Sunday, 5 July 2026

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी : भारतीय जनसंघ के संस्थापक राष्ट्रवादी चिंतक


डॉ.श्यामा प्रसाद मुखर्जी आधुनिक भारत के उन विराट व्यक्तित्वों में से एक थे जिन्होंने शिक्षा, कानून, राजनीति और राष्ट्रवाद के क्षेत्र में अप्रतिम योगदान दिया। वे एक प्रतिष्ठित शिक्षाविद्, बैरिस्टर, कुशल प्रशासक, प्रखर वक्ता और सशक्त राष्ट्रवादी नेता थे। अल्पायु में ही उन्होंने देश की सेवा में अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया और अंततः जम्मू-कश्मीर की पूर्ण एकीकरण की लड़ाई में शहीद हो गए।

 

6 जुलाई 1901को कलकत्ता के अत्यन्त प्रतिष्ठित परिवार में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी  का जन्म हुआ। उनके पिता सर आशुतोष मुखर्जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे जो एक प्रखर शिक्षाविद के रूप में विख्यात थे। डॉ.मुखर्जी ने 1917 में मैट्रिक किया तथा 1921 में बी०ए० की उपाधि प्राप्त की। 1923 में लॉ की उपाधि अर्जित करने के पश्चात वह विदेश चले गये और 1926 में इंग्लैण्ड से बैरिस्टर बनकर स्वदेश लौटे। अपने पिता का अनुसरण करते हुए उन्होंने भी अल्पायु में ही विद्याध्ययन के क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलताएँ अर्जित कर ली थी। 1934 में मात्र 33 वर्ष की आयु में वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे युवा कुलपति भी बने। इस पद पर रहते हुए  उन्होंने उच्च शिक्षा के विस्तार और सुधार के लिए महत्वपूर्ण कार्य किए। वे एक प्रखर विचारक और लेखक भी थे। उनकी आत्मकथा लीव्स फ्रॉम ए डायरी  और अन्य लेखन भारतीय इतिहास तथा शिक्षा व्यवस्था पर गहरी अंतर्दृष्टि रखते हैं। एक विचारक और शिक्षाविद  के रूप में उनकी ख्याति निरन्तर आगे बढ़ती गई।

 

मुखर्जी की राजनीतिक यात्रा देश 1930 के दशक में शुरू हुई। वे शुरू में कांग्रेस से जुड़े लेकिन हिंदू महासभा के माध्यम से सक्रिय हुए। पत्नी सुधा देवी की 1934 में मृत्यु के बाद उन्होंने पुनर्विवाह नहीं किया और पूर्ण रूप से देशसेवा में लगे रहे। 1943 से 1946 तक वे अखिल भारतीय हिंदू महासभा के अध्यक्ष भी रहे। बंगाल के अकाल (1943) के दौरान उन्होंने बड़े पैमाने पर राहत कार्य संगठित किए।

 

डॉ.श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने स्वेच्छा से अलख जगाने के उद्देश्य से राजनीति में प्रवेश किया था। डॉ.मुखर्जी सच्चे अर्थों में मानवता के उपासक और सिद्धान्तवादी थे। उन्होंने बहुत से गैर कांग्रेसी हिन्दुओं की मदद से कृषक प्रजा पार्टी से मिलकर प्रगतिशील गठबन्धन का निर्माण किया। इस सरकार में वे वित्त मन्त्री बने। इसी समय वे सावरकर के राष्ट्रवाद के प्रति आकर्षित हुए और हिन्दू महासभा में सम्मिलित हुए। मुस्लिम लीग की राजनीति से बंगाल का वातावरण दूषित हो रहा था। वहाँ साम्प्रदायिक विभाजन की नौबत आ रही थी। साम्प्रदायिक लोगों को ब्रिटिश सरकार प्रोत्साहित कर रहा था। ऐसी विषम परिस्थितियों में उन्होंने यह सुनिश्चित करने का बीड़ा उठाया कि बंगाल के हिन्दुओं की उपेक्षा न हो। अपनी विशिष्ट रणनीति से उन्होंने बंगाल के विभाजन के मुस्लिम लीग के प्रयासों को पूरी तरह से नाकाम कर दिया।  


डॉ.मुखर्जी इस धारणा के प्रबल समर्थक थे कि सांस्कृतिक दृष्टि से हम सब एक हैं इसलिए धर्म के आधार पर वे विभाजन के कट्टर विरोधी थे। वे हिंदुत्व विचारधारा से प्रेरित जरूर थे, लेकिन सभी धर्मों के प्रति सम्मान रखते थे। उन्होंने बंगाल विभाजन के समय पश्चिम बंगाल को भारत में बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे मानते थे कि विभाजन सम्बन्धी उत्पन्न हुई परिस्थिति ऐतिहासिक और सामाजिक कारणों से थी। वे मानते थे कि आधारभूत सत्य यह है कि हम सब एक हैं। हम सभी में कोई अन्तर नहीं है। हम सब एक पर विशेष हो रक्त के हैं। एक ही भाषा, एक ही संस्कृति और हमारी विरासत भी एक है परन्तु उनके इन विचारों को अन्य राजनैतिक दल के तत्कालीन नेताओं ने अन्यथा रूप से प्रचारित-प्रसारित किया बावजूद इसके लोगों के दिलों में उनके प्रति अधाह प्यार और समर्थन बढ़ता गया।

 

अगस्त, 1946 में मुस्लिम लीग ने जंग की राह पकड़ ली और कलकत्ता में भयंकर बर्बरतापूर्वक अमानवीय मारकाट हुई। उस समय कांग्रेस का नेतृत्व सामूहिक रूप से राष्ट्रसेवा था। ब्रिटिश सरकार की भारत विभाजन की गुप्त योजना और षड्यन्त्र को एक कांग्रेस के नेताओं ने अखण्ड भारत सम्बन्धी अपने वादों को ताक पर रखकर स्वीकार कर लिया। उस समय डॉ. मुखर्जी ने बंगाल और पंजाब के विभाजन की बड़ी माँग उठाकर प्रस्तावित पाकिस्तान का विभाजन कराया और आधा बंगाल और आधा पंजाब खण्डित भारत के लिए बचा लिया। गांधी और सरदार पटेल के अनुरोध पर वे भारत के पहले मन्त्रिमण्डल में शामिल हुए जहां उन्हें उद्योग और आपूर्ति मंत्री जैसे महत्वपूर्ण विभाग की जिम्मेदारी सौंपी गई। इस दौरान उन्होंने स्वतंत्र भारत की औद्योगिक नीति तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसने देश के आर्थिक विकास की नींव रखी। हालांकि, पाकिस्तान के प्रति नेहरू की तुष्टिकरण नीति से असहमत होकर उन्होंने 1950 में अपना इस्तीफा देने में भी देरी नहीं की। संविधान सभा और प्रान्तीय संसद के सदस्य और केन्द्रीय मंत्री के नाते उन्होंने शीघ्र ही अपना विशिष्ट स्थान बना लिया किन्तु उनके राष्ट्रवादी चिन्तन के चलते अन्य नेताओं से मतभेद बराबर बने रहे। राष्ट्रीय हितों को प्रतिबद्धता को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता मानने के कारण उन्होंने मन्त्रिमण्डल से त्यागपत्र दे दिया जिसके बाद उन्होंने एक नई पार्टी बनाई जो उस समय विरोधी पक्ष के रूप में सबसे बड़ा दल था।

 

उनका सबसे बड़ा योगदान 21 अक्टूबर 1951 को भारतीय जनसंघ की स्थापना करना था, जिसके वे संस्थापक अध्यक्ष भी बने। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सहायता से गठित यह पार्टी बाद में भारतीय जनता पार्टी की पूर्ववर्ती बनी। जनसंघ का उद्देश्य सांस्कृतिक राष्ट्रवाद,  एकात्म भारत और मजबूत राष्ट्रीय सुरक्षा पर आधारित वैकल्पिक राजनीति प्रस्तुत करना था और 1952 के आम चुनावों में पार्टी ने तीन सीटें भी जीती। डॉ.श्यामा प्रसाद मुखर्जी जम्मू कश्मीर को भारत का पूर्ण और अभित्र अंग भी बनाना चाहते थे। उस समय जम्मू कश्मीर का अलग झंडा और अलग संविधान था। वहाँ का मुख्यमंत्री वजीरे आलम अर्थात प्रधानमन्त्री कहलाता था। संसद में अपने भाषण में मुखर्जी ने धारा-370 को समाप्त करने की भी जोरदार वकालत की। डॉ. मुखर्जी भारत की अखंडता के प्रबल पक्षधर थे। उन्होंने अनुच्छेद 370 का घोर विरोध किया जो जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देता था। उनका प्रसिद्ध नारा था “एक देश में दो विधान, दो प्रधान, दो निशान नहीं चलेंगे।”

 

अगस्त 1952 में जम्मू की विशाल रैली में उन्होंने अपना संकल्प व्यक्त किया था कि या तो मैं आपको भारतीय संविधान प्राप्त कराऊँगा या फिर इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये अपना जीवन बलिदान कर दूंगा। उन्होंने तत्कालीन नेहरू सरकार को चुनौती दी तथा अपने दृढ़ निश्चय पर अटल रहे। अपनी मजबूत संकल्प शक्ति से 1953 में वे कश्मीर घाटी में प्रवेश करने के लिए सत्याग्रह पर उतरे। जम्मू-कश्मीर सरकार ने उन्हें गिरफ्तार किया। तभी जेल में उनकी तबीयत बिगड़ी और 23 जून 1953 को मात्र 51 वर्ष की आयु में उनकी रहस्यमय परिस्थितियों में मृत्यु हो गई। उनका बलिदान कश्मीर को पूर्ण रूप से भारत में समाहित करने के संकल्प का एक बड़ा प्रतीक बन गया। डॉ. मुखर्जी का जीवन संदेश देता है कि सच्चा राष्ट्रवाद केवल शब्दों में नहीं, बल्कि बलिदान में प्रकट होता है।

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