कुछ लोग मास्क पहनकर आते हैं और कुछ शो पीस की तरह इसे अपने चेहरे पर लटकाते हुए घूमते हैं। कोरोना की टेस्टिंग का रेट भी देश में नहीं बढ़ पाया है ।  स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली भी इस दौर में सवालों के घेरे में है । जहां बीते बरस  सितंबर अक्टूबर माह में कोरोना की प्रतिदिन औसतन हजारों  के आसपास सैम्पलिं  हर जिले में हो रही थी , वहीं आज आलम ये है जिलों में  प्रतिदिन बमुश्किल 100 से 500  सैंपल लिए जा रहे हैं  और थर्मल स्क्रीनिंग करके अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली जा रही है ।   कोविड 19 की गाइडलाइन का पालन करने को कहीं से कहीं तक गंभीर  कोई नहीं दिख रहा जिसके चलते देश में मामले बढ़ रहे हैं ।  कोरोना के प्रति ये लापरवाही कहीं पूरे नगर के लिए मुसीबत न बन जाये ।  

 देश में टीकाकरण अभियान में बहुत भारी भीड़ उमड़ रही है लेकिन प्रशासन के पास पर्याप्त  इंतजामात नहीं हैं ।   दूरदराज़ इलाकों में लोगों को घंटों  गर्मी में लाइन  में खड़ा होना पड़ रहा है । कमरों  में लोगों के बैठने के लिए भी जगह कम पड़ रही है । कोविड के खतरों को देखते  हुए बीमार लोगों शासन की गाइडलाइन के तहत ही टीकाकरण कराया जा रहा है जो केवल  कागजों में दर्ज है ।   वैक्सीन लगाने वाले कोरोना के हमारे वारियर भी अब मास्क पहनने के नाम पर औपचारिकता ही निभा रहे हैं ।  सोशल डिस्टैंसिंग भी अब  इनके लिए दूर की गोटी हो चुकी है ।   टीकाकरण बूथ पर पहचान पत्र, आधार कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस या अन्य फोटोयुक्त आईडी के आधार पर पंजीकरण तो  हो रहा है वहीं टीकाकरण के बीच गंभीर बीमारी से ग्रस्त लोगों के लिए शासन ने गाइडलाइन जारी की है जिसमें  कहा गया है कि गंभीर बीमारी से ग्रस्त 45 से 59 साल उम्र तक के ऐसे लोग जिन्हें ब्लड प्रेशर, कैंसर, हृदय रोग , सांस  संबंधी बीमारी है, तो तो उन्हें अपने साथ इलाज करने वाले डॉक्टर का पर्चा और उनका परामर्श दिखाना होगा। इसे पहले पोर्टल पर अपलोड किया जाएगा फिर मौजूद स्वास्थ्य विशेषज्ञों के विचार के बाद ही उन्हें टीका लगेगा लेकिन अब ऐसा  कहीं नहीं हो रहा है  और  सारी कवायद  कागज में डाटा फिट  हर दिन बढ़त बढ़ाने  तक सिमटती जा रही है ‌। अब तो वैक्सीन लगाने  का सिलसिला  रफ्तार पकड़ चुका है । क्या  स्वस्थ  क्या  गंभीर बीमार सब एक श्रेणी के  हो चले हैं ।
 
 भारत ही नहीं दुनिया के विकसित देश भी इस भयावह बीमारी से जूझ रहे हैं। वैज्ञानिक अप्रैल के मध्य में कोरोना की दूसरी लहर के पीक स्तर पर पहुंचने का अनुमान लगा रहे हैं। दुनिया को इस महामारी से जूझते हुए एक वर्ष से अधिक का समय हो चुका है। हालांकि वैक्सीन भी आ चुकी है परन्तु वैक्सीन लगवाने की रफ्तार बेहद धीमी है। भारत में अभी तक मात्र छह करोड़ लोगों को ही वैक्सीन लग पाई है। सरकारें अपने स्तर पर प्रयास कर रही हैं। कहीं पर पूर्ण तो कहीं पर आंशिक पाबंदियां लगाई गई हैं। बेशक इस प्रकार की पाबंदियां, लॉकडाउन इस महामारी  का हल नहीं परन्तु  इस प्रकार की पाबंदियों द्वारा कोरोना की रफ्तार को कुछ कम अवश्य किया जा सकता है।

लॉकडाउन के दौरान आने वाली समस्याओं से जनता भी रूबरू हो चुकी है। सरकारी प्रयास तभी सफल होते हैं जब जनता की उसमें सहभागिता होती है। कोरोना को रोकने की जिम्मेदारी केवल सरकार की है यह सोचने की भूल मानव जीवन पर भारी पड़ सकती है। कोरोना से बचने के लिए हर एक व्यक्ति को जागरूक होना होगा और खुद का बचाव करना होगा।हमारे शरीर में कोरोना के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता खत्म हो जाना भी कोरोना के  पुन: उभरने का एक कारण है।  अभी भी  लॉकडाउन से संक्रमण को थामा जा सकता है। बेशक पिछले साल यही उपाय अधिक कारगर रहा था, लेकिन इसका फायदा यह मिला कि कोरोना के खिलाफ हम अधिक सावधान हो गए, कमियां एवं त्रुटियां सुधार लीं। अस्पतालों की सेहत सुधार ली लेकिन अब साधन-सुविधाओं से अधिक सावधानी ही बचाव का सबसे जरूरी उपाय है। मास्क पहनना, शारीरिक दूरी का पालन करना और सार्वजनिक जगहों पर जाने से बचना कहीं ज्यादा प्रभावी उपचार है। मानसिक और सामाजिक सेहत के लिए हमारा घर से बाहर निकलना जरूरी है। मगर हां, निकलते वक्त हमें पूरी सावधानी बरतनी होगी। अभी लापरवाही एवं गैर-जिम्मेदाराना हरकत किसी अपराध से कम नहीं है।  जनता को यह बात समझने की आज जरूरत है ।

Tuesday, 20 April 2021

सल्ट के रण में भाजपा से पिछड़ती काँग्रेस



आगामी 17 अप्रैल को उत्तराखंड के  सल्ट विधानसभा क्षेत्र के लिए होने जा रहे उपचुनाव भाजपा से अधिक काँग्रेस के लिए अधिक  चुनौतीपूर्ण  बन गया है।सल्ट को जीतने में भाजपा ने जहां  अपनी पूरी ताकत झोंकी  है और वह एकजुट नजर आ रही है वहीं  कांग्रेस  गंगा के भरोसे संघर्ष  कर रही है । भाजपा सहानुभूति के रथ पर सवार है, लेकिन  काँग्रेस की अंतर्कलह  इस  चुनावी संग्राम  में जिस तरह  दिख रही है उसे देखते हुए  लग रहा है कहीं इस बार भी काँग्रेस के  खाते में 2022 से पहले हार की पटकथा पहले से ही तैयार हो चुकी है । 

आमतौर पर उपचुनावों का ट्रेंड  सत्तारूढ़ दलों के खाते में ही दर्ज होता रहा है । पहले भी राज्य में ऐसा देखने को मिलता रहा है जो पार्टी सत्ता में होती है उसकी लिए उपचुनाव में जीत दर्ज करने में आसानी होती है ।  राज्य में 2017 के विधान सभा चुनावों के ठीक बाद हुए दो विधानसभा उपचुनावों में भाजपा के प्रत्याशी सहानुभूति लहर की बदौलत जीतते रहे हैं। सल्ट में भी भाजपा को इसी सहानुभूति के करिश्में की उम्मीद दिवंगत नेता सुरेन्द्र सिंह जीना के भाई महेश जीना से है ।भाजपा के लिए महेश जीना नवेले उम्मीदवार हैं। पार्टी के पूर्व  विधायक सुरेंद्र सिंह जीना का बीते साल कोरोना के कारण देहांत हो गया था। उसके बाद से ही सुरेंद्र सिंह जीना के भाई महेश जीना सल्ट विधानसभा सीट में मतदाताओं के बीच आए हैं। महेश के बारे में बताया जाता है कि वह दिल्ली में रहकर अपना बिजनेस संभालते थे। भाजपा के कार्यकर्ताओं में भी उनकी ज्यादा पैठ नहीं है। लेकिन दिवंगत विधायक जीना की मौत की सहानुभूति लेने के लिए उनके भाई को चुनाव में उतारा गया। सल्ट में भाजपा के प्रत्याशी महेश जीना  व्यवसायी हैं और दिल्ली में ही रहते  हैं ।काँग्रेस इस बात को खूब प्रचारित कर रही है लेकिन  सहानुभूति एक ऐसी चीज है जो हर मतदाता के दिल में उस दिन उभर जाया करती है जब वह वोट करता है । सल्ट में भाजपा एकजुट होकर  चुनाव लड़ रही है और पार्टी के सभी छोटे से बड़े नेता कार्यकर्ताओं को चुनाव प्रचार में लगा चुकी है वहीं  भाजपा के 25-30 विधायक  यहां पार्टी प्रत्याशी के चुनाव प्रचार की कमान संभाले हुए हैं जिससे महेश जीना मजबूत होकर उभर रहे हैं । वहीं  कांग्रेस प्रत्याशी गंगा पंचोली के साथ सिर्फ   सांसद प्रदीप टम्टा, पूर्व विधानसभा अध्यक्ष एवं विधायक गोविंद सिंह कुंजवाल,  रानीखेत के विधायक करण माहरा , पूर्व सीएम हरीश रावत के बेटे आनंद रावत चुनावी प्रचार की कमान संभाले हुए हैं। पार्टी को इस चुनाव में पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की कमी खूब खल रही है।  हरदा  कोरोना से अभी हाल ही में उबरे हैं और इन दिनों  एम्स  से  डिस्चार्ज होकर दिल्ली  में अपना स्वास्थ्य लाभ कर रहे हैं ।  चिकित्सकों ने फिलहाल उन्हें आराम करने की सलाह दी है ।इस लिहाज से उनकी सल्ट में फिलहाल कोई सभा होनी फिलहाल मुश्किल दिख रही है शायद इसी को जानते हुए उन्होनें एम्स से एक आडियो सोशल मीडिया पर गंगा पंचोली के समर्थन में बीते दिनों  डाला ताकि जनता भी हरीश रावत के साथ खड़ी हो सके और गंगा पंचोली के हाथ मजबूत कर  काँग्रेस का हाथ सल्ट में मजबूत हो सके ।  काँग्रेस महासचिव हरीश रावत ने गंगा के पक्ष में एक मार्मिक आडियो अपील जारी कर भाजपा खेमे में भारी हलचल मचा दी है। सल्ट क्षेत्र में इस अपील का क्या   प्रभाव पड़ेगा यह देखने वाली बात होगी ?  इस समय  कांग्रेस का संकट  उसकी अंदरूनी कलह है। हरीश रावत के कई करीबी संकट की इस घड़ी में रणजीत रावत के साथ गलबहियां करते नजर आ रहे हैं।  खुद के चुनाव प्रचार न कर पाने के चलते हरीश रावत ने  सल्ट उपचुनाव का पूरा प्रबंधन अपने करीबी  पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल ,सांसद प्रदीप टम्टा के हवाले कर दिया है।

सल्ट का जिक्र जब भी उत्तराखंड में होता है तो बिना रणजीत रावत के सल्ट अधूरा सा लगता है । 2017 में जब तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत और रणजीत रावत की एकजुटता थी , तब रणजीत हरदा के सलाहकार हुआ करते थे ।  तब रणजीत रावत रामनगर से चुनाव लड़े और  गंगा पंचोली को सल्ट से आजमाया गया ।  गंगा पंचाोली सुरेन्द्र जीना के हाथों पराजित हुई और मोदी लहर में रणजीत का किला भी दरक गया  । इस चुनाव में करारी हार के बाद रणजीत हरदा के धूर  विरोधी बन गए और इन्दिरा कैंप में अपना नया आशियाना बनाया ।  इस बार यही देखने को मिली है सल्ट उपचुनाव  में अब तक  पूर्व कांग्रेसी विधायक रणजीत सिंह रावत और उनके पुत्र ब्लाॅक प्रमुख विक्रम रावत की चुनाव में सक्रियता नहीं  के बराबर है और वह किसी सूरत में गंगा पंचोली  को विजयी नहीं देखना चाहते । काँग्रेस के अंदर भीतरघात अगर सल्ट उपचुनाव में होता है तो  कहीं  रणजीत रावत की यह  नाराजगी काँग्रेस का कोई  बड़ा नुकसान न कर जाये । वैसे भी इस बार  पूर्व विधायक रणजीत रावत इस सीट पर अपने बेटे ब्लाक प्रमुख  विक्रम रावत को उपचुनाव लड़ाना चाहते थे।  काँग्रेस के पर्यवेक्षकों की रिपोर्ट विक्रम रावत के फ़ेवर में थी तो वहीं  नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश और प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह ,  प्रभारी देवेंद्र यादव भी खुलकर दस जनपथ में  विक्रम रावत को ही  टिकट देने की पैरवी करते दिखाई दिये । इन्दिरा और प्रीतम तो  टिकट के एलान से पहले से ही विक्रम रावत के नामांकन के लिए हामी  भरते नजर आए  लेकिन काँग्रेस महासचिव  हरीश रावत  दस जनपथ का भरोसा फिर से जीतने में कामयाब रहे और  दस जनपथ ने गंगा पंचोली पर दांव लगाया जो पिछला चुनाव थोड़े अंतर से हार गई थी । अब चुनाव प्रचार में दो चार  दिन रह गए हैं और काँग्रेस प्रदेश अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष गंगा को प्रत्याशी बनाए जाने के बाद से  इस चुनाव से नदारद दिख रहे हैं उसने कांग्रेस के भीतर कई सवालों को खड़ा कर दिया है ।  चुनाव में जिस तरह से काँग्रेस के ये सभी नेता अपनी  बेरूखी दिखा रहे हैं इसको देखते हुए कहा जा सकता है  काँग्रेस का  अपना आंकड़ा सल्ट उपचुनाव  के जरिये नहीं बढ़ने वाला है । हाँ , हमेशा की तरह गुटबाजी काँग्रेस का इस चुनाव में खेल जरूर  खराब कर देगी  ।  

  वैसे इस  सूबे में भाजपा ने उपचुनाव में सहानुभूति का पूरा  फायदा उठाया  है । वर्ष 2018 में गढ़वाल की थराली सीट से तत्कालीन भाजपा विधायक मगनलाल शाह की मौत के बाद हुए उपचुनाव में उनकी पत्नी मुन्नी देवी को टिकट दिया गया था। भाजपा ने यह सीट जीती तो सही लेकिन अपेक्षा के विपरीत जीत का अंतर बहुत कम यानी महज 1981 मतों का ही रहा। इसके बाद  पिथौरागढ़ में  प्रकाश पंत  के असामयिक निधन के बाद भाजपा ने उनकी पत्नी चंद्रा पंत  को टिकट दिया जिसमें उसकी रणनीति सफल दिखी । सुरेंद्र सिंह जीना दो बार विधायक रहने के बाद तीसरी बार चुनाव मैदान में थे, फिर भी गंगा पंचोली ने मोदी लहर में उन्हें कड़ी टक्कर दी थी। शायद यही वह प्रमुख वजह हो सकती है जिसके कारण भाजपा ने यहां से मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत पर दांव लगाने का जोखिम सल्ट से नहीं लिया। सूबे के मुखिया तीरथ सिंह रावत के लिए  2022 से पहले  यह सेमीफाइनल  जीतना बहुत जरूरी  है। सल्ट में भाजपा के प्रत्याशी महेश जीना अगर विजय श्री हासिल करते  हैं तो वह  2022 से पहले निश्चित ही  बहुत मजबूत होंगेऔर इसके बाद उन्हें भी अपने लिए किसी सुरक्षित सीट से उपचुनाव जीतने में आसानी होगी ।

Saturday, 27 March 2021

प्रधानमंत्री मोदी की बांग्लादेश यात्रा के मायने




 


 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 26 मार्च को अपने दो दिवसीय दौरे परबांग्लादेश पहुँच चुके हैं। नरेंद्र मोदी के हाल के दौरे पर सबकी नजर है। वह राष्ट्रीय दिवस समारोह में हिस्सा लेने के खास मौके पर बांग्लादेश पहुंचे हैं ।कोरोना महामारी की शुरुआत के बाद यह मोदी की पहली विदेश यात्रा है। बांग्लादेश इस  बार अपनी आजादी की 50वी वर्षगांठ मना रहा है। इस दिन को बांग्लादेश के लोग मुजीब दिबस के रुप में भी मनाते है। इस खास मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बांग्लादेशपहुँचने के कई मायने हैं। 

राष्ट्रीय दिवस के खास मौके पर पी एम मोदी  ने बांग्लादेश के अखबार में एक खास लेख भी लिखा है जिसमें दोनों देशों के गहन रिश्तों की बात की गई है । बांग्लादेशी अखबार द डेली स्टार में अपने लेख में पीएम मोदी ने बंगबंधुशेख मुजीबुर्रहमान को याद किया, साथ ही बांग्लादेश के गठन के लिए उनके संघर्ष को सलाम किया है । पीएम मोदी ने लिखा कि बंगबंधु की जिंदगी संघर्ष से भरी हुई थी, जिन्होंने बांग्लादेश को एकजुट करने का काम किया । अपने लेख में यह भी लिखा है कि बंगबंधु  शेख मुजीबुर्रहमान को भारत में भी बड़े सम्मान के साथ देखा जाता है और उनकी सोच को सराहा जाता है यही कारण है  इस जश्न के खास मौके पर भारत भी बांग्लादेश के साथ खड़ा है । अपने लेख में  मोदी ने भारत-बांग्लादेश के बीच 2015 में हुए सीमा समझौते की तारीफ करने केसाथ ही दोनों देशों की दोस्ती के लिए बंगबंधु के विजन की तारीफ की है। पीएम मोदी  ने लिखा कि आज भारत और बांग्लादेश एक साथ मिलकर विकास की ओर बढ़ रहे हैं और अपने लोगों को मौका दे रहे हैं। इस लिहाज से इस ऐतिहासिक समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का शामिल होने के बड़े निहितार्थ हैं। मोदी के अलावे समारोह में  भूटान , नेपाल, श्रीलंका, और मालदीव के राष्ट्राध्यक्ष भी शिरकत कर रहे हैं । इस लिहाज से देखें तो सभी के एक मंच पर आने से पड़ोसियों के साथ दोस्ती  में गर्मजोशी बढ़ने की उम्मीद है ।

भारत और बांग्लादेश के बीच  50साल का सफर एक ऐसा  यादगार मौका है जिसे दोनों देश कई समझौतों के जरिये यादगार बना सकते हैं। मोदी की इस यात्रा में गंगा नदी के पानी के बटवारे का मुद्दा सुलझने के आसार हैं। यह अहम समझौता 2026 में समाप्त  होने जा रहा है जो हाल के दौरे में नया आकार ले सकता है। बांग्लादेश में अभी भी इसका भारी विरोध होता रहा है लेकिन शेख हसीना अपने देश के हितों को ताक पर रख किसी नतीजे पर पहुँच पाएँगी यह देखते वाली बात होगी । गंगा और ब्रह्मपुत्र भारत के लिहाज से जहां महत्वपूर्ण हैं वहीं यह बंगाल की खाड़ी में ही जाकर गिरती हैं जिसे उस इलाके की जीवन रेखा कहा जाता है । बांग्लादेश के लिहाज से भी इसकी बहुत अधिक उपयोगिता है और उनकी पूरी अर्थव्यवस्था इन नदियों पर ही टिकी है। गंगा की बात करें तो बेशक यह भारत के कई राज्यों से होकर गुजरती है लेकिन यह बांग्लादेश की पानी की जरूरत कोभी पूरा करती है ,साथ ही यह बांग्लादेश के उत्तर पश्चिम और उत्तर इलाके के जल भाव कोबरकरार रखने में भी सहायक की भूमिका में नजर आती हैं । बांग्लादेश के भीतर इस बातको लेकर विरोध के स्वर बहुत पहले से ही उठते रहे हैं । इसे इस तरह  प्रचारित किया जाता रहा है भारत पानी के बहाव को रोककर उनके देश के लिए परेशानी पेश कर सकता है । पड़ोसी से संधि की शर्तें बदलसकता है । आज भारत दक्षिण एशिया में अपनी मजबूत पकड़ रखता है जिसका लोहा खुद अमरीका जैसा देश भी मानता रहा है और कोरोना संकट के बीच दुनिया में चीन की किरकिरी के बाद भारत ने अपनी साख जिस अंदाज में बनाई है उसके मद्देनजर चीन को सबक सिखाने के लिए हर देश भारत के करीब चीन को काउंटर करने के लिए आना चाहता है । इस लिहाज से भी देखें तो बांग्लादेश भारत के साथ रखकर  दोनों  देशों की दोस्ती को प्रगाढ़ बना सकता है । मोदी की इस  दो दिवसीय यात्रा  को वह ऐतिहासिक बनाने का मौका हाथ से छोड़ना नहीं चाहता ।

बांग्लादेश के साथ भारत के सम्बन्धों में दशकोंसे कई उतार चढ़ाव देखने को मिलते रहे हैं लेकिन रिश्तों में तल्खी अन्य  पड़ोसी देशों की तुलना में बेहद कम रही । 1971 में बांग्लादेश की आज़ादी में भारत की बड़ी भूमिका रही जिसमें तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी की रणनीति  ने  बड़ा काम किया था ।   पाक की सेना ने तत्कालीन जगजीत सिंह अरोड़ा के सामने आत्मसमर्पण किया थातब बांग्लादेश आज़ाद हुआ था । 2015 में कई दशकों पुराना सीमा विवाद जहां मोदी के दौर में ही सुलझ गया वहीं दोनों देश झटके में एक दूजे के पास आ गए। शेख हसीना की सरकार जब-  जब बांग्लादेश में  सत्ता में आई है तब-  तब भारत के करीब बांग्लादेश रहा है । हाल के समय में केंद्र सरकार द्वारा पारित किया गया नागरिकता संशोधन कानून,  मोदी सरकार की नीतियां और बीजेपी सरकार का मुसलमानों के प्रति रुख को इन सभी ने कई बार बांग्लादेश के लोगों को असहज किया है। 2019 में बांग्लादेश और भारत के बीच संबंधों में तल्ख़ी तब देखने को मिली जब केंद्र सरकार ने नागरिकता संशोधन क़ानून पारित किया। बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख़ हसीना ने इस क़ानून को 'अनावश्यक' बताया था। तब शेख हसीना ने भी इस परअपना विरोध दर्ज किया था हालांकि हाल के समय में इसे  भारत के आंतरिक मामले से जुड़ा होने की बात दोहराई जाती रही है । भारत में भी एक दौर में सीएए और एनआरसी को लेकर भारी विरोधप्रदर्शन हुए थे। बांग्लादेश के  मुस्लिम वर्ग के लोगों ने इन कानूनों को लेकर अपनी चिंता जाहिर की थी, कि इन कानूनों से मुस्लिम वर्ग को देश से बाहर धकेला जा रहा है। विरोध-प्रदर्शन के कारण मुस्लिम देशों ने भी भारत की मोदी सरकार की आलोचना की थी लेकिन अब हालात काफी अलग हैं ।   इसके अलावा कोरोना काल में भी कई बार ऐसे हालात बन गए जिससे दोनों देशों के बीच संबंधों में तनाव पैदा हो गया।  

हाल के समय में भारत और बांग्लादेश के सम्बन्ध सिर्फ़ सामरिक दृष्टिकोण से मज़बूत नहीं हुए हैं बल्कि उससे भी आगे जा चुके हैं।  भारत और बांग्लादेश के लिए अब ये ज़्यादा महत्वपूर्ण हो गया है कि वो किस तरह दोनों देशों के बीच व्यापार और निवेश  को और मज़बूत और व्यापक बना सकते हैं।  हाल के समय में मोदी ने  फेनी नदी मैत्री सेतु का उद्घाटन भी किया है जोभारत के पूर्वात्तर राज्यों को बांग्लादेश से जोड़ती है जो  1147 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली हुई है जिसमें से 535 वर्ग किमी भारत में और शेष बांग्लादेश में है। यह दोनों सीमाओं से जुड़ी हुई नदी है। फेनी  नदी त्रिपुरा की राजधानी अगरतला से 135 किमी दक्षिण में बहती है। यह दोनों सीमाओं से जुड़ी हुई नदी है जिसके पानी के अधिकारों को लेकर विवाद चल रहा था । फेनी नदी वर्ष 1934 से विवादों में रही है। त्रिपुरा के जल संसाधन विभाग के अनुसार,बांग्लादेश द्वारा आपत्ति व्यक्त किये जाने के बाद फेनी नदी से जुड़ी 14 परियोजनाएं वर्ष 2003 से ही रुकी हुई थी जिसके चलते  इस क्षेत्र के गांवों में सिंचाई प्रभावित हो रही  थी। पीएम मोदी ने अपने कार्यकाल में इस विवाद को सुलझा कर नई लकीर खीचने का काम किया है ।

मोदी की बांग्लादेश की इस बार की यात्रा में तीस्ता के समझौते पर हस्ताक्षर होने के आसार भी दिखाई दे रहे हैं।  2019 में भी दोनों देशों के बीच व्यापार और निवेश पर खूब चर्चा हुई लेकिन यह समझौता लटका रहा।  इस नदी का बंटवारा  दोनों देशों के लिए मुश्किल काम है।  तीस्ता का बांग्लादेश की आर्थिकी  में बड़ा योगदान है।  अगर इस पर बंटवारा हो जाता है तो बांग्लादेश में भीषण सूखे के हालत होंगे । ऐसे में फूँक फूँक कर कदम रखने की जरूरत होगी। बांग्लादेश  के किसी प्रधानमंत्री ने अब तक इस पर कोई कदम आगे नहीं बढ़ाए लेकिन क्या शेख हसीना इस पर हस्ताक्षर का जोखिम मोल लेंगी देखने वाली बात होगी । साल 2017 में जब प्रधानमंत्री शेख हसीना भारत आईं थी, तब दोनों देशों के बीच 22 समझौते हुए थे लेकिन सबसे ज़्यादा चर्चित तीस्ता समझौता अधर में ही लटका रहा है। क्या इस बार तीस्ता पर कुछ नई पहल हो पाएगी देखने वाली बात रहेगी। बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी  इस संधि पर हस्ताक्षर करने से इंकार करती रही हैं। उनका तो साफ मानना है इससे उत्तर बंगाल के पांच जिलों कूचबिहार, जलपाईगुड़ी, दक्षिण और उत्तर दिनाजपुर, दार्ज़लिंग में सिंचाई प्रणाली प्रभावित होगी।

प्रधानमंत्री  मोदी की यात्रा से पहले विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने  भी कुछ समय पहले ढाका की यात्रा की। उन्होंने भी कहा कि भारत का तीस्ता को लेकर पक्ष नहीं बदला है । ऐसे में पीएम  मोदीके रुख पर सभी की नजरें होंगी । बांग्लादेश से मज़बूत रिश्ते भारत के लिए  बेहद ज़रूरी है ।  नरेंद्र मोदी के हाल के दौरेसे  दोनों देशों के संबंधों में नए आयाम जुड़ेंगे इससे इंकार नहीं किया जा सकता । बांग्लादेश हमेशा से ही मानकर चलता रहा है कि उसकी मुक्ति में भारत का बड़ा योगदान है । हालांकि  रोहिंग्या मुसलमानों के मसले पर भी बांग्लादेश को भारत का उतना समर्थन नहीं मिला है जितनी वह आस वह लगा रहा था ।  प्रधानमंत्री मोदी बांग्लादेश के साथ भारत के संबंधों में मधुरता लाने का काम कर रहे है। वहीं दूसरी तरफ बांग्लादेश की बहुसंख्यक आबादी अल्पसंख्यकों पर अत्याचार कर रही है। ऐसे में कई और मसलें हैं जिनको लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बांग्लादेश में विरोध हो सकता है।  

 प्रधानमंत्री मोदी के मई, 2014 में पदभार संभालने के बाद से ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ आज प्रासंगिक बनी हुई है । आज बांग्लादेश हमारा  महत्वपूर्ण पड़ोसी ही नहीं है  बल्कि हिन्द-प्रशांत क्षेत्र के सीमावर्ती इलाकों में  अहम साझेदार। भारत के लिए सबसे चिंता का मसला दक्षिण एशिया और दक्षिण पूर्वी एशिया में आतंकवादी संगठनों की व्यापक पैठ और तस्करी है । बांग्लादेश में इन संगठनों की गतिविधियाँ अगर बढ़ती हैं तो यह भारत  की सुरक्षा  गंभीर ख़तरा बन सकता है । इस पर शेख़ हसीना सरकार के भावी  रुख से दोनों देशों के भावी सम्बन्धों की पटकथा  तैयार होगी । 

Saturday, 13 February 2021

प्रेम दिवस का बाजार


 

पिछले कुछ समय से  ग्लोबलाइज्ड  समाज में प्यार भी ग्लोबल ट्रेंड का हो गया है । आज जहाँ इजहार और इकरार करने के तौर तरीके बदल गए हैं वहीँ  इंटरनेट के इस दौर में प्यार भी बाजारू  हो चला है । पहली बार शहरी चकाचौंध  से इतर  प्यार का यह उत्सव एक बड़ा बाजार  को अपनी गिरफ्त में ले चुका है।  र जगह वैलेंटाइन की संस्कृति पसरती जा रही है ।  आज युवा भी इसकी गिरफ्त में  पूरी तरह से नजर आते है तभी तो शहरों से लेकर कस्बो तक वैलेंटाइन का जलवा देखते ही बनता है। आलम यह है ये बड़ा उत्सव बन चुका है जो भारतीयों में तेजी से अपनी पकड़ बना रहा है। 

 

वैलेंटाइन के चकाचौंध पर अगर दृष्टि  डाले तो इस सम्बन्ध में कई किस्से प्रचलित हैं ।  रोमन कैथोलिक चर्च की माने तो यह "वैलेंटाइन "अथवा "वलेंतिनस" नाम के तीन लोगों  को मान्यता देता है जिसमें से दो के सम्बन्ध वैलेंटाइन डे से जोड़े जाते है लेकिन बताया जाता है इन दो में से भी संत " वैलेंटाइन " खास चर्चा में रहे । कहा जाता है संत वैलेंटाइन प्राचीन रोम में एक धर्म गुरू थे।  उन दिनों वहाँ पर क्लाडियस दो का शासन था।  उसका मानना था अविवाहित युवक बेहतर सैनिक  हो सकते है क्युकि युद्ध के मैदान में उन्हें अपनी पत्नी या बच्चों की चिंता नही सताती  । अपनी इस मान्यता के कारण उसने तत्कालीन रोम में युवको के विवाह पर प्रतिबंध लगा दिया।

 

किन्दवंतियो की मानें तो संत वैलेंटाइन के क्लाडियस के इस फेसले का विरोध करने का फैसला  किया। बताया जाता  है  वैलेंटाइन ने इस दौरान कई युवक युवतियों का प्रेम विवाह करा दिया ।  यह बात जब राजा को पता चली तो उसने संत वैलेंटाइन को 14 फरवरी को फासी की सजा दे दी । कहा जाता है  संत के इस त्याग के कारण हर साल 14  फरवरी को उनकी याद में युवा "वैलेंटाइन डे" मनाते है । 1260 में संकलित की गई 'ऑरिया ऑफ जैकोबस डी वॉराजिननामक पुस्तक में  भी सेंट वेलेंटाइन का वर्णन मिलता है। इसके अनुसार रोम में तीसरी शताब्दी में सम्राट क्लॉडियस के अनुसार विवाह करने से पुरुषों की शक्ति और बुद्धि कम होती है। उसने फरमान  जारी  किया  कि उसका कोई सैनिक या अधिकारी विवाह नहीं करेगा। संत वेलेंटाइन ने इस क्रूर आदेश का विरोध किया। उन्हीं के आह्वान पर अनेक सैनिकों और अधिकारियों ने विवाह किए। 

 

कैथोलिक चर्च की एक अन्य मान्यता के अनुसार एक दूसरे संत वैलेंटाइन की मौत प्राचीन रोम में ईसाईयों पर हो रहे अत्याचारों से उन्हें बचाने के दरमियान हो गई  । यहाँ इस पर नई मान्यता यह है  ईसाईयों के प्रेम का प्रतीक माने जाने वाले इस संत की याद में ही वैलेंटाइन डे मनाया जाता है । एक अन्य किंदवंती के अनुसार वैलेंटाइन नाम के एक शख्स ने अपनी मौत से पहले अपनी प्रेमिका को पहला वैलेंटाइन संदेश भेजा जो एक प्रेम पत्र था  । उसकी प्रेमिका उसी जेल के जेलर की पुत्री  थी जहाँ उसको बंद किया गया था।  उस वेलेंन टाइन  नाम के शख्स  ने प्रेम पत्र  लिखा  " फ्रॉम यूअर  वेलेंनटाइन "। आज भी यह वैलेंटाइन पर लिखे जाने वाले हर पत्र के नीचे लिखा रहता है।  क्लॉडियस ने 14 फरवरी को संत वेलेंटाइन को फांसी पर चढ़वा दिया। तब से उनकी स्मृति में प्रेम दिवस मनाया जाता है। कहा जाता है कि सेंट वेलेंटाइन ने अपनी मृत्यु के समय जेलर की नेत्रहीन बेटी जैकोबस को नेत्रदान किया व जेकोबस को एक पत्र लिखाजिसमें अंत में उन्होंने लिखा था 'तुम्हारा वेलेंटाइन'  14 फरवरी के  बहाने  जिसे बाद में इस संत के नाम पूरे विश्व में निःस्वार्थ प्रेम से मनाया जाने लगा ।   

 

यही नही वैलेंटाइन के बारे में कुछ अन्य बातें भी है  । इसके अनुसार तर्क यह दिए जाते है प्राचीन रोम के  प्रसिद्ध  पर्व "ल्युपरकेलिया " के ईसाईकरण की याद में मनाया जाता है । यह पर्व रोमन साम्राज्य के संस्थापक रोम्योलुयास और रीमस की याद में मनाया जाता है    इस आयोजन पर रोमन धर्मगुरु उस गुफा में एकत्रित होते थे जहाँ एक मादा भेडिये ने रोम्योलुयास और रीमस को पाला था इस भेडिये को ल्युपा कहते थे और इसी के नाम पर उस त्यौहार का नाम ल्युपर केलिया पड़ गया ।  इस अवसर पर वहां बड़ा आयोजन होता था ।  लोग अपने घरो की सफाई करते थे साथ ही अच्छी फसल की कामना के लिए बकरी की बलि देते थे ।  कहा जाता है प्राचीन समय में यह परम्परा खासी लोक प्रिय हो गई।

 

एक अन्य किंदवंती यह कहती है 14 फरवरी को फ्रांस में चिडियों के प्रजनन की शुरूवात मानी जाती थी जिस कारण खुशी में यह त्यौहार वहा प्रेम पर्व के रूप में मनाया जाने लगा  । प्रेम के तार रोम से   भी  सीधे जुड़े नजर आते हैं  । वहाँ पर क्यूपिड को प्रेम की देवी के रूप में पूजा जाने लगा जबकि यूनान में इसको इरोश के नाम से जाना जाता था। प्राचीन वैलेंटाइन संदेश के बारे में भी लोगो में   एकरूपता नजर नही आती । कुछ ने माना है  यह इंग्लैंड के राजा ड्यूक ने  लिखा जो आज भी वहां के म्यूजियम में रखा हुआ है। 

 

 आज युवाओं में वैलेंटाइन की खुमारी सर चढ़कर  बोल रही है।  इस दिन के लिए सभी पलके बिछाये बैठे रहते हैं ।   भईया प्रेम का इजहार जो करना है वैलेन्टाइन प्रेमी  इसको प्यार का इजहार करने का दिन बताते है ।  यूँ तो प्यार करना कोई गुनाह नही है लेकिन जब प्यार किया ही है तो इजहार करने मे देर नही होनी चाहिए लेकिन अभी का समय ऐसा है जहाँ युवक युवतिया प्यार की सही परिभाषा नही जान पाये है । वह इस बात को नही समझ पा रहे है प्यार को आप एक दिन के लिए नही बाध सकते ।वह तो  प्यार को हंसी मजाक का खेल समझ रहे हैं  आज का प्यार मैगी के नूडल जैसा बाजारू बन गया है जो दो मिनट चलता है ।  सच्चे प्रेमी के लिए तो पूरा साल प्रेम का प्रतीक बना रहता है लेकिन आज के बाजार ने प्यार की परिभाषा बदल दी है । इसका प्रभाव यह है 1 4 फरवरी को प्रेम दिवस का रूप दे दिया गया है जिसके चलते संसार भर के कपल प्यार का इजहार करने को उत्सुक रहते हैं । जहां चीन में यह दिन 'नाइट्स ऑफ सेवेन्सप्यार करने वालों के लिए खास होता हैवहीं जापान व कोरिया में इस पर्व को 'वाइट डेका नाम से जाना जाता है। इतना ही नहींइन देशों में  इस दिन से पूरे एक महीने तक लोग अपने प्यार का इजहार करते हैं । 

 

आज 14 फरवरी का कितना महत्त्व बढ गया है इसका अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है इस अवसर पर बाजारों में खासी रौनक  छा जाती है। गिफ्ट सेंटर में उमड़ने वाला सैलाब चहल पहल इस बात को बताने के लिए काफी है यह किस प्रकार आम आदमी के दिलो में एक बड़े पर्व की भांति अपनी पहचान बनने में कामयाब हुआ है । इस अवसर पर प्रेमी होटलों रेस्तारा में देखे जा सकते हैं ।

 

यूं तो हमारी संस्कृति में प्रेम को परमात्मा का दूसरा रूप बताया गया है अतः प्रेम करना गुनाह और प्रेम का विरोधी होना सही नही होगा लेकिन वैलेंटाइन के नाम पर जिस तरह का पश्चिमीपरस्त विस्तार हो रहा है वह सही नहीं है  । वैसे भी यह प्रेम की स्टाइल भारतीय जीवन मूल्यों से किसी तरह मेल नही खाती । आज का वैलेंटाइन डे भारतीय काव्य शास्र में बताये गए मदनोत्सव का पश्चिमी संस्करण प्रतीत होता है लेकिन बड़ा सवाल जेहन में हमारे यह आ रहा है क्या आप प्रेम जैसे चीज को एक दिन के लिए बाध सकते हैशायद नहीं। एक समय ऐसा था जब राधा कृष्ण मीरा वाला प्रेम हुआ करता था जो आज के वैलेंटाइन प्रेमियों का जैसा नहीं होता था । आज लोग प्यार के चक्कर में बर्बाद हो रहे है। हीर रांझालैला मजनू रोमियो जूलियट  के प्रसंगों का हवाला देने वाले हमारे आज के प्रेमी यह भूल जाते है मीरा वाला प्रेम सच्ची आत्मा से सम्बन्ध रखता था । आज तो  प्यार बाहरी आकर्षण की चीज बनती जा रही है । प्यार को गिफ्ट और पॉकेट  में तोला जाने लगा है । वैलेंटाइन के प्रेम में फसने वाले कुछ युवा सफल तो कुछ असफल साबित होते है । जो असफल हो गए तो समझ लो बरबाद हो गए क्युकि यह प्रेम रुपी "बग" बड़ा खतरनाक है । एक बार अगर इसकी जकड में आप आ गए तो यह फिर भविष्य में भी पीछा नही छोडेगा । असफल लोगो के तबाह होने के कारण यह वैलेंटाइन डे घातक बन जाता है।

 

वैलेंटाइन के नाम पर आज हमारे समाज में  जिस तरह की उद्दंडता हो रही है वह चिंतनीय ही है ।  संपन्न तबके साथ आज का मध्यम वर्ग और अब निम्न तबका भी  इसके मकड़ जाल में फसकर अपना पैसा और समय दोनों ख़राब करते जा रहे है ।   आज वैलेंटाइन की स्टाइल बदल गई है ।  गुलाब गिफ्ट दिए ,पार्टी में थिरके बिना काम नही चलता ।  यह मनाने के लिए आपकी जेब गर्म होनी चाहिए । यह भी कोई बात हुई क्या जहाँ प्यार को अभिव्यक्त करने के लिए जेब की बोली लगानी पड़ती हो 


आज के समय में वैलेंटाइन प्रेमियों की तादात बढ रही है।  साल दर साल। इस बार भी प्रेम का सेंसेक्स पहले से ही कुलाचे मार रहा है । वैलेंटाइन ने एक बड़े उत्सव का रूप ले लिया है।  मॉल गिफ्टआर्चीस डिस्को थेकमैक डोनल्स  पार्टी   का  आज इससे चोली दामन का साथ बन गया है ।  अगर आप में यह सब कर सकने की सामर्थ्य नही है तो आपका प्रेमी नाराज । बस फिर प्रेम का    एंड समझे    प्यार का स्टाइल समय बदलने के साथ बदल रहा है।  वैलेंटाइन प्रेमी  भी हर साल बदलते  ही जा रहे है। आज प्यार की परिभाषा बदल गई है।  वैलेंटाइन का चस्का हमारे युवाओ में तो सर चढ़कर बोल रहा है लेकिन उनका प्रेम आज आत्मिक नही होकर छणिक बन गया है।  उनका प्यार पैसों में तोला जाने लगा है। आज की युवा पीड़ी को न तो प्रेम की गहराई का अहसास है न ही वह सच्चे प्रेम को परिभाषित कर सकती   है ।  उनके लिए प्यार मौज मस्ती और सैर सपाटे  का खेल बन गया है जहाँ बाजार में प्यार नीलाम हो गया है और पूरे विश्व में इस दिन प्यार के नाम पर  मुनाफे का बड़ा कारोबार किया जा रहा है ।

Wednesday, 2 December 2020

अहमद पटेल होने के मायने





 “मेरे लिए यकीन कर पाना मुश्किल है कि अहमद पटेल नहीं रहे। चार दशकों तक वह गुजरात और राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अभिन्न हिस्सा थे। राजनीति में उनका प्रवेश इंदिरा गांधी की प्रेरणा से हुआ और राजीव गांधी ने उन्हें बड़ी भूमिका सौंपी। मैं खुद जबसे कांग्रेस अध्यक्ष बनी, एक भरोसेमंद साथी के तौर पर वह हमेशा मेरे साथ खड़े रहे। वह ऐसे इंसान थे जिनसे मैं कभी भी सलाह ले सकती थी। किसी भी स्थिति में उन पर भरोसा कर सकती थी। वह हमेशा पार्टी के हित की बात करते। उन्हें समस्याओं को हल करने वाला, संकटमोचक कहा जाता था। वह वास्तव में ऐसे ही थे बल्कि इससे भी कहीं अधिक अहम। वह आत्मविश्वास से भरी शख्सियत थे और उनकी सलाह हमारे लिए नीति -निर्देशक की तरह होती थीं। इन्हीं कारणों से उनका असमय जाना हमारे लिए अपार दुख का विषय है। मैं उन्हें "अहमद" कहकर पुकारती थी। बड़े दयालु इंसान थे। दबाव के क्षणों में भी एकदम शांत चित्त और संयत रहते। कांग्रेस अध्यक्ष और संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) की चेयरपर्सन के तौर पर मेरी भूमिकाओं में वह मेरी ताकत बने रहे। किसी भी जरूरी समय पर उन तक पहुंच पाने का भरोसा न केवल आम कांग्रेस कार्यकर्ताओं बल्कि दूसरी पार्टी के नेताओं को भी था। उनकी दोस्ती और प्रभाव का दायरा बेहद व्यापक था और मैं निजी तौर पर जानती हूं कि कैसे दूसरे दलों के नेता उन पर यकीन करते थे, उनके साथ रिश्तों क कितनी अहमियत देते थे। अहमद बुनियादी तौर पर एक सांगठनिक व्यक्ति थे। कांग्रेस के सत्ता में रहने के दौरान भी उनकी रुचि संगठन में ही रही। सरकारी दफ्तर, पद-ओहदा, प्रचार में उनकी कोई रुचि नहीं थी और न ही उन्होंनें सार्वजनिक पहचान या प्रशंसा की कभी अपेक्षा की। लोगों की नजरों, सुर्खियों से दूर चुपचाप लेकिन बड़ी कुशलता के साथ अपना काम करते रहते। शायद काम करने के उनके तरीके ने उनकी अहमियत और उनके प्रभाव को और बढ़ा दिया था। राजनीति से जुड़े लोग आमतौर पर चाहते हैं कि लोग उन्हें देखें, सुनें। लेकिन अहमद उन चंद विरले लोगों में थे जो पृष्ठभूमि में रहते हुए किसी और को श्रेय लेते देखना पसंद करते। बड़े आस्थावान और पूरी तरह राजनीतिक गतिविधियों में रहने के बाद भी विशुद्ध रूप से एक पारिवारिक व्यक्ति थे। फिर भी पार्टी और उसके हितों के लिए पूरी तरह समर्पित। अपनी पहुंच का कभी कोई फायदा नहीं उठाया।


संवैधानिक मूल्यों और देश की धर्मनिरपेक्ष विरासत में उनका अटूट विश्वास था। अहमद हमें छोड़कर जा चुके हैं, लेकिन उनकी यादें हमारे साथ हैं। जब भी कांग्रेस का 1980 से बाद का इतिहास लिखा जाएगा, उनका नाम ऐसे व्यक्ति के रूप में याद किया जाएगा जो पार्टी की तमाम उपलब्धियों के केंद्र में रहा। हममें से हर को कभी न कभी जाना है लेकिन समय ने अहमद को बड़ी क्रूरता के साथ ऐसे समय छीन लिया जब उनकी सबसे ज्यादा जरूरत थी।कांग्रेस को उनकी जरूरत थी। भारतीय राजनीति और सार्वजनिक जीवन को उनकी जरूरत थी। हमें उनकी जरूरत थी।”


 कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की अहमद पटेल को दी गयी भावुक श्रद्धांजलि  स्‍पष्‍ट रूप से पार्टी  में उनके महत्‍व को भी दर्शाती है। पटेल की एक अनोखी क्षमता थी कि वह पार्टी नेताओं के बीच सामंजस्‍य और एकता बनाए रखने में सक्षम थे। निजी हितों के बजाय पटेल पार्टी हित को सबसे ऊपर रखते थे शायद यही वजह रही इस दौर में पार्टी का हर छोटा कार्यकर्ता सीधे उनसे ही मिला करता था । एक तरह से वह कॉंग्रेस पार्टी के सबसे बड़े संकटमोचक थे। 

संसदीय राजनीती के मायने भले ही इस दौर में बदल गए हो और उसमे सत्ता का केन्द्रीयकरण देखकर अब उसे विकेंद्रीकृत किये जाने की बात की जा रही हो लेकिन देश की पुरानी पार्टी कांग्रेस में परिवारवाद साथ ही सत्ता के केन्द्रीकरण का दौर नहीं थमा है। दरअसल आज़ादी के बाद से ही कांग्रेस में सत्ता का मतलब एक परिवार के बीच सत्ता का केन्द्रीकरण रहा है फिर चाहे वो दौर पंडित जवाहरलाल नेहरु का हो या इंदिरा गाँधी या फिर राजीव गाँधी , सोनिया गांधी का । राजीव गाँधी के दौर के खत्म होने के बाद एक दौर ऐसा भी आया जब कांग्रेस पार्टी की सत्ता लडखडाती नजर आई। उस समय पार्टी के अध्यक्ष पद की कमान सीता राम केसरी के हाथो में थी। यही वह दौर था जिस समय कांग्रेस पार्टी सबसे बुरे दौर से गुजरी। यही वह दौर था जब भाजपा ने पहली बार गठबंधन सरकार का युग शुरू किया और अपने बूते केन्द्र की सत्ता पायी थी। इस दौर में किसी ने शायद कल्पना नही की थी कि एक दिन फिर यही कांग्रेस पार्टी भाजपा को सत्ता से बेदखल कर केन्द्र में सरकार बना पाने में सफल हो जाएगी। यही नही वामपंथियों की बैसाखियों के आसरे अपने पहले कार्यकाल में टिकी रहने वाली कांग्रेस अन्य पार्टियों से जोड़ तोड़ कर सत्ता पर काबिज हो जाएगी और "मनमोहन" शतरंज की बिसात पर सभी को पछाड़कर दुबारा "किंग" बन जायेंगे ऐसी कल्पना भी शायद किसी ने नही की होगी । दरअसल उस समूचे दौर में कांग्रेस पार्टी की परिभाषा के मायने बदल चुके थे ।उसमे  परिवारवाद की थोड़ी महक तो देखी गई ही साथ ही कही ना कहीं भरोसेमंद "ट्रबल शूटरो" का भी समन्वय भी देखा गया जिसमें अहमद पटेल एक महत्वपूर्ण कड़ी हुआ करते थे । वह सीनियर और जूनियर नेताओं के बीच की दीवार थे जिसे भेद पानया किसी के लिए आसान नहीं था ।

अहमद पटेल परदे के पीछे से काँग्रेस में बिसात बिछाया करते थे । अहमद के भरोसे  काँग्रेस ने यू पी ऐ 1 से यू पी ए  2 की छलांग लगाई । सही मायनों में अगर कहा जाए तो सोनिया गाँधी ने जब से हिचकोले खाती कांग्रेस की नैय्या पार लगाने की कमान खुद संभाली  तब से  कांग्रेस की सत्ता का संचालन 10 जनपथ से हो रहा है । यहाँ पर सोनिया के सबसे  भरोसेमंद  पटेल कांग्रेस की कमान को ना केवल संभाले हुए थे जिनके आगे पूरी काँग्रेस नतमस्तक हुआ करती थी । इस दौर में भी  कांग्रेस की सियासत 10 जनपथ से तय हो रही थी जहां पर  अहमद भाई जैसे कांग्रेस के सिपहसलार समूची व्यवस्था को इस तरह  संभाल रहे थे  कि उनके हर निर्णय पर सोनिया की छाप जरुरी बन जाती थी । सही मायनों में अगर कहा जाए तो 10 जनपथ की कमान पूरी तरह से इस समय अहमद पटेल के जिम्मे थी जिनके निर्देशों पर इस समय पूरी पार्टी चल रही थी । "अहमद भाई" के नाम से मशहूर इस शख्स के हर निर्णय के पीछे सोनिया गाँधी की सहमती रहती थी। सोनिया के "फ्री हैण्ड " मिलने के चलते कम से कम कांग्रेस में तो कोई भी अहमद पटेल को नजरअंदाज नही कर सकता था ।

कांग्रेस में अहमद पटेल की हैसियत इसी से समझी जा सकती थी ,बिना उनकी हरी झंडी के  कांग्रेस में पत्ता तक नही हिला करता था। कांग्रेस में "अहमद भाई" की ताकत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पार्टी के किसी भी छोटे या बड़े नेता या कार्यकर्ता को सोनिया से मिलने के लिए सीधे अहमद पटेल से अनुमति लेनी पड़ती थी । अहमद की इसी रसूख के आगे पार्टी के कई कार्यकर्ता अपने को उपेक्षित महसूस करते थे लेकिन सोनिया मैडम के आगे कोई भी अपनी जुबान खोलने को तैयार नही होता था । उसी अपनी फरियाद सुनाने के लिए अहमद पटेल का सहारा लेना पड़ता था । मनमोहन सरकार मे शामिल एक पूर्व केन्द्रीय मंत्री ने एक बार मुझे बताया था कि कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्य मंत्री अहमद पटेल से अनुमति लेकर सोनिया से मिलते हैं ।

अहमद भाई को समझने के लिए हमें 70 के दशक की ओर रुख करना होगा। यही वह दौर था जब अहमद गुजरात की गलियों में अपनी पहचान बना रहे थे। उस दौर में अहमद पटेल "बाबू भाई" के नाम से जाने जाते थे और 1977  से 1982 तक उन्होंने गुजरात यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष पद की कमान संभाली । 77 के ही दौर में वो भरूच कोपरेटिव बैंक के निदेशक भी रहे। इसी समय उनकी निकटता राजीव के पिता फिरोज गाँधी से भी बढ़ गई क्युकि राजीव के पिता फिरोज का सम्बन्ध अहमद पटेल के गृह नगर से पुराना था। इसी भरूच से अहमद पटेल तीन बार लोक सभा भी पहुंचे । 1984  में अहमद पटेल ने कांग्रेस में बड़ी पारी खेली और वह "जोइंट सेकेटरी" तक पहुँच गए लेकिन पार्टी ने उस दौर में उन्हें सीधे राजीव गाँधी का संसदीय सचिव नियुक्त कर दिया था और उस दौर में इनकी खूब चलने लगी । इसके बाद कांग्रेस का गुजरात में जनाधार बढाने के लिए पटेल को 1986  में गुजरात भी भेजा गया । गुजरात में पटेल को करीब से जाने वाले बताते है पूत के पाँव पालने में ही दिखायी देते हैं शायद तभी अहमद पटेल ने राजनीती में बचपन से ही पैर जमा लिए थे। पटेल के टीचर ऍम एच सैयद ने उन्हें 8 वी क्लास का मोनिटर बना दिया था। यही नहीं  जोड़ तोड़ की कला में पटेल कितने माहिर थे इसकी मिसाल उनके टीचर यह कहते हुए देते है कि अहमद पटेल ने उस दौर में उनको उस विद्यालय का प्रिंसिपल बना दिया था।शायद बहुत कम लोगों को ये मालूम है कि गुजरात के पीरामन  में अहमद पटेल का जीवन क्रिकेट खेलने में भी बीता था उस दौर में  पीरामन की क्रिकेट टीम की कमान खुद वो सँभालते थे । टीम में उनकी गिनती एक अच्छे आल राउंडर के तौर पर होती थी। अहमद पटेल की इन्हीं  विशेषताओं के कारण शायद उन्हें उस पार्टी में एक बड़ी जिम्मेदारी दी गई जो देश की सबसे बड़ी और आजादी के आंदोलन की पार्टी है जहां अहमद पटेल सोनिया गाँधी के राजनीतिक सलाहकार थे ।अहमद पटेल के संबंध सभी पार्टियों के साथ बेहद आत्मीय थे । उनके कौशल और रणनीति का का लोहा आज  उनके विपक्षी भी मानते थे ।यकीन जान लें काँग्रेस पार्टी को बुरे दौर से उबारकर सत्ता में लाने में अहमद पटेल की भूमिका को किसी तरह से नजर अंदाज नही किया जा सकता । हाँ ये अलग बात है भरूच में कांग्रेस लगातार  लोक सभा चुनाव हारती जा रही है और वर्तमान में ढलान पर है लेकिन  फिर भी हर छोटे बड़े चुनाव में टिकटों कर बटवारा काँग्रेस में अहमद पटेल की सहमति से होता आया  जो यह बतलाने के लिए काफी है कि पार्टी में उनका सिक्का कितनी मजबूती के साथ जमा हुआ था । राहुल गांधी की नापसंद के बावजूद वह सोनिया के अहम सलाहकार यूं ही नहीं थे । 

अहमद पटेल की ताकत की एक मिसाल 2004  में देखने को मिली जब पहली बार कांग्रेस यू पी ए 1  में सरकार बनाने में कामयाब हुई थी । इस कार्यकाल में सोनिया के "यसबॉस " मनमोहन बने ओर वह अपनी पसंद के मंत्री को विदेश मंत्रालय सौपना चाहते थे लेकिन दस जनपद गाँधी पीड़ी के तीसरे सेवक नटवर सिंह को यह जिम्मा देना चाहता था लेकिन मनमोहन नटवर को भाव देने के कतई मूड में नही थे। हुआ भी यूं ही। जहाँ इस नियुक्ति में मनमोहन सिंह की एक ना चली वही नटवर के हाथ विदेश मंत्रालय आ गया ।मनमोहन का झुकाव शुरू से उस समय अमेरिका की ओर कुछ ज्यादा ही था लेकिन अपने कुंवर साहब ईरान और ईराक के पक्षधर दिखाई दिए। कुंवर साहब अमेरिका की चरण वंदना पसंद नही करते थे और परमाणु करार करने के बजाए ईरान के साथ अफगानिस्तान , पाकिस्तान के रास्ते भारत गैस पाइप लाइन लाना चाहते थे । इस योजना में कुंवर साहब को गाँधी परिवार के पुराने सिपाही मणिशंकर अय्यर का समर्थन था ।वही मणिशंकर जो आज कांग्रेस पार्टी को सर्कस कहने और उसके कार्यकर्ताओ को जोकर कहने से परहेज नही किया करते । 

कुंवर , मणिशंकर मनमोहन को 10 जनपथ का दास मानते थे लेकिन समय ने करवट ली और "वोल्कर" के चलते नटवर ना केवल विदेश मंत्री का पद गवा बैठे बल्कि पार्टी से भी बड़े बेआबरू होकर निकल गए लेकिन इसके बाद भी मनमोहन अपनी पसंद के आदमी को विदेश मंत्री बनाना चाहते थे लेकिन 10 जनपथ के आगे उनकी एक ना चली और प्रणव मुखर्जी को विदेश मंत्री की जिम्मेदारी मिली ।प्रणव की नियुक्ति से परमाणु करार तो संपन्न हो गया लेकिन देश की विदेश नीति वैसे नही चल पाई जैसा मनमोहन चाहते थे लेकिन 2009 में जब अपने दम पर मनमोहन ने अपने को "मजबूत प्रधानमंत्री के तौर पर स्थापित किया तो दस जनपद के आगे उनकी चलने लगी। इसी के चलते मनमोहन ने अपनी दूसरी पारी में एस ऍम कृष्णा, शशि थरूर , कपिल सिब्बल को अपने हिसाब से कैबिनेट मंत्री की कमान सौपी। आई पी एल विवाद  थरूर के फँसने के बाद जब 10 जनपथ ने उनसे इस्तीफ़ा माँगा तब अकेले मनमोहन उनका बीच बचाव करते नजर आये। उस दौर में 10 जनपथ की तरफ  से पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन को जबरदस्त घुड़की पिलाई गई थी । तब 10  जनपथ की ओर से मनमोहन को साफ़ संदेश देते हुए कहा गया था आपको ओर आपके मंत्रियो को 10  जनपथ के दायरे में रखकर काम करना होगा । यही नहीं  अहमद पटेल ने तो उस समय शशि थरूर को लताड़ते हुए यहाँ तक कह डाला था वे यह ना भूले वह किसकी कृपा से यू पी ए सरकार  में मंत्री बने हैं।

दरअसल यह पूरा वाकया दस जनपथ में अहमद पटेल की ताकत का अहसास कराने के लिए काफी है। दस जनपथ शुरुवात से नहीं  चाहता था  कि मनमोहन को हर निर्णय लेने के लिए "फ्री हेंड" दिया जाए। अगर ऐसा हो गया तो मनमोहन अपनी कोर्पोरेट की बिसात पर सरकार चलाएंगे यह दर सभी को सताने लगा । गाहे बगाहे कहा जाने लगा ऐसी सूरत में आने वाले दिनों में कांग्रेस पार्टी के  भावी "युवराज " के सर सेहरा बाधने में दिक्कतें पेश आ सकती थी इसलिए कांग्रेस के सामने वो दौर ऐसा था जब उसके हर मंत्री की स्वामीभक्ति मनमोहन के बजाए 10 जनपथ में सोनिया के सबसे विश्वासपात्र अहमद पटेल पर आ टिकी थी ।एक दौर ऐसा भी था जब अहमद पटेल की पार्टी में उतनी पूछ परख नही थी लेकिन जोड़ तोड़ की कला में बचपन से माहिर रहे अहमद पटेल ने समय बीतने के साथ गाँधी परिवार के प्रति अपनी निष्ठा बढ़ा ली और सोनिया के करीबियों में शामिल हो गए।राजनीतिक प्रेक्षक बताते है कि पार्टी में अहमद पटेल के इस दखल को पार्टी के कई नेता और कार्यकर्ता पसंद तक नही करते थे लेकिन सोनिया के आगे इस पर कोई अपनी चुप्पी नही तोड़ता था ।


कुल मिलाकर कांग्रेस में अहमद पटेल होने के मायने गंभीर थे । राज्य सरकारों में किसको मंत्री बनाना है ?  किस नेता को अपने पाले में लाना है ? जोड़ तोड़ कैसे होगा ? यह सब अहमद पटेल की आज सबसे बड़ी ताकत बन गई थी । अहमद की इसी काबिलियत के आगे जहाँ कांग्रेस हाईकमान नतमस्तक होता था  वही पूर्व प्रधानमंत्री  मनमोहन अपने मन की बेबसी के गीत गाते नजर आते थे । मनमोहन के अंतिम  मंत्रिमंडल विस्तार मे भी चली  तो सिर्फ दस जनपथ की जहां अहमद पटेल के निर्देशों पर शीशराम ओला को न केवल मंत्रिमंडल मे लिया गया बल्कि गिरजा व्यास को राजस्थान मे गहलोत की काट के तौर पर आगे किया गया ।  यू पी ए  के इस विस्तार मे राहुल की यंग ब्रिगेड से कोई चेहरा सामने नहीं आया ।  चली तो सिर्फ और सिर्फ अहमद पटेल की जिसमें  दस जनपथ के हर निर्णय में वह आगे रहे और अपने मनमुताबिक फैसले लेते रहे ।  यही नहीं पूर्व में  यू पी ए  दो  के  मंत्रियो अश्विनी कुमार और पवन बंसल के  इस्तीफे मे भी अहमद पटेल ने ही दस जनपद में  अहम रोल निभाया था ।   मनमोहन तो शुरू से दोनों के बीच बचाव मे सामने आए थे लेकिन दस जनपथ में अहमद का का भरोसा ये दोनों मंत्री नहीं जीत पाये जिसके चलते उनकी कुर्सी कुर्बान हो गयी ।  यहाँ भी अहमद पटेल का सिक्का चला जब वह दोनों मंत्रियो से मिले और इस्तीफे पर अड़ गए तब कहीं जाकर दोनों की कुर्सी छिनी । 

दस जनपथ की कमान पूरी तरह से इस समय भी अहमद पटेल के जिम्मे थी लेकिन पिछली बार अहमद पटेल गुजरात में बुरी तरह से घिर गए। राजनीती के चाणक्य अमित शाह की राज्य सभा की  बिसात में अहमद पटेल जिस तरह उलझे उसने कई सवालों को पहली बार खड़ा किया ।  गुजरात में कांग्रेस के कुल छह विधायक इस्तीफ़ा दे चुके थे तो शंकर सिंह वाघेला चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस को गुड़ बाय कर जिस अंदाज में हर दिन अपने रंग दिखा रहे थे। कांग्रेस ने अपने विधायकों को बेशक कर्नाटक  भेज दिया  लेकिन  कई विधायको की निष्ठा जिस तरह वाघेला के साथ थी उससे इस बात के आसार लग रहे थे कि राज्य सभा चुनाव में अगर क्रॉस वोटिंग हुई तो पटेल की हार तय हो जाएगी । अहमद पटेल सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार थे इसलिए उस दौर में कहा भी जाने लगा  गुजरात में हार का सीधा मतलब दस जनपद में पटेल के रुतबे का काम हो जाना होगा और यह हार सोनिया तक को परेशान कर सकती है ।   अहमद पटेल के लिए अगर क्रॉस वोटिंग हो जाती  तो उनकी राज्यसभा  में इंट्री  बंद हो जाती   जिसका सीधा मतलब दस जनपद की हार होगी और कांग्रेस मुक्त भारत की दिशा में  अब यह  सीधी चोट होगी ।  नोटा का विकल्प  उस चुनाव में बने रहने से पार्टी को अपने विधायकों से धोखा मिलने की आशंका सता रही थी । कांग्रेस अपना वोट सुरक्षित रखने के लिए पार्टी के 44 विधायकों को गुजरात से हटा कर बैंगलुरू ले गई, लेकिन उसकी परेशानी कम होती नहीं दिख रही थी । नोटा खत्म करने की उसकी मांग खारिज हो चुकी थी । सुप्रीमकोर्ट में झटका खाने के बाद पार्टी आशंकित थी  कि विधायकों को टूटने से भले ही वह बचा ले, लेकिन वोट में नोटा का उपयोग कर कुछ विधायक उसका खेल बिगाड़ सकते हैं। कांग्रेस की आशंका निर्मूल नहीं थी ।

 दरअसल, राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और राज्यसभा चुनाव में पार्टी का व्हिप लागू नहीं होता। पार्टी संगठन स्तर पर भले ही अनुशासनात्मक कार्रवाई बाद में करती रहे, लेकिन वोट के पार्टी लाइन से बंधे नहीं होने से विधायक कहीं भी वोट डालने को स्वतंत्र रहते  हैं। राष्ट्रपति चुनाव के वक्त कांग्रेस यह देख चुकी थी । गुजरात में ही उसके 10 से ज्यादा विधायक एनडीए उम्मीदवार रामनाथ कोविंद के पक्ष में क्रास वोटिंग कर चुके थे । तत्कालीन  विधानसभा की सदस्य संख्या के आधार पर राज्यसभा के एक उम्मीदवार को न्यूनतम 44 वोटों की जरूरत थी । बैंगलुरू ले जाए गए कांग्रेस विधायकों की संख्या 44 थी । उसे दो विधायक एनसीपी और एक जदयू से भी समर्थन का आश्वासन था लेकिन इन 47 में से चार-पांच ने भी नोटा दबा दिया तो अहमद पटेल का संसद के उच्च सदन में जाना संभव नहीं हो  सकेगा ऐसा गाहे बगाहे कहा जाने लगा । दरअसल गुजरात में कांग्रेस के कुल 57 विधायक थे, लेकिन अब 6 विधायकों के पाले बदलने की वजह से संख्या घटकर 51 रह गई थी  ।  अहमद पटेल को राज्यसभा में जीत के लिए 47 विधायकों का वोट चाहिए थे  लेकिन हकीकत यही है कि वाघेला के कांग्रेस छोड़ने के बाद पार्टी की हालत पतली थी ।   उसके 6 विधायक कांग्रेस छोड़ चुके थे और कई और विधायक भाजपा के पाले में अंतिम समय तक जा सकते हैं ऐसा अंदेशा बना था ।  बीजेपी के चाणक्य अमित शाह उस दौर में ऐसी कोशिश में जुटे थे कि गुजरात कांग्रेस के कम से कम 22 विधायक उसका साथ छोड़ दें ।   ऐसा करने से गुजरात विधानसभा में कांग्रेस की सदस्य संख्या 57 से घटकर 35 हो जाती  साथ ही कांग्रेस के 22 विधायकों के इस्तीफे से विधानसभा की सदस्य संख्या 182 से घटकर 160 हो जाती ।  ऐसी सूरत में  राज्यसभा में एक सीट की जीत के लिए 40 विधायकों के वोट की जरूरत पड़ती ।  अगर  ऐसा हो गया  होता तो बीजेपी के तीनों राज्यसभा उम्मीदवार- अमित शाह, स्मृति ईरानी और कांग्रेस से बीजेपी में आये बलवंत सिंह राजपूत की जीत पक्की  हो जाती  क्योंकि वहां पर बीजेपी के कुल 121 विधायक थे । उसके तीनों उम्मीदवारों के लिए जरूरी 120 वोट आराम से मिल जाते । सोनिया के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल गुजरात चुनावों से ठीक पहले अपनी पार्टी के अंदर बड़ी जंग लड़ रहे थे । अगर राज्यसभा चुनाव में पटेल की हार होती  तो यह हार दिसम्बर में गुजरात चुनाव से पहले कार्यकर्ताओं के मनोबल को गिराने का काम करती क्युकि पिछले कई चुनावों से अहमद पटेल के भरोसे  कांग्रेस ने गुजरात छोड़ा हुआ था जहाँ टिकटों के चयन में उनकी तूती बोला करती थी ।  लेकिन अहमद पटेल ने अपने रणनीतिक कौशल से गुजरात में राज्यसभा की सीट अपने नाम कर ली । इसी तरह से राजस्थान में भी जब काँग्रेस में संकट के बादल छाये थे तब अशोक गहलोत और सचिन पायलट को समझाने बुझाने का जिम्मा अहमद पटेल को ही सौंपा और राजस्थान में काँग्रेस टूटने से बच गई । छत्तीसगढ़  बघेल को कमान सौंपने  के लिए सोनिया   गाँधी को उन्होंने ही   राजी किया । इसी तरह से  मध्य प्रदेश में  कमलनाथ को कमान  देने  का उनका निजी फैसला था जिसका सम्मान सिंधिया और उनके समर्थकों को करना पड़ा  । महाराष्ट्र  में शिवसेना को कांग्रेस और राकपा के साथ लाकर महाअघाड़ी बनाने के पीछे ढाल अहमद पटेल ही थे । 

अहमद पटेल  इतनी जल्दी दुनिया से रुखसत हो जाएंगे इसका भान कार्यकर्ताओं तक को नहीं था ।  सोनिया तक उनकी फरियाद पहुँचाने का माध्यम भी अहमद भाई ही थे । काँग्रेस के सितारे अभी लंबे समय से गर्दिश में हैं ऐसे समय में अहमद पटेल की जरूरत काँग्रेस को सबसे अधिक थी । अहमद पटेल के जाने के बाद काँग्रेस में अब युवा नेताओं के दिन बदल सकते हैं । उम्मीद है पार्टी में अब सीनियर और जूनियर नेताओं के बीच की लड़ाई खत्म हो जाएगी और राहुल गांधी का दबदबा बढ़ सकता है । ऐसे हालातों में कांग्रेस  में अब सभी सीनियर नेता किनारे किए जा सकते हैं ।  फिर आज के दौर में कांग्रेस के कार्यकर्ता अगर यह सवाल पूछते है कि 24  अकबर रोड नाम मात्र का दफ्तर बनकर रह गया है तो जेहन में उमड़ घुमड़ कर कई सवाल पैदा होते हैं  क्युकि राहुल गांधी के पार्टी में रहने के बाद भी स्थितिया कमोवेश वैसी ही हैं जैसी पहले हुआ करती थी ।  कार्यकर्ता आज भी उपेक्षित है।  टिकटों को लेकर जोड़ तोड़ और गुटबाजी काँग्रेस मे आज भी चरम पर है । कोई नया विजन नहीं है । मोदी के मुकाबिल पार्टी में कोई ऐसा चेहरा नहीं है जो मॉस लीडर का ताज  ले सके।  राहुल के  लाख अनुनय विनय के  बाद भी कांग्रेस के नेताओं का  कार्यकर्ताओं से सीधा कोई संवाद स्थापित नहीं हुआ है। पार्टी को  हर चुनाव में करारी हार का सामना करना पड़ रहा है उसके बाद भी वह आत्ममंथन को तैयार नहीं है । संगठन में अभी भी ऐसे नेता कुंडली मार कर बैठे हैं जिनकी स्वामीभक्ति गाँधी परिवार के प्रति  है लेकिन  भीड़ खींचने वाले नेताओं के तौर पर वह कई पीछे हैं  और इस दौर मे भी दस जनपथ  की गणेश परिक्रमा करने का पुराना कांग्रेसी दौर नहीं थमा है ।  ऐसे में  अब क्या उम्मीद करें देश की सबसे पुरानी पार्टी  बिना अहमद पटेल के   कांग्रेस दस जनपथ की कालकोठरी से खुद को बाहर निकाल पाएगी ? कहना मुश्किल है  इस बार दस जनपद में अहमद पटेल नहीं हैं ।