Sunday, 13 September 2015

विराट व्यक्तित्व के धनी थे भारत रत्न गोविन्द बल्लभ पन्त

    


भारत रत्न पंडित गोविन्द बल्लभ पन्त का नाम आज भी राष्ट्रीय राजनीती में बड़े गर्व के साथ लिया जाता है |  पन्त जी के अतुलनीय योगदान के कारण वह पूरे राष्ट्र के लिए ऐसे युगपुरुष के समान थे जिसने अपने ओजस्वी विचारो के द्वारा राष्ट्रीय राजनीती में हलचल ला दी |  उनके व्यक्तित्व में समाज सेवा, त्याग, दूरदर्शिता का बेजोड़ सम्मिश्रण था |  उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री और भारत रत्न गोविंद बल्लभ पंत को राजनीतिक रूप से पिछड़े माने जाने वाले पहाड़ी इलाकों को देश के राजनीतिक मानचित्र पर जगह दिलाने का श्रेय जाता है तो वहीँ तराई लिकाओं को भी आबाद कराने में उनकी खासी भूमिका रही |

 पंत जी का जन्म 10 सितम्बर 1887 ई. वर्तमान उत्तराखंड राज्य के अल्मोड़ा ज़िले के खूंट  नामक गाँव में ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इस परिवार का सम्बन्ध कुमाऊँ की एक अत्यन्त प्राचीन और सम्मानित परम्परा से है। पन्तों की इस परम्परा का मूल स्थान महाराष्ट्र का कोंकण प्रदेश माना जाता है और इसके आदि पुरुष माने जाते हैं जयदेव पंत। ऐसी मान्यता है कि 11वीं सदी के आरम्भ में जयदेव पंत तथा उनका परिवार कुमाऊं में आकर बस गया था। गोविन्द बल्लभ पंत के पिता का नाम श्री 'मनोरथ पन्त' था। श्री मनोरथ पंत गोविन्द के जन्म से तीन वर्ष के भीतर अपनी पत्नी के साथ पौड़ी गढ़वाल चले गये थे। बालक गोविन्द दो-एक बार पौड़ी गया परन्तु स्थायी रूप से अल्मोड़ा में रहा। उसका लालन-पोषण उसकी मौसी 'धनीदेवी' ने किया।

 गोविन्द ने 10 वर्ष की आयु तक शिक्षा घर पर ही ग्रहण की। 1897 में गोविन्द को स्थानीय 'रामजे कॉलेज' में प्राथमिक पाठशाला में दाखिल कराया गया। 1899 में 12 वर्ष की आयु में उनका विवाह 'पं. बालादत्त जोशी' की कन्या 'गंगा देवी' से हो गया, उस समय वह कक्षा सात में थे। गोविन्द ने लोअर मिडिल की परीक्षा संस्कृत, गणित, अंग्रेज़ी विषयों में विशेष योग्यता के साथ प्रथम श्रेणी में पास की। गोविन्द इण्टर की परीक्षा पास करने तक यहीं पर रहे। इसके पश्चात इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया तथा बी.ए. में गणित, राजनीति और अंग्रेज़ी साहित्य विषय लिए। इलाहाबाद उस समय भारत की विभूतियां पं० जवाहरलाल नेहरु, पं० मोतीलाल नेहरु, सर तेजबहादुर सप्रु, श्री सतीशचन्द्र बैनर्जी व श्री सुन्दरलाल सरीखों का संगम था तो वहीं विश्वविद्यालय में अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के विद्वान प्राध्यापक जैनिग्स, कॉक्स, रेन्डेल, ए.पी. मुकर्जी सरीखे विद्वान थे। इलाहाबाद में नवयुवक गोविन्द को इन महापुरुषों का सान्निध्य एवं सम्पर्क मिला साथ ही जागरुक, व्यापक और राजनीतिक चेतना से भरपूर वातावरण मिला

   1909 में गोविन्द बल्लभ पंत को क़ानून की परीक्षा में विश्वविद्यालय में सर्वप्रथम आने पर 'लम्सडैन' स्वर्ण पदक प्रदान किया गया। जनमुद्दो की वकालत करने की तीव्र जिज्ञासा ने इनको इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एल एल बी की डिग्री लेने को विवश किया | इस उपाधि के मिलने के बाद इन्होने अपना जीवन न्यायिक कार्यो में समर्पित कर दिया |गोविन्द बल्लभ पंत जी की वकालत के बारे में कई किस्से मशहूर रहे |  उनका मुकदमा लड़ने का ढंग निराला था  जो मुवक्किल अपने मुकदमों के बारे में सही जानकारी नहीं देते थे पंत जी उनका मुकदमा नहीं लेते थे |  काकोरी मुकद्दमें ने एक वकील के तौर पर उन्हें पहचान और प्रतिष्ठा दिलाई  | गोविंद बल्लभ पंत जी महात्मा गांधी के जीवन दर्शन को देश की जनशक्ति में आत्मिक ऊर्जा का स्त्रोत मानते रहे | गोविंद बल्लभ पंत जी ने देश के राजनेताओं का ध्यान अपनी पारदर्शी कार्यशैली से आकर्षित किया | भारत के गृहमंत्री के रूप में वह आज भी प्रशासकों के आदर्श हैं|  पंत जी चिंतक, विचारक, मनीषी, दूरदृष्टा और समाजसुधारक थे|  उन्होंने साहित्य के माध्यम से समाज की अंतर्वेदना को जनमानस में पहुंचाया |   उनका लेखन राष्ट्रीय अस्मिता के माध्यम से लोगों के समक्ष विविध आकार ग्रहण करने में सफल हुआ |

उनके निबंध भारतीय दर्शन के प्रतिबिंब हैं | उन्होंने राष्ट्रीय एकता के लिए भी  अपनी लेखनी उठाई |  प्रबुद्ध वर्ग के मार्गदर्शक पंत जी ने सभी मंचों से मानवतावादी निष्कर्षों को प्रसारित किया | राष्ट्रीय चेतना के प्रबल समर्थक पंत जी ने गरीबों के दर्द को बांटा और आर्थिक विषमता मिटाने के अथक प्रयास किए |1909 में पंतजी के पहले पुत्र की बीमारी से मृत्यु हो गयी और कुछ समय बाद पत्नी गंगादेवी की भी मृत्यु हो गयी। उस समय उनकी आयु 23 वर्ष की थी। वह गम्भीर व उदासीन रहने लगे तथा समस्त समय क़ानून व राजनीति को देने लगे।  1910 में गोविन्द बल्लभ पंत ने अल्मोड़ा में वकालत आरम्भ की। अल्मोड़ा के बाद पंत जी ने कुछ महीने रानीखेत में वकालत की   वहाँ से काशीपुर आ गये। उन दिनों काशीपुर के मुक़दमें डिप्टी कलक्टर की कोर्ट में पेश हुआ करते थे। यह अदालत ग्रीष्म काल में 6 महीने नैनीताल व सर्दियों के 6 महीने काशीपुर में रहती थी। इस प्रकार पंत जी का काशीपुर के बाद नैनीताल से सम्बन्ध जुड़ा।वह अल्मोड़ा , नैनीताल , लखनऊ ,काशीपुर में अत्यधिक सक्रिय रहे | कुमाऊ परिषद् के सचिव होने के साथ ही उन्होंने गढ़वाल में भी आज़ादी की अलख जगाई |

      परिवार के दबाव पर 1912 में पंत जी का दूसरा विवाह अल्मोड़ा में हुआ। उसके बाद पंतजी काशीपुर आये। पंत जी काशीपुर में सबसे पहले 'नजकरी' में नमक वालों की कोठी में एक साल तक रहे। सन 1912-13 में पंतजी काशीपुर आये उस समय उनके पिता जी 'रेवेन्यू कलक्टर' थे। श्री 'कुंजबिहारी लाल' जो काशीपुर के वयोवृद्ध प्रतिष्ठित नागरिक थे, का मुक़दमा पंत' जी द्वारा लिये गये सबसे 'पहले मुक़दमों' में से एक था। इसकी फ़ीस उन्हें 5 रु० मिली थी।


1913 में पंतजी काशीपुर के मौहल्ला खालसा में 3-4 वर्ष तक रहे। अभी नये मकान में आये एक वर्ष भी नहीं हुआ था कि उनके पिता मनोरथ पंत का देहान्त हो गया। इस बीच एक पुत्र की प्राप्ति हुई पर उसकी भी कुछ महीनों बाद मृत्यु हो गयी। बच्चे के बाद पत्नी भी 1914 में स्वर्ग सिधार गई।1916 में पंत जी 'राजकुमार चौबे' की बैठक में चले गये। चौबे जी पंत जी के अनन्य मित्र थे। उनके द्वारा दबाव डालने पर पुनःविवाह के लिए राजी होना पडा तथा काशीपुर के ही श्री तारादत्त पाण्डे जी की पुत्री 'कलादेवी' से विवाह हुआ। उस समय पन्त जी की आयु 30 वर्ष की थी।

काशीपुर में एक बार गोविन्द बल्लभ पंत जी धोती, कुर्ता तथा गाँधी टोपी पहनकर कोर्ट चले गये। वहां अंग्रेज़ मजिस्ट्रेट ने आपत्ति की। पन्त जी की वकालत की काशीपुर में धाक थी और उनकी आय 500 रुपए मासिक से भी अधिक हो गई। पंत जी के कारण काशीपुर राजनीतिक तथा सामाजिक दृष्टियों से कुमाऊँ के अन्य नगरों की अपेक्षा अधिक जागरुक था। अंग्रेज़ शासकों ने काशीपुर नगर को काली सूची में शामिल कर लिया। पंतजी के नेतृत्व के कारण अंग्रेज़ काशीपुर को ”गोविन्दगढ़“ कहती थी।
     
1914 में काशीपुर में 'प्रेमसभा' की स्थापना पंत जी के प्रयत्नों से ही हुई। ब्रिटिश शासकों ने समझा कि समाज सुधार के नाम पर यहाँ आतंकवादी कार्यो को प्रोत्साहन दिया जाता है। फलस्वरूप इस सभा को हटाने के अनेक प्रयत्न किये गये पर पंत जी के प्रयत्नों से वह सफल नहीं हो पाये। 1914 में ही पंत जी के प्रयत्नों से ही 'उदयराज हिन्दू हाईस्कूल' की स्थापना हुई। राष्ट्रीय आन्दोलन में भाग लेने के आरोप में ब्रिटिश सरकार ने इस स्कूल के विरुद्ध डिग्री दायर कर नीलामी के आदेश पारित कर दिये। जब पंत जी को पता चला तो उन्होंनें चन्दा मांगकर इसको पूरा किया।
   
1916 में पंत जी काशीपुर की 'नोटीफाइड ऐरिया कमेटी' में लिये गये। बाद में कमेटी की 'शिक्षा समिति' के अध्यक्ष बने। कुमायूं में सबसे पहले निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा लागू करने का श्रेय पंत जी को ही जाता  है। पंतजी ने कुमायूं में 'राष्ट्रीय आन्दोलन' को 'अंहिसा' के आधार पर संगठित किया। आरम्भ से ही कुमाऊं के राजनीतिक आन्दोलन का नेतृत्व पंत जी के हाथों में रहा। कुमाऊं में राष्ट्रीय आन्दोलन का आरम्भ कुली उतार, जंगलात आंदोलन, स्वदेशी प्रचार तथा विदेशी कपडों की होली व लगान-बंदी आदि से हुआ। दिसम्बर 1920 में 'कुमाऊं परिषद' का 'वार्षिक अधिवेशन' काशीपुर में हुआ जहां 150 प्रतिनिधियों के ठहरने की व्यवस्था काशीपुर नरेश की कोठी में की गई। पंतजी ने बताया कि परिषद का उद्देश्य कुमाऊं के कष्टों को दूर करना है न कि सरकार से संघर्ष करना। सन 1916 में 'कुमायूँ परिषद' की स्थापना की और इसी वर्ष 'अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी' के सदस्य चुने गये। यह वर्ष  पन्त जी के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण वर्ष साबित हुआ |  इस वर्ष पन्त जी अपने असाधारण कार्यो के कारण किसी के परिचय के मोहताज नही रहे | यही वह वर्ष था जब वे राष्ट्रीय राजनीती में धूमकेतु की तरह चमके| कुँमाऊ परिषद् के सचिव रहते हुए उन्होंने गढ़वाल में भी आज़ादी कि अलख जगाई | 1920 में गाँधी जी के सहयोग से असहयोग आन्दोलन में इन्होने अपना सक्रिय सहयोग दिया | की।1923 में 'स्वराज्य पार्टी' के टिकट पर उत्तर प्रदेश 'विधान परिषद के लिए निर्वाचित हुए  वहीँ सन 1927 में उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रहे। बाद में धीरे-धीरे कांग्रेस द्वारा घोषित असहयोग आन्दोलन की लहर कुमायूं में छा गयी।

      1927 में सर्व सम्मति से कांग्रेस के अध्यक्ष चुन लिए गए |  19 नवम्बर 1928 को लखनऊ में जब साईमन कमीशन आया तो नेहरु की साथ इन्होने भी उनका विरोध किया | इसी वर्ष पंडित नेहरु और पन्त जी के नेतृत्व में  साईमन कमीशन के लखनऊ आगमन पर भारी जुलूस निकाला गया जिसमे पुलिस के लाथिचार्ग में उनको गायल भी होना पड़ा |  23 जुलाई, 1928 को पन्त जी 'नैनीताल ज़िला बोर्ड' के चैयरमैन चुने गए  | पंत जी का राजनीतिक सिद्धान्त था कि अपने क्षेत्र की राजनीति की कभी उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए। 1929 में गांधी जी कोसानी से रामनगर होते हुए काशीपुर भी गये। काशीपुर में गांधी जी लाला नानकचन्द खत्री के बाग़ में ठहरे थे। पंत जी ने काशीपुर में एक चरखा संघ की विधिवत स्थापना नवम्बर, 1928 में लखनऊ में साइमन कमीशन का बहिष्कार करने की ठानी और स्वतंत्रता संग्राम के दौर में कई वर्ष जेल रहे | 10 अगस्त, 1931 को भवाली में उनके सुपुत्र श्रीकृष्ण चन्द्र पंत का जन्म हुआ। नवम्बर, 1934 में गोविन्द बल्लभ पंत 'रुहेलखण्ड-कुमाऊं' क्षेत्र से केन्द्रीय विधान सभा के लिए निर्विरोध चुन लिये गये। 17 जुलाई, 1937 को गोविन्द बल्लभ पंत 'संयुक्त प्रान्त' के प्रथम मुख्यमंत्री बने जिसमें नारायण दत्त तिवारी संसदीय सचिव नियुक्त किये गये थे।
   
            सन 1937 से 1939 एवं 1954 तक अर्थात मृत्यु पर्यन्त केन्द्रीय सरकार के स्वराष्ट्र मंत्री रहे। पन्त जी 1946 से दिसम्बर 1954 तक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। पंत जी को भूमि सुधारों में पर्याप्त रुचि थी। 21 मई, 1952 को जमींदारी उन्मूलन क़ानून को प्रभावी बनाया। मुख्यमंत्री के रूप में उनकी विशाल योजना नैनीताल तराई को आबाद करने की थी। पंत जी एक विद्वान क़ानून ज्ञाता होने के साथ ही महान नेता व महान अर्थशास्त्री भी थे। स्व कृष्णचन्द्र पंत उनके पुत्र केन्द्र सरकार में विभिन्न पदों पर रहते हुए योजना आयोग के उपाध्यक्ष भी रहे और भाजपा के टिकट पर नैनीताल संसदीय सीट का प्रतिनिधित्व भी किया |

पन्त जी के जीवन पर महात्मा गाँधी का विशेष प्रभाव पड़ा |गाँधी के कहने पर ये वकालत को छोड़कर राजनीती में चले आये | उस समय समाज में दो तरह की विचार धाराएं थी | पहली विचारधारा में प्रगतिशील लोग हुआ करते थे, वही दूसरी विचार धारा में स्वदेश प्रेमी लोग थे | पन्त जी ने दोनों विचार धारा में समन्वय कायम कर उत्तराखंड के कुमाऊ में राष्ट्रीय चेतना फ़ैलाने में अपनी महत्त्व पूर्ण भूमिका निभाई |उन्होंने गरीबो के विरोध में आवाज उठाते हुए कुली बेगार के खिलाफ विशाल आन्दोलन चलाया  | अपने प्रयासों से ही कुमाऊ परिषद की स्थापना की और अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य भी  चुने गए | कांग्रेस के पार्टी उनकी इतनी अगाध आस्था रही 30 बरस तक वह राष्ट्रीय कांग्रेस कार्यकारणी के सदस्य रहे | गांधी जी के द्वारा चलाये गए कई आन्दोलन में उन्होंने बढ़  चढ़कर भाग लिया और कई बार जेल भी जाना पड़ा |

देश की आजादी में पन्त के योगदान को कभी नही भुलाया जा सकता है | जंगे आजादी की दौर में हिमालय पुत्र की द्वारा प्रत्येक आन्दोलन चाहे वह सत्याग्रह हो या असहयोग आन्दोलन ,अपना पूरा योगदान दिया | आजादी की दौर में अपनी सक्रिय भूमिकाओं की चलते पन्त जी को कई बार जेल की यात्राये भी करनी पड़ी | देश की आज़ादी के लिए  ब्रिटिश हुकूमत के साथ वह गोलमेज वार्ता में भी वह शामिल हुए |   वर्ष 1937 में पंत जी संयुक्त प्रांत के प्रथम प्रधानमंत्री बने और 1946 में उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री बने | 15 अगस्त 1947 को वह आज़ाद भारत में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनाये गए | इस पद पर वह 1952 तक काम करते रहे | 1952 में देश की संविधान बनाये जाने के बाद जब प्रथम आम चुनाव हुए तो उनका सञ्चालन पन्त जी की प्रयास से हुआ | इन चुनावो में कांग्रेस ने विजय पताका लहराई | 1954 में जवाहर लाल नेहरु की आग्रह पर केन्द्रीय मंत्रिमंडल में गृह मत्री का ताज पहना और देश के विकास में अपना योगदान दिया |

सन 1957 में गणतन्त्र दिवस पर महान देशभक्त, कुशल प्रशासक, सफल वक्ता, तर्क के धनी एवं उदारमना पन्त जी को भारत की सर्वोच्च उपाधि ‘भारतरत्न’ से विभूषित राष्ट्रपति  डॉ राजेंद्र प्रसाद ने किया  | अपने कार्यकाल में पन्त जी ने विभिन्न कामो को पूरा करने का भरसक प्रयत्न किया | हिन्दी को राजकीय भाषा का दर्जा दिलाने में भी गोविंद वल्लभ पंत जी का महत्वपूर्ण योगदान रहा | 26 जनवरी का दिन कुमाऊ के इतिहास में बड़ा महत्वपूर्ण रहा | इस तिथि को भारत सरकार ने उन्हें "भारत रत्न" की उपाधि से विभूषित किया | 7 मार्च 1961 को पन्त जी की ह्रदय गति रुक जाने से मौत हो गई |

पन्त जी ने अपने प्रयासों से राष्ट्र हित के जितने काम किये उसके कारण भारतीय इतिहास में उनके योगदान को नही भुलाया जा सकता | पन्त जी को सच्ची श्रद्धांजलि तब मिल पाएगी जब हम उनके द्वारा कहे गए विचारो और सिद्धांतो पर चले | 

Monday, 31 August 2015

देवीधुरा उत्तराखंड का बग्वाल


                              


उत्तराखण्ड जहां अपनी मनमोहक प्राकृतिक सुषमा व नैसर्गिक सौन्दर्य के लिए जाना जाता है वहीं इस देवभूमि की अनेक परम्पराएं यहां की धर्म संस्कृति से जुड़ी हुई है। ऐसी ही अनूठी परम्पराओं को अपने में संजोये देवीधूरा मेला है जिसे ‘‘आषाड़ी कौतिक‘‘ नाम से जाना जाता है। प्रतिवर्ष रक्षाबन्धन के पावन पर्व पर लगने वाले इस मेले को ‘बग्वाल‘ नाम से अधिक जाना जाता है। वह इसलिए क्योंकि इस मेले में होने वाले पत्थर युद्ध को लेकर दर्शकों में कौतूहल बना रहता है।
             
उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल के चार जनपदों के मध्य देवीधुरा कस्बा स्थित है जो नैनीताल, अल्मोड़ा, उधमसिंहनगर, चंपावत जिलों को एक दूसरे से जोड़ता है। जिला मुख्यालय चंपावत से 57 किमी0 की दूरी पर स्थित देवीधुरा कस्बा अपने प्राकृतिक सौन्दर्य के लिए मशहूर है। कहा जाता है कि देवीधुरा पूर्णागिरी का एक पीठ है जहां चंपा कालिका को प्रतिष्ठित किया गया। ऊंचे देवदार के घने वृक्षों व चीड़ के लम्बे वृक्षों के मध्य बग्वाल की पृष्ठभूमि चार राजपूती खामों के पुस्तैनी खेल से जुड़ी हुई है। खामों से तात्पर्य जाति से है जिसमें गहरवाल, वाल्किया, लमगड़िया, चम्याल मुख्य है। श्रावण शुक्ल पूर्णिमा के दिन पूजा कर यह सभी एक दूसरे को निमंत्रण देते हैं और बग्वाल में भागीदार बनते हैं। बग्वाल में भाग लेने वाले कुछ दिन पूर्व से अपनी तैयारियों में जुट जाते हैं। पाषाण युद्ध के रणबांकुरों के चार दल सर्वप्रथम एक-एक करके देवी माता बाराही की परिक्रमा करते हैं बग्वाल में वल्किया व लमगड़िया खाम एक छोर पश्चिम से प्रवेश करती है तो चम्याल व गहरवाल पूर्वी छोर से रणभूमि में आती है। मंदिर के पुजारी द्वारा आशीर्वाद के बाद सभी एक स्थान पर एकत्रित होते हैं। आमतौर पर गहरवाल खाम सबसे अंत में आती है जिन पर गहखाल खाम का व्यक्ति पत्थर फेंककर प्रहार करता है। गहरखाल के पत्थर फेकने के साथ बग्वाली कौतिक शुरू हो जाता है। युद्ध में भाग लेने वाली चार खामों वैसे तो आपस के मित्र होते हैं लेकिन पाषाण युद्ध के समय वह सारे रिश्ते-नाते छोड़ एक दूसरे पर पूरी ताकत के साथ वार कर देते हैं। सुरक्षा के लिए दलों द्वारा लाठियों व फर्रो को सटाकर एक कवच बना लिया जाता है जो घायलों की सुरक्षा का कार्य करता है।बग्वाल के दौरान पत्थरों की वर्षा द्वारा शरीर के विभिन्न अंग लहुलुहान हो जाते हैं लेकिन रक्त की बूंदे गिरने के बाद भरी कोई चित्कार नहीं सुनायी पड़ता है। मुख्य पुजारी एक व्यक्ति के शरीर के बराबर रक्त गिरने के बाद बग्वाल को रोकने का आदेश दे देते हैं पत्थर मारने का यह सिलसिला ताम्र छात्र व चंवर गाय की पूंछ के मैदान में पहुंचते ही समाप्त माना जाता हे। तकरीबन 20 से 25 मिनट तक चलने वाले इस पाषाण युद्ध के समाप्त होने के बाद बग्वाल खेलने वाली खामें एक दूसरे के गले मिलते हैं। पत्थरों से घायल हुए लोगों को गंभीर चोटें नहीं आती ऐसा माना जाता है कुछ वर्ष पूर्व तक लोग बग्वाल खेले जाने वाले मैदान की बिच्छू घास अपने शरीर में लगा लिया करते थे जिसमें वे कुछ क्षण बाद स्वयं ठीक हो जाते थे लेकिन वर्तमान में यहां घायलों के इलाज का समुचित प्रबंध रहता है।

                   

पौराणिक कथाओं के अनुसार देवीधुरा किसी समय काली के उपासना का प्रमुख केन्द्र था जिसमें देवी के गणों को प्रसन्न करने के लिए नर बलि की प्रथा प्रचलित थी यह बलि बग्वाल खेलने वाली चार खामों से ही दी जा सकती थी एक बार चमियाल खाम की एक वृद्धा  के परिवार से बलि की बारी आयी परिवार में उस वृद्धा का एकमात्र सहारा उसका एक पौत्र था। कहा जाता है उस वृद्धा ने वंश नाश के भय से मॉ बाराही की आराधना की और कठोर तप किया। वृद्धा के तप से मॉ बाराही प्रसन्न हुई और उन्होंने राजा व प्रजा से बलि का दूसरा विकल्प ढूंढने को कहा। प्रजा के विचार- विमर्श के बाद राजा ने आम सहमति बनाते हुए यह निर्णय लिया कि यदि मनुष्य के रक्त के बराबर रक्त बहा दिया जाए तो उसे नरबलि माना जा सकता है कहा जाता है तभी से पत्थर मारकर रक्त बहाने का सिला चलन में है। अठवार का तात्पर्य है कि किसी मनोकामना के पूर्ण होने के बाद व्यक्ति द्वारा जो बलि स्वेच्छा से दी जाती है अठवारी बलि बग्वाल के एक दिन पहले होती है। यह समय चतुदर्शी को रहता है। क्योंकि चतुदर्शी को पूर्णिमा पड़ती है और इसी दिन पाषाण युद्ध होती है। अठवारी में एक भैंस,छः बकरे व एक नारियल चढ़ते हैं।

देवीधुरा के बाराही देवी के मंदिर में तांबे के पिटारे में रखी देवी की मूर्तियां कई तरह के रहस्यों को समेटे हैं तांबे के पिटारे में महाकाली,सरस्वती व बाराही की मूर्तियां हैं। बाराही की मूर्ति में तेज चमक होने के कारण किसी ने अपने खुले नेत्रों से इसके दर्शन नहीे किये। ऐसा माना जाता है कि बाराही माता लक्ष्मी का नवीन रूप है जिसके दर्शन वर्जित हैं। यदि कोई इसे देखने का प्रयास करता है तो उसे अपनी ज्योति से हाथ धोना पड़ता है। इसी कारण मंदिर के मुख्य पुजारी भी देवी को स्नान कराते समय आंखों में पट्टी बांधे रखते हैं।
                 




बग्वाल के दिन चारों खामों के प्रधान देवी का पहरा करते हैं बग्वाल के अगले दिन तीनों मूर्तियों को स्नान कराया जाता है। तांबे के बक्से की चाबी गहरवाल के प्रधान के पास रहती र्है वह बग्वाल के दिन इसे अन्य प्रधानों को देता है सर्वप्रथम बाराही की मूर्ति को दूध से स्नान कराया जाता है फिर दो मूर्तियों को। तत्पश्चात् तीनों को उस बक्से में रख दिया जाता है।

 उत्तराखंड के देवीधुरा का बग्वाल ‘मेला‘ आधुनिक परमाणु युग में भी पाषाण युद्ध की परम्परा को संजोये है। यह मेला आपसी सदभाव की जीती जागती प्रत्यक्ष मिसाल हे। देवीधूरा क्षेत्र में पर्यटन की व्यापक संभावनाऐं हैं। यहां के बाराही मंदिर में प्रतिवर्ष खेले जाने वाले बग्वाल को देखने देशभर से लोग पहुंचते हैं और एक अमिट छाप लेकर जाते हैं। यहां पहुंचकर श्रद्धालुओं को देवभूमि में अपनी उपस्थिति का वास्तविक अहसास होता है। तीर्थाटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण ऐसे पवित्र स्थल राज्य के आर्थिक विकास में खासे उपयोगी है। यह अलग बात है कि सरकारी अव्यवहारिक नीतियों के चलते देवीधुरा के विकास का कोई खासा तैयार नहीं किया गया है जिस कारण उत्तराखंड  में सांस्कृतिक परम्पराएं दम तोड़ रही है। वैश्वीकरण के इस दौर में यदि आज बग्वाल सरीखी सांस्कृतिक विरासत जीवित है तो इसका श्रेय इन मान्यताओं का वैज्ञानिक स्वरूप है।

Thursday, 27 August 2015

भारत की 'कूटनीति ' में घिर गया 'पाकिस्तान '




दुनिया जानती है एन एस ए स्तर की बातचीत किस तरह पाक के अड़ियल रवैये के चलते रद्द हुई है लेकिन इन सबके बावजूद पाक अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा | तमाम मंचों पर करारी मात खाकर अब पाक की बौखलाहट पूरी दुनिया के सामने ना केवल उजागर हो रही है बल्कि अन्तराष्ट्रीय मंचो पर भी उसकी कारिस्तानी पूरी दुनिया देख रही है | भारत के साथ सचिव स्तर की वार्ता रद्द हो जाने के बाद पाक के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार  सरताज अजीज ने डॉन में प्रकाशित अपने लेख में भारत को खूब खरी खोटी सुनाते हुए दोनों पक्षों के बीच रद्द हुई वार्ता के लिए भारत को जिम्मेदार बताया है | अजीज ने कड़े शब्दों में भारत को कहा है वह पाक को कम ना समझे क्युकि पाक भी परमाणु सम्पन्न देश है और वह अपनी हिफाजत करना खुद जानता है | अब इस तरह के संकेतों को अगर डिकोड किया जाए तो समझा जा सकता है यह कहने के पीछे अजीज की मंशा क्या रही होगी ? साफ़ है पाकिस्तान  चक्रव्यूह में इस तरह उलझ गया है एक तरफ चुनी हुई सरकार है तो दूसरी तरफ सेना और आई एस आई और तीसरी तरफ अलगाववादी नेता जो अपने इशारों पर हिंदुस्तान पाकिस्तान को न केवल नचाते हैं बल्कि हर मामले में अपने को तीसरा पक्ष बनाये जाने का मर्सिया हर वक्त पढ़ते रहते हैं | अब ऐसे हालातों का सीधा प्रभाव भारत पाक संबंधो पर पड़ना लाजमी ही है | दुनिया अब पाक के चेहरे को सही से पहचान रही है | हर किसी को पता है भारत पाक की यह वार्ता पाक की जिद के चलते रद्द हुई है |

 भारत शुरू से ही किसी तीसरे पक्ष को वार्ताकार बनाये जाने का विरोध कर रहा है जबकि पाकिस्तान हुर्रियत और अलगाववादी नेताओं के प्रभाव में ही हमेशा रहा है जिसका नतीजा एक बार फिर सबके सामने है | पाक  के प्रधान मंत्री नवाज शरीफ ने भी अब कश्मीर मुद्दे को शामिल किये बिना भारत के साथ बातचीत को व्यर्थ बताया है | उन्होंने कहा है कश्मीरी नेता इस मसले का महत्वपूर्ण पक्ष है | उनके भविष्य को लेकर कोई फैसला उनकी राय और उनसे बातचीत के बिना हल नहीं किया जा सकता | शरीफ ने यह बातें अजीज और डोभाल के बीच होने वाली एन एस ए स्तर की बातचीत के रद्द होने के ठीक बाद कही हैं | वैसे इस मामले में पाक को भारत से सीख लेनी चाहिए | यह वार्ता रद्द होने के बाद भारत की पहली प्रतिक्रिया न केवल संयमित थी बल्कि उसने उन्ही बातों को दोहराया जो वह शुरुवात से कहता आया है | वह पाकिस्तान से यह कहता रहा है कि पाक कश्मीरी अलगाववादी नेताओं के साथ मुलाक़ात नहीं करे तो तब बातचीत ट्रैक पर आ सकती है लेकिन पाकिस्तान तो मानो अलगाववादी नेताओं की गोद में बैठकर खेल रहा है और ऐसे उलूल जुलूल बयान दे रहा है जिससे भारत पाक संबंधों में तनाव की छाया पड़ना तय माना जा सकता है | 

वैसे पाकिस्तान  संघर्षविराम का लगातार  उल्लंघन करते हुए जम्मू-कश्मीर में नियंत्रण रेखा पर भारत की अग्रिम सीमा चौकियों पर गोलीबारी करने से बाज नहीं आ रहा है | भारत की तरफ से सचिव स्तर की वार्ता रद्द किए जाने से पहले और  बाद  संघर्षविराम  उल्लंघन के हर दिन नए मामले सामने आ रहे हैं   । अपनी करतूतों से पाकिस्तान ने एक बार फिर अपना घिनौना  चेहरा पूरी दुनिया के सामने उजागर कर दिया है ।  जम्मू कश्मीर से लगी नियंत्रण रेखा पर  भारी गोलाबारी कर पाकिस्तान ने  नवम्बर 2003 की  संघर्ष विराम वाली उल्लंघन की उस लीक पर चल निकला है जहाँ अपनी बर्बर कार्यवाही से वह फिर से कश्मीर को लेकर एक नई किस्सागोई करने में लग गया है क्युकि पाकिस्तान के अन्दर नवाज शरीफ सरकार के सामने जैसा संकट अभी खड़ा है उससे उनका बाहर निकलना मुश्किल दिख रहा है और कश्मीर को ढाल बनाकर पाकिस्तान एक बार फिर अपना बरसो पुराना वही राग अलाप रहा है जिसमे कश्मीर को केंद्र में लाकर हमेशा से नई परिस्थिति सामने लायी जाती रही है  ।  

सीमा पार अपनी  बर्बर कार्यवाही से जहाँ  पाक  तमाम अन्तरराष्ट्रीय  कानूनों की धज्जियाँ  उड़ाने से बेपरवाह नजर आता है वहीँ कश्मीर को केंद्र में रखकर वह भारत से बातचीत का राग दोहराता रहा है लेकिन बीते दिनों मोदी ने जिस तरीके से विदेश सचिवो की बातचीत को शुरू  करने का फैसला किया और लाहौर और शिमला के ट्रेक पर बात बढ़ाई उसने पहली बार कश्मीर के सवालों को भी खड़ा किया है | पाक बिना तीसरे पक्ष को साधे बिना इस मामले पर आगे नहीं बढ़ना चाहता | 

नियंत्रण रेखा तथा अंतरराष्ट्रीय सीमा पर पाकिस्तान द्वारा संघर्षविराम का उल्लघन जारी रखने को  को गंभीर और उकसाने वाला करार देते हुए भारत ने कहा कि यह द्विपक्षीय संबंधों के लिए बहुत अनुकूल नहीं हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ऊफा वार्ता के दौरान भी   कहा था किसी भी सार्थक द्विपक्षीय वार्ता के लिए आवश्यक रूप से एक ऐसा माहौल जरूरी है जो आतंकवाद एवं हिंसा से मुक्त हो | नियंत्रण रेखा तथा अंतरराष्ट्रीय सीमा दोनों स्तरों पर घुसपैठ संघर्षविराम उल्लंघन गंभीर है और इन घटनाओं से ऐसा माहौल पैदा हो रहा है जो दोनो देशों के बीच संबंधों के लिए बहुत सहायक नहीं रहने वाला |

पाकिस्तान द्वारा सैकड़ों बार संघर्षविराम का उल्लंघन मोदी सरकार के आने के बाद किया गया है | इस दौरान कई मासूम  मारे गये और कई जवानों सहित अन्य घायल हो गये जिसकी तस्दीक हमारी सेना भी करती रही है | सीमा पार हो रही इस कार्यवाही ने हमें यह सोचने के लिए मजबूर कर दिया है अब पकिस्तान के साथ  किस मुह से हम दोस्ती का हाथ बढ़ाये ? पाक के साथ दोस्ती का आधार क्या हो वह भी तब जब वह लगातार भारत की पीठ पर छुरा भौंकते  हुए लगातार विश्वासघात ही करता जा रहा है । पाक के साथ भारत की एन एस ए स्तर की वार्ता रद्द होने की जहाँ अमरीका ने निंदा है वहीँ आम आदमी अब भारतीय नीति नियंताओ से सीधे सवाल पूछ रहा है कि अब समय आ गया है जब पाक से सारे रिश्ते तोड़ ही लिए जाएँ तो यह बेहतर ही रहेगा  ।  यही नहीं विपक्ष भी अगर इस बार सरकार  के द्वारा  की  जाने वाली हर बातचीत के विरोध में कदमताल कर रही हैं तो यह सही भी है क्युकि  लगातार होते हमलो  से हमारा धैर्य अब जवाब दे रहा है । वैसे भी नफरत की नीव में सुलग रहा पाक कभी अपने को बदल नहीं सकता |  सीमा पार उल्लंघन के जरिये पाक की  हर कोशिश  भारत में उन्माद फैलाने की ही बन रही है ।

     असल में  कारगिल के दौर में भी पकिस्तान ने भारत के साथ गलत सलूक किया था  ।  हमारे प्रधानमंत्री वाजपेयी रिश्तो  में गर्मजोशी लाने लाहौर बस से गए लेकिन  नवाज  शरीफ  को अँधेरे में रखकर मिया मुशर्रफ  कारगिल की पटकथा तैयार करने में लगे रहे । इस काम में उनको पाक की सेना का पूरा सहयोग मिला था । इस बार की कहानी भी पिछले बार से जुदा नहीं है । पहली बार आई एस आई पाकिस्तान के आंतरिक और बाह्य मामलो में अपना सिक्का मजबूत कर रही है |यह सच शायद ही किसी से अब छुपा है कि आई एस आई के बिना पाकिस्तान में पत्ता भी नहीं खड़कता और सेना  भारत के साथ रिश्तो को सुधारने के बजाए बिगाड़ना ही चाहती है । यह उनके द्वारा दिए गए हाल के बयानों में भी  साफ़झलका है |

पाक के सियासी संकट पर नजर रख रहे अंतर्राष्ट्रीय जानकारों का मानना है इस कार्यवाही में सेना का पाक के सैनिको को  पूरा समर्थन मिल रहा है । पाक में सरकार तो नाम मात्र की है वहां पर चलती सेना की ही है और बिना सेना के वहां पर पत्ता भी नहीं हिला हिलता  । कट्टरपंथियों की बड़ी जमात वहां ऐसी है जो भारत के साथ सम्बन्ध सुधरते नहीं देखना चाहती है ।  ऐसी सूरत में अगर हम बार बार उससे दोस्ती का राग  छेड़ते है  तो यह हजम नहीं होता क्युकि  छलावे के सिवा यह कुछ भी नहीं है । ऐसे में मोदी सरकार द्वारा हुर्रियत को द्विपक्षीय बातचीत में शमिल ना किये जाने वाले फैसले को सही ठहराया जाना जायज है और मोदी ने हुर्रियत नेताओं  को भाव न देकर कश्मीर को लेकर एक नई लकीर अजित  डोभाल के आसरे खींचने की कोशिश की थी जिसमे पाक को मुह की खानी पड़ी क्युकि डोभाल के मुकाबले अजीज बहुत कमजोर नजर आ रहे थे | ऐसी खबरें  खुद पाक के कई बड़े चैनल चला चुके थे  और वैसे भी अजित डोभाल पाक को कई डोजियर इस बातचीत में सौपने वाले थे जिसमे मुंबई हमलो के आरोपियों से लेकर दाउद के पाक में होने के सबूत शामिल थे | लेकिन डोभाल ने आतंकवाद के मसले पर पाक को चारों तरफ से ऐसे घेर लिया कि पाक को हुर्रियत का पुराना राग छेड़ने पर मजबूर होना पड़ा जिसके चलते डिनर की टेबल में आने से पहले ही पाक भाग गया | 

 दुखद पहलू यह है पाक जहाँ  नियंत्रण रेखा पर हो रही घुसपैठ और  आतंकी  घटनाओं  में अपना हाथ होने से  हमेशा इनकार करता  रहा है वहीँ भारत सरकार कह रही है वह हमारे सब्र का इम्तिहान नहीं ले तो यह पहेली किसी के गलेनहीं उतर रही । आखिर कब तक हम पाक के साथ दोस्ती का हाथ बढ़ाते रहेगे  और बातचीत से मेल मिलाप बढ़ायेंगे जबकि हर मोर्चे पर पाकिस्तान  हमको धोखा ही धोखा देता आया है । इस घटना के बाद हमारे नीतिनियंताओ को यह सोचना पड़ेगा अविश्वास की खाई  में दोनों मुल्को की दोस्ती में दरार पडनी  तय है । अतः अब समय आ गया है जब हम पाक के साथ अपने सारे सम्बन्ध तोड़ डालें । हमें अपने उच्चायुक्त को पाक से वापस बुला लेना  चाहिए ताकि पाक के चेहरे को अब पूरी दुनिया में बेनकाब किया जा  सके और इस दिशा में अब हमारे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल को अपनी कूटनीति के आसरे आगे बढ़ना होगा जिसमे अंतर्राष्ट्रीय  मंचों पर आतंवाद के मसले पर पाक को बेनकाब किया जा सके | 

  मुंबई  में 26/11 के हमलो में भी पाक की संलिप्तता पूरी दुनिया के सामने ना केवल उजागर हुई थी बल्कि पकडे गए आतंकी कसाब ने  यह खुलासा  भी किया हमलो की साजिश पाकिस्तान में रची गई जिसका मास्टर माइंड हाफिज मोहम्मद  सईद  था । हमने मुंबई हमलो के पर्याप्त सबूत पाक को सौंपे भी लेकिन आज तक वह इनके दोषियों पर कोई कार्यवाही नहीं कर पाया है । आतंक का सबसे बड़ा मास्टर माईंड हाफिज पाकिस्तान में खुला घूम रहा है और  भारत  केखिलाफ लोगो को जेहाद छेड़ने के लिए उकसा भी रहा है लेकिन आज तक हम पाक को हाफिज के मसले पर ढील ही देते रहे हैं  यही कारण  है वहां की सरकार  उसे पकड़ने में नाकामयाब रही है । 

 2001 में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर में हमले के बाद उसके जमात उद  दावा ने  कश्मीर के ट्रेंनिग कैम्पों में घुसकर युवको को  जेहाद के लिए प्रेरित किया । अमेरिका द्वारा उसके संगठन  को प्रतिबंधित  घोषित  करने  और उस पर करोडो डालर के इनाम रखे जाने के बाद भी पाकिस्तान  सरकार  ने उसे कुछ दिन लाहौर की जेल में पकड़कर रखा और जमानत पर रिहा कर दिया । आज  पाकिस्तान  उसे   पाक में होने को सिरे से नकारता रहा है जबकि असलियत यह है पुंछ  में हाफिज की संलिप्तता कई बार उजागर भी  हुई है । पाकिस्तान के कब्जे वाले पी ओ  के में हाफिज का जबरदस्त प्रभाव है जो अभी  पाकिस्तान के कट्टरपंथियों के साथ भारत में घुसपैठ बढाने की कार्ययोजना को तैयार कर रहा है ।  भारतीय गृह मंत्रालय भी अब सीमा पार हो रही गोलाबारी को लेकर चिंतित ही नहीं चौकन्ना हो गया है | यही नहीं मुंबई के 1993 के हमलों का मास्टर माइंड दाऊद भी  पाकिस्तान में ही छिपा हुआ है | उसने पाक के 9 शहरों में अपने ठिकाने बनाए हुए हैं जिनमे कराची, इस्लामाबाद और लाहौर सरीखे शहर शामिल हैं लेकिन पाक सरकार और सेना दाऊद के पाक में ना होने की बात अक्सर दोहराती रहती है |  अब ऐसे हालातो में पाक हमसे  बेहतर सम्बन्ध कैसे बना सकता है जबकि पाक भारत सरकार को किसी मसले पर तमाम डोजियर सौपे जाने के बाद भी सहयोग नहीं करता   ?

 26 / 11 के हमलो के बाद भारत ने  जहाँ कहा था जब तक 26 /11 के दोषियों पर पाक  कार्यवाही नहीं करेगा तब तक हम उससे कोई बात  नहीं  करेंगे लेकिन आज तक उसके द्वारा दोषियों पर कोई कार्यवाही ना किये जाने के बाद भी हम 200 बिलियन व्यापार , वीजा  नियमो में ढील , क्रिकेट और विदेश सचिवो  के आसरे अगर इस दौर में निकटता बढाने की  सोच  रहे हैं तो यह हमारी लुंज पुंज विदेश नीति वाले रवैये को उजागर करता है । भारत तो पहले  ही पाक को  मुंबई हमलों के सभी सबूत पेश कर  चुका  है लेकिन पाक उस पर कोई कार्यवाही  क्यों नहीं करता ?  अब तो  हर घटना में अपना  हाथ होने से इनकार करना पाक का शगल ही बन गया है । 

लाइन ऑफ़ कंट्रोल पर युद्ध विराम तो नाम मात्र का है इसके बावजूद भी उस पूरे इलाके में सैनिको के बीच अकसर तनाव देखा जा सकता है और फायरिंग की घटनाएं आये  दिन होती रहती हैं।  15  अगस्त को भी पाक सेना की तरफ से भारतीय जवानों को निशाना बनाया गया | भारतीय सेना में घुसपैठ की कार्यवाहियां अब पाक की सेना  ही कर  रही है क्युकि  पाक  का पूरा ध्यान अपने अंदरूनी झगडो  और तालिबान में लगा रहा है । उसे लगता है अगर ऐसा ही जारी रहा तो आने वाले दिनों में कश्मीर उसके हाथ से निकल जायेगा । अतः ऐसे हालातो में वह अब लश्कर और हिजबुल मुजाहिदीन जैसे संगठनो को आई एस आई एस के जरिये  पी ओ  के  में भारत के खिलाफ एक  बड़ी जंग लड़ने के लिए उकसा रहा  है जिसमे कई कट्टरपंथी संगठन उसे मदद कर रहे हैं । यही नहीं घाटी में अब आई  एस आई एस के झंडे भी कई मर्तबा लहराए जा रहे हैं जो हमारे लिए खतरे की घंटी हैं |

पाक की राजनीती का असल सच किसी से छुपा नहीं है । वहां पर सेना कट्टरपंथियों का हाथ की कठपुतली ही  रही है । नवाज  सरकार तो नाम मात्र की लोकत्रांत्रिक है  असल नियंत्रण तो सेना का हर जगह है ।  पाक इस बार यह महसूस कर रहा है अगर समय रहते उसने भारत के खिलाफ अपनी जंग शुरू नहीं की तो कश्मीर का मुद्दा ठंडा पड  जायेगा । अतः वह भारतीय सेना को अपने निशाने पर लेकर कट्टरपंथियों की पुरानी  लीक पर चल निकला है । आने वाले दिनों में भारत को चौकन्ना रहने की जरुरत है  क्युकि  तालिबानी लड़ाके जिन्होंने पाक में पनाह ली हुई है वह आई एस आई एस के जरिये भारत में घुसपैठ तेज कर सकते हैं । कश्मीर का राग पाक का पुराना राग है जो दोस्ती के रिश्तो में सबसे बड़ी दीवार है । ऐसे दौर में हमें पाक पर ज्यादा ध्यान देने की जरुरतहै । हमारी सेना को ज्यादा से ज्यादा अधिकार सीमा से सटे इलाको में मिलने चाहिए ।

 सीमा पार खराब हालातो के चलते  अब भारत को पाक के साथ सख्ती से पेश आना चाहिए । उसे किसी तरह की ढील नहीं मिलनी चाहिए । पकिस्तान हमारे धैर्य  की परीक्षा ना ले अब ऐसे बयान देकर काम नहीं चलने वाला क्युकि  सीमा पार की गोलाबारी की घटनाओ ने  हमारे  सैनिकॊ  के मनोबल को   गिराने का काम किया है । पाक के साथ भारत को अब किसी तरह की नरमी नहीं बरतनी चाहिए और कूटनीति के जरिये अंतर्राष्ट्रीय स्तर  पर उसके खिलाफ माहौल बनाना  चाहिए  साथ ही अमेरिका सरीखे मुल्को से बात कर यह बताना  चाहिए  आतंक के असल सरगना पकिस्तान में  पल रहे हैं और आतंकवाद के नाम पर दी जाने वाली हर मदद का इस्तेमाल पाक दहशतगर्दी फैलाने में कर रहा है । अगर पाक को विदेशो से मिलने वाली मदद इस दौर में बंद हो जाए तो उसका दीवाला निकल जायेगा । ऐसी सूरत में कट्टरपंथियों के हौंसले भी पस्त हो जायेंगे । तब भारत  पी ओ के में चल रहे आतंकी शिविरों को अपना निशाना बना सकता है माकूल कार्यवाही के लिए यही समय बेहतर होगा । रक्षा मंत्री मनोहर परिकर को भी अब पाक मामले में कोई लकीर खीचने की जरुरत है |   अब समय आ गया है जब पाक के खिलाफ भारत बातचीत के विकल्पों से इतर कोई बड़ी कार्यवाही की रणनीति अख्तियार करे क्युकि एक के बाद एक झूठ  बोलकर पाक हमें धोखा दे रहा है और  कश्मीर के मसले के अन्तरराष्ट्रीयकरण  के पक्ष में खड़ा है ।

                   आज तक हमने पाक के हर हमले का जवाब बयानबाजी से ही दिया है । भारत सरकार धैर्य , संयम  की दुहाई देकर हर बार लोगो के सामने सम्बन्ध सुधारने की बात दोहराती रहती है ।  इसी नरम रुख से पाक का दुस्साहस इस कदर बढ  गया है  अंतरराष्ट्रीय नियमो का उल्लंघन करता है और कश्मीर पर मध्यस्थता का पुराना राग छेड़ता  रहता है । यह दौर नमो सरकार के लिए भी  असली परीक्षा का है  क्युकि  उसी की नीतियां अब पाक के साथ भारत के भविष्य को ने केवल तय कर सकती है बल्कि अंतरराष्ट्रीय  मोर्चे पर यह मामला उसकी कूटनीति के आसरे दुनिया तक पहुच सकती  है ।  मोदी अपनी विदेश नीति से सबका ध्यान खीच रहे है | वह मध्य पूर्व के कई देशो के साथ अरब देशों में भी घूमघूमकर  इशारों इशारों में पाक को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं | वह पूरी दुनिया घूमकर भारत के अनुकूल नीतियों को बनाने में लगे हैं और उनकी इस  विदेश नीति  पर इस बार पूरी दुनिया की नजर  है | वह भूटान से लेकर नेपाल और म्यामार से लेकर अमरीका , जर्मनी , चीन  जापान , दुबई को अपने आसरे न केवल साध रहे हैं बल्कि पहली बार नेहरु से लेकर इंदिरा की नीतियों से इतर नई राह अपने विदेश दौरों  में  खोल रहे हैं | ऐसे में पाक को लेकर भी अब कोई निर्णायक फैसला लेने का वक्त उन्हें देना होगा | भारत बार बार भले ही अपनी तरफ से  बातचीत के दरवाजे खोलने की कोशिश करता रहा हो लेकिन पाकिस्तान की दिलचस्पी  न तो पहले बातचीत में रही है और न ही शायद भविष्य में कभी रहे | ऐसे में अब समय आ गया है हम  संयम को छोड़कर अपनी कूटनीति से पाक को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मात  दें | 

Friday, 21 August 2015

नगरीय निकाय चुनावों ने लौटाई 'शिव' के चेहरे की मुस्कान

 




मुरैना, उज्जैन, हरदा, चक्रघाट ,भैंसदेही, कोटार, सुवासरा और विदिशा के नगरीय निकाय चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की फतह के बाद मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री  शिवराज सिंह चौहान का कद राष्ट्रीय  राजनीती में एक बार फिर बढ़ गया है । व्यापम घोटाले पर तीखी आलोचना झेलने के बावजूद मध्यप्रदेश में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने प्रदेश के 10 में से 8 नगरीय निकाय के चुनावों में जीत हासिल की है।  मध्यप्रदेश के हालिया निकाय चुनाव में भाजपा ने कांग्रेस से न केवल आठ सीटें छीन ली बल्कि कांग्रेस  महज एक ही सीट बचा पाने में सफल हो पाई। अब राज्य के 16  नगर निगम पर भाजपा का कब्ज़ा हो चला है। व्यापम की आंच के बीच 49 मौतों के बाद यह जीत मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के लिए बड़ी राहत लेकर आई है |  मध्य प्रदेश के इन नगरीय निगमों को जीतने के बाद शिवराज ने अपने को राजनीती के चाणक्य के रूप में  स्थापित किया है बल्कि निगम दर निगम कांग्रेस का सफाया जिस तरीके से हुआ है उसने पहली बार इस बात को साबित किया है प्रदेश में  कांग्रेस को सत्ता में वापसी के लिए लम्बा इन्तजार करना पड़  सकता है ।  

विधानसभा और फिर लोकसभा चुनावों के बाद नगरीय निकाय चुनावों में  मिली कांग्रेस की  हार में बड़े सबक छिपे हुए हैं । इसने एक बात को साबित किया है अब अगर आपको चुनाव जीतना है तो खूब पसीना बहाना होगा और  जनता की नब्ज को पकड़ना होगा जिसे शिवराज ने मध्य प्रदेश में बीते कई वर्षों  से बखूबी पकड़ा है । वह इन चुनावो में ना केवल जीत के स्टारप्रचारक थे बल्कि भाजपा अध्यक्ष नंद कुमार चौहान ने जिस तरीके से शिवराज के साथ बिसात बिछाई वह न केवल उनके बेहतर तालमेल की मिसाल थी बल्कि सत्ता और संगठन का बेहतर तालमेल भी नजर आया । इन निकाय चुनावों के परिणामों ने शिवराज को संजीवनी देने का काम किया है | कहने को यह नगरीय निकाय चुनाव था लेकिन भाजपा शुरू से इन चुनावों को लेकर संजीदा थी शायद यही वजह रही चुनाव की तारीखें घोषित होते ही उसने अपना होम वर्क शुरू कर दिया | भाजपा के नेताओं ने इन चुनावों में नगरीय निकायों में घूमघूम कर न केवल प्रचार किया बल्कि शिव के मंत्रियों ने भी दिन रात एक किया | इस जीत के बाद भाजपा गदगद है वहीँ व्यापम मसले पर शिवराज के इस्तीफे की मांग कर रही कांग्रेस को भी सांप सूंघ गया है | 

कांग्रेस ने विधानसभा-लोकसभा चुनावों के बाद नगरीय निगम  चुनावों में भी अपने लगातार कमजोर प्रदर्शन को दोहराया है। नगर निगम चुनाव नतीजों से साफ हो गया है कि कांग्रेस कार्यकर्ताओं का भरोसा डगमगा गया है। चुनाव में उनके शीर्ष नेताओं के बीच  भारी गुटबाजी देखने को मिली । गुटबाजी की बीमारी सुरेश पचौरी के दौर से ही कांग्रेस का पीछा नहीं छोड़ रही है । अरुण यादव के दौर के आने के बाद भी परिस्थितियां कमोवेश वैसी ही हैं जैसी कमोवेश बीते दौर में हुआ करती थी ।

 कांग्रेस के पास मध्य प्रदेश में दिग्गी राजा , ज्योतिरादित्य , अरुण यादव , अजय सिंह, कमलनाथ, सुरेश पचौरी,  कांति  लाल भूरिया के चेले चपौटों की अभी भी भारी फ़ौज ही कागजो में है |  कई बरस बाद भी उसके इन  दिग्गज नेताओ  के इलाको में ही  कांग्रेस की माली हालत सुधर नहीं सकी है ।  मिसाल के तौर पर कांग्रेस के कद्दावर नेता पूर्व केंद्रीय मंत्री  कमलनाथ का अपने गृह क्षेत्र  में बुरा हाल है | आज अगर वहां कोई चुनाव हो तो वह एक भी सीट अपने दम पर नहीं जिता सकते | छिंदवाड़ा में भाजपा का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है  जबकि छिंदवाड़ा ऐसी जगह है जहाँ कमलनाथ का जबरदस्त प्रभाव एक दौर में न केवल था बल्कि उनके अलावे वहां पर किसी का पत्ता तक नहीं खड़कता था | आज हालत यह है भाजपा कमलनाथ के इलाके में अपने पैर जमाने की कोशिशों में लगी है |  आने वाले दिनों में कमलनाथ को अपना गढ  अगर  मजबूत रखना है तो अभी से उन्हें खासी मेहनत  की जरुरत पड़ेगी नहीं तो शिवराज की आंधी में पूरी कांग्रेस ढह जायेगी । यही हाल राजगढ की सारंगपुर सीट का है जहाँ पर दिग्गी राजा का एकछत्र राज शुरू से कायम रहा है लेकिन अब यहाँ भी कांग्रेस ढलान पर है और दिग्गी राजा के लिए खतरे की घंटी बज रही है |  

कांग्रेस अध्यक्ष अरुण यादव के लिए भी नगरीय निकाय की हार निश्चित ही  बड़े खतरे की घंटी  है ।  इन चुनावो के बाद उनका सिंहासन भी खतरे में पड़ता नजर आ रहा है ।  कांग्रेस के साथ  मध्य प्रदेश  में एक बड़ी बीमारी गुटबाजी की लग गयी है जो हर चुनाव में उसका खेल ख़राब कर देती है  ।  इस बार भी ऐसा ही हुआ है | कांग्रेस के हर बड़े नेता के इलाकों में भाजपा मजबूती के साथ आगे बढती जा रही है लेकिन कांग्रेस हर चुनाव से सबक सीखने को तैयार ही नहीं दिखती | वहीं भाजपा की जीत में  बूथ मैनेजमेंट  और कार्यकर्ताओ  के समर्पण और शिवराज सिंह चौहान से लेकर संगठन की मजबूत बिसात को हर छोटे बड़े चुनाव में  नजरअंदाज नहीं किया  सकता । भाजपा की हर जीत में  जीत के असल  नायक शिवराज ही रहते हैं ।  मुख्यमंत्री ना केवल हर चुनाव में  कई किलोमीटर के रोड शो  न केवल अपने दम पर करते हैं बल्कि पूरे प्रदेश  में घूम घूम कर अपने प्रत्याशी के लिए अपना तन मन समर्पित करने से कभी पीछे नहीं रहते वहीं कांग्रेस के पास शिवराज सरीखा कोई नेतृत्व नहीं बचा है जो उनको चुनौती देने की स्थिति में खड़ा है |  

नमो के कांग्रेस मुक्त भारत की परिकल्पना अब मध्य प्रदेश में साकार  होती दिख रही है । शिवराज ने मध्य प्रदेश में जिस तरीके से  बीते कुछ बरस से सबको साथ लेकर अपना मध्य प्रदेश बनाने की ठानी है वह उनकी दूरगामी सोच का परिचायक है । मुख्यमंत्री के रूप में जिस तरीके से शिवराज ने मध्य प्रदेश में काम किया है और उसे बीमारू राज्य से बाहर निकाला है उससे अब भाजपा का शिवराज मॉडल आने वाले दिनों में भाजपा शासित  राज्यों के लिए रोल मॉडल बन सकता है । नगरीय निकाय चुनाव के  हालिया परिणाम भाजपा के पक्ष में आने से निश्चित ही शिवराज मजबूत होंगे । हाल के दिनों में कैलाश विजयवर्गीय के राष्ट्रीय राजनीती में  चुनावी प्रबंधक के रूप में उभरने से कुछ लोग यह मान रहे थे हरियाणा में भाजपा की सरकार बनने के बाद अब राज्य में कैलाश विजयवर्गीय  को शिवराज का उत्तराधिकारी माना जा रहा था लेकिन अब कैलाश के राष्ट्रीय महासचिव बनाये जाने के बाद से शिवराज के लिए मध्य प्रदेश की राह निष्कंटक है | मौत के व्यापम ने शिवराज सरकार का अमन चैन छीन लिया था लेकिन  इस जीत के बाद शिवराज जिस तरीके से मजबूत हुए हैं उसने यह साबित किया है फिलहाल जिस अंदाज में वह  मजबूती  कदम बडा  रहे हैं उससे लगता तो यही है उनके कद को चुनौती  दे पाने की स्थिति में फिलहाल कोई नेता दूर दूर तक उनके आस पास भी नहीं फटकता । 

  मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने  प्रदेश में हुए हर रोड शो में न केवल विकास का तड़का लगाया और अपनी उपलब्धियों के आसरे मतदाताओ का दिल जीतने में कोई कोर कसार नहीं छोडी है । संगठन और सरकार के जबरदस्त तालमेल से भाजपा का कांग्रेस मुक्त भारत का सपना साकार होता जा रहा है। आने वाले वर्षों में अब मध्य प्रदेश में कोई चुनाव नहीं है लेकिन हाल ही में हुए चुनावों से कांग्रेस को सबक लेने की आवश्यकता  है ताकि वह अपनी खोई प्रतिष्ठा पुन: प्राप्त कर सकें।

नगरीय चुनावो में कमल के खिलाने के बाद शिवराज ने साबित कर दिया है मध्य प्रदेश में उनका राज किसलिए चलता है । इस जीत के बाद केन्द्रीय स्तर पर उनका कद एक बार फिर बढ़  गया है  ।  संभवतया केन्द्रीय नेतृत्व अब  मध्य प्रदेश को लेकर लिए जाने वाले हर निर्णय में उनको फ्री हैण्ड दे । वहीँ  कांग्रेस को चाहिए वह बचे  वर्षो में  मजबूती से विपक्ष की भूमिका निभाए अन्यथा शिवराज अकेले ही सभी पर भारी पड़ जायेंगे ,इससे अब शायद ही कोई इंकार करे ।  कांग्रेस को  चुनावो के बाद अब  इन बातो की दिशा में गंभीरता से विचार करने की जरुरत है ।

Saturday, 15 August 2015

प्रधानसेवक आप तो एकदम बदल गए सरकार

     

आज से ठीक एक बरस पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी ने जब लाल किले की प्राचीर से स्वतंत्रता दिवस के मौके पर देश के नाम संबोधन दिया था तो हर किसी ने मुक्त कंठ से उनकी प्रशंसा की थी | हर कोई उनकी तारीफों के कसीदे न केवल पढ़ रहा था बल्कि उन्हें लीक से अलग हटकर चलने वाला प्रधानमंत्री भी बता रहा था | वैसे भी इससे पूर्व जितने भी प्रधानमंत्री लाल किले की प्राचीर से बोले वह कमोवेश बिजली , पानी और शिक्षा , गरीबी जैसे मुद्दों पर ही बात करते नजर आये | 

पहली बार मोदी ने नई लीक पर चलने का साहस ना केवल बीते बरस दिखाया बल्कि अपने भाषणों से लोगों में उत्साह और उमंग का संचार किया | मोदी ने ना केवल जोशीले भाषण से सभी का दिल जीतने की कोशिश की बल्कि स्वच्छ भारत , निर्मल भारत और आदर्श ग्राम योजना  और सबका साथ सबका  विकास सरीखे वायदों से राजनीती में आदर्श लकीर खींचने  की कोशिशें तेज की लेकिन  इस बार के स्वतंत्रता दिवस के मौके पर पी एम बदले बदले से नजर आये | इसका एक कारण यह हो सकता है पिछली बार वह दिल्ली के लिए नए थे और उनकी सरकार का हनीमून पीरियड  चल रहा था लेकिन ठीक एक साल के बाद अब सिस्टम के अन्दर काम करने पर उन्हें इस बात का भान हो चला है कथनी और करनी को अमली जामा पहनना इतना आसान नहीं है और वह भी उस देश में जहाँ पर नौकरशाही का दौर हावी हो और हवाई घोषणाओं का पिटारा खुलता आ रहा हो  शायद यही वजह रही प्रधानमंत्री के भाषण में वह तेज गायब था जो पिछली दफा हमें देखने को मिला | ललितगेट ,व्यापम और वसुंधरा प्रकरण ने भाजपा की कैसी किरकिरी हाल के दिनों में कराई है यह किसी से  छुपी नहीं है और खुद प्रधानमंत्री  मोदी भी इससे आहत दिखाई दिए जिस वजह से उन्होंने इन प्रकरणों से अपने को अलग झलकाने की कोशिशें की और खुद की सरकार का बचाव यह कहते हुए किया कि पंद्रह महीने की उनकी सरकार पर किसी तरह का दाग नहीं लगा है |

 पिछली बार मोदी 64 मिनट बोले थे इस बार मोदी 86 मिनट बोले | आज़ादी के दौर को याद करें तो उस दौर में नेहरु ने 72 मिनट का भाषण दिया था | इस तरह से मोदी का स्वतंत्रता दिवस पर दिया गया  अब तक का यह सबसे लम्बा  भाषण रहा  | सवा सौ करोड़ देशवासियों को संबोधित करते हुए उन्होंने 38 दफा इस बार  नए शब्द टीम इंडिया शब्द का इस्तेमाल किया | 125 करोड़ देशवासियों को संबोधित करते हुए उन्होंने यह जताने से भी परहेज नहीं किया कि उनकी नीतियों में आदिवासी से लेकर गरीब और शोषित वंचित तबके तक शामिल हैं |

 गांधी और अम्बेडकर को साधकर उन्होने एक तीर से कई निशाने खेलने की कोशिश की |  उन्होंने कहा सवा सौ करोड़ देशवासी जब एकजुट होकर खेलते हैं तो राष्ट्र का विकास बुलंदियों तक पहुच सकता है |  यह अलग बात है मोदी अपने भाषणों में सभी को साथ लेकर चलने की बात जरुर कहते रहे हैं लेकिन यह तथ्य शायद ही किसी से छुपा हो भाजपा में अब  आगे आगे मोदी हैं तो पीछे पीछे शाह है जिनके इशारों पर न केवल पूरी भाजपा इस दौर में चल रही है बल्कि वह नेता किनारे हैं जिनकी अतीत में निकटता कभी आडवानी और कभी डॉ जोशी वाले कैम्प के साथ रही है |  

इस दौर में मोदी सरकार के आने के बाद भले ही भाजपा के अपने नेताओं पर सांप्रदायिक सौहार्द को बिगाड़ने के आरोप लगाये जाते रहे हों लेकिन प्रधान मंत्री  मोदी ने अपने शुरुवाती  भाषण में इस बार जातिवाद और साम्प्रदायिकता को ही निशाने पर लिया | यह ऐसे मसले हैं जिन पर पी एम की चुप्पी देश को खलती रही है | ओबामा के भारत दौरे के समय भी यह मसला जोर शोर से उठा था कि हमारे देश में अल्पसंख्यक अपने को सुरक्षित महसूस नहीं करते और उस दौर को याद करें तो हरामजादे से लेकर लव जेहाद और धर्म परिवर्तन  जैसे मसले खूब चर्चा के केंद्र में रहे  | यही नहीं चर्च पर लगातार हमले होते रहे लेकिन पी एम मोदी ने मौन व्रत ही धारण किया |  अगर इस बार 

प्रधानमंत्री ने कहा है हमारे देश का सद्भाव ही हमारी सबसे बड़ी पूंजी है इसे किसी भी तरह चोट नहीं पहुंचनी चाहिए तो इसे यक़ीनन राजनीती के नए संकेतों के तौर पर लिया जाना चाहिए | बिहार और यू पी की पूरी चुनावी बिसात बिछाने में शायद पी एम को इससे मदद मिले | मझे हुए राजनेता के तौर पर मोदी  आज यह कहने से भी नहीं चूके  जब तक देश के पूर्वोत्तर राज्यों और नॉर्थ ईस्ट का विकास नहीं होगा तब तक यह देश प्रगति पथ पर आगे नहीं बढ़ सकता | संभवतः यह कहने के पीछे मोदी की मंशा बिहार और यू पी के आने वाले चुनाव हैं जहाँ की पूरी राजनीति जातीय गठजोड़ पर टिकी हुई है |

 अपने भाषणों में जातिवाद को जहर बताकर और विकास के मोदी मंत्र से गरीबी मिटाने की घोषणा कर संभवतः मोदी भाजपा का रास्ता बंगाल बिहार और यू पी सरीखे बड़े राज्यों में साफ़ कर रहे हों | बीते बरस लोक सभा चुनावों के दौरान  मोदी सरकार पर कॉरपरेट की गोद में बैठे रहने के आरोप लगाये जाते रहे लेकिन स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से दिए गए अपने दूसरे भाषण में मोदी ने गरीबो और वंचितों के प्रतिनिधित्व की बात कही और इसे जनभागीदारी से जोड़ने की कोशिश की | पहली बार उनके भाषण में कॉरपरेट शब्द गायब दिखा | 

मोदी ने अपने इस भाषण में अपनी सरकार की अब तक की उपलब्धियों का पिटारा ही खोला  |  मोदी ने 17 करोड़ लोगों का जिक्र इस भाषण में किया जिन्होंने प्रधानमंत्री जन धन योजना के तहत खाते खुलवाए | साथ ही उन्होंने स्वच्छ भारत अभियान पर अपनी पीठ खुद थपथपाई और इस बार 9 सेलेब्रिटियो से इतर बच्चो को ब्रांड एम्बेसडर बना दिया | मोदी ने पिछली बार स्कूलों में शौचालय बनाने की बात की थी इस बार भी उन्होंने सवा चार लाख शौचालय बनाने का काम पूरा होने की बात कही | 

श्रमेव जयते के जिस नारे से मोदी सरकार वाहवाही बटोरने की बात कर रही थी लाल किले की प्राचीर से मोदी ने श्रम कानूनों को चार अध्याय में समेटने की कोशिश की | यह अलग बात है देश के हर कोने में मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी तो दूर शोषण बदस्तूर जारी है | इस पर प्रधानमंत्री कुछ नहीं बोले | भ्रष्टाचार को देश के लिए कलंक बताते हुए उन्होंने अपनी सरकार की नीतियों का चिटठा जनता के सामने रखा और डायरेक्ट बेनिफिट और कोयला की नीलामी से पाए गए राजस्व की चर्चा की जिससे दलालों और कालाबाजारी पर रोक लगी | 

उन्होंने कोयले की नीलामी से तीन लाख करोड़ रुपये कमाने और ऍफ़ एम की नीलामी से एक हजार करोड़ रुपये खजाने में आने की घटना का जिक्र अपने भाषण में कर भ्रष्टाचार को रोकने की प्रतिबद्धता जताई | मोदी ने काले धन को लाने के लिए कठोर क़ानून उनकी सरकार द्वारा लाने की  भी चर्चा की | यह अलग बात है भाजपा अध्यक्ष अमित शाह काले धन को चुनावी जुमला बता चुके हैं लेकिन प्रधानमंत्री ने कहा काले धन पर कठोर कानून लाये जाने के बाद अब देश से बाहर धन जा पाना इतना आसान नहीं है | मोदी ने युवाओं को टारगेट ऑडियंस बनाते हुए यह भी कहा छोटी नौकरियों के लिए इंटरव्यू बंद किये जाने चाहिए | 

वन रैंक वैन पेंशन पर सबसे ज्यादा उम्मीदें लोगों को पी एम से थी जिस पर मोदी ने सैधान्तिक सहमति तो जताई लेकिन इसके लिए कोई डेडलाइन नहीं दी जिससे पूर्व सैनिकों में सरकार के रुख से साफ़ नाराजगी देखी जा सकती है और यह सभी जंतर मंतर पर अपनी मांगों को लेकर अभी भी डटे हैं लेकिन सरकार का रुख इस मसले पर अभी भी साफ़ नहीं है | किसान मोदी से ज्यादा उम्मीदें लगाये बैठे थे लेकिन मोदी ने किसानों को यूरिया उपलब्ध कराने से लेकर 18000 गाँवों में एक हजार दिनों में 24 घंटे बिजली पहुचाने का वादा किया |  इसके अतिरिक्त कृषि मंत्रालय  अब कृषि और किसान मंत्रालय के नाम से जाना जायेगा यह घोषणा उन्होंने की | 

पी एम भूमि अधिग्रहण सरीखे जरुरी मसले पर कुछ नहीं बोले जबकि पिछले कुछ समय से सरकार इस मामले पर बुरी तरह घिरी हुई है | बार बार अध्यादेशों के जरिये इस पर सरकार को बेशक मुह की खानी पड़ी और संसद में भी सरकार की सांसें इस बिल ने अटकाई हुई हैं | पी एम मोदी चाहते तो इस पर कुछ बात जरुर कर सकते थे और किसानों को यह दिलासा दिला भी सकते थे कि उनकी जमीनें औने पाने दामो पर नहीं ली जाएँगी और अगर ली भी जाएगी तो उचित मुआवजा मिलने के साथ ही  तयशुदा   समयसीमा  के भीतर उसमे काम होगा | 

मोदी अपने भाषण में यह भरोसा नहीं जगा सके |  दूसरी बार लाल किले से दिए अपने भाषण में मोदी ने स्टार्ट अप एंड स्टैंड अप का नारा दिया जिसके तहत बैंक दलित वंचित  और आदिवासियों को उद्योग  लगाने के लिए मदद करेंगे जिससे देश का विकास संभव हो पायेगा | मोदी के इस बार के भाषण में पडोसी पाकिस्तान भी  गायब था | पाकिस्तान द्वारा सीमा पार से लगातार फायरिंग के बाद भी पाकिस्तान के खिलाफ कुछ न बोलकर मोदी सरकार ने विपक्ष को एक और मुद्दा थमा दिया | 

बीते दिनों भारतीय सीमा में एक आतंकी की गिरफ्तारी के बाद जिस तरह पाक का कच्चा चिट्ठा खुला उसने पाक को आतंक की नर्सरी के रूप में दुनिया के सामने लाकर खड़ा कर दिया | मोदी चाहते तो अपने भाषण में पाक का जिक्र कर उसे आतंक का मार्ग छोड़ने की नसीहत और अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति के केंद्र में रखकर उसे मात दे सकते थे लेकिन मोदी पाक के मसले पर कुछ नहीं बोले | यही नहीं प्रधानमंत्री के आज के भाषण में विदेश नीति भी गायब रही | जबकि मोदी को ऐसा प्रधानमंत्री होने का गौरव प्राप्त है जिसने विदेश नीति की नई लीक पर देश को आगे ले जाने का काम किया है जिससे दुनिया में भारत का मस्तक ऊँचा हुआ है | खुद पी एम मोदी अब तक के अपने पहले साल के कार्यकाल में ही कई ताकतवर मुल्कों की यात्रा कर अब मध्य पूर्व में अपने कदम मजबूती के साथ बढ़ा रहे हैं |

 पी एम मोदी अगर चाहते तो आज के भाषण में वैदेशिक संबंधो पर खुलकर बात कर सकते थे लेकिन इस विषय को आज उन्होंने नहीं छुआ | इसी तरह योग सरीखे मसले पर प्रधानमंत्री का लाल किले से कुछ न कहना देशवासियों के दिल को तोड़ गया | पी एम मोदी ने यू एन ओ में  अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर जिस तरह से सैकड़ों  देशों को राजी किया और पहली बार देश में योग को लेकर एक नई  सुबह का आगाज हुआ उससे मोदी सरकार कि बड़ी उपलब्धि माना जा सकता है  |  भारत की इस योग की  ताकत का लोहा पूरी दुनिया बीते 21 जून को मना चुकी है जिसे मोदी सरकार के खाते में जोड़ा जाना उचित होगा लेकिन अपने भाषण में मोदी इन मुद्दों को नहीं छू सके शायद इसका बड़ा कारण सुषमा ललित गेट , मौत का व्यापम और वसुंधरा का प्रकरण रहा जिसने ऐसे प्रधानमंत्री को पिछले कुछ दिनों से अन्दर से ऐसा हिला दिया जिसके चलते वह कई महीनों से इस पर अपनी चुप्पी नहीं तोड़ सके | 

आज भी चुप्पी तो नहीं टूटी लेकिन भ्रष्टाचार पर  गोल मोल बातों से पी एम मोदी ने खुद अपनी छवि को बचाने की भरपूर कोशिश तो कि इससे आप और हम इनकार तो नहीं कर सकते | वैसे प्रधानमंत्री मोदी की व्यक्तिगत ईमानदारी और प्रशासनिक योग्यताओ और बेहतर कप्तान की योग्यताओं  पर शायद ही किसी को संदेह हो क्युकि मोदी एक मंझे  हुए राजनेता हैं और जनता के मूड को बखूबी पढने वाले राजनेता भी जो ऑडियंस देखकर भाषण देते हैं लेकिन आज का पूरा भाषण उन्होने न केवल बीच बीच में पर्ची देखकर  पढ़ा बल्कि बीच बीच में वह रुमाल पोछकर और पानी पीकर धाराप्रवाह बोलते रहे शायद इसकी बड़ी वजह कुछ समय से भाजपा शासित राज्यों में चल रही नूराकुश्ती है जिसने पी एम को अन्दर से  इस कदर हिलाकर रख दिया है कि अब  मनोचिकित्सकों को  भी उनकी बदली हुई बाडी लैंग्वेज आसानी से नजर आने लगी है | 

कुलमिलाकर स्वतंत्रता दिवस के अपने दूसरे भाषण में पी एम मोदी का पिछले बरस वाला जोश गायब दिखा | गुजराती दहाड़ भाषण से गायब ही रही शायद पी एम अपनी कैबिनेट इंडिया की फिरकी में उलझकर रह गए जिस कारण कई अहं मसलों पर न कुछ उगलते बन रहा था और ना ही कुछ निगलते |    



Tuesday, 28 July 2015

डॉ कलाम को आखरी सलाम



सपने वो नहीं होते जो आपको रात में  नींद में आएं लेकिन सपने वे होते हैं जो रात में सोने ना दें । ऐसी बुलंद सोच और अग्नि सरीखी ऊँची उड़ान रखने  वाले  मिसाइलमैन कलाम ही थे जिन्हें पीपुल्स प्रेसीडेन्ट यूँ  ही नहीं कहा जाता था । अपने राष्ट्रपति  पद  के 5 बरस के कार्यकाल   में कलाम ने अन्य  राष्ट्रपति   के  कार्यकालों के  मुकाबले   न केवल अमिट  छाप छोड़ी बल्कि ऐसी मिसाल भारतीय राजनीती में दूर दूर तक देखने को नहीं मिलती । कलाम ने राष्ट्रपति पद के दरवाजे ना केवल आम आदमी के लिए ही नहीं खोले बल्कि समाज के हर तबके को अपने साथ जोड़ने की कोशिश की ।  अपनी सादगी से उन्होंने पूरे देश की जनता का दिल जीता शायद यही वजह रही शिलॉंग में देर शाम जब उनकी मौत की खबर आई तो  किसी को सहसा यकीन ही नहीं हुआ  कि कलाम साहब इस दुनिया में नहीं रहे और फिर सोशल  मीडिया  में जिस तरह से उनको श्रद्धांजलि देने का सिलसिला शुरू हुआ उसने इस बात को बखूबी बताया कि कलाम को चाहने वाले किस तरह उनको अपने दिल  में बसाये हुए थे ।   फेसबुक से लेकर ट्विट्टर हर जगह टॉप टेन में कलाम ही ट्रेंड हो रहे थे । कलाम की शख्सियत ही  यूँ  थी कि हर कोई उनका मुरीद हो जाता था । राष्ट्रपति पद पर रहते हुए  भी वह आम   इंसान की तरह सादगी में रहते थे ।    कलाम देश के वह सम्मानित व्यक्तियों में  से एक थे जिन्होंने एक वैज्ञानिक और एक राष्ट्रपति के रूप में अपना अतुल्य योगदान देकर देश सेवा की।     राष्ट्रपति पद पर अपना कार्यकाल पूरा करने के बाद से कलाम शिलांग, अहमदाबाद और इंदौर के भारतीय प्रबंधन संस्थानों तथा देश एवं विदेश के विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों में अतिथि प्रोफेसर के रूप में कार्यरत थे। डॉ कलाम ने राष्ट्राध्यक्ष रहते हुए राष्ट्रपति भवन के दरवाजे आम जन के लिए खोल दिए जहां बच्चे उनके विशेष अतिथि होते थे ।  

15  अक्टूबर 1931 को तमिलनाडु के रामेश्वरम में पैदा हुए कलाम ने मद्रास इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलोजी से स्नातक करने के बाद भौतिकी और एयरोस्पेस इंजीनियरिंग का अध्ययन किया और फिर उसके बाद रक्षा शोध एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) से जुड़ गए। उनका  बचपन  भी  बड़ा संघर्ष पूर्ण रहा।प्राइमरी स्कूल के बाद कलाम ने श्वार्ट्ज हाईस्कूल, रामनाथपुरम में प्रवेश लिया। वहां की शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने 1950 में सेंट जोसेफ कॉलेज, तिरुचिन्नापल्ली  में प्रवेश लिया। वहां से उन्होंने भौतिकी और गणित विषयों के साथ बीएससी की डिग्री प्राप्त की। अपने अध्यापकों की सलाह पर उन्होंने स्नातकोत्तर शिक्षा के लिए मद्रास इंस्टीयट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, चेन्नई का रुख किया। वहां पर उन्होंने एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग का चयन किया। कलाम की इच्छा थी कि वे वायु सेना में भर्ती हों तथा देश की सेवा करें। यह इच्छा पूरी न हो पाने पर उन्होंने बे-मन से रक्षा मंत्रालय के तकनीकी विकास एवं उत्पाद का चुनाव किया। वहां पर उन्होंने 1958 में तकनीकी केन्द्र  सिविल विमानन  में वरिष्ठ वैज्ञानिक सहायक का कार्यभार संभाला। उन्हीं दिनों इसरो में स्वदेशी क्षमता विकसित करने के उद्देश्य से ‘‘उपग्रह प्रक्षेपण यान कार्यक्रम’ की शुरुआत हुई। कलाम को इस योजना का प्रोजेक्ट डायरेक्टर नियुक्त किया गया जिसे  उन्होंने  भलीभांति अंजाम तक पहुंचाया ।  जुलाई 1980 में ‘‘रोहिणी’ उपग्रह को पृथ्वी  की कक्षा के निकट स्थापित करके भारत को ‘‘अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष क्लब’ के सदस्य के रूप में स्थापित कर दिया।

डॉ. कलाम ने भारत को रक्षा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्यद से रक्षामंत्री के तत्कालीन वैज्ञानिक सलाहकार डॉ. वीएस अरुणाचलम के मार्गदर्शन  में ‘‘इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम’ की शुरुआत की। इस योजना के अंतर्गत ‘‘त्रिशूल’  ‘‘आकाश’, ‘‘नाग’, ‘‘अग्नि’ एवं ‘‘ब्रह्मोस’ मिसाइलें विकसित हुई। डॉ. कलाम ने जुलाई 1992 से दिसम्बर 1999 तक रक्षा मंत्री के विज्ञान सलाहकार तथा डीआरडीओ के सचिव के रूप में अपनी सेवाएं प्रदान कीं। उन्होंने भारत को ‘‘सुपर पॉवर’ बनाने के लिए 11 मई और 13 मई 1998 को सफल परमाणु परीक्षण किया। इस प्रकार भारत ने परमाणु हथियार के निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण सफलता अर्जित की और यह डॉ  रणनीति थी  पोकरण विस्फोटों  की भनक अमरीका तक  को नहीं लगी और परीक्षण  सफल हुआ ।  डॉ. कलाम नवम्बर 1999 में भारत सरकार के प्रमुख वैज्ञानिक सलाहकार रहे  और फिर 25 जुलाई 2002 को भारत के ग्यारहवें राष्ट्रपति के रूप में निर्वाचित हुए। वे 25 जुलाई 2007 तक इस पद पर रहे और उनको राष्ट्रपति बनाने में नेताजी ने मास्टर  स्ट्रोक उस  दौर में चला  था जब  वामपंथी  और विपक्ष एनडीए के इस  फैसले के साथ  गया था । 2012 में सबसे पहले नेताजी ने  तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी के साथ कलाम  पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम को राष्ट्रपति बनाने की बात सामने रखी थी लेकिन कांग्रेस की पसंद प्रणव मुखर्जी थे और वह कलाम के साथ नहीं थी । डॉ कलाम को  कार्यकाल की कोई चाह नहीं थी लेकिन करोङों  प्रशंसकों का दिल उन्होेने  नहीं तोड़ा  और अपने दूसरे कार्यकाल के चयन पर सभी दलों की सम्मति को जरूरी बताया लेकिन कांग्रेस शायद उन्हें दूसरा कार्यकाल  न  बना चुकी थी । 

 उनकी जीवनी ‘‘विंग्स ऑ फायर’ भारतीय युवाओं और बच्चों के बीच बेहद लोकप्रिय है। उनकी लिखी पुस्तकों में ‘‘गाइडिंग सोल्स : डायलॉग्स ऑन द पर्पज ऑफ लाइफ’ एक गंभीर कृति है। इनके अतिरिक्त उनकी अन्य चर्चित पुस्तकें हैं- ‘‘इग्नाइटेड माइंड्स : अनलीशिंग द पॉवर विदिन इंडिया’ ‘‘एनिवजनिंग अन एमपार्वड नेशन : टेक्नोलॉजी फॉर सोसायटल ट्रांसफारमेशन’, ‘‘डेवलपमेंट्स इन फ्ल्यूड मैकेनिक्सि एण्ड स्पेस टेक्नालॉजी’, ‘‘2020: ए विजन फॉर द न्यू मिलेनियम’ सह लेखक- वाईएस राजन, ‘‘इनिवजनिंग ऐन इम्पॉएर्वड नेशन : टेक्नोलॉजी फॉर सोसाइटल ट्रांसफॉरमेशन’ सह लेखक- ए सिवाथनु पिल्ललई। डॉ. कलाम ने तमिल भाषा में कविताएं भी लिखी  जो अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। उनकी कविताओं का एक संग्रह ‘‘द लाइफ ट्री’ के नाम से अंग्रेजी में भी प्रकाशित हुआ है।। डॉ. कलाम की योग्यता के दृष्टिगत सम्मान स्वरूप उन्हें अन्ना यूनिर्वसटिी ऑफ टेक्नोलॉजी, कल्याणी विविद्यालय, हैदराबाद विविद्यालय, जादवपुर विविद्यालय, बनारस हिन्दू विविद्यालय, मैसूर विविद्यालय, रूड़की विविद्यालय, इलाहाबाद विविद्यालय, दिल्ली विविद्यालय, मद्रास विविद्यालय, आंध्र विविद्यालय, भारतीदासन छत्रपति शाहूजी महाराज विविद्यालय, तेजपुर विविद्यालय, कामराज मदुरै विविद्यालय, राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विवि आईआईटी दिल्ली, आईआईटी मुंबई, आईआईटी कानपुर, बिड़ला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलाजी, इंडियन स्कूल ऑफ साइंस, सयाजीराव  ऑफ बड़ौदा, मनीपाल एकेडमी ऑफ हॉयर एजुकेशन ने अलग-अलग ‘‘डॉक्टर ऑफ साइंस’ की मानद उपाधियां प्रदान की। जवाहरलाल नेहरू टेक्नोलॉजी विवि हैदराबाद ने उन्हें ‘‘पीएचडी’ तथा विश्वभारती शान्ति निकेतन और डॉ. बाबा साहब भीमराव अंबेडकर विविद्यालय औरंगाबाद ने उन्हें डॉक्टर ऑफ लिटरेचर की मानद उपाधियां प्रदान कीं। इनके साथ वे इंडियन नेशनल एकेडमी ऑफ इंजीनियरिंग, इंडियन एकेडमी ऑफ साइंसेज बेंग्लुरू, नेशनल एकेडमी ऑफ मेडिकल साइंस नई दिल्ली के सम्मानित सदस्य, एरोनॉटिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया, इंस्टीट्यूशन ऑफ इलेक्ट्रानिक्स एंड टेलीकम्यूनिकेशन इंजीनियर्स के मानद सदस्य, इजीनियरिंग स्टॉफ कॉलेज ऑफ इंडिया के प्रोफेसर तथा इसरो के विशेष प्रोफेसर रहे।   डॉ कलाम को नेशनल डिजाइन अवार्ड-1980 (इंस्टीटयूशन ऑफ इंजीनियर्स भारत), डॉ. बिरेन रॉय स्पेस अवार्ड-1986 (एरोनॉटिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया), ओम प्रकाश भसीन पुरस्कार, राष्ट्रीय नेहरू पुरस्कार-1990 (मध्य प्रदेश सरकार), आर्यभट्ट पुरस्कार-1994, प्रो. वाई नयूडम्मा मेमोरियल गोल्ड मेडल-1996, जीएम मोदी पुरस्कार-1996, एचके फिरोदिया पुरस्कार-1996, वीर सावरकर पुरस्कार-1998 आदि। उन्हें राष्ट्रीय एकता के लिए इंदिरा गांधी पुरस्कार (1997) भी प्रदान किया गया। भारत सरकार ने उन्हें क्रमश: पद्म भूषण (1981), पद्म विभूषण (1990) एवं ‘‘भारत रत्न’ सम्मान (1997) से भी विभूषित किया गया।

 कलाम ने अपने कार्यकाल में कई राजसी परम्पराओं  तोडा । महामहिम होते भी वह सादा जीवन  थे ।  पूरा  देश मानो उनका परिवार था । चाचा नेहरू के बाद इस जेनरेशन के बच्चों क़े  लिए कलाम ही आईकन थे । बच्चो से बातें करना उनको पढ़ाना बहुत अच्छा  लगता था और संयोग देखिये शिलांग में भी वह प्लेनेट के बारे में व्याख्यान  देने ही गए थे कि अचानक उनको हार्ट अटैक आने  से  उनकी साँसों की डोर थम गई और पूरा देश शोक संतप्त हो उठा । राष्ट्रपति के रूप में कलाम की पहचान अलहदा थी ।   अपनी अनोखी संवाद शैली  के चलते कलाम अपने भाषणों में बच्चों  को हमेशा शामिल करते थे ।  व्याख्यान के बाद वह अक्सर छात्रों से उन्हें पत्र लिखने को कहते थे और प्राप्त होने वाले संदेशों का हमेशा तुरंत  जवाब देते थे । वी आई पी की परम्पराओं को तोड़कर  हर बार मंच से नीचे उतरकर  हाथ मिलाने  थे और फोटो खिंचवाने में भी हमेशा आगे  रहते  थे । अपने कार्यकाल में   लाभ के पद संबंधी विधेयक को मंजूरी देने से इनकार करके यह साबित कर दिया था कि वह एक ‘‘रबर स्टैम्प’  नहीं हैं।   इतना कुछ  होने के बाद भी  बतौर राष्ट्रपति अपने कार्यकाल में कई  आलोचना का सामना करना पड़ा ।  डॉ  कलाम ने अपने पांच साल के कार्यकाल में  21  में से  केवल एक दया याचिका पर कार्रवाई की और बलात्कारी धनंजय चटर्जी की याचिका को नामंजूर कर दिया जिसे बाद में फांसी दी गयी ।  यही नहीं  उन्होंने संसद पर आतंकवादी हमले में दोषी करार दिए जाने के बाद मौत की सजा पाने का इंतजार कर रहे अफजल गुरु की दया याचिका पर फैसला लेने में देरी को लेकर अपने आलोचकों को जवाब दिया और कहा कि उन्हें सरकार की ओर से कोई दस्तावेज नहीं मिला जिसके चलते  वह  कुछ कदम नहीं  उठा सके । बिहार  में वर्ष 2005 में राष्ट्रपति शासन लगाने के विदेश से लिए गए अपने विवादास्पद फैसले पर भी  उनको  आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था। हालांकि उन्होंने यह कहते हुए आलोचनाओं को खारिज कर दिया कि उन्हें कोई अफसोस नहीं है । 
  
वह  राष्ट्रपति  पद से रिटायर  टायर्ड  नहीं हुए । तकरीबन 300 से भी ज्यादा कालेजों और स्कूल में वह अपना लेक्चर देने गए । उनके जीवन में 2011  में एक मौका ऐसा भी अाया जब अमरीका के   एयरपोर्ट में पूर्व राष्ट्रपति होने के बाद भी सघन  तलाशी  ली गयी जहाँ  उनके कपडे उतारे जाने की घटना से पूरा देश आहत  हुआ था लेकिन डॉ कलाम ने इस पर कुछ भी नहीं कहा । यह उनकी महानता और जीवटता  थी  जो उन्हें महामहिम सरीखे शिखर पर ले गई और हमेशा आम इंसान की तरह  बेरोकटोक अपना काम समर्पित  भाव से  करते रहे ।  बेशक उनके निधन से  देश ने  महान वैज्ञानिक खो दिया है लेकिन इतिहास के पन्नों में वह जनता के राष्ट्रपति के रूप  में हमेशा अमर रहेंगे  । 

Wednesday, 15 July 2015

आईपीएल के तमाशे की कलंक कथा



7 बरस पहले ट्वेन्टी ट्वेन्टी विश्व कप के फाईनल मैच में पाक खिलाडी मिसबाह- उल –हक के शॉट पर श्रीसंत ने कैच पकड़कर न केवल भारत को टी 20 का सरताज बनाया बल्कि 1983  की सुनहरी यादो को भी पीछे छोड़ दिया जब पहली बार कपिल देव की अगुवाई में भारतीय क्रिकेट टीम ने विश्व कप जीतने का ककहरा सीखा था |  टी ट्वेंटी  विश्व कप जीतकर पाकिस्तान सरीखे चिर प्रतिद्वंदी को हराने के बाद भारत ने टी ट्वेन्टी में  भी अपनी सफलता के नए झंडे गाड़ दिये जिसके बाद भारत में ट्वेन्टी ट्वेन्टी का बुखार  परवान चढ़ने लगा | कैरी पैकर की तर्ज पर जब सुभाष चंद्रा ने आई सी एल चलाई तो उसकी बादशाहत को चुनौती देने के लिए ललित मोदी ने आई पी एल का दाव खेला | कॉर्पोरेट , मनोरंजन के तडके ,बी सी सी आई ने जब उसे आई पी एल लीग में तब्दील कर दिया तो क्रिकेट की मंडी में खिलाडियों की बोलियां लगने लगी जिससे क्रिकेटरों की खूब कमाई हुई | क्रिकेटर बाजार में घोड़े की  तरह नीलम होने लगे |  साथ ही चीयर लीडरो के ग्लैमर और रेव पार्टियों ने पहली बार क्रिकेट को उस तमाशे में तब्दील कर मनोरंजन के तडके में परदे पर ऐसे पेश किया कि दर्शकों की भारी भीड़ अपने अपने सितारों को देखने उमड़ने लगी |  लेकिन किसे पता था पाक के साथ खेले गए टी ट्वेन्टी फाईनल मैच में जों श्रीसंत हीरो बन गया वही हीरो एक दिन स्पॉट फिक्सिंग की जद में आ जायेगा और इसके बाद तो अंकित च्वहाण, और  चंदीला को  फिक्सिंग में गिरफ्तार कर लिया गया और आई पी एल के तमाशे की परतें जिस  खुलती चली गई  उसने  मयप्पन से लेकर कुंद्रा पर धोखाधड़ी , जालसाजी के  आरोपों की बौछार  ही कर डाली जिसके बाद आई पी एल की संचालन परिषद ने  दोनों के खिलाफ  3 सदस्यीय कमेटी  गठित की जिसने दोनों को क्लीन चिट दे दी लेकिन दिल्ली पुलिस इस बात पर  अड़ी  रही कि दोनों इसमें शामिल रहे ।   इसके बाद बिहार क्रिकेट एसोसिएशन ने बम्बई उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की जिसने बी  सी  सी आई की सल्तनत पर सवाल उठाये और जब बोर्ड ने बम्बई  उच्च न्यायालय के खिलाफ अपील की तो  न्यायालय ने श्रीनिवासन से लेकर   बी  सी  सी आई और इंडिया  सीमेंट से लेकर राजस्थान रॉयल्स को अपने रडार पर लेने में देर नहीं लगाई । 201 3  में  अंकित  और श्रीसंत  प्रतिबन्ध लगा दिया गया लेकिन चंदीला पर फैसला सुरक्षित रखा । फिर उच्चतम न्यायालय ने  3  सदस्यीय  कमेटी जस्टिस   मुद्गल के नेतृत्व में गठित की जिसने मयप्पन और कुंद्रा  गलत कामो का भंडाफोड़ कर दिया और संयोग देखिये  सितारों से भरी पड़ी चेन्नई सुपर किंग्स और राजस्थान रॉयल्स को दो साल के लिए  आई पी एल  रास्ता दिखा दिया गया । मयप्पन और  कुंद्रा  पर खेल को बदनाम करने के चलते आजीवन निलंबित कर दिया गया जिसने एक बार फिर मैच फिक्सिंग और सट्टेबाजी को फिर से हवा देने का काम किया है |        


 आई पी एल को लेकर आये हलिया फैसले ने मनोरंजन के नाम पर चल रहे खेल के गोरखधंधे को सबके सामने उजागर कर दिया है | दरअसल इस दौर में सट्टेबाजी कई खेलों में हावी रही है | जयादा समय नहीं बीता जब फीफा के दामन पर भी भ्रष्टाचार की ऐसी कालिख पुती कि विश्व के सबसे बड़े दर्शक वर्ग को खींचने वाले फ़ुटबाल के  खेल प्रेमी तक सन्न  रह गए | वहीँ 2000 के आसपास हेंसी क्रोनिये विवाद के साथ ही कई भारतीय खिलाडियों के नाम आने की खबरों ने इस खेल की साख को गर्त में ले जाने का काम किया | इसके बाद शारजाह तो सटोरियों की पनाहगाह बन गया  और जब से फटाफट क्रिकेट के नए संस्करण टी ट्वेंटी की शुरुवात हुई तब से यह लीग भ्रष्टाचार की गंगा बहा रही  है जहाँ फ्रेंचाईजी से लेकर बोर्ड के सदस्य करोडो के वारेन्यारे करने में लगे रहे जिसकी शुरुवात तो ललित मोदी के कार्यकाल से ही शुरू हो गई थी जब भ्रष्टाचार की कालिख पुतने के चलते उनको आई पी एल से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था  लेकिन  उनके जाने के बाद भी बोर्ड आँखों में पट्टी बांधे अपने खिलाडियों और मालिकों को बचाने में लगा रहा | अब श्रीनिवासन को ही देख लीजिये अपने दामाद मयप्पन को बचाने के लिए उन्होंने किस तरह कि तिकड़मो का सहारा नहीं लिया | अभी भी चेन्नई सुपर किंग्स और अपने दामाद को सजा सुनाये जाने के बाद वह ख़ामोशी की चादर ओढे बैठे हैं | ऐसे खेल के भी क्या मायने निकाले जाए जहाँ खिलाडियों की मंडी में बोलियाँ लगती हों और उनके खरीददार कारोबारियों से रिश्ते बनाकर सट्टेबाजी के आसरे इस खेल की साख को तार तार करने में लगे रहे | परत दर परत स्पॉट फिक्सिंग आई पी एल के मैचो में इस कदर हुई  कि सट्टेबाजी के तार अंडरवर्ल्ड  , बालीवुड और राजनेताओ के इर्द गिर्द तक जाते दिखाई दिए | मास्टर माईंड दाउद ने भी अपने भाई अनीश इब्राहीम की छत्रछाया में  कई गुर्गो के साथ मिलकर दुबई और कराची से सट्टेबाजो के जरिये खिलाडियों तक अपनी पहुँच बनाने में सफलता कायम की  |  आई पी एल कोई खेल नहीं रहा क्युकि विभिन्न जांचो में खिलाडियों के लैपटॉप में मिली कई लड़कियों की फोटो और मोबाइल नंबर इस बात की तस्दीक तो करते ही थे  कि किस तरह आई पी एल के नाम पर  स्पॉट फिक्सिंग के अलावा अय्याशी का खुला खेल खेला जा रहा था | स्पॉट फिक्सिंग का यह खुलासा क्रिकेट के नाम पर कलंक तो है ही साथ ही आई पी एल के आयोजन पर भी सवालिया निशान भी लगाता है क्युकि आई पी एल में काले धन का खुला खेल भी बड़े पैमाने पर हुआ  जिसमे खुले तौर पर करोडो के वारे न्यारे किये जा रहे थे |सवाल तो इस दौर में धोनी को लेकर भी है | बेशक वह भारत के सफलतम कप्तान जरुर रहे हैं लेकिन फिक्सिंग के मसले पर धोनी खुद और उनकी टीम को क्यों बचाने में लगे रहे ? वैसे क्रिकेट अनिश्चितताओं का खेल जरुर है लेकिन पिछले कुछ समय से सट्टेबाजी ने इस खेल की  महिमा तार तार कर दी है | आई पी एल मुनाफे के बड़े बाजार , मनोरंजन के अलावे सट्टा बाजार में गोते लगाकर फिक्सिंग के साये में भी घिरते जा रहा है | अगर ऐसी घटनाओ के बाद लोगो का क्रिकेट से भरोसा उठ रहा है तो यह लाजमी ही है क्युकि इस दौर में आई पी एल भारतीय फिक्सिंग लीग का बदनुमा दाग ढो रहा है जहाँ सब पहले से ही तय माना जा रहा था और शायद यही वजह है क्रिकेट खिलाडियों से भी लोगो का भरोसा उठता ही जा रहा था  और लोग यह मान रहे थे  हर बार का आई पी एल भी किन दो टीमों के बीच होगा यह सब फिक्स है |आई पी एल के हर  सीजन में सवा अरब की आबादी के मनोरंजन के नाम पर एक तरह से खिलवाड ही किया जा रहा था क्युकि स्पॉट फिक्सिंग की परतों के खुलने के बाद लोग अब यह सवाल पूछ रहे थे यह खेल नहीं तमाशा  है शायद तभी 2010 में संसद में 60 से ज्यादा सांसदों ने इस तमाशे को लेकर सवाल उठाये और इसे बंद करने की मांग कर डाली थी क्युकि खेल भावना को दरकिनार करते हुए इसमें थप्पड़ बाजी , हवाला , फ्रेंचायजी विवाद , रेव पार्टी और महिलाओ के साथ हो रही अश्लीलता आम बात बन गई थी लेकिन आज तक इस पर कोई कार्यवाही नहीं की गई क्युकि खेल के मैदान पर भी राजनेताओ की बिसात इस कदर बिछी है कि हर कोई एक दूसरे के लिए इसमें लंगडी मार  अपने अपने खेल संघों के आसरे खेल रहा है |

क्रिकेट में फिक्सिंग का यह पहला कोई मामला सामने नहीं आया है | 2000  में हेन्सी क्रोनिए और गिब्स  वाला दौर भी जेहन में बना है जब अजहर, प्रभाकर, जडेजा, मोगिया का नाम फिक्सिंग के दलदल में सीधे उछला था जिसके बाद इन सभी पर प्रतिबन्ध लगाए गए | शारजाह उस दौर में सटोरियों की शरणस्थली  बन गया था जिसके बाद वहाँ  पर मैच खेलने प्रतिबंधित कर दिये गए |  एक बार  लन्दन में पाक खिलाडियों का नाम भी फिक्सिंग के चलते बदनाम हुआ जिसके बाद उनकी टीम से छुट्टी कर दी गई लेकिन उसके बाद भी फिक्सिंग का दौर थमा नही | आई पी एल के एक  सीजन में तो  मोहनीश मिश्रा , टी पी ,अमित यादव , शलभ, अभिनव बाली को एक स्टिंग में पकड़ा गया जिसके बाद उन पर आई पीएल में एक साल का प्रतिबन्ध लगा दिया गया था | उसके बाद बी सी सी आई ने कहा भी था भविष्य में आई पी एल मैचो में अब फिक्सिंग नहीं हो पाएगी क्युकि अब बी सी सी आई ने एंटी करप्शन विंग बना दी है जो यह  सारे मामले पकड़ लेगी लेकिन हैरत की बात तो यह है हर बार होने वाले  आई पी एल  में क इस कमेटी को सांप सूंघ गया ?   खिलाडियों ने तो बकायदा नए नवेले तरीको से स्पॉट फिक्सिंग का ताना बाना बुना क्रिकेट में बुना  जिसमे तोलिये, लाकेट और कलाई की घडी से मुनाफे का भारी खेल चंद ओवेरो में खेला गया  |

दरअसल इस देश में क्रिकेट एक बड़े बजार का रूप ले चुका है | इसे बाजार का रूप देने में मीडिया की भी बड़ी भूमिका रही है | क्रिकेट खिलाडियों की छवि विज्ञापन जगत में ऐसे ब्रांड का रूप ले चुकी है जिसमे दिखने वाले ग्लैमर के बाद आम आदमी उस प्रोडक्ट की और खिंचा चला आता है | वहीँ इन क्रिकेट के खिलाडियों को क्रिकेट के अलावा विज्ञापनों से और आई पी एल से करोडो की कमाई साल दर साल हो रही है साथ ही अब तो बी सी सी आई ने खिलाडियों के कई ग्रेड भी निर्धारित किये हैं जिनके अनुरूप उनको रिटायरमेंट के बाद भी पैसो की बारिश हो रही है | शायद यही वजह है इस दौर में कॉर्परेट भी अब आई पी एल के तमाशे में अपना भविष्य सुनहरा देख रहा है जहाँ अम्बानी से लेकर नाईट राईडर्स शाहरुख , प्रीती जिंटा से लेकर विजय माल्या  सभी अपने अपने हित साधने में लगे हुए हैं | अकूत धन सम्पदा के चलते क्रिकेट अब सट्टेबाजी के लिए सबसे माकूल है |भारत में तो अब छोटे शहरों से लेकर बड़े शहरो तक क्रिकेट की आड में बड़े बड़े सट्टे नुक्कड़ चौराहों में खेले  जा रहे हैं लेकिन यह पहला मौका है जब आई  पी एल के उस आयोजन में जिसमे कारपोरेट ने अपना सब दाव पर लगाया है जहाँ  दाऊद   सीधे दुबई और कराची सरीखे शहरों में बैठकर अपना हित  सट्टेबाजो  के आसरे साध रहा है  वहीँ फटाफट क्रिकेट का यह आई पी एल संस्करण ज्यादा दर्शक वर्ग को जहां खीच रहा है वहीँ क्रिकेटर भी यह जान रहा है टीम इंडिया में जगह बनाना इस दौर में कितना मुश्किल है और सेलेक्टर किस तरह अपने अपने राज्यों के खिलाडियों को टीम में जगह देते हैं यह किसी से इस दौर में  छुपा नहीं है | ऐसे में खिलाडी कम समय में आई पी एल के जरिये पैसा कमाना चाहते हैं जहां वह दर्शकों से खिलवाड कर पैसे के तमाशे के नाम पर कुछ भी करने को तैयार खड़े दिखते हैं और आई पी एल की यह गाथा किसी कलंक कथा से कम तो इस समय नजर नहीं आती क्युकि कई सफेदपोश लोगो के नाम से पर्दा हटना अभी बाकी है जिसमे राजनेताओ के साथ कई क्रिकेटरों और हसीनाओ के चेहरे बेनकाब हो सकते हैं | अब समय आ गया है जब आई पी एल के साथ क्रिकेट की  सफाई के लिए ठोस  पहल शुरू हो |  

 जस्टिस मुद्गल कमिटी और लोढा कमेटी के फैसलों से यह आस तो बंधी ही है अब सट्टेबाजी में शामिल  बड़ी मछलियों के साथ छोटी मछलियाँ भी बाहर आएँगी जिससे निचले स्तर से क्रिकेट में भ्रष्टाचार की गंगा की सफाई की जा सकेगी | यदि सट्टेबाजी के धंधे को जल्द रोका नहीं गया तो आने वाले समय में यही फिक्सिंग क्रिकेट को निगल जाएगी और मयप्पन से लेकर राज कुंद्रा जैसे कई और व्यवसायी इसकी साख को गर्त में मिलाते जायेंगे |  वैसे क्रिकेट में सबसे जयादा पैसा भारतीय बोर्ड के पास है जो सबसे ज्यादा मैच साल भर में आयोजित करवाता है और इसके साथ सबसे अधिक दर्शकों का वर्ग जुडा हुआ है जिसमे बच्चो से लेकर बूढ़े लोग शामिल रहे हैं और स्टेडियम में हर मैच में टिकटों की भारी बिक्री भी इस बात की गवाही देने के लिए काफी है कि इस  खेल  ने समाज के हर वर्ग को ना केवल लुभाया  है बल्कि क्रिकेटरों को विज्ञापनों में करोड़ों के करार को भी दिलाया है जिसने लोगों के बीच उनकी पहचान किसी देवता से कम नहीं बनाई है शायद यही वजह है खेल प्रेमी खिलाडियों को भगवान से कम नहीं समझते हैं और हर मैच से पहले जीत के लिए अनुष्ठान तक हर शहर में आयोजित करते रहते हैं और अपने दैनिक क्रियाकलापों को छोड़कर मैच दर मैच टकटकी टेलीविजन स्क्रीन में लगाए रहते हैं | यह क्रिकेट की दीवानगी छोटे कस्बों से लेकर अब हर शहर में महसूस की जाने लगी है | क्रिकेट भले ही भारत के कई खेलों को निगल गया हो लेकिन खुद बी सी सी आई ने इसके नाम पर सबसे धनी महल खड़ा करने में देर नहीं लगाई है और तो और अब यही संस्था आर टी आई के दायरे में आने से ही अपने को इनकार कर दे तो मजबूरियों को समझा जा सकता है | सट्टेबाजी की दस्तक ने क्रिकेट का अंतर राष्ट्रीयकरण कर दिया है जहाँ हवाला के जरिये कई कारोबारी दुबई जैसे कई शहरों से पैसा लगाकर मुनाफा काने में लगे हुए हैं | क्रिकेट आज कई देशो को अपने साथ जोड़ चुका है लिहाजा सटोरियों की घुसपैठ को रोकना मुश्किल हो गया है | अब तो खिलाडियों को भी चाहिए कि वह खेल भावना से खेल खेलें और इस खेल की  पुरानी  गरिमा को वापस लाये |