Wednesday, 24 October 2012

मलाला के जज्बे को सलाम ..................






" मैं स्कूल के लिए तैयार हो रही थी और ड्रेस पहनने  वाली थी कि मुझे याद आया कि प्रधानाचार्य ने हमसे स्कूल की ड्रेस नहीं पहनने के लिए कहा है | इसलिए मैंने अपनी पसंदीदा गुलाबी रंग की पोशाक पहनी |  स्कूल की बाकी लड़कियां भी रंग बिरंगी पोशाको में थी  | सुबह असेम्बली में हमसे कहा गया कि हम रंग बिरंगे परिधान न पहने क्युकि तालिबान को इस पर आपत्ति होगी " 

पाकिस्तान की स्वात घाटी में रहने वाली १४ वर्षीय मलाला युसुफजई की "गुल मकई " नाम से २००९ में बीबीसी उर्दू के लिए खास तौर पर  लिखी गई यह डायरी उसके इरादों को बताने के लिए काफी है | बीते ९ अक्टूबर को दोपहर १२.४५ पर मिंगोरा में चंद नकाबपोश आतंकियों ने एक स्कूल वैन को रोका जिसमे तीन छात्राए घर वापस लौट रही थी | आतंकियों ने पूरी बस को घेर लिया और पूछा कौन है मलाला ? वहां पर मौजूद तीनो सहेलियां मलाला को पहचानने से साफ इनकार कर देती हैं | ए के ४७ की पिस्टल उनकी कनपटी पर तनी रहती है लेकिन जान की परवाह किये बिना वह अपना मुह नहीं खोलती हैं |   मलाला के जज्बे को देखिये वह सहेलियों को बचाने के लिए खुद को आगे आने से नहीं रोकती है और अपना परिचय नकाबपोशो को खुद देती है | तब नकाबपोशो के हाथ एक बड़ी कामयाबी उस समय हाथ लगती है जब मलाला को गोली लगती है | उस पल  वहां के माहौल को देखकर हर किसी के रोंगटे खड़े हो जाते हैं | वातावरण गोलियों की थर्राहट से काँप उठता है | गोली मलाला के सर और गर्दन में लगती है जिससे वह बुरी तरह घायल हो जाती है | इससे अंदाजा लगाया जा सकता है मलाला पर हुआ आतंकी हमला कितना भीषण रहा होगा | आज वह गंभीर स्थिति में है और जिन्दगी  और मौत से जूझ  रही है | पेशावर के एक अस्पताल में कोमा में चले जाने के बाद अब उसको लन्दन के एक अस्पताल में वेंटिलेटर पर इलाज के लिए भेजा गया है जहाँ   मलाला यूसुफजई कोमा से बाहर आ गई है । लन्दन के क्वीन  एलिजाबेथ अस्पताल के डेव रोजर ने यह जानकारी दी। 'द न्यूज' ने रोजर के हवाले से बताया कि मलाला  कोमा से बाहर आ गई है  और उसने अपने विचारों को पहली बार  लिखकर व्यक्त किया। रोजर के अनुसार मलाला बोल नहीं पा रही हैं लेकिन उम्मीद है कि जल्द ही बोलने लगेगी। उसे वेंटीलेटर से हटा दिया गया है।घायल होने के बाद मलाला पहली बार सहारे के साथ खड़ी भी हुई है । पूरे विश्व में लोग आज  उसकी सलामती की दुआ कर रहे हैं | खुदा करे वह लन्दन से ठीक होकर फिर से अपने देश वापस लौटे और महिलाओ को  शिक्षित करने के अपने मिशन में फिर से लग जाए |
                       


इस हमले के बाद तालिबान की प्रतिक्रिया गौर करने लायक थी क्युकि तालिबान के प्रवक्ता ने  कहा अगर  हमले के बाद भी वह जिन्दा बच जाती है तो हम उस पर फिर से हमला कर देंगे | लेकिन मलाला के जज्बे को देखिये उसकी हिम्मत को देखकर तालिबानी लड़ाको के पसीने छूट गए  | पहले भी उसे तालिबान से जान से मारने की कई धमकियाँ मिल चुकी हैं लेकिन इन सबसे बेपरवाह होकर उसने महिला शिक्षा की अपनी आवाज को हमेशा से बुलंद ही रखा | तालिबानी कट्टरपंथियों  के अलावा पाकिस्तान  के कुछ कट्टरपंथियों की धमकियों से बेपरवाह होकर वह स्त्री शिक्षा के लिए अपने संघर्ष को जारी रखती है वह भी उस देश में जहाँ स्त्री शिक्षा का विरोध शुरू से होता आया है | पाकिस्तान की राजनीती पर पकड़ रखने वाले कई जानकारों का मानना है कि वहां बीते कुछ  समय से तालिबान ने पाक के आवाम में जैसा खौफ पैदा किया है उसके मुकाबले के लिए  अभी कई  और मलाला चाहिए |  इस  घटना के बाद पाकिस्तान में मलाला के समर्थन में एक बड़ा तबका उसके साथ खड़ा दिखता है और एक नयी मोर्चाबंदी की आहट वहां सुनाई देने लगी है जिसमे तालिबान के विरोध  में कई स्वर मुखरित हुए हैं | तो क्या माना जाए मलाला की यह लकीर पाकिस्तान को  पहली  बार उसे एक नई मोर्चाबंदी की तरफ ले जाती दिख रही है जिसमे  पाक के आम जनमानस के साथ धर्म गुरुओ की बड़ी जमात तालिबान को अपने गिरेबान में झाँकने को मजबूर कर रही है जिसमे महिला शिक्षा के बारे  में उसके  गैर मुस्लिम दृष्टिकोण पर सवाल उठाकर  पाक एक नई लीक पर जाने का साहस दिखा रहा है | असल में पूरी तस्वीर ऐसी नहीं है | पाकिस्तान में एक तबका जहाँ मलाला के साथ खुलकर खड़ा है तो वहीँ कट्टरपंथियों  की एक बड़ी जमात तालिबानियों के सुर में सुर मिलते हुए दिखाई दे रही है | तालिबानियों ने मलाला को निशाना बनाकर यह दिखा दिया वह किस तरह आज भी महिलाओ की शिक्षा का कितना बड़ा विरोधी है | साथ ही इसकी हिमाकत करने वाली एक छोटी सी बच्ची को मारने में भी वह देरी नहीं कर सकता | तालिबान के निशाने पर मलाला उस दौर से है जिस दौर में २००९ में तालिबानियों ने स्वात घाटी में अपने झंडे गाड़ लिए थे और अपनी मनमानी द्वारा वहां के सारे स्कूल ,कालेज बंद करा दिए थे | यही नहीं उनके अनुसार महिलाओ की जगह घर की चहारदीवारी में है और उसे वहीँ कैद रहना चाहिए | इसका विरोध करने वाली महिलाओ को मौत के घाट उतारा जाना वहां आम बात हो गई थी | उस समय वहां के बारे में  यह कहा जाने लगा था यहाँ जान भी सस्ती है | उसी दौर में मलाला महिला शिक्षा के लिए खुलकर सामने आती हैं और घर घर जाकर लोगो से महिला शिक्षा की उपयोगिता के बारे में  भाषण देती है तो तबसे वह तालिबान की आँखों में खटकने लगी | मलाला को उसके इस  कार्य के लिए अंतरराष्ट्रीय शांति  पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है  और अब मलाला पर हाल में हुए हमलो ने पूरी दुनिया में उसके  नाम को सबकी जुबान पर ला दिया है | आज विश्व के तमाम देशो में लोग  मलाला की बहादुरी से प्रेरित होकर जहाँ अपनी लडकियों के नाम उसके नाम पर रख रहे है वहीँ अब घर घर में रहने वाली बेटियां मलाला बनने का सपना पालने लगी हैं | 
                                  
                           

                    तालिबान में लम्बे समय से कट्टरपंथियों का शासन रहा है | वह  आधुनिकीकरण के घोर विरोधी रहे है | यहाँ तक की महिलाओ को शिक्षित करने के फैसलों के खिलाफ वह खुलकर फसाद करने से भी बाज नहीं आते | इसी के चलते अपने प्रभाव वाले इलाको पर उसने स्कूल कालेज  लम्बे समय से बंद किये हुए  हैं  और इस फैसलों के विरोध में जाने वाले लोगो को बंदूक के दम पर खौफ दिखाकर ठिकाने लगाया जाता रहा है | लेकिन मलाला को देखिये उसने तालिबानियों की मांद में घुसकर  उन्हें ललकारा है और तालिबान को उसी की भाषा में जबाव महिला शिक्षा का समर्थन  कर दिया है | तालिबानी नेता फजल उल्लाह ने अपने गुर्गो को मलाला को मारने के लिए भेजा जिसमे वह बुरी तरह घायल हो गई | अभी वह जिन्दगी और मौत से जूझ  रही है | लेकिन तालिबान ने अभी भी यह कहा  है कि वह उसे मार कर ही दम लेंगे | तालिबान के कट्टरपंथी पाकिस्तान के कुछ कठमुल्लों के समर्थन  के बूते  महिला  शिक्षा विरोधी  झंडा  थामे हुए हैं लेकिन शायद यह कहते हुए वह यह भूल रहे है इस्लाम में महिला शिक्षा पर किसी तरह के प्रतिबन्ध की बात नहीं कही गई है | पैगम्बर साहब तो खुद महिलाओ को शिक्षित किये जाने पर शुरू से बल देते थे | इस लिहाज से तालिबान के इस कदम की जितनी निंदा की जाये उतनी कम है क्युकि वह महिला शिक्षा को देश की प्रगति में एक बड़ा रोड़ा मानता रहा है |शायद वह यह समझते हुए वह  यह भूल जाता है कि महिलाओ को शिक्षित करने से जहाँ उनका सामाजिक स्तर ऊँचा उठता है वहीँ वह पुरुष की बराबरी पर आकर खड़ी हो जाती हैं | लेकिन तालिबानियों के गले यह बात थोड़ी उतरती है | अगर ऐसा होता तो मलाला पर हमला नहीं होता | तालिबान द्वारा मलाला पर हमले से उसकी खासी किरकिरी हुई है शायद तभी अब वह अपने निशाने पर विदेशी मीडिया को लेने से बाज नहीं आ रहा जिसकी  बेरोकटोक कवरेज से मलाला के पक्ष में ना केवल लहर  चली बल्कि दुनिया के कोने कोने से उसे खासी सहानुभूति भी मिली | आज स्थिति यह है कि प्रिंट मीडिया से लेकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया सभी के निशाने पर तालिबान है | यही नहीं अब तो सोशल मीडिया में भी पूरी दुनिया मलाला के साथ में आकर खड़ी हो गई है |अफगानिस्तान के इलाको में भी मलाला का जादू सर चदकर बोलने लगा है और लोग मलाला के समर्थन में आकर खड़े हुए है | पाकिस्तान में 14 साल की मानवाधिकार कार्यकर्ता मलाला यूसुफजई पर हमले के बाद एक और स्कूली लड़की ने तालिबान से धमकी मिलने का दावा किया है। मूलत: स्वात घाटी की रहने वाली हिना खान ने कहा है कि वह तालिबान की हिट लिस्ट में है। हिना मालकंद घाटी में तालिबान के खिलाफ लगातार सार्वजनिक रूप से आवाज उठाती रही है। हिना के हवाले से डॉन अखबार ने लिखा है लड़कियों के स्कूल जाने पर तालिबान की धमकी के बाद हमें स्वात छोड़ना पड़ा, लेकिन अब तालिबान की ताजा धमकी के बाद मुझे लगता है कि मैं इस्लामाबाद में भी स्कूल नहीं जा पाऊंगी। हालांकि तालिबान की ओर से इसकी पुष्टि नहीं हो पाई  है लेकिन  हिना के पिता रायतुल्ला खान ने अखबार को बताया कि उनकी सामाजिक कार्यकर्ता पत्नी फरहत को भी इसी साल अगस्त में धमकियां मिलनी शुरू हुईं।  कुछ दिनों पहले जब वह घर से बाहर निकले  तो दरवाजे पर एक लाल क्रॉस देखा। उन्होंने  यह सोचकर इसे मिटा दिया कि यह किसी बच्चे की करतूत होगी लेकिन अगले रोज  उसे दोबारा देख वह  डर गए । इसके अगले दिन उनको  एक फोन आया और किसी  ने कहा कि हिना अगली मलाला होगी। यह घटना ये बताने के लिए काफी है कि मलाला पर घटी आतंकी घटना आज भी वहां के लोगो को अच्छे से याद है और पहली बार लोग उसी तर्ज पर सामने आने से खुलकर बोलने से नहीं कतरा रहे जिस लीक पर चलने का साहस अकेले मलाला सरीखी लडकियों ने दिखाया है  | आज आलम यह है कि हर परिवार के सदस्य अपनी आप बीती मीडिया के सामने लाने से पीछे नहीं हट रहा  है तो इसका बड़ा कारण मलाला का जज्बा है जो लोगो को तालिबान के विरोध में बिगुल बजाने  को मजबूर कर रहा है |
             
               

अरब देशो में भी मलाला ने अपने काम के बूते जागरूकता ला दी है | शायद इसी के चलते अब वहां भी लोग महिलाओ को अच्छी शिक्षा देने की पैरवी अगर खुलकर करने लगे हैं तो समझा जा सकता है मलाला इस दौर में कितना लोकप्रिय हो गई हैं ? यह स्थिति उस अफगानिस्तान की भी है जहाँ कभी तालिबान के शासन  में महिलाओ का घर से बाहर निकलना मुश्किल होता था | लेकिन पाकिस्तान में तस्वीर का दूसरा पहलू भी देखने को मिलता है जहाँ वहां के आवाम का बड़ा  तबका आज भी खुलकर मलाला के साथ आने से परहेज करता हुआ देखा जा सकता है |वैसे भी पाकिस्तान में सेना, सरकार और आई एस आई तीनो की राह अलग अलग चलती रही है | वहां पर आज भी तालिबान को लेकर एक विशेष हमदर्दी देखी जा सकती है | सेना तालिबान के समर्थन  में खड़ी देखी जा सकती है | उसके बिना वहां पत्ता भी नहीं हिला करता  और यही जमात ऐसी है जो आज भी अमेरिका को उसका दुश्मन नम्बर एक मानती है | भले ही हिचखोले खाती पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था अमेरिका के सहयोग से चलती है लेकिन पाकिस्तान इस मदद का बेजा इस्तेमाल आतंकी गतिविधियों के इस्तेमाल में करता आया है जिसके चलते आज भी वहां का लोकतंत्र खतरे में है| अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नाम की कोई चीज वहां नहीं बची है | भले ही वहां की  सरकार अमेरिका का गुणगान आर्थिक मदद के चलते करती आई है लेकिन पाक में कट्टरपंथियों  की एक बड़ी जमात आज भी खूनखराबे और आतंक पर ही भरोसा करती है शायद इसलिए वहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नाम मात्र की बची है | अमेरिका आतंक के खिलाफ लड़ाई में एक बड़ी राशि प्रतिवर्ष पाक को देता है जिसमे तकरीबन १७ करोड़ डॉलर शिक्षा के लिए दिए जाते हैं ताकि वहां की शिक्षा व्यवस्था पटरी पर आ सके लेकिन इस मदद का बेजा इस्तेमाल वह आतंकी गतिविधियों में करता रहा है जिस पर अमेरिकी सीनेट  में भी कई बार सवाल उठ चुके हैं | और शायद यही कारण है कि हाल के दिनों में सी आई ए के पूर्व  अधिकारी ब्रूस रीडेल ने "डेली बीस्ट "  के सम्पादकीय में अमेरिकी चुनाव में राष्ट्रपति  पद के दोनों उम्मीदवारों से  आखरी बहस में अपना ध्यान पाकिस्तान पर केन्द्रित करने की नसीहत दे डाली है | उन्होंने सवाल उठाते हुए पूछा है अगर तालिबान की फिर से सत्ता में वापसी हो जाती है और वहां स्कूल जाने वाली तीस लाख  से  ज्यादा लडकियों के साथ मलाला जैसे बर्ताव होता है तो उनकी हिफाजत के लिए अमेरिका की क्या नीति है ?  पाकिस्तान अगर सच में महिलाओ का हितेषी होता  होता तो  मलाला पर हमला करने की जुर्रत तालिबान नहीं कर पाता और ना ही पाकिस्तान के गृह मंत्रालय को उन उलेमाओ को धमकी देनी पड़ती जिन्होंने मलाला पर हमले के विरोध में तालिबानियों की इस कार्यवाही के खिलाफ सवाल उठाये थे और फ़तवा जारी किया था | इसे  आतंकी कट्टरपंथियों के आगे घुटने  टेकना ना कहें  तो और क्या कहें  ?  लेकिन जो भी हो इस पूरे वाकये में मलाला के जज्बे को सलाम करने की जरुरत है |  

Monday, 22 October 2012

" एक्शन" और "रोमांस " का यश ............







मशहूर फिल्म निर्माता और निर्देशक यश चोपड़ा  ने बीते रविवार को दुनिया को अलविदा कहा तो एक पल यकीन ही नहीं हुआ क्युकि अभी बीते २७ सितम्बर को उन्होंने सादगी के साथ अपनी जिन्दगी के ८० बसंत पूरे किये थे | लेकिन इस जिन्दगी का भी कोई भरोसा नहीं है |अपनी जिन्दगी के अंतिम पडाव पर यश चोपड़ा  भी डेंगू की चपेट में आ गए जिसके बाद उनको मुंबई के लीलावती अस्पताल में भर्ती कराया गया जहाँ उन्होंने आंखरी सांस ली और इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया |अपने पांच दशको के फ़िल्मी करियर में यश चोपड़ा ने जहाँ त्रिशूल ,सिलसिला , दीवार,  कभी कभी ,चांदनी, वीरजारा, जैसी सुपर डुपर फिल्मे बालीवुड को दी वहीँ दिल तो पागल है,दिल वाले दुल्हनिया ले जाएँगे जैसी फिल्मो के जरिए सिल्वर स्क्रीन पर  प्रेम और रोमांस का ऐसा ताना बाना बुना जिसे देश के युवा पीड़ी आज भी आज भी बड़ी साफगोई से याद करती है | असल में बालीवुड   बतौर डायेक्टर  के तौर पर जहाँ उन्हें धूल का फूल, वक्त, दीवार , काला पत्थर ,सिलसिला ,लम्हें , डर, दिल तो पागल है और उनकी रिलीज होने वाली आखरी  फिल्म जब तक है जान के जरिए याद करेगा वहीँ बतौर प्रोड्यूसर उनके काम को  दिल वाले दुल्हनिया ले जाएँगे , दिल तो पागल है, मोहोब्बतें ,साथिया, चक दे, रब ने बना दी जोड़ी, न्यूयार्क, बैंड, बाजा और बारात ,एक था टाइगर के जरिए पहचानेगा | 




पंजाब के लाहौर में जन्मे यश चोपड़ा इंजीनियरिंग के छात्र थे | पिता उन्हें पढ़ाई के लिए  लन्दन भेजना चाहते थे लेकिन उनका मन पढाई लिखाई में कम लगता था | अपने भाई बी आर चोपड़ा की तरह उन्हें भी फिल्मो से प्यार हो गया | माँ से आशीर्वाद लेकर मायानगरी मुंबई की ओर रुख किया | पहले आई एस जौहर  और फिर बाद में अपने भाई बी आर चोपड़ा के साथ बतौर  सहायक निर्देशक उन्होंने मुंबई में काम संभाला | शेरो शायरी से उन्हें बचपन से लगाव था | उस दौर में साहिर लुधयानवी बहुत बड़ा नाम होते थे | उनकी शायरियो ने यश चोपड़ा को भी खासा प्रभावित उस दौर  किया  और यह भी साहिर की तरह शायरियां गुनगुनाए बिना नहीं रह पाते थे | कहा जाता है उस दौर की प्रसिद्ध अभिनेत्री मीना कुमारी यश चोपड़ा से प्रभावित हुई और उन्होंने यश को हीरो बनने की सलाह दी लेकिन बैजन्तीमाला के निर्देशक बनने का सुझाव  उन्हें  भाया जिसके बाद उन्होंने निर्देशन की दुनिया में अपने  कदम  आगे बढाये  | १९५९ में यश ने पहली सफल फिल्म धुल का फूल बनाई हालाँकि उनकी पहली सफल फिल्म वक्त (१९६५) को माना जाता है | दाग से उन्होंने अपने खुद के यशराज बैनर की शुरुवात १९७३ में की | दाग में उन्होंने उस दौर के सुपर स्टार राजेश खन्ना को साथ लिया था लेकिन बाद में उन्होंने हिंदी सिनेमा को दो बड़े कलाकार दिए जो अमिताभ बच्चन ओर शाहरुख़ खान हुए | हालाँकि यश ने पचास के दशक  में अपना फ़िल्मी करियर शुरू किया था लेकिन वह उस दौर से हर दर्शक वर्ग की नब्ज पकड़ना जानते थे शायद यही कारण रहा वह अपने प्रशंसको को हर दौर में एक के बाद एक हिट फिल्में देते रहे | यही नहीं उन्होंने अपने दौर में हर तरह की कहानियो को परदे के कैनवास में उकेरकर अपने निर्देशन से नया रंग दिया जिसने हर वर्ग के तबके पर अपनी छाप छोड़ी | यश चोपड़ा ने बालीवुड की दीवार से एक ऐसा नायक देश को दिया जो कानून को चुनौती देते हुए खुले आम मेरा हाथ चोर है लेकर चला वहीँ त्रिशूल में "एंग्री यंग मैन" को साथ लेकर खून के ताने बाने पर आधारित ऐसा संसार रचा कि सिलसिला आते आते प्यार के त्रिकोण को रुपहले परदे पर उतारकर रोमांस की दुनिया में कदम रख दिया |


                        यश चोपड़ा को इसलिए भी याद किया जायेगा उन्होंने अपने निर्देशन में दो कलाकारों को बालीवुड में नई पहचान दी जिनमे अमिताभ के साथ शाहरुख़ खान  शामिल हैं | अमिताभ उस दौर में यश के करीब आये थे जब उनको कही काम नहीं मिल रहा था तब यश ने उनके करियर को नया सहारा दिया था जिसके बाद अमिताभ हिंदी फिल्मो के सुपर स्टार कहलाये | अमिताभ बच्चन   को दीवार के बाद एंग्री यंग मैन कहा गया | जंजीर में भी वह गुस्सैल मिजाज के हीरो के रूप में लोगो के सामने आये थे | बाद में यश चोपड़ा ने बिग बी के लिए काला पत्थर और सिलसिला बनाईजिसके बाद उनके कदम रोमांस की दुनिया में गए |  यश ने अमिताभ के बाद शाहरुख़  को परदे पर प्रोजेक्ट किया | सिरफिरे आशिक की कहानी "डर " के जरिए लोगो तक पहुंचाई और युवाओ के बीच  होने वाले  प्यार की असल तस्वीर   दिल वाले दुल्हनिया ले जायेगे, मोहोब्बते , वीर जारा के जरिए दिखाई तो देश के यंगिस्तान के बीच शाहरुख़  खान का जादू सर चढ़कर बोलने लगा | हाल ही में जब तक है जान के जरिए यश चोपड़ा  ने ८ साल बाद फिर से निर्देशन में अपने कदम रखे  जिसे उन्होंने अपनी जिन्दगी की आखरी फिल्म बताया जो इस साल दिवाली पर १३ नवंबर को पूरे देश में रिलीज होगी | 

                          हिंदी सिनेमा में यश चोपड़ा के योगदान को नहीं भुलाया जा सकता | सत्तर के दशक में उनके खोया पाया फोर्मुले की यादें  आज भी दर्शको के जेहन में हैं जिसे उन्होंने वक्त और सिलसिला के साथ आजमाया |  बाद में उनकी  मल्टी कास्ट वाली लीक  पर चलने का साहस मनमोहन देसाई ने किया जिसके बूते वह भी बालीवुड में राज करने लगे | यश चोपड़ा की फिल्मो की खासियत उनकी फिल्मो का मधुर संगीत था |  यश चोपड़ा की फिल्मो के गीत आज के दौर में भी प्रासंगिक और हिट रहे हैं | खाली पलों में उनको गुनगुनाने का अपना अलग एहसास है |दिवाली पर रिलीज होने वाली उनकी आखरी  फिल्म जब तक है जान का संगीत भी अभी से सहारा जाने लगा है | यश चोपड़ा की फिल्मो के गीत देश की हर पीड़ी आज भी बड़े चाव से गुनगुनाती है | एकान्त में इसे गुनगुनाने से दिल को सुकून मिलता है | ऐसा लगता है मानो यश चोपड़ा की फिल्में गीत ,संगीत के बल पर टिकी हैं | संगीत के बिना यश की  कोई उपयोगिता नहीं है | यश के सिलसिला से लेकर प्यार का डर और चांदनी  से लेकर कभी कभी और फिर दिल वाले दुल्हनिया ले जाएँगे से लेकर जब तक है जान तक का संगीत आज में देश के युवाओ को खूब भाता है तो इसके मायने एक्शन और रोमांस के पर्याय बने यश के कुशल निर्देशन से समझा समझा जा सकता है  |

 यश चोपड़ा ने अपने निर्देशन में तकरीबन २२ फिल्में बनाई और अपने कुशल निर्देशन से हिंदी सिनेमा को नई पहचान दिलाई | उनकी पहचान उस निर्देशक के तौर पर बालीवुड में है जो हर समय नया करने को उतावला रहता था | उनकी फिल्मो की रूमानियत दिल के तारो को झंकृत कर देती थी | इत्तेफाक  , दाग में उन्होंने राजेश खन्ना को नए अंदाज में जहाँ लोगो के बीच रखा वहीँ काला पत्थर में अमिताभ और शत्रुघ्न सिन्हा शॉट गन  की उस दौर में टक्कर कराई जब उनकी आपस में बोलचाल बिलकुल बंद थी | यही नहीं दीवार आते आते उन्होंने अमिताभ की एंग्री यंग मैन की नई छवि को लोगो के बीच  पेश किया | उस दौर में मेरे पास माँ है का डायलाग आज भी यादगार  और सदाबहार बना है | भारतीय सिनेमा को सही मायनों  में विदेशी धरती पर पहुचाने का श्रेय भी यश चोपड़ा को जाता है | उन्होंने ही पहली बार अपनी फिल्मो के  दृश्यों  को  स्विट्जर्लैंड  की  हसीन  वादियों में फिल्माया जहाँ हर फिल्म के गानों में कल कल करते झरने, बर्फ से ढकी  पहाड़ियां नजर आती थी | कहा जाता है उनके काम से प्रभावित होकर स्विट्जरलैंड  सरकार ने उन्हें सम्मानित किया और एक झील का नाम तो बाकायदा उन्ही  के नाम से रख दिया |  अपने अप्रीतम योगदान के  कारण यश चोपड़ा को दादा साहब फाल्के पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चूका है |
                                             
यश चोपड़ा को इसलिए भी याद किया जायेगा उन्होंने अपनी छत्रछाया में अमिताभ और शाहरुख़ खान जैसे कलाकारों को सुपर स्टार बनाया | जंजीर से अमिताभ को शोहरत  मिली लेकिन यश के निर्देशन में अमिताभ के अभिनय की असल पटकथा दीवार में लिखी जा चुकी थी जो सिलसिला आते आते सुपर हिट हो गई | यही नहीं डर के जरिए शाहरुख को सामने लाकर उन्होंने बालीवुड को अमिताभ के बाद अब तक का  सबसे बड़ा कलाकार हिंदी सिनेमा को दिया जिसकी कामयाबी का सफ़र दिल वाले दुल्हनिया ले जायेगे से लेकर  दिल तो पागल है ,वीरजारा तक जारी है और यह महज संयोग  ही है कि अपने रोमांस की खुशबू और   शाहरुख़ की रूमानियत से प्यार का एक नया पाठ अपनी   फिल्म जब तक है जान में पढ़ाते नजर आयेगे जो दिवाली के मौके पर रिलीज होने वाली उनकी आखरी  फिल्म होगी तो उनके प्रशंसक  एक्शन और रोमांस के यश को पहली बार मिस करेगे | जाहिर है ऐसे माहौल में दिवाली तो फीकी होगी ही लेकिन अपनों के खोने का गम उनके चाहने वाले करोडो प्रशंसको को सताता रहेगा |  सही मायनों में यश आप बहुत याद आओगे ........

Saturday, 6 October 2012

टिहरी उपचुनाव -- दाव पर दिग्गजों की प्रतिष्ठा






उत्तराखंड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा द्वारा खाली कराई गई  टिहरी संसदीय सीट के लिए होने जा रहा चुनाव दिलचस्प बनता  जा रहा है | जैसे जैसे मतदान की तिथि १० अक्तूबर पास आते जा रही है वैसे वैसे पूरे संसदीय इलाके में चुनाव प्रचार जोर पकड़ता जा रहा है | टिहरी संसदीय सीट पर कांग्रेस के टिकट पर विजय बहुगुणा के बेटे साकेत बहुगुणा पहली बार राजनीती के समर में अपना भाग्य आजमाने उतरे हैं | वही इस सीट पर भाजपा ने राजघराने की  बहू माला राजलक्ष्मी पर दाव लगाया है | टिहरी लोक सभा उपचुनाव उत्तराखंड में ऐसे समय में हो रहा है जब लोक सभा के आम चुनाव होने में बमुश्किल दो साल से भी कम का समय बचा है | ऊपर से कांग्रेस जिस तरीके से आर्थिक सुधारो की अपनी लीक पर सहयोगियों को धता बताकर फर्राटा भर रही है और जिस तरीके से इस मसले पर उसके सहयोगी लगातार उससे छिटकते जा रहे हैं उसने पहली बार मध्यावधि चुनावो की आशंका को बल प्रदान किया है | इन सबके बीच यह उपचुनाव निश्चित ही भाजपा और कांग्रेस सरीखे दोनों राष्ट्रीय दलों के लिए उत्तराखंड में अहम हो चला है क्युकि टिहरी उपचुनाव की बढ़त दोनों दलों के लिए आने वाले लोक सभा चुनावो में उनके मनोबल को सीधे प्रभावित करेगी | वैसे भी राज्य में कांग्रेस और भाजपा इन दोनों दलों के इर्द गिर्द ही राजनीती चलती आई है | २००९ के लोकसभा  चुनावो में कांग्रेस ने ५-० से भाजपा को करारी शिकस्त दी थी जिसके बाद राज्य के तत्कालीन सीएम बी सी खंडूरी की मुख्यमंत्री की कुर्सी चली गई थी | टिहरी लोक सभा चुनाव में उस समय विजय बहुगुणा ने भाजपा प्रत्याशी निशानेबाज जसपाल राणा  को धूल चटाई थी |  ऐसे में अब भाजपा के सामने टिहरी के इस उपचुनाव को जीतकर अपनी खोयी प्रतिष्ठा हासिल करने का सुनहरा अवसर है | 
                                        




वैसे  टिहरी लोक सभा उपचुनाव में मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने राज्य के कांग्रेसियों के भारी विरोध के बावजूद जहाँ अपने बेटे साकेत बहुगुणा पर दाव इस चुनाव के बहाने खेला है वहीँ भाजपा ने भी टिहरी उपचुनाव के बहाने टिहरी राजघराने की बहू माला राजलक्ष्मी शाह का नाम कांग्रेस प्रत्याशी घोषित होने से पहले प्रत्याशी चयन में कांग्रेस से बढ़त जरुर ले ली है  | टिहरी उपचुनाव में उत्तराखंड के दो राजनीतिक परिवारों की तीसरी पीड़ी की साख दांव पर लगी है जिसके सामने अपने राजनीतिक वजूद को तलाशने की एक बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है | मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के पुत्र साकेत बहुगुणा पहली बार राजनीतिक अखाड़े में अपनी किस्मत आजमाने उतरे है | साकेत बहुगुणा अपने " पर्वत पुत्र " दादा हेमवतीनंदन बहुगुणा के नाम के आसरे जहाँ टिहरी उपचुनाव की नैय्या पार लगने की उम्मीद पाले बैठे हैं तो वहीँ महारानी राजलक्ष्मी भी अपने ससुर राजा मानवेन्द्र शाह के नाम में अपनी जीत की सम्भावनाये तलाश रही हैं जिनकी ईमानदारी के किस्से आज भी टिहरी में सर चढ़कर बोलते हैं  जो  टिहरी संसदीय इलाके से रिकॉर्ड 8  बार  जीते  भी थे | 
       
                                      तकरीबन बारह लाख से ज्यादा वोटरों से  घिरी टिहरी लोक सभा सीट  उत्तराखंड के देहरादून, उत्तरकाशी, टिहरी जिलो तक फैली हुई है | इन सीटो पर भाजपा और कांग्रेस दोनों समय समय पर अपना दावा जताती आई हैं |  उत्तराखंड के हालिया विधानसभा चुनावो में १४ सीटो पर भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबला बराबरी पर जहाँ सिमटा है वही एक सीट निर्दलीय और एक यू के डी के पाले में गई |  गढ़वाल के इलाको में आज भी अधिकतर सीटो पर खंडूरी का जलवा कायम है | इसी के चलते भाजपा पहले बी सी खंडूरी को यहाँ से चुनाव लडाना चाह रही थी लेकिन खंडूरी द्वारा आलाकमान को राज्य की राजनीती में ज्यादा  दिलचस्पी के निर्णय से पहले ही अवगत करवा दिया गया था जिसके चलते पार्टी ने माला राजलक्ष्मी का नाम फ़ाइनल  करने में लम्बी मैराथन नहीं करनी पड़ी | वहीँ कांग्रेस में इस उपचुनाव के बहाने एक बार फिर गुटबाजी का असर देखने को मिला | केन्द्रीय मंत्री हरीश रावत जहाँ इस  उपचुनाव में अपने समर्थको को टिकट देने का मूड बना चुके थे वहीँ राज्य में कांग्रेस के प्रभारी चौधरी वीरेंद्र सिंह भी पहली बार इस मसले पर रावत के साथ खड़े दिखाई दिए | बाद में मुख्यमंत्री  विजय बहुगुणा ने दस जनपथ के अपने सम्पर्को का लाभ  उठाते हुए अपने बेटे साकेत बहुगुणा का नाम फ़ाइनल  करवाकर हरीश रावत सरीखे खांटी कांग्रेसी और उनके समर्थको को एक बार फिर से पटखनी दे दी | 



हरीश रावत कांग्रेस से किशोर उपाध्याय , हीरा सिंह बिष्ट, जसपाल राणा  और बहुगुणा सरकार में कैबिनेट  मंत्री प्रीतम सिंह के लिए अपने स्तर से लाबिंग करने में लगे हुए थे लेकिन कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष यशपाल आर्य , सांसद सतपाल महाराज के विजय बहुगुणा के साथ आने से साकेत बहुगुणा के नाम पर मुहर लगनी आसान हो गई | दस जनपथ के अपने सलाहकारों  के साथ अहमद पटेल ने भी  टिहरी उपचुनाव  के लिए  विजय बहुगुणा के बेटे साकेत को टिकट देने के लिए हामी भर दी जिससे साकेत बहुगुणा सब पर भारी पड़े और अंततः नए राजनीतिक माहौल के बीच टिहरी में हो रहे उपचुनाव के इस घमासान में कांग्रेस के सामने मुश्किलें इस दौर में ज्यादा हैं क्युकि राज्य की कांग्रेस सरकार का ६ साल का निराशाजनक  कार्यकाल, प्रमोशन में आरक्षण ,मूल निवास प्रमाण पत्र, आपदा का मुद्दा सत्तारूढ़  कांग्रेस के लिए भारी पड़ता दिखाई दे रहा है | वहीँ केंद्र सरकार द्वारा सब्सिडी ख़त्म करने, महंगाई, एफ डी आई जैसे मुद्दे भी टिहरी के आम वोटर को सीधे प्रभावित कर रहे हैं |   एफ डी आई के मसले पर पूरे भारत बंद का इस संसदीय सीट पर खासा असर हाल में देखने को मिला | वैसे भी उत्तराखंड में छोटे व्यापारियों की तादात ज्यादा है जो सबसे ज्यादा  मसूरी, देहरादून, उत्तरकाशी , टिहरी में अपना असर दिखा सकते  है |


जहाँ  गैस ,तेल की बड़ी कीमतों से संसदीय इलाके का आम वोटर परेशान  दिखता  है वही आपदा की  विभीषिका पर हीलाहवाली के भाजपा  द्वारा लगाये गए आरोप भी बहुगुणा सरकार की मुश्किलों को  बढ़ा सकते  हैं क्युकि इस चुनावी बेला में आपदा प्रभावितों की सुध लेने के बजाये सभी अपनी पूरी ताकत टिहरी चुनाव जीतने को लगाये हुए हैं | मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा स्टार प्रचारक बनकर हेलिकॉप्टरो में अपने तूफानी दौरे कर रहे हैं | आपदा प्रभावितों से उनका कोई सरोकार भी नहीं रहा शायद तभी वह प्रभावितों से  आपदा आई है तो भजन कीर्तन करो यह कहते हाल के दिनों में  देखे गए | वहीँ प्रमोशन में आरक्षण का मसला भी मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की गले की फाँस बना हुआ है | यह मुद्दा राज्य के हर वोटर को सबसे ज्यदा प्रभावित कर रहा है | खास तौर से कर्मचारियों में इसे लेकर खासा रोष देखा जा सकता है |

 बीते दिनों कर्मचारियों की लम्बी हड़ताल के बाद टिहरी उपचुनाव की अधिसूचना जारी होने के बाद विजय बहुगुणा ने जस्टिस इरशाद हुसैन की अध्यक्षता में कमेटी  बनाकर कुछ दिनों के लिए राहत की सांस जरुर ली है लेकिन दून  के सचिवालय , परेड ग्राउंड  से  निकली क्रमिक अनशन की चिंगारी पूरे प्रदेश को अपने आगोश में ले चुकी है|  संभावना है टिहरी उपचुनाव के संपन्न  होने के बाद आक्रोशित  कर्मचारी परेड  ग्राउंड से बहुगुणा सरकार के विरुद्ध फिर से कोई बड़ी हुंकार भरें |  इस समय  में टिहरी की चुनावी बेला सभी के लिए  टशन बढ़ाने  का काम कर रही है |   





भाजपा प्रत्याशी माला राजलक्ष्मी  तो इन मुददों के आसरे कांग्रेस की दुखती रग पर हाथ रखकर जनता के बीच कांग्रेस को कटघरे में खड़ा करने में कोई कसर नहीं छोड़ रही हैं | वह अपने ससुर राजा मानवेन्द्र शाह की साफगोई को भ्रष्टाचार विरोधी माहौल के बीच  भुनाने में लगी हैं | राजा मानवेन्द्र अपनी साफगोई के चलते टिहरी को  8 बार फतह करने में कामयाब हुए थे | केंद्र सरकार की नाकाम नीति, विजय बहुगुणा के खिलाफ बन रहे असंतोष , असंतुष्टो  की बढती संख्या भी इस उपचुनाव में अपना असर दिखा सकती है | शायद इसी के चलते मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने टिहरी  उपचुनाव को उनकी प्रतिष्ठा से जोड़ लिया है और वह खुद भी यहाँ से लगातार दो बार जीत दर्ज कर अपने पुत्र साकेत को     जीत दिलाकर "हैट्रिक" लगाने की फ़िराक में हैं | 

राजनीतिक विश्लेषको का आंकलन है कि पार्टी  हाईकमान के भरोसे में खरा उतरने की चुनोती इस समय बहुगुणा के सामने खड़ी है | वह भी ऐसे दौर में जब राज्य के सभी कांग्रेसी नेता राज्य की राजनीती में अपनी पारिवारिक विरासत को आगे बढाने के लिए  बैचैन खड़े हैं | संगठन और हरीश रावत सरीखे खांटी कांग्रेसी नेता को हाशिये पर धकेल कर विजय बहुगुणा साकेत के लिए तो टिकट ले आये लेकिन अगर इस चुनाव में साकेत का दाव नहीं चला तो खुद  मुख्यमंत्री  विजय बहुगुणा के खिलाफ राज्य में हरीश रावत के समर्थक अपना मोर्चा खोल  सकते हैं | ऐसे में विजय बहुगुणा की मुख्यमंत्री की कुर्सी खतरे में पड़  सकती है | शायद इसी के मद्देनजर विजय बहुगुणा ने टिहरी उपचुनाव में अपनी पूरी मशीनरी लगाई हुई है जहाँ हेलीकाप्टर के दौरों में  पानी की तरह पैसा बहाया  जा रहा है | यहाँ भी मुख्यमंत्री सितारगंज विधान सभा उपचुनाव की तरह अपने भरोसेमंद साथियो से चुनाव प्रचार करवा रहे हैं |  


मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के पूरे  परिवार का जोर  इस समय टिहरी चुनाव में अपनी प्रतिष्ठा बचाने में लगा हुआ है| मुख्यमंत्री बहुगुणा की बहन  यू पी की पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष रही रीता बहुगुणा जोशी भी इस समय चुनाव प्रचार में देखी जा सकती हैं |  हरीश रावत सरीखे जमीनी नेता और उनके समर्थक  इस दौर में एक बार उपचुनाव के बहाने हाशिये पर चले गए हैं |






 टिहरी उपचुनाव में सपा , बसपा ने इस बार भी सितारगंज विधान सभा उपचुनाव की भांति कांग्रेस प्रत्याशी साकेत बहुगुणा  को वाक ओवर दे दिया है |  बहुगुणा सरकार में शामिल यू के डी   (पी) की इस चुनाव में स्थिति सबसे असहज हो चली  है क्युकि उसके कोटे के कैबिनेट मंत्री प्रीतम सिंह पवार जहाँ चुनाव प्रचार में नदारद हैं वहीँ पार्टी के केन्द्रीय अध्यक्ष त्रिवेन्द्र सिंह पंवार चुनावी अखाड़े में अपनी ताकत दिखाने डटे हुए हैं जो  मुकाबले  को त्रिकोणीय संघर्ष में तब्दील  करने की आस में हैं | यू के डी ( पी ) के नेताओ में इस बात को लेकर टीस जरुर है  क़ि वह पिछले लोक सभा चुनाव में इस सीट से अस्सी हजार वोट लाकर अच्छी स्थिति में थी | इस लिहाज से बहुगुणा के बेटे के खिलाफ दम दिखाना स्वांग नहीं लग रहा | वैसे भी यू के डी  में उत्तराखंड के इस बार के विधान सभा चुनाव के दरमियान दो फाड़ हो चुका है और उस पर भाजपा और कांग्रेस के साथ सत्ता में सांठगाँठ करने के आरोप राज्य गठन के बाद से लगते रहे हैं | यह टिहरी उपचुनाव निश्चित ही उसकी ताकत का थोडा बहुत अहसास तो जरुर ही करवा सकता है | 

 बहरहाल जो भी हो कांग्रेस और भाजपा के दो राजपरिवारो की तीसरी पीड़ी उत्तराखंड के टिहरी उपचुनाव के बहाने अपने वजूद  को लेकर संघर्ष कर रही है | राज्य की कांग्रेस सरकार के लिए राहत की बात यह है क़ि चुनाव से ठीक पहले निशंक सरकार में कैबिनेट मंत्री  रहे मातबर सिंह कंडारी ने बीते दिनों भाजपा को अलविदा कहकर २१ सालो बाद कांग्रेस का दामन  थामा | उनकी वापसी बहुगुणा परिवार के लिए क्या गुल खिलाती है यह तो आने वाला समय ही बतायेगा ? लेकिन इस चुनावी  बिसात में  भाजपा प्रत्याशी रानी राजलक्ष्मी भी फिट बैठ रही है क्युकि उनके ससुर राजा मानवेन्द्र शाह का टिहरी में व्यापक प्रभाव आज भी कायम है | उनकी बहू रानी खुद नेपाली मूल की हैं और इस संसदीय इलाके कई तकरीबन पचास हजार से ज्यादा वोटर जीत के आंकड़ो को सीधे प्रभावित कर सकते हैं  और महिला प्रत्याशी होना भी उनके लिए फायदे का सौदा बनकर  उभर रहा है | इससे भाजपा के महिला आरक्षण के समर्थन को भी बल मिल रहा है | 

वैसे पूर्व में भाजपा ने नैनीताल संसदीय सीट से नब्बे के दशक में इला पन्त को आगे कर नया एक नया दाव खेला था| तब इला पन्त ने कांग्रेस के कद्दावर नेता और यू पी के मुख्यमंत्री रहे नारायण  दत्त तिवारी को हराकर सबको  चौका दिया था | क्या भाजपा यह इतिहास फिर राजलक्ष्मी के जरिये टिहरी में दोहरा रही है ? कह पाना मुश्किल है लेकिन रानी राजलक्ष्मी की सभाओ में उमड़ रही भारी भीड़ बहती हवा का थोडा बहुत अहसास  तो जरुर ही करवा  रही है  और इस चुनाव के बहाने भाजपा  के उत्तराखंड में तीन बड़े चेहरे खंडूरी, कोश्यारी और निशंक एकजुट होकर यह अहसास जरुर करवा रहे हैं कि भाजपा ने सितारगंज के हालिया उपचुनावों से कुछ सबक जरुर लिया है |  वैसे हमारी समझ से टिहरी के गलियारों में इस समय यह सवाल भी घुमड़ रहा है क़ि अगर विजय बहुगुणा यहाँ से अपने पुत्र साकेत बहुगुणा के बजाए अपनी पत्नी सुधा बहुगुणा या उनकी बहु गौरी बहुगुणा का दाव  खेलते तो मुकाबला बराबरी का हो सकता था | लेकिन क्या करें राजनीती की बिसात ही बड़ी अप्रत्याशित है  |  यहाँ असंभव से संभव होने में कुछ देर नहीं लगती | क्या टिहरी उपचुनाव इतिहास की एक नई इबारत लिखने जा रहा है ? देखना होगा आगे क्या होता है | तो इन्तजार करिए १३ अक्तूबर को होने वाली काउंटिंग  का.......................

Wednesday, 3 October 2012

आपदा से सहमा उत्तराखंड .................

"  इस साल अगस्त महीने की वो काली रात आज भी याद आती है जब हम रात का खाना खाकर सो ही रहे थे कि घरो के बाहर भीषण बरसात ने जनजीवन बुरी तरह प्रभावित कर दिया  | वैसे भी पहाड़ो  में बरसात के मौसम में दिन बड़े कष्टप्रद रहते हैं | रात एक बजते बजते भीषण जल प्रलय ने लोगों की जिन्दगी तबाह कर दी और प्रकृति का ऐसा कहर   टूटा कि आज भी वो काली याद का दर्दनाक          मंजर  मैं नहीं भूला हूँ | "       

                       उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में रहने वाले मान सिंह ने जब ४ अगस्त की सुबह का आँखों देखा मंजर मुझे बताया तो उसकी आँखों से आंसू  छलक आये |  किसी आपदा में अपनों के खोने का गम क्या होता है यह मान सिंह का दर्द बताने के लिए काफी है जिसने उस रात अपने आस  पास के कई गाँवों को तबाह होते देखा |  उत्तराखंड के लिए हर साल अगस्त, सितम्बर , अक्टूबर का महीना भयानक विनाश बरसाता  रहा है | यूँ तो इस इलाके में आपदाए सत्तर और अस्सी के दशक  के दौरान भी आई हैं लेकिन इस साल आपदा से हुई  तबाही का मंजर अन्य वर्षो से ज्यादा खतरनाक रहा है |  आज  आपदा की   भयावहता  इतनी भीषण है कि लोग अपने सगे सम्बन्धियों, रिश्तेदारों ,पड़ोसियों का पता नहीं लगा पा रहे जो आपदा के चलते जमीदोंज हो गए हैं | लोग इस हादसे को अभी भूले भी नहीं थे कि सितम्बर के मध्य में गढ़वाल मंडल के रुद्रप्रयाग जिले के उखीमठ और कुमाऊ मंडल के बागेश्वर जनपद में  कई  लोग बादल फटने की घटना के चलते काल के गाल में समा गए | उत्तराखंड की जो सुरम्य वादियाँ अपने नैसर्गिक सौन्दर्य के कारण देश दुनिया में जानी पहचानी जाती थी बादल फटने का कहर उन पर ऐसा टूटा कि दर्जनों गाँवों का नामोनिशान  ही मिट गया | बिजली ,पानी  , सड़क की  सुविधा बहाल  होना तो दूर आज चुन्नी, मंगली , किमाड़ा सरीखे  गाँव जो उखीमठ वाले इलाके में आते हैं ये कई साल पीछे चले गए मालूम पड़ते  हैं | रास्तो का नामोनिशान मिट चुका है | संचार तो बहुत दूर की गोटी है | हर तरफ सन्नाटा ही सन्नाटा पसरा है |  कभी यह गलियां शोर से सरोबार हो उठती थी लेकिन आज ये वीरान हैं क्युकि अपनों के खोने का गम आज भी यहाँ के लोगो को आज भी सताता है  




            उत्तरकाशी ,रुद्रप्रयाग,बागेश्वर  जिले की आपदाएं उत्तराखंड के लिए नई नहीं हैं  | १९७८ में जहाँ जीवनदायनी भागीरथी ने यहाँ कहर बरपाया था तो वहीँ १९८० में उत्तरकाशी के ज्ञानसू में बादल फटने से सैकड़ो लोगो की मृत्यु हो गई थी | १९९१ में उत्तरकाशी के भूकंप की यादें आज भी यहाँ के लोगो के जेहन में हैं जो  मन में सिहरन पैदा कर देती हैं |  राज्य गठन के बाद यहाँ पर आपदाओ के ग्राफ में तेजी से इजाफा हुआ |   २४ सितम्बर २००३ को वरुणावत पर्वत से रुक रुक कर हुए भूस्खलन ने  सैकड़ो लोगों की जिन्दगी को ग्रहण लगाया था | यही नहीं बीते दस बरस में राज्य के सीमान्त जनपद पिथौरागढ़  के  मुनस्यारी इलाके के  बरम, तल्ला जोहार , मल्ला जौहार, नामिक इलाको और बागेश्वर जनपद के कपकोट , सुमगढ़ में बादल फटने और भूस्खलन की कई घटनाएं हो चुकी हैं जो राज्य के लोगों के लिए कहर बनकर आई |

                प्राकृतिक आपदाओ की दृष्टि से संवेदनशील माने जाने वाले उत्तराखंड राज्य में बादल फटने , बाढ़, भूस्खलन ,भूकंप की घटनाये लगातार हो रही है लेकिन भयानक तबाही का मंजर  देखने के बाद भी यहाँ आपदा प्रबंधन नाम की कोई तैयारी शासन की ओर से नहीं की गई है | उत्तराखंड में इस साल प्राकृतिक  आपदा से जान माल का  व्यापक  नुकसान हुआ  है | उखीमठ में बादल फटने का कहर जहाँ ६ गाँवों में बादल फटने से टूटा वहीँ आपदा से सबसे ज्यादा प्रभावित जिलो में रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी, बागेश्वर और पिथौरागढ़   जनपद रहे | सरकारी आंकड़ो पर अगर गौर फरमाए तो आपदाओ से इस साल तकरीबन ४० हक्टेयर कृषि योग्य भूमि 
को  नुकसान पंहुचा साथ ही ३०० से ज्यादा मोटर  मार्ग और दर्जनों पैदल मार्ग जिनमे लोगो की आवाजाही होती थी बुरी तरह से प्रभावित हुए हैं | बीते ६ बरस में सरकारी आंकड़ो में जहाँ २०७ हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि प्रभावित बताई जा रही है वहीँ २२ हजार के आस पास मकान इस दौर में जमींदोज हो गए |
                                             
                                          बेहद संवेदनशील माने जाने वाले उत्तराखंड में इन आपदाओ से मुकाबले के लिए अलग से आपदा प्रबंधन मंत्रालय गठित किया जा चुका है परन्तु राज्य गठन के बाद से आज तक इसका नतीजा सिफर ही रहा है | हर साल इसका प्रबंधन फेल रहता है | यह तभी हरकत में आता है जब आपदा घट जाती है और बचाव कार्य शुरू होते हैं | इस साल भी सूबे में आपदा राहत  के  नाम  पर हवा हवाई काम हो रहे हैं | सत्ता पक्ष और विपक्ष के लोग आपदा राहत  के नाम पर भी अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने में ही लगे हुए हैं | आपदा 
राहत  के नाम पर जमकर धन की बंदरबाट भी हो रही है  |  आपदा से प्रभावित  इलाको की  जमीनी सच्चाई से उत्तराखंड के राजनेताओ का कोई सरोकार नहीं रहा  है | आपदा की इस संकट घडी में गिले शिकवे भुलाने के बजाय वह एक दुसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाने से बाज नहीं आ रहे हैं | दिल्ली से पैराशूट मुख्यमंत्री के रूप में उतारे गए विजय बहुगुणा आपदा की इस  घडी में जहाँ हवाई दौरे कर  लोगो का उपहास आपदा आई है तो भजन कीर्तन करो कहकर उडा रहे हैं वहीँ आपदा प्रभावित ज्यादातर इलाको में कांग्रेस और भाजपा का कोई   प्रतिनिधि नहीं पंहुचा है | आपदाओ से मुकाबला करने के लिए कोई बड़ी कार्ययोजना तैयार करने के बजाय सारी नौकरशाही  सरकारी आंकड़ो की फर्जी बाजीगिरी  और केंद्र  सरकार से पत्र व्यवहार करने में ही लगी हुई है | आज भी असलियत यह है कि आपदा से प्रभावित इलाको में सरकारी तंत्र की पोल खुल रही है | लोगो को तो दो समय का भोजन,पानी भी  ठीक से नहीं मिल पा रहा है |   

                                                         सरकारी आंकड़ो के लिहाज से उत्तराखंड के २३३ गाँव विस्थापन के मुहाने पर खड़े हैं | इनका विस्थापन  किया जाना जरुरी है लेकिन आज तक राज्य की दोनों सरकारें इस दिशा में कोई ठोस पहल नहीं कर पाई | ऐसे सबसे अधिक ७१ गाँव जहाँ पिथौरागढ़ जिले में हैं वहीँ चमोली में ४२ तो बागेश्वर में भी ४२ हैं |  अब उखीमठ ,भागीरथी 
घाटी , सुमगढ़ जैसे इलाके भी इसमें शामिल हो गए हैं | ऐसे इलाको में अधिकांश इलाके नगरीय इलाको से सटे हुए हैं जिसके चलते शासन प्रशासन के सामने मुश्किलों का पहाड़ ही खड़ा हो गया है | सरकारे इन इलाको में पुनर्वास के नाम पर मोटे बजट के खर्च होने का रोना रोती  रहती हैं | इन २३३ गाँवों में से अभी तक बमुश्किल १०० गाँवों का ही सर्वे हो पाया है | पुनर्वास तो बहुत दूर की  गोटी है |  राज्य का आपदा प्रबंधन विभाग किस कछुआ चाल से चल रहा है यह इस बात से पता लगता है कि आज तक किसी भी गाँव का पुनर्वास नहीं हो पाया है | तत्कालीन भाजपा सरकार ने जहाँ विस्थापन नीति को अपने शासन में अमली जामा पहनाया वहीँ कांग्रेस सरकार आने के बाद इसकी रफ़्तार थम सी गई है | मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा  का पूरा जोर भाजपा के कार्यकाल में शुरू की गई योजनाओ के नाम बदलने में लगा हुआ है  जिसको उन्होंने बाकायदा शुरू भी कर दिया है | विस्थापन  के मसले पर मौजूदा सरकार  केंद्र सरकार  की ओर ताक़ रही है | उसका कहना है केंद्र सरकार से मोटे पैकेज की  मांग की जा रही है |

                            उत्तराखंड में प्राकृतिक आपदाए लगातार बढ़ रही हैं  | भूगर्भीय दृष्टि से यहाँ के पहाड़ मौजूदा दौर में बेहद कमजोर हो चले हैं जिनका बरसात में दरकना आम बात हो चुकी है | लगातार बढ रही आबादी ने पहाड़ के प्राकृतिक असंतुलन को बढ़ाने का काम हाल के वर्षो में किया है | जहाँ  वनों के कटान पर अंकुश नहीं लग पाया वहीँ माफियाओ, नौकरशाहों ओर राजनेताओ के कॉकटेल  ने पहाड़ो को खोखला  कर दिया है | राज्य बनने के बाद यहाँ रिजोर्ट , खनन, बाँध बनाने का कारोबार खूब फला फूला है  | अवैध खनन के इस कारोबार ने जहाँ पहाड़ की सुन्दरता पर ग्रहण लगाया वहीँ माफियाओ की भी खूब चांदी हुई है क्युकि प्रशासन माफियाओ के आगे नतमस्तक रहता है |   इस दरमियान  पर्यावरणीय  मानको   की जहाँ लगतार अनदेखी अपने पहाड़ो में हो रही है वहीँ धड़ल्ले से एन ओं सी प्राप्त करने का धंधा चल पड़ा है | राज्य के तराई इलाको में स्टोन क्रेशर बड़ी आबादी वाले स्थानों में चल रहे है जिनमे तमाम मानको की अनदेखी हुई है | दुर्भाग्य है जनता के हितो की बात करने वाले सामाजिक संगठन  जो कभी जल , जमीन , जंगल का सवाल अपने आंदोलनों के जरिये उठाते थे  वह आज पहाड़ो को बचाने के मसलो पर अपना मुह नहीं खोल रहे | इसका बेहतर नमूना भाजपा शासन के कार्यकाल में कई हाइड्रो  परियोजनाए हैं जिन पर निशंक के राज में कई समाजसेवियों , आन्दोलनकारी संगठनो के दबाव में रोक लग गई थी | आज  दिल्ली से पैराशूट मुख्यमत्री के रूप में उतारे गए विजय  बहुगुणा ने कॉरपरेट  लाबी के दबाव में उनको फिर से शुरू करने का ऐलान एक झटके में कर दिया तो यह सारे समाजसेवी और आन्दोलनकारी ख़ामोशी की चादर ओड़ लिए है |  राज्य की कृषि योग्य भूमि आने पौने दामो पर बेचीं जा रही है | यह स्थिति तब है जब  भूगर्भ विज्ञानी मान चुके हैं  कि उत्तराखंड के सैकड़ो गाँव आज आपदा के बड़े  ढेर में बैठे हैं |  
                    
                    हाल में आई  प्राकृतिक आपदा ने बता दिया है कि राज्य में आज पानी कितना सर से उपर बह चुका है | पहाड़ो का मौसम चक्र तो गड़बड़ा ही चुका है साथ ही  यहाँ  की पारिस्थिकी  भी नाजुक दौर में है | अगर समय रहते इस दिशा में कारगर प्रयास नहीं किये गए तो इसकी कीमत पहाड़ वासियों को किसी भी बड़े हादसे के रूप में चुकानी पड़  सकती है | आपदा के बाद आज उत्तराखंड में राहत कार्य के नाम पर केवल राजनीती हो रही है और प्रभावित स्थल नेताओ के लिए पिकनिक स्पॉट बन गए हैं  | ऐसे में प्रभावितों को कितनी मदद मिलेगी या मिल रही है इसका अनुमान लगाना  आसान  है | राज्य के नेताओ का आज पहाड़ से कोई सरोकार भी नहीं रहा | अधिकांश विधायक या मंत्री राजधानी देहरादून में डटे रहते है | अपने विधान सभा इलाको से वह दूर हो रहे हैं | वहीँ राज्य के पैराशूट सी ऍम विजय बहुगुणा का भी बीता ६ महीने का समय दिल्ली में पार्टी से जुड़े मसले सुलझाने में ही बीता है |  कुछ कर गुजरने की तमन्ना जिस खंडूरी सरीखे शासक में है उसे निशंक सरीखे लोग भीतर घात से हरा देते हैं | चुनाव निपटने के बाद भी भीतरघातियो पर कार्यवाही तक नहीं होती 
जो   बतलाता है स्थितिया इस दौर में कितनी बेकाबू हो गई हैं | नौकरशाही  , माफिया खंडूरी के राज में खौफ खाते थे जिसके चलते उत्तराखंड में विकास कार्य कभी उतना प्रभावित नहीं हुए जितना बहुगुणा के शासन में हो रहे हैं | मुख्यमंत्री बहुगुणा   की सारी कवायद अपनी कुर्सी बचाने में लगी हुई है क्युकि उनकी पार्टी के नेता, विधायक उनकी नाक में दम किये   हुए है | ऐसे में विकास कार्य सीधे प्रभावित हो रहे हैं क्युकि नौकरशाहों पर मुख्यमंत्री का कोई नियंत्रण नहीं रहा | खुद मुख्यमंत्री बहुगुणा जज के अपने अन्तर्मुखी आवरण से बाहर  नहीं निकल पा रहे है  | ऐसे में समझा जा सकता है उत्तराखंड किस राह में जा रहा है  ?
 
                        सरकार अगर ईमानदारी से आपदा के मुकाबले के लिए कोई कारगर योजना तैयार करती है तो उत्तराखंड में बहुत कुछ हो सकता है| राहत कार्यो में तेजी आ सकती है |लेकिन इसे राज्य का दुर्भाग्य ही कहेंगे यह राज्य अब नौकरशाहों , राजनेताओ , माफियाओ की अवैध कमाई का अड्डा बन चुका है | जिन लोगो  के मन में उत्तराखंड को अलग राज्य बनाने को लेकर कोई पीड़ा नहीं थी उनके नुमाइंदे आज शासन कर रहे है | इन दिनों राज्य में केंद्र सरकार से राहत पैकेज  मांगने का नया चलन चल रहा है | केंद्र में  कांग्रेस की सरकार होने के बाद भी विजय बहुगुणा  आपदा राहत के नाम पर कोई बहुत बड़ा पैकेज राज्य के लिए नहीं ला सके हैं | अपने घर में डिजास्टर मैनेजमेंट खुद 
फेल  हो रहा है | आपदा के नाम पर केंद्र से पैसा मांगने से नेताओ की राजनीती तो चमक सकती है लेकिन मान सिंह सरीखे लोगो का दर्द हवाई दौरों से नहीं समझा जा सकता जिसने अपनी आँखों के सामने कई परिवारों को उजड़ते देखा है | लेकिन क्या किया जाए जब मौजूदा दौर में हर व्यवस्था भ्रष्टाचार और लूट खसोट की पोषक बन चुकी है | ऐसे में जनता बेहाल होकर अगर किसी तारणहार को ना ताके तो और करे भी क्या क्युकि नेताओ की सारी बिसात  तो राजनीती और अपनी कुर्सी बचाने ,चमकाने और आरोप प्रत्यारोप पर ही  टिक गई है | ऐसे में उत्तराखंड की  आपदा राहत  की लकीर भी भला  इससे अछूती कैसे रह सकती है ?


Friday, 28 September 2012

व्हाइट हाउस की दिलचस्प जंग......................



  अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव की जंग इन दिनों परवान पर है | ४५ वे राष्ट्रपति चुनाव में ओबामा ने दुबारा राष्ट्रपति बनने के लिए अपनी सारी उर्जा चुनाव प्रचार पर केन्द्रित कर दी है वहीँ मिट रोमनी को उनका एक बड़ा प्रतिद्वंदी माना जा रहा है | इस साल के अंत में होने जा रहे चुनाव में जहाँ ओबामा के सामने लगातार दूसरी बार जीत दर्ज करने की चुनौती खड़ी है वहीँ  रिपब्लिकन उम्मीदवार मिट रोमनी डेमोक्रेट्स को हराने के लिए अपनी पूरी ताकत इस चुनाव में लगा रहे हैं | जहाँ ओबामा अपने चार साल के कार्यकाल का रिपोर्ट कार्ड जनता के बीच ले जाकर अपनी उपलब्धियो का बखान कर रहे हैं वहीँ मिट रोमनी ओबामा की नाकाम नीतियों को कटघरे में खड़ा करके उन्हें कड़ी चुनोती दे रहे हैं |


                     बीते दिनों विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन और उनके पति बिल क्लिंटन के साथ सीनेटर जान  कैरी ने ओबामा के पक्ष में झुकाव  दिखाते हुए अमेरिकी जनता से उन्हें दुबारा राष्ट्रपति चुने जाने की अपील की वहीँ लुसियाना के गवर्नर बाबी  जिंदल ने ओबामा की नीतियों पर सीधा वार करते हुए कहा कि पिछले चार साल में ओबामा की लोकप्रियता का ग्राफ घटा है और चुनाव से पूर्व उनके  द्वारा किये गए वादे  भी पूरे नहीं हुए हैं लिहाजा अमेरिकी नीतियों के मामले में भारी अव्यवस्था देखने को मिली है | इसके बचाव में पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने कहा कि इसके लिए ओबामा दोषी नहीं हैं | उन्होंने कहा कि ओबामा को ख़राब अर्थव्यवस्था विरासत में मिली थी अतः जनता उन्हें दुबारा मौका दे जिससे अमेरिका का पुराना वैभव फिर से वापस आ सके |  यह दोनों बयान इस बात को बताने के लिए काफी हैं कि इस बार के राष्ट्रपति चुनाव में अमेरिकी अर्थव्यवस्था  के इर्द गिर्द पूरी चुनावी कम्पैनिंग घूमेगी |  आर्थिक नीतियों की यही दुखती रग है जो ओबामा की सबसे बड़ी मुश्किल इस दौर में हो चली है क्युकि चार साल पहले जिन उम्मीदों के साथ अमेरिकी जनता ने उन्हें राष्ट्रपति चुना था वह उम्मीदें बिगड़ी अर्थव्यवस्था के चलते धराशाई  हो गई हैं |  ऐसे में ओबामा के सामने जनता तक अपनी बात सही रूप में पहुचाने की बड़ी चुनोती सामने है | अमेरिकी आर्थिक नीतियां जहाँ इस दौर में पटरी से उतरी दिखी वहीँ संघीय खर्चो पर बीते चार बरस में पहली बार नकेल कसी हुई दिखी  जिसकी सीधी मार विकास दर पर पड़ी | यही नहीं अमेरिका में बेरोजगारी के लगातार बढ रहे आंकड़ो ने भी  हाल के वर्षो में ओबामा के सामने मुश्किलों का पहाड़ खड़ा किया है क्युकि वहां के  फेडरल  रिजर्व के चेयरमेन बेन बर्नान्क ने खुद बेरोजगारी के बढ़ते  आंकड़ो पर चिंता जताई है | जून जुलाई में ब्यूरो ऑफ़ लेबर स्टेटिक्स द्वारा बताये गए आंकड़े भी भयावहता की तस्वीर आँखों के सामने पेश करते हैं | इसको अगर आधार बनाये तो २००९ में आर्थिक मंदी आने के बाद से अमेरिका में रोजगार के अवसर लगातार घट रहे हैं | अमेरिका का राष्ट्रपति चुने जाते समय ओबामा के कार्यकाल में जहाँ १४.३ फीसदी बेरोजगारों की तादात थी वहीँ २०१० में यह बढकर १४.८ फीसदी तक जा पहुची |  आज यह आंकड़ा १५ फीसदी पार कर चुका है जो यह बताता है की अमरीका में हालात कितने बेकाबू हो गए हैं |  
                           

   नए राष्ट्रपति चुनाव में भी अर्थव्यवस्था  की छाप साफतौर से दिखाई दे रही है | वोटरों को रिझाने के लिए दोनों प्रत्याशी अपना सारा जोर अर्थव्यवस्था सुधारे जाने पर दे रहे हैं क्युकि बेरोजगारी, विकास दर भी सीधे इससे प्रभावित होते हैं | डेमोक्रेट्स ने जहाँ बीते चार बरस में इससे मुकाबले के लिए कोई बड़ी कार्ययोजना तैयार नहीं की वहीँ अब वह यह कह रहे हैं कि सत्ता में वापसी के बाद अमीरों के खर्चो में कटौती कर लगाकर की जाएगी | साथ ही उत्पाद पर कर कम किया जाएगा जिससे खर्च कम करने की कार्ययोजना को अमली जामा पहनाया जा सकेगा | वहीं रिपब्लिको ने सरकारी खर्चो पर सीधे कटौतियो  की बात कही है | २०१२ की पहली तिमाही में अमेरिकी जीडीपी में १.७ फीसदी की बढोत्तरी दर्ज की गई | हाल ही में हुए चुनावी सर्वे में अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा अपने रिपब्लिकन प्रतिद्वंदी मिट रोमनी पर बदत बनाये हुए देखे जा सकते हैं | रायशुमारी और सर्वे करने वाली संस्था गेलाप के अनुसार ५ में से ४ लोग अमरीकी मौजूदा आर्थव्यवस्था की हालत से  संतुष्ट नहीं हैं | वोटर राष्ट्रपति किसे चुनेगा इसको लेकर भी कोई साफ़ लकीर नहीं खींच रहे हैं | मगर इतना जरुर है कि अर्थव्यवस्था इस चुनाव में सबसे बड़ा मुद्दा जरुर है | साथ ही घटते रोजगार के अवसर भी चुनाव प्रचार को सीधा प्रभावित कर रहे हैं | शायद ओबामा के पिटारे में इसके मुकाबले के लिए कई योजनायें हैं जिनमे वह ज्यादा कमाई करने वाले लोगो के टैक्स को बढ़ाकर ३९ फीसदी करने की बात कह रहे हैं |  इसी साल यूरोप के साथ भी एक  मुक्त व्यापार समझोता होने की उम्मीद उन्हें है जो ओबामा की साख को बदने का काम करेगी | उनके प्रतिद्वंदी रोमनी भी अर्थव्यवस्था  को पटरी पर लाने के लिए अपना रिपब्लिक फ़ॉर्मूला सुझा रहे हैं जिसमे अमीर लोगो को और कम टेक्स चुकाना पड़ेगा | २०१६ तक वह संघीय खर्चो में ५०० अरब डॉलर की कटौती कर लेंगे जिससे सरकारी व्यय घटकर २० फीसदी हो जाएगा |

 भारतीय मूल की निक्की हेली और बाबी  जिंदल रोमानी के पक्ष में खुलकर प्रचार अभियान चलाये हुए हैं | वहीँ इस चुनाव में ओबामा ने अपना एजेंडा साफ़ करते हुए कहा है रोजगार के अवसर ज्यादा बढ़ाना उनकी पहली प्राथमिकता रहेगी | एफ डी आई के द्वार भारत द्वारा खोले जाने को कई राजनीतिक विश्लेषक इसी नजर से देख रहे  हैं | जहाँ तक हाल के वर्षो में ओबामा की विदेश नीति का सवाल है तो इस मोर्चे पर पहली बार ओबामा ने नई लीक पर चलने का साहस  दिखाया है | वह ऐसे पहले राष्ट्रपति हैं जिसने मुस्लिम राष्ट्रों का दौरा कर उनके साथ बीते दौर के गिले शिकवे भुलाकर एक नई  पारी की शुरुवात कर जताया  है कि अमरीका सभी देशो के साथ शांतिपूर्ण सहअस्तित्व कायम करने की अपनी नीति का पक्षधर रहा है | यही नहीं अपने धुर विरोधी चीन, रूस की यात्रा द्वारा ओबामा ने यह जताया है कि वह बदलते दौर  के मद्देनजर खुद को बदलने के लिए बेकरार खड़ा है | दुनिया के सभी देश बदल रहे हैं अतः उसे भी बदलना होगा नहीं तो यूरोप की तरह वह भी अर्श से फर्श पर आ सकता है | 
                    

अपने चार साल के कार्यकाल में ओबामा ने जहाँ ग्वांतानामो बे को बंद करने की बात दोहराई थी वहीँ उन्होंने २०१२ तक ईराक और अफगानिस्तान से सैनिको की वापसी का वादा सत्ता सँभालते समय किया था | इन दोनों वादों में वह खरा नहीं उतर पाए | वहीँ उनकी सबसे बड़ी कामयाबी आतंकवादियों के विरुद्ध कड़े रुख को दिखाने की  रही जिसमे  ओसामा बिन लादेन को पहली बार "ओपरेशन जेरोनेमो" के तहत मिली कामयाबी रही | उनके प्रतिद्वंदी रिपब्लिकन जहाँ ८ साल में ओसामा का ठिकाना नहीं खोज पाए वह काम उन्होंने दो साल के भीतर करके दिखाया | अगर अब ओबामा फिर से सत्ता में आते हैं तो इराक और अफगानिस्तान से अमरीकी सैनिको  की वापसी २०१४ में हो सकती है | ओबामा ने खुद इसके लिए डेड लाइन तय की है | यह सभी ऐसे मुद्दे हैं जिन पर ओबामा रोमनी पर भारी पड़ते नजर आ रहे हैं | वही उनके प्रतिद्वंदी रोमनी की चिंता इन दिनों हो रहे चुनावी सर्वे ने बढ़ा रखी है | गेलाप और ब्लूमबर्ग द्वारा हाल में किये गए सर्वे में ओबामा रोमनी  से ६ अंक आगे हैं | यही नहीं नेशनल जर्नल चुनावी सर्वे में ओबामा को ७ अंको की बदत मिली है जिसे ओबामा की जीत की राह में अच्छा संकेत माना जा रहा है |

                   इस चुनाव पर पूरी दुनिया के साथ भारत की नजरें भी लगी हुई हैं | अगर ओबामा ने भारत को एशिया  में बड़ा साझीदार माना है तो वहीँ रिपब्लिकन भी इस सच को नहीं झुठला सकते क्युकि बुश के कार्यकाल में ही पहली बार भारत और अमरीका की दोस्ती वाजपेयी के दौर में ही परवान चदी थी | उस दौर में न्यूक्लियर डील को अंजाम दिया गया था जो आज मनमोहनी इकोनोमिक्स कि छाँव  तले आर्थिक सुधारो यानी  एफ डी आई तक आगे बढ़ चुकी है | यकीन जानिए आज के दौर में अगर अमेरीका की  सबसे बड़ी जरुरत भारत है क्युकि वह आज एशिया की उभरती ताकत है शायद इसी के चलते वहां के दोनों दल आज भारत को उसका एक बड़ा साझीदार मानने से गुरेज नहीं करते | फिलहाल व्हाइट हाउस की जंग इस साल अपने दिलचस्प मोड़ में खड़ी है | बड़ा सवाल यही से खड़ा होता है क्या ओबामा का जादू  इस साल फिर वहां चलेगा ? कह पाना मुश्किल जरुर है लेकिन ओबामा रोमनी पर भारी पड़ रहे है | आगे क्या होगा कह पाना मुश्किल  है क्युकि चुनाव में ऊट किसी भी करवट बैठ सकता है | तो इन्तजार कीजिये ६ नवम्बर का ...........

Monday, 17 September 2012

नेताजी चले पीऍम बनने ...................



दिल्ली का रास्ता यूपी  से होकर गुजरता है ।  भारतीय राजनीती के  सन्दर्भ  में यह कथन परोक्ष रूप से फिट बैठता है।  लखनऊ से दूर कोलकाता  में ममता के आँगन में मुलायम सिंह जब अपनी राष्ट्रीय कार्यकारणी के अधिवेशन के दौरान अपना भाषण पढ़ रहे थे तो उनकी नजरें  भारतीय राजनीती की इस ऐतिहासिक इबारत की ओर भी जा रही थी । शायद इसलिए मुलायम सिंह ने लोक सभा चुनावो की डुगडुगी  समय से पहले बजने  और कार्यकर्ताओ को तैयार  रहने की सलाह इशारो इशारो में दे डाली। इस राष्ट्रीय कार्यकारणी की बैठक  में नेताजी की पीऍम बनने की हसरतें भी हिलारें मार रही थी शायद तभी आत्मविश्वास से लबरेज मुलायम ने दावा कर डाला केंद्र में अगली सरकार बिना सपा के समर्थन मिले बिना नहीं बन पाएगी। मुलायम सिंह का साफ़ मानना है  अगले लोकसभा चुनाव में भाजपा और कांग्रेस दोनों में से किसी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलेगा और केंद्र में सरकार बनाने में छेत्रीय दलों की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका होगी । इसकी तासीर भाजपा  नेता लाल कृष्ण आडवानी के 5 अगस्त को लिखे ब्लॉग से भी देखी  जा सकती है जिसमे उन्होंने कांग्रेस और भाजपा दोनों में से किसी को स्पष्ट बहुमत न मिलने का अंदेशा जताया था। लेकिन अब नेताजी  के कार्यकर्ता आडवानी के इसी ब्लॉग में तीसरे मोर्चे की सम्भावनाये तलाश रहे हैं और नेताजी को पीऍम इन वेटिंग की राह पर  लाने  की दिशा में मनोयोग से जुट गए हैं।
     
                    दरअसल कोलकाता की राष्ट्रीय कार्यकारणी के समापन के बाद मुलायम सिंह ने जिस तरीके के तल्ख़ तेवर दिखाए हैं उसने पहली बार कांग्रेस को "बैक फुट " पर आने को मजबूर कर दिया है। नहीं तो यूपीए 1 की न्यूक्लिअर डील से लेकर यूपीए 2  के हर संकट में मुलायम सिंह कांग्रेस के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर  खड़े रहे।  फिर चाहे वह राष्ट्रपति चुनावो के दौरान ममता बनर्जी को गच्चा देकर  कांग्रेस प्रत्याशी प्रणव मुखर्जी को समर्थन देने का मामला हो या हर संकट के समय सरकार को बाहर  से समर्थन देकर यूपीए में अपनी ठसक  दिखाने  का मामला मुलायम 2004 से अब तक हर बार कांग्रेस के साथ खड़े रहे हैं। शायद इसी वजह से नेताजी कांग्रेस के हर जश्न में सोनिया और मनमोहन के साथ खड़े दिखे हैं ।

                    लेकिन राजनीती संभावनाओ का खेल है और यहाँ  महत्वाकांशाए हिलारे मारती रहती है। मुलायम के साथ भी यही हो रहा है । यह पहला मौका है जब कांग्रेस के साथ दूरी बनाने की मुलायम सिंह ने ठानी है  क्युकि  जिस तरीके से यूपीए सरकार के कार्यकाल में एक के बाद एक घोटाले सामने आ रहे है उसके छींटे सपा पर पड़ने लाजमी हैं इसलिए सपा का कांग्रेस से दूरी बनाकर चलना ही मौजूदा दौर में सबसे बेहतर विकल्प दिख रहा है ।  इसी विकल्प के आसरे वह गैर कांग्रेसी और गैर भाजपाई दलों को अपने पाले में लामबंद कर 2014 की चुनावी बिसात बिछाने में लग गई है। असल में मुलायम के कांग्रेस के प्रति कुछ ज्यादा ही तल्ख़ तेवर हो गए हैं क्युकि  कांग्रेस लगातार भ्रष्टाचार के कीचड में धसती  जा रही है और आम आदमी से उसका वैसा सरोकार भी नहीं रहा जो पुराने दौर में हुआ करता था। यही नहीं महंगाई से लेकर  भ्रष्टाचार पर नकेल कसने में वह पूरी तरह विफल साबित हो रही है और कॉरपरेट पर ज्यादा मेहरबानी  इस दौर में दिखा  रही है। आम आदमी और अपने देश के व्यापारियों की कमर तोड़ने  के बाद अब कांग्रेस ने खुदरा व्यापार में  एफडीआई के दरवाजे  खोल दिए हैं जिसकी सीधी  मार अपने देश के 22 करोड़ से भी ज्यादा व्यापारियों पर पड़ेगी जो उनके पेट  पर लात मारने जैसा है । फिर वालमार्ट सरीखी कम्पनियों का विश्व के अन्य देशो में अनुभव भी सबके सामने है । रही सही कसर  सरकार  ने घरेलू गैस पर सब्सिडी खत्म  कर पूरी कर दी है। इससे जनता में कांग्रेस सरकार के प्रति गुस्सा बढ़ने  लगा है  क्युकि  आम   आदमी का सेंसेक्स से कुछ भी लेना देना नही है। उसके लिए रोटी,कपड़ा ,मकान सबसे अहम है।

 मुलायम ही नहीं उनकी पार्टी से जुडा  हर छोटा और बड़ा नेता, कार्यकर्ता  अब यह मान रहा है जल्द से जल्द कांग्रेस को निपटाना जरुरी होगा अन्यथा नेताजी के पीऍम बनने  के सपनो को पंख नहीं लग पाएँगे। इसी कवायद के तहत सपा ने बीते दिनों संसद के मानसून सत्र के अंतिम दिनों में "कोलगेट" पर वामपंथी और टीडीपी को साथ लेकर धरना दिया। सपा प्रमुख  मुलायम के भाई रामगोपाल यादव ने तो तत्कालीन कोयला मंत्री प्रकाश  जायसवाल की भूमिका पर पहली बार सवाल उठाकर कांग्रेस पार्टी को "बैक गेयर" पर चलने को मजबूर कर दिया है । मजबूरन प्रकाश जायसवाल को मनोज जायसवाल से अपने रिश्ते स्वीकारने पड़े हैं। हालाँकि कोलगेट  पर सफाई देते हुए प्रकाश जायसवाल का  कहना है अगर उनके खिलाफ लगे आरोप सही साबित होते हैं तो वह राजनीती  से सन्यास ले लेंगे । यही नहीं मुश्किलों में घिरी कांग्रेस के खिलाफ आक्रमकता दिखाते हुए सपा महासचिव मोहन सिंह ने तो पहली बार राहुल गाँधी की कार्यछमता पर सवाल उठाकर उन्हें पीऍम  पद के लिए अयोग्य करार दे दिया है ।  कांग्रेस से दूरी बनाने की दिशा में इसे एक बड़ा कदम माना जा रहा है क्युकि  बिना गाँधी परिवार के  "औरे" का गुणगान किये बिना कोई भी दल कांग्रेस से इस दौर में निकटता नहीं बड़ा सकता और यही वह दुखती रग  है जो कांग्रेस की सबसे बड़ी मुश्किल इस दौर में है क्युकि  सभी जानते हैं  पार्टी के चाटुकार भले ही राहुल गाँधी को पीऍम पद के लिए प्रोजेक्ट करें लेकिन उनका "औरा " केवल रायबरेली, अमेठी तक ही सिमटकर रह जाता है। वहीँ पंजाब ,यूपी, बिहार  और  अन्य  राज्यों में कांग्रेस लगातार सिकुड़ती जा रही है । आने वाले हिमांचल, गुजरात के विधान सभा चुनावो में भी शायद ही राहुल का जादू चलेगा इसलिए सपा कांग्रेस के सामने आक्रामक रूप से उतरने का मन बना चुकी  है और इसी कोशिशो के तहत कार्यकर्ताओ से यू पी से 60 सीटें जीतने का लक्ष्य  तय करने को कहा गया है ताकि केंद्र में मजबूत ताकत बनकर पी ऍम पद के लिए सौदेबाजी की जा सके । 

                                     कोलकाता में सपा की राष्ट्रीय कार्यकारणी के बाद का रास्ता मुलायम के सामने गैर भाजपा और गैर कांग्रेसी गठजोड़ बनाने की दिशा में तेजी के साथ आगे बढ़  रहा है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होनी चाहिए क्युकि  कार्यकारणी  के पहले दिन से अंतिम दिन तक कांग्रेसी घोटालो की गूंज सुनने को मिली जिसमे कांग्रेस  की  आर्थिक नीतियों के विरोध से लेकर महंगाई, बेरोजगारी और गरीबी से जुड़े मुद्दे केंद्र में छाये रहे। वैसे डीजल और गैस पर सब्सिडी खत्म किये जाने और आर्थिक सुधारों की दिशा में कांग्रेस के बढ़ते  कदमो के मद्देनजर आम चुनाव 2014 से पहले हो जाने की संभावनाओ से भी इनकार नहीं किया  जा सकता  क्युकि लागातार  भ्रष्टाचारके मसले पर घिर रही यूपीए सरकार  के मुखिया मनमोहन सिंह ने जिस तरह बीते दिनों जाएंगे तो लड़ते हुए जाएँगे का ऐलान कर विपक्षियो को अपनी रणनीति बदलने के लिए मजबूर कर दिया वहीँ यूपीए के सहयोगियों को भी इशारो इशारो में समझा दिया कि आर्थिक मोर्चे पर गिर रही सरकार  और देश की सेहत सुधाने का यही सही वक्त है। साथ ही प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री ने कीमतो  पर रोल बैक न किये जाने की बात दोहराकर  कह दिया कि  अब वह अपनी मनमोहनी इकोनोमिक्स के माडल की छाव तले  कांग्रेस की वैतरणी आने वाले लोकसभा  चुनावो में पार लगाएंगे ।  फिर चाहे इसकी कीमत उन्हें किसी भी रूप में क्यों ना चुकानी पड़े वह किसी की घुड़की के आगे नहीं झुकेंगे। 

                           इस साल यूपी के विधान सभा चुनाव में सपा ने 33 फीसदी मत प्राप्त कर ऐतिहासिक जीत दर्ज की और सी ऍम की कुर्सी युवा तुर्क अखिलेश यादव के कंधो पर सौप दी ।   उम्मीदों और देश की मौजूदा स्थिति के मद्देनजर मुलायम द्वारा कार्यकर्ताओ को 60 सीटें जीतने का लक्ष्य बहुत ज्यादा भी नहीं लगता क्युकि  उत्तर प्रदेश फतह किये बिना दिल्ली में अगली सरकार के गठन में अहम भूमिका निभाने के सपने देखना मुंगेरी लाल के हसीन सपने देखने जैसा है । यू पी में सपा के मजबूत  होने की सूरत में ही केंद्र में मुलायम प्रधानमंत्री पद की ना केवल  दावेदारी कर सकते हैं बल्कि अगली सरकार में अपने पैंतरों द्वारा वह मोल भाव की स्थिति में होंगे।    देश की मौजूदा स्थिति के मद्देनजर राजनीतिक विश्लेषक अब इस बात को महसूस  रहे हैं अगर मायावती, ममता, मुलायम इन तीनो  से से कोई दो एक हो जाए तो केंद्र की यूपीए सरकार  अल्पमत में आ जाएगी। ऐसी सूरत में कई सहयोगी यूपीए से पल्ला झाड सकते हैं । ऐसे में कांग्रेस के सामने आगामी चुनावो में मुश्किलें आ सकती हैं क्युकि  कांग्रेस को सहयोग कर रहे ये सहयोगी अभी ही उससे दूरी बनाकर भ्रष्टाचार, आर्थिक सुधार , महंगाई जैसे मुद्दों का ठीकरा कांग्रेस के ही सर फोड़ेंगे। जहाँ तक भ्रष्टाचार का सवाल है तो इस मुद्दे पर सपा ने कांग्रेस को हाल के दिनों में जमकर कोसा है और आम जनमानस में यह सन्देश देने की कोशिश की है वह कांग्रेस के हर फैसले पर साथ नहीं है।  कमोवेश यही लकीर अखिलेश यादव ने एफडीआई पर खींची है और समझ बूझ के साथ यूपी में एफडीआई को लागू न करने का बयान  दिया है। यही नहीं प्रमोशन में रिजर्वेशन के विरोध में हाई कोर्ट के फैसले के साथ जाकर मायावती के स्वर्ण वोट बैंक पर सेंध लगाने का काम किया है । 

  रही  बात ममता की तो राष्ट्रपति चुनाव में ममता के साथ बड़ी दूरियों के बाद पहली बार पार्टी के राष्ट्रीय अधिवेशन के दौरान अखिलेश का दीदी से मिलने" रायटर्स बिल्डिंग " जाना और मुलाकात करना कई  संभावनाओ की तरफ इशारा करता है।  हमारी समझ से  ममता के 72 घंटो के अल्टीमेटम को इस बार गंभीरता से लेने की जरुरत है क्युकि  ममता की राजनीती  का रास्ता उसी पश्चिम बंगाल से निकालता  है जहाँ उन्होंने वामपंथियों के एकछत्र राज का अपने दम से अंत किया।  उनकी एकमात्र इच्छा बंगाल का सी ऍम बनना  रही थी जो अब पूरी हो चुकी है।  अगले साल बंगाल में नगर निगम के चुनाव होने हैं ऐसे में वह कभी नहीं चाहेंगी कि "माँ", माटी और मानुष" के अपने मुद्दों से भटककर वह कांग्रेस के साथ मूल्य वृद्धि, एफ़डीआई का समर्थन कर कदमताल करेंगी।  इससे बेहतर यह होगा वह मुलायम को साथ लेकर एक नई  संभावनाओ का विकल्प लोगो को  देंगी जिसमे नवीन पटनायक , शरद पवार, जयललिता,  नीतीश  कुमार भी साथ आ सकते हैं। ऐसी सूरत में मुलायम का  मैजिक  चलने की पूरी  सम्भावना  रहेगी  बशर्ते उत्तर प्रदेश में वह 60 सीटें जीत जाए।  रही बात माया की  तो इन हालातों  में मायावती उनको समर्थन देने से पहले दस बार सोचेंगी 

                             भारतीय राजनीती में यह मौका पहली बार आया  है जब कांग्रेस भ्रष्टाचार के दलदल में फंसती नजर आ रही है । जहाँ उसके राज में भू सम्पदा की लूट मची जिसे उसने मंत्रियो के नाते रिश्तेदारों को औने पौने दामो पर बेच डाला और पहली बार " कैग" सरीखी संवेधानिक संस्थाओ पर उसके प्रवक्ता और नेता ऊँगली उठाते नजार आये।  हर रोज सरकार  के खिलाफ आन्दोलनों का बिगुल बज रहा है । जहाँ रामदेव काले धन, लोकपाल पर सरकार की मुश्किलें बढा  रहे है वहीँ टीम अन्ना  भी जनलो पाल  के साथ कोयले की कालिख , कामनवेल्थ , आदर्श सोसाईटी को बड़ा मुद्दा बनाने की तैयारियों में दिख रही  है उससे यूपीए के सहयोगी भी "वेट एंड वाच " नीति के तहत काम कर रहे हैं क्युकि यूपीए 2 का  अब  कोई इकबाल नहीं बचा है ।  एक ईमानदार  प्रधानमंत्री सीधे कठघरे में खड़ा है जिसकी कमान दस जनपथ के हाथो में है । हालात  1989 में वी  पी सिंह के दौर जैसे हो चले  हैं जहाँ राजीव गाँधी को "बोफोर्स" के जिन्न ने अर्श से फर्श पर ला दिया था । वी पी ने उस दौर में देश भर में घूम घूम कर कांग्रेस की खूब भद्द  पिटाई थी और कांग्रेस को सत्ता से बेदखल होना पड़ा था ।  तो क्या माना जाए मनमोहन भी उसी राह की तरफ अपने कदम बढ़ा  रहे हैं  ? अभी तक के हालत तो यही कहानी कह रहे हैं । आम चुनाव समय से पूर्व कभी भी हो सकते  हैं ।  ऐसे में समय रहते यूपीए के सहयोगियों के लिए कांग्रेस से पिंड छुड़ाना ही फायदे का सौदा रहेगा ।
  
                      देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी भाजपा को भी  मौजूदा माहौल में ज्यादा उत्साहित होने की जरुरत नही है क्युकि कोयले की कालिख के  दाग  उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी के करीबी अजय संचेती  से लेकर भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियो तक जा रहे है । कारपोरेट को साथ लिए बिना उसकी दाल भी इस दौर में नहीं गलती क्युकि  चुनावी चंदे के लिए उसकी मजबूरी  भी  इसी कोर्पोरेट के साथ खड़े होना बन जाती है। भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने से लेकर महंगाई को कम करने के लिए उसके पास कोई जादू की छड़ी और कारगर नीति नहीं है । साथ ही वह पी ऍम पद के लिए अपने झगड़ो में उलझी है । ऐसे में अब रास्ता भाजपा और कांग्रेस से इतर एक नए गठबंधन तीसरे मोर्चे की दिशा में बढ़ता दिख रहा है जिसमे मुलायम सिंह सबसे बड़ा " ट्रंप  कार्ड" साबित हो सकते हैं।

                           1996 में मुलायम ने अपने पैतरे से केंद्र में कांग्रेस की सरकार बनाने की मंशा पर जहाँ पानी फेरा था वही बाद में रक्षा मत्री सौदेबाजी के आसरे बन गए। 1999  में अटल बिहारी की सरकार गिरने के बाद कांग्रेस को गच्चा देकर उसे सरकार  बनाने से रोक दिया था । वही मुलायम 2004 में न्यूक्लिअर डील पर यू पीए 1 को संसद में विश्वासमत प्राप्त करने में मदद करते हैं फिर यू पीए 2 के तीन साल के जश्न में जहाँ  शरीक  होते हैं तो वहीँ मौका आने पर कांग्रेस के साथ रहकर उसी के खिलाफ तीखे तेवर दिखने से बाज नहीं आते हैं। उसकी नीतियों को कोसते हैं और तीसरे मोर्चे का राग अपनी राष्ट्रीय  कार्यकारणी में अलापते है जिसमे वह भाजपा -कांग्रेस दोनों को किनारे कर लोहियावादी, समाजवादी , वामपंथियों को साथ लेकर राजनीति की नई लकीर उसी तर्ज पर खींचते हैं जो उन्होंने 1996 में नरसिंह राव के मोहभंग के बाद खींची थी तो इससे जाहिर होता है मुलायम अभी भी तीसरे मोर्चे की दिशा में आशान्वित हैं। अब आप इसे मुलायम की पैतरेबाजी कहें या अवसरवादिता  ।   राजनीती के अखाड़े का यह चतुर  सुजान अब इस बात को बखूबी समझ रहा है अगर भाजपा और कांग्रेस के खिलाफ अभी एक नहीं हुए तो समय हाथ से निकल जायेगा। वैसे भी मुलायम के पास उम्र के इस  अंतिम पड़ाव पर पी ऍम बनने का सुनहरा मौका शायद ही होगा जिसमे वह 1996 की गलतियों से सीख लेकर एक नई  दिशा में देश को ले जाने का साहस दिखा सकते है । वैसे भी इस समय कांग्रेस ढलान  पर है तो भाजपा  पर भी  सादे साती चल रही है । तीसरे मोर्चे की सियासत को आगे बढाने  का यही बेहतर समय है । मुलायम इसके मर्म को शायद समझ भी रहे हैं । ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि राजनीती के अखाड़े में मुलायम  का यह दाव  कितना कारगर होता है ?