Monday, 25 April 2016

नीतीश चले पी एम बनने




बिहार  की सत्ता पर ठसक के साथ तीसरी बार काबिज होने वाले जेडीयू अध्यक्ष और सूबे के सीएम नीतीश कुमार ने मिशन 2019 के लिए अभी से चुनावी  बिगुल फूंक दिया है । नीतीश ने 2019 लोकसभा चुनाव की ज़मीन तैयार करते हुए बड़ा बयान दिया है।  उन्होंने  जद यू की कमान संभालने के बाद बड़ा ऐलान  कर दिया कि राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के खिलाफ महा गठबंधन  बनाने में वह  उत्प्रेरक की भूमिका निभायेंगे जिससे 2019 में मोदी सरकार की विदाई हो सकेगी । साथ ही उन्होंने यह भी  कहा है कि अगर बीजेपी का हराना है तो तमाम पार्टियों को बीजेपी के खिलाफ एकजुट होने की जरूरत है। पटना के श्री कृष्ण मेमोरियल हाल में जद यू की राष्ट्रीय परिषद् में नीतीश की हुंकार के बाद लग रहा है कि पी एम  मोदी के खिलाफ वह उसी तरह की गोलबंदी सभी दलों को साधकर करना चाहते हैं जैसा प्रयोग उन्होंने  बीते बरस बिहार में किया  ।
 
मोदी के कांग्रेस मुक्त भारत की तर्ज पर नीतीश ने अब नया नारा संघ मुक्त भारत का दिया है । उन्होंने भरोसा ही नहीं उम्मीद जताई है भाजपा को महागठबंधन की तर्ज पर पराजित किया जा सकता है।   तो क्या माना जाए नीतीश ने बिहार से निकलकर पहली बार राष्ट्रीय राजनीती में सक्रिय होने के संकेत दे दिए हैं और क्या पहली बार बिहार के महागठबंधन की तर्ज पर सभी दल नीतीश की छाँव तले एकजुट होकर मोदी सरकार के खिलाफ बड़ी मोर्चाबंदी करने जा रहे हैं  । इन शुरुवाती संकेतों को डिकोड करें तो जद यू की कमान अपने  हाथ में लेते  ही नीतीश कुमार के निशाने पर अभी से 2019 आ चुका है जिसके खिलाफ वह माहौल बनाने में जुट गए हैं जिसकी शुरुवात आने वाले दिनों में उनके लखनऊ के दौरे से होने जा रही है । यह भाजपा को शिकस्त देने के लिए गैर भाजपाई दलों को एक झंडे के नीचे लाने की कोशिश मानी जा सकती है क्युकि दिल्ली का रास्ता यूपी  से होकर गुजरता है ।  भारतीय राजनीती के सन्दर्भ  में यह कथन परोक्ष रूप से फिट बैठता है। 

दिल्ली से दूर पटना में श्री कृष्ण मेमोरियल हॉल में नीतीश कुमार जब अपनी राष्ट्रीय कार्यकारणी के अधिवेशन के दौरान अपना भाषण दे  रहे थे तो उनकी नजरें शायद  भारतीय राजनीती की इस ऐतिहासिक इबारत की ओर भी जा रही थी । शायद इसलिए उन्होंने  लोक सभा चुनावो  से पहले  गैर भाजपा दलों और अपने कार्यकर्ताओ को तैयार  रहने की सलाह इशारो इशारो में दे डाली।

 इस राष्ट्रीय कार्यकारणी की बैठक  में नीतीश  कुमार  की पीऍम बनने की हसरतें भी हिलारें मार रही थी शायद तभी आत्मविश्वास से लबरेज नीतीश  ने दावा कर डाला राष्ट्रीय स्तर पर महागठबंधन  बनाने में उनकी भूमिका सिर्फ उत्प्रेरक की होगी ।  उत्प्रेरक किसी भी क्रिया की गति को बढाने में सहायक है  लिहाजा नीतीश ने भी अपनी सार्थकता को इशारो इशारो में बता दी  ।  वहीँ जद यू को भी उम्मीद है नीतीश की साफ़ छवि और सुशासन बाबू की छवि को ढाल बनाकर 2019 से पहले वह गैर भाजपा दलों को अपने पाले में लाकर गठबंधन में स्वीकार्यता बढ़ा सकते हैं । यूँ  तो  2019 की  चुनावी बिसात अभी बहुत दूर है मगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के काट की तैयारी नीतीश अभी से करने लगे हैं। राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव मोदी के मुकाबले नीतीश कुमार को सामने ला रहे हैं। ।   बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव भी उनका इस समय  भरपूर साथ दे रहे हैं। लालू ने तो यहां तक कह दिया कि नीतीश एक दिन भारत के प्रधानमंत्री बनेंगे तो हमें खुशी होगी।
 
उम्मीदों और देश की मौजूदा स्थिति के मद्देनजर नीतीश  द्वारा भाजपा के खिलाफ गोलबंदी का प्रयोग आसान  नहीं लगता क्युकि  बिना उत्तर प्रदेश फतह किये बिना दिल्ली में अगली सरकार के गठन में अहम भूमिका निभाने के सपने देखना मुंगेरी लाल के हसीन सपने देखने जैसा है । यू पी में इस महागठबंधन  के मजबूत  होने की सूरत में ही नीतीश प्रधान मंत्री पद की दावेदारी कर सकते हैं लेकिन यहाँ  पर भी राजनीती के दिग्गज नेताजी को साधना नीतीश के लिए  आसान नहीं होगा । नेताजी  महागठबंधन  से  बिहार चुनावों से पहले ही खुद बाहर हो चुके हैं  ।  सपा  और बसपा के इर्द गिर्द ही यू पी की  राजनीती घूमती रही है लेकिन यह दोनों दल अपने गिले शिकवे भुलाकर साथ आयेंगे ऐसा कहना दूर की  गोटी है ।  रही बात अजीत सिंह की  तो उनका पश्चिमी यू पी पर जबरदस्त प्रभाव है लेकिन फिलहाल वह नेताजी के आसरे खुद राज्य सभा में जाने की जुगत में दिखाई दे रहे हैं । भला वह अपनी पार्टी का विलय  नीतीश की पार्टी में करवाकर  क्यों अपने पैर कुल्हाड़ी मारेंगे  । ऐसा ही हाल झारखंड के पूर्व  मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी का है  जिनका कोई नावलेवा  अब नहीं बचा है । तो  ऐसे हालतों  में नीतीश के पी एम के  सपनों को भला  कैसे पंख लग पायेंगे ?

 नीतीश के बारे में कहा जा रहा है वह आने वाले दिनों में अपनी पार्टी जद यू ,राजद,  झारखंड विकास मोर्चा , आर एल  डी का विलय कर जनविकास दल नाम की नई पार्टी खड़ी करना चाहते हैं लेकिन भाजपा के मजबूत होने के चलते इनका यह प्रयोग पूरे देश में साकार हो पायेगा इसमें संशय है । बिहार देश नहीं है और देश का मतलब इस दौर में बिहार नहीं है । हर राज्य की परिस्थितिया कमोवेश अलग अलग हैं और आज का वोटर भी अब बदल चुका है । राष्ट्रीय राजनीती अपनी जगह है और राज्यों में छत्रपों के वर्चस्व  हो हम नहीं नकार सकते । मुलायम सिंह , मायावती , नवीन पटनायक , जयललिता , ममता ,केजरीवाल, उमर अब्दुल्ला क्यों अपने राज्यों को नीतीश की पार्टी के हवाले कर देंगे और अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारेंगे ? नीतीश का साथ बिहार में कांग्रेस ने दिया । सोनिया का प्रयोग बिहार में सफल रहा लेकिन देश के मसले पर कांग्रेस भी अपनी 131 बरस पुरानी साख क्यों नीतीश के साथ जाने से खोएगी ? इस बीच कांग्रेस ने नीतीश को अपना समर्थन देने पर सतर्कता बरती है  ।

नीतीश कुमार ने इसके साथ ही  संघ मुक्त भारत की बात कही है। उन्होंने लोकतंत्र की रक्षा के लिए गैर भाजपा दलों से एकजुट होने की अपील  की है।उन्होंने भरोसा दिलाया कि भाजपा विरोधी दलों कांग्रेस वामदल और अन्य क्षेत्रीय दलों को 2019  से पहले एक साथ लाने के लिए प्रयासरत रहेंगे।नीतीश के बयान  की प्रतिक्रिया में बीजेपी का कहना है कि वह नीतीश के महामोर्चा गठित करने के प्रयासों से परेशान नहीं है। इस बीच कांग्रेस ने नीतीश को अपना समर्थन देने पर सतर्कता बरती है  ।  बीजेपी प्रवक्ता ने कांग्रेस को आड़े हाथों लेते हुए पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी से यह स्पष्ट करने को कहा कि क्या राहुल गांधी ऐसे किसी मोर्चे की अगुवाई करेंगे या केवल उसका हिस्सा भर होंगे ।  राजनीती संभावनाओ का खेल है और यहाँ  महत्वाकांशा हिलारे मारती रहती है। इस समय नीतीश के साथ भी यही हो रहा है ।
 
यह पहला मौका नहीं है जब अलग मोर्चा बनाने की बात कही गई है। कई बार ऐसे प्रयास हो चुके हैं मगर यह मोर्चे बहुत दूर तक सफर तय नहीं कर पाए।1996 में नेताजी  ने अपने पैतरे से केंद्र में कांग्रेस की सरकार बनाने की मंशा पर जहाँ पानी फेरा था वही बाद में  वह रक्षा मंत्री बन गए। 1999  में अटल बिहारी की सरकार गिरने के बाद  अपनी  दूरदर्शिता से कांग्रेस को गच्चा देकर उसे सरकार  बनाने से रोक दिया था । वही नेताजी ने  2004 में न्यूक्लिअर डील पर यू पीए 1 को संसद में विश्वासमत प्राप्त करने में जहाँ मदद की वहीँ  यू पीए 2 के तीन साल के जश्न में वह  शरीक भी  हुए  तो वहीँ मौका आने पर कांग्रेस के साथ रहकर उसी के खिलाफ तीखे तेवर दिखने से बाज नहीं आये । उसकी नीतियों को कोसते हैं और तीसरे मोर्चे का राग अपनी राष्ट्रीय  कार्यकारणी में  कई  बार अलापते रहे  जिसमे वह भाजपा -कांग्रेस दोनों को किनारे कर लोहियावादी, समाजवादी , वामपंथियों को साथ लेकर राजनीति की नई लकीर उसी तर्ज पर खींचते  दिखाई  दिए  जो उन्होंने 1996 में नरसिंह राव के मोहभंग के बाद खींची थी  । इसके बाद देवेगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल को साधकर तीसरे मोर्चे का दाव  खेल गया लेकिन यह प्रयोग भी असफल रहा ।  यू पी ए के  दौर में प्रोग्रेसिव  अलाइंस  बनाने  की बातें भी खूब हुई लेकिन चुनाव से पहले यह प्रयोग  भी फुस्स हो गया ।
 
दो बरस पहले  ही लोकसभा चुनाव के समय नेताजी  ने तमाम छोटे दलों को जोड़ कर भाजपा और कांग्रेस के सामने तीसरे मोर्चा के रूप में सशक्त चुनौती पेश करने की पहल की थी पर वह नाकामयाब रहे। अब नीतीश कुमार हर हर मोदी का भय दिखाकर सभी पार्टियों को जोड़ने की बात कर रहे हैं।   दरअसल जब लोग भाजपा और कांग्रेस से ऊब जाते हैं तब वह तीसरे विकल्प की तरफ चले जाते हैं। लेकिन जब यह दल सत्ता में रहते हैं तो इनके राजनीतिक हित  टकराने लगते हैं।  देश में अब माहौल बदल  चुका है । विकास के नाम पर ही अब वोट मिल रहे हैं इस बात को हमें समझने पड़ेगा । आज का भारत नब्बे के दशक वाला नहीं रहा जब मंडल कमंडल ने देश की राजनीती को झटके में बदल दाल था ।  आज  हर क्षेत्रीय दल का अपना समीकरण है तो पार्टियां भी जातीय  राजनीती के दंगल से अपने को बाहर नहीं निकाल पा रही हैं । देश में क्षेत्रीय स्तर पर सभी विपक्षी दलों के आपस में टकराव हैं। जहां सपा होगी वहां बसपा के लिए साथ देना गवारा नहीं होगा। द्रमुक और अन्नाद्रमुक  एक साथ नहीं होना चाहेंगे। इस तरह अगर देखें तो नीतीश का सभी पार्टियों को साथ लाने का सपना तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक विपक्षी दल अपने राजनीतिक स्वार्थों से ऊपर न उठें।
 
 राजनीती  की  नई  बिसात  में  2019  से ठीक पहले नीतीश  कुछ ऐसी खिचड़ी पकाना चाह रहे हैं जिससे भाजपा  से इतर एक नयी मोर्चाबंदी केंद्र  में शुरू हो सके जिसकी कमान वह खुद अपने हाथो में लेकर  केन्द्र  में  आने का  दावा  पेश कर सकें ।  1996  में जब नरसिंहराव सरकार से लोगो का मोहभंग हो गया तो नेताजी ही वह शख्स  थे जिसने समाजवादियो , वामपंथियों, लोहियावादी विचारधारा के लोगो को एक साथ   लाकर उस दौर में शरद पवार के साथ मिलकर एक नई  बिसात केंद्र की राजनीती में चंद्रशेखर को  आगे लाकर बिछाई थी । उसी तर्ज पर  चलते हुए नीतीश  अपना राग गा रहे हैं  ,साथ में तीसरे मोर्चे के लिए भी हामी भरते दिख रहे हैं ।  दशकों  बाद वह  गैर भाजपाई  मोर्चे के लिए अपनी शतरंजी बिसात बिछाने में लग गए हैं ।  राजनीती के अखाड़े का यह चतुर  सुजान अब इस बात को बखूबी समझ रहा है अगर भाजपा  के खिलाफ अभी एक नहीं हुए तो समय हाथ से निकल जायेगा। वैसे भी नीतीश कुमार के पास  पी ऍम बनने का सुनहरा मौका शायद ही होगा जिसमे  1996 की  तीसरे मोर्चे  से  हुई गलतियों से सीख लेकर एक नई  दिशा में देश को ले जाने का साहस दिखा सकते है ।  

वैसे भी इस समय कांग्रेस ढलान  पर है तो भाजपा  पर भी  साढ़े  साती चल रही है । मोदी  के लिए आने वाले 3  बरस  चुनौतियों  भरे रहेंगे वहीँ नीतीश के सामने भी आने वाले बरसों  में उम्मीदों पर खरा उतरने की चुनौती है । मोदी के सामने पूरा देश है तो नीतीश के सामने बिहार । मोदी गुजरात मॉडल के बूते जब 7  रेस कोर्स का सफर तय कर सकते हैं तो नीतीश भी अपने बिहार मॉडल और सुशासन बाबू के आसरे देश में नई  लकीर  खींचने का माद्दा तो रखते हैं  शायद यही वजह है  जद  यू  के कैडर मे जोश है और तीसरी  बार बिहार फतह करने के बाद बिहार मॉडल और नीतीश के आसरे  अब दिल्ली जीतने की तैयारी  है ।  तीसरे मोर्चे की सियासत को आगे बढाने  का यही बेहतर समय है । नीतीश  इसके मर्म को शायद समझ भी रहे हैं । ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि राजनीती  के अखाड़े में नीतीश  का यह दाव  कितना कारगर होता है और आने वाले दिनों में छत्रप किस तरह उनके इस कदम पर ताथैय्या  करते हैं । फिलहाल इसका इन्तजार सबको है ।

Monday, 21 March 2016

अस्थिरता के भंवर में उत्तराखंड





उत्तराखंड की हरीश रावत की कांग्रेस शासित  सरकार पर भी संकट आ गया  है । अरुणाचल की तरह कांग्रेस के लिए यहाँ मुश्किलें बढ़ गई हैं |  रावत की चार साल पुरानी कांग्रेस सरकार के नौ विधायकों ने बगावती तेवर दिखाकर रावत को अस्थिर करने की तैयारी पूरी कर ली है और बीजेपी के खेमे में चले गए हैं |  इन सात विधायकों में पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा और बर्खास्त  कृषि मंत्री हरक सिंह रावत भी शामिल हैं । बागियों की अगुआई कर रहे  डॉ. हरक सिंह रावत ने राज्य मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया है । इस बीच कांग्रेस के सभी नौ बागी विधायक भाजपा के 26 विधायकों के साथ दिल्ली पहुंच गए  जिन्हें  एक चार्टेड प्लेन से दिल्ली लाया गया | दिल्ली पहुंचने पर राज्य के पूर्व मुख्य मंत्री विजय बहुगुणा ने हरीश रावत पर भ्रष्टाचार में लिप्त होने का आरोप लगाते हुए कहा कि उनके नैतिकता के आधार पर इस्तीफा दे देना चाहिए। वहीं कांग्रेस के बागी विधायक हरक सिंह रावत ने भी कहा कि हरीश रावत की सरकार गिरने के बाद राज्य में एक बेहतर सरकार बन सकेगी। हरक सिंह रावत के मुताबिक उनके साथ बगावत करने वाले कांग्रेसी विधायकों में विजय बहुगुणा, शैलारानी रावत, कुंवर प्रणव चैंपियन, प्रदीप बत्रा, अमृता रावत, सुबोध उनियाल, शैलेंद्र मोहन सिंघल और उमेश शर्मा हैं और इस फेहिरस्त में कई नाम और जुड़ सकते हैं | राजभवन की तरफ से  हरीश रावत को सदन में 28 मार्च तक का समय दिया गया है जिसके चलते इस छोटे से राज्य में हार्स ट्रेडिंग को बढ़ावा मिलने की आशंकाए बढती दिख रही हैं |

 गौरतलब है कि उत्तराखंड में विधानसभा की कुल 70 सीटें हैं, एक सीट एंग्लो इंडियन नामित हैं और उसे जोड़ कर सीटों की संख्या  71 पहुंच जाती है। कांग्रेस के पास बहुमत से एक सीट ज्यादा 36 सीटें हैं। बीजेपी के पास 28 सीटें हैं तो बीएसपी की झोली में 2 सीटें हैं । अन्य के खाते में 4 सीटें हैं। एक बड़े जनांदोलन से निकला उत्तराखंड बीते 15 बरस में कई सियासी घटनाओं का गवाह रहा है | वर्ष 2000 में मानसून सत्र में लोकसभा ने उत्तर प्रदेश पुनर्गठन को मंजूरी दी जिसके बाद  9 नवम्बर 2000 को यह अलग राज्य अस्तित्व में आया | चूँकि  अविभाजित अंतरिम सरकार में 30 में से 24 विधायक भाजपा के थे लिहाजा भाजपा की अंतरिम सरकार बनी जहाँ बाहरी  नित्यानंद स्वामी की सी एम के रूप में ताजपोशी हुई | नित्यानंद स्वामी के दौर में नौकरशाहों ने नए नवेले ऐसे नेताओं की घिग्गी बाँध दी जिनकी उत्तर प्रदेश में कोई पूछ परख भी नहीं होती थी | नौकरशाही ने इसी दौर से उत्तराखंड में अपने पैर मजबूती के साथ जमाने शुरू कर दिए जिससे यहाँ के नेता असहज हो गए | मजबूर होकर भाजपा को  राज्य के प्रथम विधान सभा चुनावों से ठीक चार महीने पहले वरिष्ठ नेता भगत सिंह कोश्यारी को आगे करना पड़ा जो स्वामी की सरकार में उर्जा मंत्री भी थे | कोश्यारी का करिश्मा भी  फीका पड़ गया और राज्य के प्रथम विधान सभा चुनावों में कांग्रेस की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी | कांग्रेस में भी मुख्यमंत्री  बनाने की बारी आई तो उसके प्रदेश अध्यक्ष हरीश रावत मुख्यमंत्री के स्वाभाविक दावेदार थे लेकिन आलाकमान ने यू पी के चार बार मुख्यमंत्री रहे एन डी तिवारी को उत्तराखंड की पहली निर्वाचित सरकार का मुखिया बनाया |  तिवारी के कार्यकाल में सड़क , पर्यटन , शिक्षा , स्वास्थ्य , आई टी, ऊर्जा  सेक्टर में बूम आने के दावे जोर शोर से किये गए और उन्हें विकास पुरुष के नाम से नवाजा जाने लगा लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू यह था  तिवारी जी ने राज्य में दिल खोल के सरकारी  खजाना लुटाया और अपने पांच बरस के कार्यकाल में 16 हजार करोड़ रुपये के कर्ज में राज्य के कदम डुबोने में देरी नहीं लगाई | ऊपर से दरोगा भरती , पटवारी भरती , लालबत्ती जैसे विवादों और घोटालों ने उनकी सरकार की मिटटी पलीत कर दी जिसकी बड़ी कीमत उनकी सरकार को  2007 के चुनावों में चुकानी पड़ी जब भाजपा की उत्तराखंड में पूर्ण बहुमत से वापसी हुई लेकिन यहाँ पर भी मुख्यमंत्री पद को लेकर आर पार की लड़ाई जारी रही | विधायक बड़े पैमाने पर कोश्यारी की रहनुमाई कर रहे थे लेकिन आलाकमान ने जनरल खंडूरी को आगे किया | खंडूरी के आते ही नौकरशाही खौफ खाने लगी | खंडूरी ने नौकरशाहों , माफियाओं और खुद अपनी पार्टी के उन नेताओं के नाक में दम कर दिया जो लूट खसोट की कमीशनबाजी से अपनी समानांतर सरकार उत्तराखंड में चलाते आये थे | पहली बार ऐसा लगा उत्तराखंड में कोई ईमानदार मुख्यमंत्री आया है जिसके मन में राज्य के प्रति कुछ करने की तमन्ना है | राज्य में भ्रष्टाचार की गंगा में रोक लगायी जिसके चलते माफियाओं , नौकरशाहों और खुद अपनी पार्टी के नेताओं की आँखों में खंडूरी खटकने लगे जिसके चलते एक षड़यंत्र के चलते भाजपा के नेताओं निशंक और कोश्यारी ने उनको मुख्यमंत्री पद की कुर्सी से न केवल हटाया बल्कि भाजपा का राज्य में जहाज डुबो दिया  जिसके बाद नई उम्मीद और नए युवा नेतृत्व के तहत डॉ निशंक को भाजपा ने मुख्यमंत्री बनाया |निशंक भी अपनी कुर्सी बचाने के लिए हर उस तिकड़म का सहारा लेने से पीछे नहीं रहे जो रास्ता एन डी तिवारी ने पकड़ा | बिजली, जमीन के  प्रोजेक्टों में धांधली, कुम्भ  , सिट्जुरिया में घोटाले से निशंक हिट विकेट हो गए और कोश्यारी और जनरल खंडूरी की जुगलबंदी ने उत्तराखंड में फिर से 2012 के चुनावों से पहले जनरल खंडूरी को मुख्यमंत्री बनाया | अपने तीन माह के कार्यकाल में खंडूरी ने जो निर्णय लिए उसकी मिसाल भारतीय राजनीति में देखते को नहीं मिलती यही वजह रही अपनी ईमानदारी के आसरे खंडूरी उस चुनाव में भाजपा का मुख्य चेहरा बने और कांटे की टक्कर के बीच वह भाजपा के जहाज को 31 सीटों तक पार ले गए | यह अलग बात है वह पार्टी के भीतरघात के चलते खुद कोटद्वार से चुनाव हार गए जिसके बाद सूबे में कांग्रेस ने पी डी ऍफ़ की मदद से सरकार बनाई और विजय बहुगुणा को काफी विरोध के बाद मुख्यमंत्री बनाया गया लेकिन केदारनाथ की 2013 की आपदा ने भी खुद उनका विकेट लेने में देरी नहीं की जिसके बाद हरीश रावत की ताजपोशी कांग्रेस ने की |

 राज्य में दबाव की परंपरागत रणनीति पर गौर करें तो अंतरिम सरकार के मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी को उन्हीं की पार्टी के बड़े दिग्गज भगत सिंह कोश्यारी , रमेश पोखरियाल निशंक और कुछ नेताओं का भारी विरोध झेलना पड़ा। अंततः उन्हें चुनाव से छह माह पूर्व ही मुख्यमंत्री पद से विदा होना पड़ा। पहली निर्वाचित कांग्रेस की तिवारी सरकार में भी तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष हरीश रावत ने सरकार के विरोध में अपने स्वर इस तरह बुलंद किए | उन्हें अपनी सारी ऊर्जा सरकार को बचाने में ही लगानी पड़ी। इसके लिए उन्होंने नेताओं को खुश करने के लिए लालबत्तियां बांटने की जो परंपरा शुरू की उसका असर राज्य को आज तक झेलना पड़ रहा है।भाजपा की खण्डूड़ी सरकार भी अपने जन्म के समय से ही विरोध झेलती रही। पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी ने विरोधी झण्डा इस कदर उठाया कि महज ढाई वर्ष में ही खण्डूड़ी सरकार निपट गई। इसका असर यह हुआ कि 2009 के लोकसभा चुनाव में भाजपा राज्य में लोकसभा की पांचों सीटें हार गई। पार्टी के अंदरूनी हालात को जानते हुए भी खण्डूड़ी के सिर ही इस हार का ठीकरा फोड़ा गया। इसी तरह निशंक सरकार भी तमाम विरोधों और अंतर्द्वंद्वों के चलते अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई। हालांकि निशंक सरकार पर कई विवादों के बादल भी छाये रहे जिनके चलते निशंक को मुख्यमंत्री पद से हाथ धोना पड़ा। वर्ष 2012 में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस 31 सीटों के साथ बसपा ,उक्रांद और निर्दलियों पी डी एफ के समर्थन से सत्ता में तो आ गई  लेकिन तत्कालीन मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की ताजपोशी से विरोध का खासा बवंडर मचा। बहुगुणा का विरोध इस कदर हुआ कि एकबारगी तो कांग्रेस में टूट होना निश्चित माना जाने लगा। तकरीबन दो वर्ष में ही बहुगुणा की भी मुख्यमंत्री पद से विदाई हो गई और हरीश रावत को राज्य की कमान मिली। हालांकि अधिकतर मुख्यमंत्रियों की असमय विदाई के कई कारण लचर शासन और भ्रष्टाचार के मामले भी कुछ हद तक रहे लेकिन असल में इन सबकी जड़ में सत्ता पाने की महत्वकाक्षाएं और राजनीतिक समीकरण ही मुख्य रहे हैं। आज मुख्यमंत्री हरीश रावत को भी इसी समस्या से जूझना पड़ रहा है।राजनीतिक तौर पर देखा जाये तो हरीश रावत ने केंद्रीय मंत्री रहते विजय बहुगुणा के साथ जो किया वही आज उनके साथ भी किया जा  रहा है।  एक पुख्ता रणनीति के तहत इस समय भाजपा अपनी बिसात में लोकसभा चुनावों से ठीक पहले भाजपा में शामिल किये गए सतपाल महाराज को साधकर हरीश रावत सरकार  को शहीद करेने की तैयारी में खड़ी है |

  हरीश मंत्रिमंडल से निलंबित  डॉ हरक सिंह रावत तो शुरुवात से ही  हरीश रावत को निशाने पर लेते रहे हैं लेकिन इस बार की बगावत में उन्हें पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा और सतपाल महाराज की पत्नी अमृता रावत का पूरा साथ मिला है | कुछ समय पूर्व बहुगुणा ने राज्य में विकास कार्यों सरकार की योजनाओं और नीतियों का जायजा लेने के लिए राज्य का दौरा करने की कोशिश की |  इसकी आड़ में उन्होंने अपने  बगावती इरादे  जाहिर कर दिए  लेकिन इसके बाद भी हरीश रावत चकमा खा गए |   

‘हरीश रावत ’ के मुख्यमंत्री बनने के बाद उम्मीद थी कि सब कुछ कांग्रेस में सामान्य हो जायेगा लेकिन यहाँ भी मंत्री पद को लेकर और लालबत्ती को लेकर अंदरूनी खींचतान थमी नहीं  | छोटा राज्य होने के कारण पार्टी  में झगड़े और व्यक्तिगत स्वार्थ इतने अधिक रहे कि अँधा बांटे रेवेड़ी वाली बात उत्तराखंड में  हर सरकार में लागू है | जिसको खुश नहीं कर सको वहीँ आँखें तरेर देता है जिससे उत्तराखंड का विकास दूर की कौड़ी लगता है | असल में इसकी सबसे बड़ी वजह नीतियों का देहरादून से संचालित होना और राजनेताओं का अपने आकाओं का एजेंट बना रहना है | 

 उत्तराखंड की सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि यहाँ  पर सत्ता का विकेंद्रीकरण नहीं हो पाया | पहले नीतियां लखनऊ में बनती थी आज देहरादून से नीती नियंता अपना शासन चलाते हैं और छोटा राज्य होने के कारण कमीशनबाजी और लूटखसोट में मिलजुलकर सभी नेताओं के साथ हाथ साफ़ करने में लगे रहते हैं | इस राज्य का दुर्भाग्य ही कहेंगे  यहाँ सत्ता में जो भी दल भागीदार रहा उसका मुख्यमंत्री ठसक के साथ केवल अपनी सरकार ही बचाता रहा । बीते 15 बरस में उत्तराखंड मुख्यमंत्री उत्पादक प्रदेश बना है और नीतियों के बनने से लेकर उसके इम्प्लिटेशन में मुखिया की ही भागीदारी यत्र , तत्र  और सर्वत्र  देखी जा सकती है | उत्तराखंड का आम आदमी आज भी विकास की आस में बैठा हुआ है | इसे दुर्भाग्य ही कहेंगे अविभाजित यूपी में जो नेता ग्राम प्रधान का चुनाव तक नहीं जीत सकते थे वह आज उत्तराखंड में मंत्री और विधायक बनकर अपनी ठसक दिखा रहे हैं और तो और तिवारी जी के शासन में 350 से ज्यादा लालबत्ती बांटने को राज्य के लिए सही नहीं मानने वाले  पहाड़ी सी एम ‘रावत ’ भी आज दिल खोलकर अपने लोगों को लालबत्ती से अलंकृत करने में पीछे नहीं रहे हैं |

इन 15 बरस में भले ही हरिद्वार में गंगा में कितना पानी बह चुका हो लेकिन उत्तराखंड से ना तो पहाड़ों से लोगों का पलायन रुका और ना ही लूट खसोट | अविभाजित यू पी का आकार बड़ा था और तब उत्तराखंड के नेता वहां पर अपनी अदद पहचान के लिए तरसा करते थे लेकिन अलग उत्तराखंड के अस्तित्व में आने के बाद छोटे छोटे विधान सभा इलाके और इकाइयाँ होने से हर किसी के पास लूट करने के कई रास्ते खुल गए जहाँ मंत्री से लेकर माफिया , नौकरशाहों से लेकर ठेकेदारों के काकटेल ने लूट की गंगा में सहभागिता दिखाने में देरी नहीं लगाई और शायद यही वजह रही उत्तराखंड में इन15 बरसों में ऐसी लूट खसोट मची कि जिसकी मिसाल हमें देखने को नहीं मिलती | ईमानदारी का तमगा लिए मुख्यमंत्री ‘हरीश रावत ’ भले ही अपनी सरकार को साफ़ सुथरी बताने से पीछे नहीं दिखाई देते हों लेकिन यह सच किसी से शायद ही छिपा है कि वह अब तक उत्तराखंड की सबसे भ्रष्ट सरकार चला रहे हैं जहाँ शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य , पेयजल से लेकर आपदा खनन हर विभाग में खुली लूट चल रही है जहाँ अधिकारी, मंत्री और संतरी तीनों की मिलीभगत और पूरी मशीनरी बहती गंगा में हाथ साफ़ करने में लगी है |   

राज्य गठन की सबसे बड़ी विडम्बना यह रही कि इसे कोई सशक्त नेतृत्व नहीं मिल पाया | जनरल बी सी खंडूरी ने अपनी अलग पहचान जरूर बनाई लेकिन कड़े फैसले खुद भाजपा के अपने नेताओं को रास नहीं आये जिसके चलते निशंक और कोश्यारी की जोड़ी ने उन्हें ठिकाने लगाने में देरी नहीं लगाई | अनुभव के मामले में तिवारी जी सबसे तजुर्बेकार थे लेकिन उन्होंने भी अपनों के लिए दिल खोल के खजाना खोलने में देरी नहीं लगाई जिससे राज्य पर कर्ज दिनों दिन बढ़ता ही चला गया |

  रावत सरकार के संरक्षण में तो उत्तराखंड में माफियाओं का एक बड़ा नेटवर्क  पूरे राज्य में सक्रिय है जो मंत्रियो से लेकर नौकरशाहों को साधकर राज्य से मोटा माल बटोरने में लगा हुआ है | यह सब खुला खेल तो मुख्यमंत्री की नाक के नीचे खेला जा रहा | हरीश रावत की चिंता भले ही किसी तरह अपनी सरकार को 2017 तक खींचने की हो लेकिन इससे उत्तराखंड का कुछ भी भला नहीं होने जा रहा है | 

बार बार उत्तराखंड के विकास के लिए हिमाचल माडल की बात कही जाती है और यशवंत सिंह परमार सरीखे नेता की चर्चा यहाँ भी होती रही है लेकिन इसे प्रदेश का दुर्भाग्य ही कहेंगे यहाँ पर परमार सरीखा नेतृत्व तो दूर लीक से अलग हटकर सोचने वाला कोई दूरदर्शी नेतृत्व ही नहीं उभर पाया है | जो नेतृत्व उभरा भी उसे पार्टी के नेताओ ने हटाने के लिए अपनी पूरी उर्जा लगा दी | क्षेत्रीय ताकतों की बात करनी बेमानी है क्युकि वह भी अपने निजी स्वार्थो के चलते सत्ता के तलवे चाटते रहे | राज्य में राष्ट्रीय दलों को पटखनी दे सकने वाली क्षेत्रीय शक्ति की जरूरत हमेशा महसूस की गई। इसके लिए अनुकूल स्थितियां भी पैदा हुईं लेकिन नेताओं की अक्षमता स्वार्थ लोलुपता और अदूरदर्शिता के चलते क्षेत्रीय विकल्प के जो मौके उभरे थे वे भी हाथ से चले गए |

अब तक यहां शासन में रहे भाजपा और कांग्रेस जैसे दल विकास के मोर्चे पर बुरी तरह फेल रहे हैं। भ्रष्टाचार और घोटालों के दर्जनों किस्से मंत्रियों और नौकरशाहों के दामन पर चिपके रहे। आज भी बाहुबल और धनबल पूरी तरह पहाड़ पर हावी है। राज्य में होने वाली नियुक्तियों  और राज्य में लगने वाले उद्योगों में पहाड़ियों को दरकिनार किया जा रहा है। यहां के मुख्यमंत्रियों की भूमिका अपने पार्टी हाईकमान की कृपा पर टिकी है । बेचारा मुख्यमंत्री समय-समय पर अपने आकाओं के पार्टी फंड में मोटी रकम न केवल दे रहा है बल्कि प्राकृतिक संसाधनों के बेशकीमती  उपहार भी अपने आकाओं के नाम करने में पीछे नहीं  है । जिन उद्देश्यों के लिए उत्तर प्रदेश से अलग राज्य  बनाया गया था गया वह सपना धूल धूसरित हो रहा है |  

 भले ही देवभूमि में हरीश सरकार के खिलाफ बगावत के हुदहुद का पटाक्षेप भले ही 28 मार्च को विधानसभा के पटल  पर होगा लेकिन राजनीतिक समीकरण बनाने-बिगाड़ने की एक अहम कड़ी बागियों को मिल चुका दल बदल का नोटिस बन सकता है। माना जा रहा है कि कांग्रेस के सभी नौ बागी विधायकों को भेजे गये इस नोटिस के बाद विधायक दबाव में होंगे। बागी हो चुके नौ विधायकों पर दलबदल कानून के तहत कार्रवाई को राजभवन मान्यता देगा तो यह तय है कि सभी बागी विधायकों को असमय विधायकी से हाथ धोना पड़ेगा जबकि अभी सरकार के पास एक साल का कार्यकाल है। ऐसे में इस बात की उम्मीद की जा रही है कि मुख्यमंत्री हरीश रावत के साथ सीधा टकराव न करने वाले विधायक वापस सरकार के साथ आने का रास्ता  भी बचाये हुए हैं। 
संविधान के 91वें संशोधन में दलबदल कानून से बचने के लिए किसी भी दल से टूटकर अलग होने के लिए दो तिहाई सदस्यों की आवश्यकता होगी। यानि वर्तमान में कांग्रेस के 36 विधायकों के दल से टूटने के लिए 24 का आंकड़ा चाहिए और वर्तमान में बागी सिर्फ नौ  बहुत ही कम हैं। स्पीकर बागियों पर कार्रवाई कर सकते हैं और विधायकों के मन में इस कानून का खौफ उन्हें वापस आने को विवश कर सकता है लेकिन  अगर 28 मार्च से पहले यह 9 बागी अन्य असंतुष्टो को साधकर अपना आंकड़ा बड़ा ले जाते हैं तो हरीश रावत की  अपनों  के जाल में फँस  सकते हैं  ।  ऐसी सूरत में कांग्रेस नंबर गेम में भाजपा से पिछड़ कर रह जायेगी | लेकिन  विधानसभा अध्यक्ष गोविन्द सिंह कुंजवाल के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस भी बीजेपी और बागी  विधायकों ने विधानसभा सचिव चंद्र शर्मा को दिया है । जब तक अविश्वास प्रस्ताव पर फैसला न हो जाये तब तक वह किसी विधायक के खिलाफ कोई भी कार्रवाई नहीं सकते हैं । ऐसे में उत्तराखंड की विधानसभा की विश्वासमत की जंग  दिलचस्प  मोड़ पर चली गई है । रूठने और मनाने का सिलसिला चलेगा भी या नहीं फिलहाल तो कुछ  नहीं कहा जा सकता ।

उत्तराखंड में चाहे सरकार कांग्रेस की रही हो या भाजपा की स्थानीय ताकतों ने अपने व्यक्तिगत स्वार्थो को हमेशा ज्यादा तरजीह दी जिसके चलते विकल्प की छटपटाहट आज भी उत्तराखंड में करीब से महसूस की जा रही है |  उत्तराखंड में विकास के बजाए मुख्यमंत्री की कुर्सी पाने और बचाने का सियासी ड्रामा राज्य गठन के बाद से ही खेला जा रहा है शायद यही वजह है बीते  15  बरस में यह राज्य 8 मुख्यमंत्रियों का शासन देख चुका है और इन सबके के बीच क्या पता 28 मार्च 2016  आते आते यहाँ पर 9 वें मुख्यमंत्री का सियासी ड्रामा देखने को न मिल जाए ? वैसे भी बीते 15 बरस में उत्तराखंड की पहचान न केवल मुख्यमंत्री उत्पादक प्रदेश बल्कि गली गली में पनप रहे छुटभइये नेताओं, ठेकेदारों से इतर नहीं बन सकी है |

Thursday, 28 January 2016

कटीली राह पर भाजपा के ‘शहंशाह’


18 महीने के कार्यकाल को पूरा करने के बाद नए बरस अमित शाह दूसरी बार भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुन लिए गए हैं | इसमें शायद ही किसी को संदेह रहा होगा कि नए बरस में शाह को पार्टी फिर से जिम्मेदारी देने जा रही है | असल में जलगाँव में संघ के सरकार्यवाह और प्रान्त प्रचारक जिस तरीके से संगठन को मथने एकजुट हुए उसी समय शाह की वापसी का रास्ता साफ़ हो गया था | हालाँकि अमित शाह  की अगुवाई  में दिल्ली के बाद बिहार में मिली करारी हार के बाद से वह  भाजपा के मार्गदर्शक मंडल के निशाने पर हैं | गाहे बगाहे पार्टी के ऐसे नेता भी डॉ जोशी और आडवाणी के कैम्प में नजर आये हैं  जिनको मोदी कैबिनेट में या तो जगह नहीं मिल सकी और बिहार चुनावों में ऐसे कई नेता हाशिये पर चले गए थे  लेकिन बिहार चुनावों के बाद पार्टी में शाह के खिलाफ जिस तरह गोलबंदी  शुरू हुई और हार के मंथन के लिए जवाबदेही तय किये जाने की बात दोहराई जाने लगी उससे शाह की दूसरी पारी को लेकर सस्पेंस कायम था | संघ के वरदहस्त के चलते शाह को अभयदान मिल गया| प्रधानमन्त्री मोदी पहले ही सर संघचालक  मोहन भागवत के सामने अमित शाह को लेकर रजामंदी जाता चुके थे लिहाजा 11 अशोका रोड में नामांकन की  सिर्फ औपचारिकताएं ही बची थी | 


 2014 में भाजपा को प्रचंड जीत दिलाने वाले अमित शाह फिर से भाजपा के अध्यक्ष चुन लिए गए | अब इसके साथ ही भाजपा और सरकार पर नरेंद्र मोदी की पकड़ पूरी हो गई है। भारत की सबसे बड़ी पार्टी पर अब दो गुजरातियों के हवाले जरूर है लेकिन अमित शाह की दूसरी पारी चुनौतियों भरी रहने के आसार हैं | 2014 में लोक सभा चुनावों में जहाँ उन्होंने भाजपा को प्रचंड बहुमत दिलाया तो वहीँ हरियाणा, महाराष्ट्र, जम्मू, झारखंड में भाजपा को सत्तासीन करवाया और 2015 जाते जाते दिल्ली और बिहार की करारी हार ने पार्टी के भीतर अमित शाह के विरोध का लावा पार्टी में बाहर निकाल दिया | दबे सुर में कार्यकर्ताओं के बीच यह जुमला कहा जाने लगा अब पोटली और ब्रीफकेस के सहारे राजनीति करने वालों की नींद उड़ गई है लेकिन शाह ने जिस तरीके से मनमाने ढंग से चुनावी बिसात बिहार और दिल्ली में बिछाई उससे उनकी पार्टी  सहयोगियों और विपक्षियों  के बीच खूब भद्द पिटी |

 साइंस से स्नातक अमित शाह कॉलेज में छात्र नेता रहे। संघ की शाखाओं में बचपन से ही जाते थे और राजनीति में आने से पहले एक स्टॉक ब्रोकर थे।  जानकार बताते हैं कि एक वरिष्ठ संघ प्रचारक ने युवा शाह को उस समय संघ और भाजपा में अपनी पैठ बना चुके नरेंद्र मोदी से मिलवाया था।  मोदी उन दिनों अपनी टीम बना रहे थे। उन्हें युवा शाह के आत्मविश्वास ने काफी प्रभावित किया। शाह ने मोदी से लालकृष्ण आडवाणी का चुनाव प्रचार संभालने की इच्छा जताई। जिम्मेदारी मिल जाने के बाद शाह ने उसे बखूबी निभाया । आडवाणी के उस चुनाव के बाद शाह ने पार्टी में अच्छी पहचान बना ली। भाजपा और गुजरात की राजनीति को करीब से देखने वाले कई लोग मोदी और शाह के रिश्ते को 80-90 में आडवाणी और मोदी के रिश्ते जैसा बताते हैं। शायद यही कारण है कि मोदी को शाह में अपने उस युवा जोश की झलक दिखी और उन्होंने अपना अभिन्न सहयोगी बना लिया। जब केशुभाई पटेल को हटाकर मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बने तो उससे पहले ही उन्होंने अमित शाह को एक कद्दावर नेता बना दिया था। 

2002   में जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की दोबारा सरकार बनी तो शाह  की  सूझबूझ और वफादारी देखते हुए  सबसे कम उम्र के शाह को गृहराज्य मंत्री बनाया गया। शाह को सबसे अधिक  मंत्रालय दिए गए और उन्हें दर्जनों कैबिनेट समितियों का सदस्य बनाया गया।  शाह सरीखी माइक्रो मैनेजमेंट की क्षमता कम ही लोगों में है। जब लोकसभा चुनाव को लेकर भाजपा रणनीति बना रही थी तब शाह जानते थे कि यूपी जीते बिना दिल्ली नहीं जीता जा सकता है । पार्टी की यूपी की कमान संभालते ही शाह एक राज्य के नेता से राष्ट्रीय नेता बन गए और मोदी लहर ने शाह को सबसे बड़ा शहंशाह बना डाला । 

 दूसरी बार अब कमान शाह  के हाथ आई है । वह एक सुलझे हुए नेता है और गुजरात की उस नर्सरी से आते हैं जहाँ भाजपा ने हिंदुत्व का परचम एक दौर में फहराकर सरकार बनाने में सफलता हासिल की थी । लेकिन इस बार अपनी दूसरी पारी में अमितशाह के पास  बहुत कम समय बचा है । पार्टी को इस बरस 5 राज्यों बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल और पुदुचेरी के चुनावी समर में कूदना है जहाँ पर भाजपा का कोई नामलेवा नहीं है | भाजपा असम से बहुत उम्मीद लगाये है तो वहीँ केरल में भी पार्टी संघ के संगठन के बूते थोड़ी बहुत आस लगाये बैठी है | इसके अलावे कोई ऐसा राज्य नहीं है जहाँ भाजपा चमत्कार करने जा रही है | भाजपा की असल मुश्किल बंगाल, तमिलनाडु, पुदुचेरी, केरल है जहाँ पार्टी का कोई मजबूत कैडर नहीं है और इन राज्यों में जिस तरह  छत्रप दिनों दिन मजबूत होते जा रहे हैं उससे आगामी चुनावो में भाजपा के लिए  सबसे बड़ा संकट खड़ा  हो गया है ।

 शाह की सबसे बड़ी परीक्षा 2017 में यूपी में होगी | यू पी में भारतीय जनता पार्टी एक दशक से भी अधिक समय से वेंटिलेटर पर लेकिन लोकसभा में मोदीलहर के चलते उसे अभूतपूर्व सफलता मिली थी अब वैसे करिश्मे की उम्मीद बेमानी ही लगती है लेकिन भारतीय जनता पार्टी यह जरूर चाहेगी कि वह यू पी में किंगमेकर की भूमिका में रहे जिससे बसपा के साथ सौदेबाजी कर किसी तरह सरकार चलाई जा सके | वैसे यू पी की मुख्य लड़ाई सपा और बसपा के इर्द गिर्द ही घूमती रही है लिहाजा भाजपा के लिए यहाँ नाक बचाना मुश्किल है |वैसे लोकसभा चुनाव के बाद उत्तर प्रदेश में हुए पंचायत चुनावों में भाजपा का सूपड़ा साफ़ रहा था | कोई बड़ा चमत्कार ही यू पी में भाजपा के जहाज को बचा सकता है | फिर यू पी में भाजपा के पास कल्याण सिंह सरीखे चेहरे का भी अभाव है और बिना सर्वमान्य नेता के अभाव में पार्टी की गत बिहार और दिल्ली सरीखी होने के आसार हैं |  2016 के बाद शाह को बड़ी चुनौती मिलने जा रही है | इसके अलावा उत्तराखंड, पंजाब,  मणिपुर, हिमाचल और गुजरात में भी भाजपा की प्रतिष्ठा सीधे सीधे  दाव पर रहेगी जहाँ भाजपा सीधी लड़ाई में है और यहीं पर शाह को अग्निपरीक्षा से गुजरना पड़ेगा | अगर भाजपा 2017 में बहुत अच्छा कर लेती है तो 2018 में मध्य प्रदेश , राजस्थान,कर्नाटक, छत्तीसगढ़ सरीखे राज्यों में पार्टी की जीत की संभावनाएं बढ़ जाएगी| इसके अलावा अमित शाह की  सबसे बड़ी मुश्किल कार्यकर्ताओं और संगठन के नेताओं से परस्पर संवाद बन गया है | 
आडवाणी भले ही संघ प्रमुख भागवत के निर्देशों के बाद मोदी सरकार के खिलाफ कोई बयान देने से बच रहे हैं लेकिन डॉ जोशी पार्टी की कार्यप्रणाली से असंतुष्ट नेताओं को साधकर नई गोलबंदी की तरफ  तेजी से बढ़ते दिखाई दे रहे हैं । अगर शाह की बिहार वाली कार्यप्रणाली में सुधार नही हुआ तो भाजपा की 2017 में मुश्किलें बढ़ सकती हैं । उत्तर प्रदेश में शाह को सबसे अधिक ध्यान देने की जरूरत होगी जहाँ पर लोक सभा चुनावों की सफलता को दोहराना सबसे बड़ी चुनौती होगी क्युकि इसके बाद ही मोदी लहर भावी लोकसभा चुनावों में  भाजपा का रास्ता तय करेगी और शाह के चुनावी प्रबंधन की असल परीक्षा होगी क्युकि दिल्ली का रास्ता बिहार से ही होकर जाता है और यू पी ही मोदी सरकार की भावी दिशा और दशा को तय करेगा ।   

अमित शाह प्रधानमंत्री खासमखास हैं। इसके कारण ही मोदी ने उन पर भरोसा जताया है  । 2017  और 2018 में अगर शाह की कप्तानी में भाजपा अच्छा प्रदर्शन करती है तो आगामी 2019 के  लोकसभा चुनाव में माहौल भाजपा के पक्ष में जाना तय  है लेकिन  मौजूदा हालात भाजपा के पक्ष में नहीं हैं । रूपया लगातार लुढक रहा है । आर्थिक सुधारो  को गति नहीं मिल पा रही है । औद्योगिक विकास दर भी रुकी हुई है । महंगाई की मार  आम जनता पर पड़ रही है लेकिन सरकार कुछ नहीं कर पा रही है ।  शाह को चाहिए वह ऐसा कुछ करें जिससे आम आदमी सरकार के करीब आये ।  इसके लिए पार्टी के मंत्रियों को पार्टी  मुख्यालय पर बैठाना अनिवार्य करना चाहिए जिससे कार्यकर्ताओं की समस्याओं के साथ जनता की समस्याओं से रूबरू होने का मौका मिल सके ।  पश्चिम बंगाल, केरल में अगर भाजपा को कुछ सीटें मिल गई तो यह शाह की उपलब्धि मानी जाएगी। 2017 सही मायनों में अमित शाह के लिए बड़ी चुनौती लेकर आएगा ।  उत्तर प्रदेश में कमल अगर विधान सभा चुनाव में कमल खिल गया तो पार्टी के लिए उसे भुनाने का भरपूर मौका मिल जाएगा । मौजूदा हालात शाह के लिए अच्छे नहीं हैं । गुजरात , यू  पी के  कई पंचायत चुनाव  में भाजपा  को मुह खानी पड़ी है  वहीँ शिवराज   भी मध्य प्रदेश के चुनावों में कुछ ख़ास सफलता नहीं पा सके हैं । छत्तीसगढ़  में चावल वाले बाबाजी का जलवा भी अब बेअसर है   जिसके बाद भाजपा बैकफुट पर आ  गयी है ।  

 नई  पारी में नए राज्यों में शाह को चाहिए वह गठबंधन की राजनीती के माध्यम से नए दलों  को  जोड़ें तो  भाजपा को लाभ  मिल सकता  है ।शाह को दक्षिण में भाजपा के दुर्ग को मजबूत करना होगा साथ ही नए सहयोगी से गठबंधन के लिए नए विकल्प ढूँढने  होंगे । इस बार निश्चित ही शाह के लिए बदली परिस्थितिया हैं । लोग मोदी में अभी भी उम्मीद देख रहे हैं लेकिन पार्टी की गुटबाजी आगामी चुनाव में उसका खेल खराब कर सकती है । शाह  को इस पर ध्यान  देना होगा । सभी को एकजुट करने की भी बड़ी चुनौती उनके सामने है ।  मोदी का हनीमून  पीरियड अब ख़त्म है और मंत्रियों  के परफॉरमेंस का आंकलन होना अब जरूरी है ।  वहीँ संघ को भी बदली परिस्थियों के अनुरूप भाजपा के लिए बिसात बिछाने की  जिम्मेदारी  शाह  के कंधो पर देनी होगी  ।  


संघ की सबसे बड़ी दिक्कत यह है वह बहुत जल्द इस दौर में सीनियर नेताओं को किनारे कर  शाह  की टीम  पर भरोसा कर रहा है और कहीं ना कहीं संगठन को लेकर भी बहुत जल्दबाजी दिखा रहा है । अब संघ की कोशिश इसी व्यक्तिनिष्ठता को  खत्म  करने की होनी चाहिए और यही चुनौती से  असल में शाह  को भी अब  झेलनी  है । आज भाजपा को दो नावो में सवार होना है । गुजरात में मोदी की तर्ज पर राष्ट्रीय स्तर  पर अपना दक्षिणपंथी चेहरा विकास की तर्ज  पर और  उम्मीद के रूप में पेश करना  होगा जहाँ विकास के मसले पर देश के जनमानस को एकजुट करना होगा जिसकी डगर मुश्किल दिख रही है क्युकि गुजरात की परिस्थितिया अलग थी । वहां मोदिनोमिक्स माडल को हिंदुत्व के समीकरणों और खाम रणनीति के आसरे मोदी ने  नई  पहचान अपनी विकास की लकीर खींचकर दिलाई लेकिन केंद्र में गठबंधन राजनीती में ऐसी परिस्थितिया नहीं हैं । सरकार के अपने नेतागण आये दिन राम मंदिर , लव जेहाद, ध्रुवीकरण , को लेकर तीर छोड़ते रहते हैं और प्रधानमंत्री चुप्पी साधे रहते हैं जिससे जनता में  गलत सन्देश जाता है और मोदी के सबका साथ सबका विकास के नारों की हवा निकल जाती है । ऐसी मुश्किलों से पार्टी को बाहर निकालना होगा ।  लिहाजा  शाह  की राह में कई  कटीले शूल दिख रहे हैं जिनसे जूझ पाने की गंभीर  चुनौती अब  उनके सामने है । देखते हैं मोदी के लाडले अमित शाह  दूसरी पारी में क्या करिश्मा  कर पाते हैं  ?

Wednesday, 6 January 2016

पठानकोट के बाद भारत पाक का रास्ता

 
 
 
 
 
बीते बरस के आखिर में मोदी ने अपने रूस दौरे से लौटते समय पाक की यात्रा कर पूरी दुनिया में  भारत पाक  के करीब आने  को लेकर जहाँ सुर्खियाँ बटोरी वहीँ किसे पता था कि इस 16 वे बरस की शुरुवात में ही भारत पाक का करीब आना वहां के आतंकियों को रास नहीं आएगा ? पठानकोट स्थित एयरफोर्स बेस पर हुए आतंकी हमले में शामिल सभी छह आतंकवादियों को भले ही मार गिराया जा चुका हो लेकिन  इसके बावजूद सात जवानों को शहीद होने से नहीं बचाया जा सका । पठानकोट के बाद अब भारत पाक दोस्ती में आतंक की ऐसी दीवार खड़ी हो गयी है जिसके बाद  15 जनवरी से होने वाली  विदेश सचिवों की बातचीत पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं । 

पठानकोट की इस घटना के तार भी हमेशा की तरह पाक से जुड़ रहे हैं । यह लगभग साफ़ हो चुका  है कि गुरदासपुर की तरह पठानकोट में भी सुरक्षा और ख़ुफ़िया एजेंसियों में तालमेल की भारी कमी दिखाई दी जिसके चलते इतनी बड़ी साजिश को जैश ए  मोहम्मद के आतंकियों ने अंजाम दिया । आतंकियों ने पाक के एयरबेस कैम्पों में ना केवल ट्रेनिंग ली बल्कि पठानकोट के हर इलाके के बारे में जानकारी ली । आतंकी हमला होने के कुछ घंटे पहले तक पाक से निर्देश भी लेते रहे जो पाक के चेहरे को बेनकाब करने के लिए काफी है । लेकिन हमारी सरकार के लिए यह  हैरानी की बात है कि कुछ महीने पहले गुरदासपुर के पुलिस स्टेशन पर हमला करने वाले आतंकी पंजाब और जम्मू-कश्मीर से सटी सीमा के जिस क्षेत्र से आए थे पठानकोट  हमले को अंजाम देने वाले आतंकियों ने भी उसी रास्ते को अगर चुना है तो यह हमारी सुरक्षा व्यवस्था में बड़ी चूक की तरफ इशारा करता है। रक्षा  मंत्री मनोहर परिक्कर ने  भी माना है कि पठानकोट एयरबेस में हुआ हमला चिंता का विषय है । उन्होंने कहा कि  कुछ कमियां हमें इस पूरे मामले में नज़र आईं जिन्हें  हम भविष्य में उन्हें दुरुस्त करेंगे जो कहीं  न कहीं हमारी गंभीर लापरवाही की तरफ इशारा करता है और यह बताता है कि  गुरदासपुर के हमलों से हमने कोई सबक नहीं लिया । 

मोदी और शरीफ ने इस घटना के तुरंत बाद टेलीफ़ोन में बात कर घटनाक्रम पर अपनी प्रतिक्रिया जारी भी की । पाक के प्रधानमंत्री नवाज ने तो इसके दोषियों के खिलाफ कठोर कार्यवाही का भरोसा इस बार भी मोदी को दे  दिया  लेकिन बड़ा सवाल यह है क्या शरीफ सरकार इस बार हमारे सबूतों के आधार पर कोई ठोस  कार्यवाही करेगी  या वह भी उसी तरह का रवैया अपनाने से परहेज नहीं करेगी जो उन्होंने 2008 में मुंबई और बीते बरस गुरदासपुर हमले के बाद अपनाया था ।  भारत  ने इस हमले से संबंधित सुबूत पाकिस्तान को इस बार भी सौंपे  हैं, लेकिन ऐसा तो 26/11 हमले को लेकर भी किया गया था और उसके बाद पाकिस्तान को 5 डोजियर भी सौंपे गए थे लेकिन इन सब पर पाक ने कोई कार्यवाही नहीं की । इस बार पठानकोट होने के चंद घंटों बाद पाक के विदेश मंत्रालय की प्रतिक्रिया संतुलित थी । विदेश मंत्रालय ने कहा पाक दक्षिण एशिया में भारत को आतंकवाद के समूल नाश के लिए भारत का सहयोगी बनना चाहता है लेकिन सहसा इस बात पर यकीन करना  थोड़ा मुश्किल है क्युकि  वहां पर नवाज की सत्ता तो कहने भर को लोकतान्त्रिक है असल नियंत्रण तो सेना और आई एस  आई  का है जिसके बिना पत्ता भी नहीं हिलता ।   

भारत की तरफ से सचिव स्तर की वार्ता रद्द किए जाने के बाद सुषमा स्वराज की यात्रा के बाद जब दोनों देशों के रिश्तों में जमी बर्फ कुछ पिघलने लगी और पी एम मोदी ने 12  बरस के बाद पाक से दोस्ती का हाथ बढ़ाने की कोशिश की तो आतंकियों को शायद यह बात नागवार गुजरी है जिसकी परिणति पठानकोट के एयरबेस कैम्प में हमले के रूप में सामने आई है ।  अपनी करतूतों से पाकिस्तान में ट्रेनिंग लेकर आतंकियों  ने एक बार फिर अपना घिनौना  चेहरा पूरी दुनिया के सामने उजागर कर दिया है ।   अपनी बर्बर कार्यवाही से आतंकी  फिर से कश्मीर को लेकर एक नई किस्सागोई करने में लगे हुए हैं  क्युकि पाकिस्तान के अन्दर नवाज शरीफ सरकार के सामने जैसा संकट अभी खड़ा है उससे उनका बाहर निकलना मुश्किल दिख रहा है और कश्मीर को ढाल बनाकर पाकिस्तान एक बार फिर अपना बरसो पुराना वही राग अलाप रहा है जिसमे कश्मीर को केंद्र में लाकर हमेशा से नई परिस्थिति सामने लायी जाती रही है  ।  सीमा पार पर अपनी  बर्बर कार्यवाही से जहाँ  पाक में बैठे आतंकी कश्मीर को लेकर किसी तरह की सौदेबाजी करने के मूड में नहीं दिखाई देते  वहीँ कश्मीर को केंद्र में रखकर पाक सरकार  भारत से बातचीत का राग  हर दफे दोहराती  रही   है लेकिन बीते दिनों मोदी ने जिस तरीके से बरसों से  विदेश सचिवो की बातचीत शुरू करने की दिशा में मजबूती से  कम्पोजिट डायलॉग प्रोसेस को आगे बढ़ाया  उसने पहली बार इन सवालों को भी खड़ा किया है क्या मोदी पहली बार नेहरु की नीतियों के आगे बेबस ना होते हुए खुद अपनी बनाई नीतियों तले पूरी दुनिया के सामने पाकिस्तान को हुर्रियत की छतरी से इतर आमने सामने लाने में सफल होते दिख रहे हैं । 

बातचीत शुरू होने की प्रक्रिया के बीच पठानकोट हमला  दोनों देशों के  द्विपक्षीय संबंधों के लिए बहुत अनुकूल नहीं हैं। सत्ता में आने से पहले  प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भावी वार्ता के लिए  कहा था किसी भी सार्थक द्विपक्षीय वार्ता के लिए आवश्यक रूप से एक ऐसा माहौल जरूरी है जो आतंकवाद एवं हिंसा से मुक्त हो लेकिन पठानकोट के हालिया हमले से ऐसा माहौल पैदा हो रहा है जो दोनो देशों के बीच संबंधों के लिए बहुत सहायक नहीं रहने वाला | मोदी सरकार के दौर में  पाकिस्तान द्वारा संघर्षविराम का कई बार  उल्लंघन किया गया। इस दौरान कई  बेक़सूर लोग  मारे गये और कई  जवानों सहित लोग  घायल हो गये लेकिन इसके बाद भी सरकार इस उधेड़बुन में उलझी ही रही की पाक से क्या बातचीत को आगे बढ़ाया जाए ? 

पठानकोट अब देश के सामने बड़ा सवाल है ।  अब पाक  के साथ  किस मुह से हम दोस्ती का हाथ बढ़ाये ? पकिस्तान के साथ दोस्ती का आधार क्या हो वह भी तब जब वह लगातार भारत की पीठ पर छुरा भौंकते  हुए लगातार विश्वासघात ही करता जा रहा है । भारतीय नीति नियंताओ से अब हमारा सीधा   सवाल है कि अब समय आ गया है जब पाकिस्तान  को कूटनीति के मोर्चे पर मौत दी जाए ।  मोदी सरकार पाकिस्तान की लोकतांत्रिक सरकार और वहां के सैन्य तंत्र को दो अलग सत्ता केंद्र के रूप में बेनकाब करने में सफल होती है तो यह  इस जनतांत्रिक सरकार की  बड़ी कामयाबी होगी । पठानकोट  का सबसे बड़ा सबक यह है कि सुरक्षा में लगी तमाम एजेंसियों के बीच समन्वय को पुख्ता किया जाए और ऐसे मामलों में किसी तरह की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जानी चाहिए। इसमे पंजाब सरकार भी अपनी जवाबदेही से नहीं बच सकती क्योंकि आतंकियों ने हमले के लिए जगह  को चुना वह पंजाब से सटा  है और पाकिस्तान की सीमा से लगने के कारण यह मानना सही नहीं होगा कि भविष्य में इस तरह के हमलों की पुनरावृत्ति  नहीं होगी । 

     असल में  कारगिल के दौर में भी पाक  ने भारत के साथ गलत सलूक किया था  ।  हमारे प्रधानमंत्री वाजपेयी रिश्तो  में गर्मजोशी लाने लाहौर बस से गए लेकिन  नवाज  शरीफ  को अँधेरे में रखकर मिया मुशर्रफ  कारगिल की पटकथा तैयार करने में लगे रहे । इस काम में उनको पाक की सेना का पूरा सहयोग मिला था । इस बार की कहानी भी पिछले बार से जुदा नहीं है । नवाज के दौर में भी  आई एस आई पाकिस्तान के आंतरिक और बाह्य मामलो में अपना सिक्का दिनों दिन  मजबूत कर रही है | पाकिस्तान में यह सच शायद ही छुपा है कि आई एस आई के बिना पाकिस्तान में पत्ता भी नहीं खड़कता और सेना  भारत के साथ रिश्तो को सुधारने के बजाए बिगाड़ना ही चाहती है । अंतर्राष्ट्रीय जानकारों का मानना है भारत विरोधी गतिविधियों  में  अक्सर आतंकियों  को पाक के सैनिको को  पूरा समर्थन मिलता  रहा है ।  पाक में सरकार तो नाम मात्र की है वहां पर चलती सेना की ही है और बिना सेना के वहां पर पत्ता भी नहीं हिला हिलता  ।   

कट्टरपंथियों की बड़ी जमात वहां ऐसी है जो भारत के साथ सम्बन्ध सुधरते नहीं देखना चाहती है ।  ऐसी सूरत में अगर हम बार बार उससे दोस्ती का राग  छेड़ते है  तो यह हजम नहीं होता क्युकि  छलावे के सिवा यह कुछ भी नहीं है । ऐसे में मोदी सरकार द्वारा पाक से बातचीत शुरू करने की पहेली काम से काम पठानकोट के बाद तो किसी के गले नहीं उतर  रही ।   आखिर कब तक हम पाक के साथ दोस्ती का हाथ बढ़ाते रहेगे  और बातचीत से मेल मिलाप बढ़ायेंगे जबकि हर मोर्चे पर वह हमको धोखा ही धोखा देता आया है । इस घटना के बाद हमारे नीतिनियंताओ को यह सोचना पड़ेगा  अविश्वास की खाई  में दोनों मुल्को की दोस्ती में दरार पडनी  तय है । अतः अब समय आ गया है जब हम पाक के साथ इजराइल सरीखी आक्रामक रणनीति के साथ काम करें  ताकि पाक के चेहरे को पूरी दुनिया में बेनकाब किया जा  सके ।

  मुंबई  में 26/11 के हमलो में भी पाक की संलिप्तता पूरी दुनिया के सामने ना केवल उजागर हुई थी बल्कि पकडे गए आतंकी कसाब ने  यह खुलासा  भी किया हमलो की साजिश पाकिस्तान में रची गई जिसका मास्टर माइंड हाफिज मोहम्मद  सईद  था । हमने मुंबई हमलो के पर्याप्त सबूत पाक को ना केवल सौंपे बल्कि 5  डोजियर  सौंपे लेकिन आज तक वह इनके दोषियों पर कोई कार्यवाही नहीं कर पाया है । आतंक का सबसे बड़ा मास्टर माईंड हाफिज पाकिस्तान में खुला घूम रहा है और  भारत  के खिलाफ लोगो को जेहाद छेड़ने के लए उकसा भी रहा है लेकिन आज तक हम पाक को हाफिज के मसले पर ढील ही देते रहे हैं  यही कारण  है वहां की सरकार  उसे पकड़ने में नाकामयाब रही है ।  2001 में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर में हमले के बाद उसके जमात उद  दावा ने  कश्मीर के ट्रेंनिग कैम्पों में घुसकर युवको को  जेहाद के लिए प्रेरित किया । अमेरिका द्वारा उसके संगठन  को प्रतिबंधित  घोषित  करने  और उस पर करोडो डालर के इनाम रखे जाने के बाद भी पाकिस्तान  सरकार  ने उसे कुछ दिन लाहौर की जेल में पकड़कर रखा और जमानत पर रिहा कर दिया । आज  पाकिस्तान   उसके  पाक में होने को सिरे से नकारता रहा है जबकि असलियत यह है पुंछ  में हाफिज की संलिप्तता कई बार  उजागर भी  हुई है । पाकिस्तान के कब्जे वाले पी ओ  के में हाफिज का जबरदस्त प्रभाव है जो अभी  पाकिस्तान के कट्टरपंथियों के साथ भारत में घुसपैठ बढाने की  बड़ी कार्ययोजना को तैयार भी  कर रहा है ।  

भारतीय गृह मंत्रालय भी अब सीमा पार हो रही गोलाबारी को लेकर चिंतित ही नहीं चौकन्ना हो गया है शायद यही वजह थी मोदी ने अपनी विदेश नीति को लेकर पहली बार नई लकीर यह कहते हुए खींची कि घुसपैठ और गोलाबारी के बीच दोनों देशो के बीच बातचीत नहीं हो सकती साथ ही उन्होंने किसी तीसरे पक्ष के साथ मध्यस्थता से भी साफ़ इनकार कर दिया जिसको मोदी की बड़ी कूटनीति माना जा सकता है लेकिन एक बार फिर पाकिस्तान के साथ दोस्ती  बातचीत के अंदाज में शुरू करने की प्रक्रिया जब परवान चढाने की कोशिशे की जा रही थी तब पठानकोट के हमले ने साबित कर दिया है आतंकवाद से लड़ने के पाक के दावे महज खोखले ही साबित हुए हैं ।  अब ऐसे हालातो में पाक हमसे  बेहतर सम्बन्ध कैसे बना सकता है  ? 

 26 / 11 के हमलो के बाद भारत ने  जहाँ कहा था जब तक 26 /11 के दोषियों पर पाक  कार्यवाही नहीं करेगा तब तक हम उससे कोई बात  नहीं  करेंगे लेकिन आज तक उसके द्वारा दोषियों पर कोई कार्यवाही ना किये जाने के बाद भी हम 200 बिलियन व्यापार , वीजा  नियमो में ढील , क्रिकेट और विदेश सचिवो  के आसरे अगर इस दौर में निकटता बढाने कि सोच  रहे हैं तो यह हमारी लुंज पुंज विदेश नीति वाले रवैये को उजागर करता है । एक बार   भारत दौरे पर आये रहमान मालिक से जब 26 /11 के बारे में हमने पूछा तो उन्होंने कहा इवाइडेंस और आरोपों में भेद होता है । अगर भारत सबूत पेश करता है तो पाक 26/11 के दोषियों को सजा देगा । लेकिन यह कैसा सफ़ेद झूठ  है । भारत तो पहले  ही पाक को सभी सबूत पेश कर  चुका  है लेकिन पाक उस पर कोई कार्यवाही  क्यों नहीं करता ?  अब तो  हर घटना में अपना  हाथ होने से इनकार करना और दोषियों पर कार्यवाही का झुनझुना थमाना  पाक का शगल ही बन गया है । लाइन ऑफ़ कंट्रोल पर युद्ध विराम तो नाम मात्र का है इसके बावजूद भी उस पूरे इलाके में सैनिको के बीच अकसर तनाव देखा जा सकता है और फायरिंग की घटनाएं आये  दिन होती रहती हैं । भारतीय सेना में घुसपैठ की कार्यवाहियां अब पाक की सेना  ही कर  रही है  क्युकि  पाक  का पूरा ध्यान अपने अंदरूनी झगडो  और तालिबान में लगा रहा है । उसे लगता है अगर ऐसा ही जारी रहा तो आने वाले दिनों में कश्मीर उसके हाथ से निकल जायेगा । अतः ऐसे हालातो में वह अब  जैश ऐ मोहम्मद,  लश्कर और हिजबुल मुजाहिदीन जैसे संगठनो को पी ओ  के  में भारत के खिलाफ एक  बड़ी जंग लड़ने के लिए उकसा रहा  है जिसमे कई कट्टरपंथी संगठन उसे मदद कर रहे हैं । पाक की राजनीती का असल सच किसी से छुपा नहीं है । वहां पर सेना कट्टरपंथियों का हाथ की कठपुतली ही  रही है । नवाज  सरकार तो नाम मात्र की लोकत्रांत्रिक है  असल नियंत्रण तो सेना का हर जगह है ।  पाक इस बार यह महसूस कर रहा है अगर समय रहते उसने भारत के खिलाफ अपनी जंग शुरू नहीं की तो कश्मीर का मुद्दा ठंडा पड  जायेगा । अतः वह भारतीय सेना को अपने निशाने पर लेकर कट्टरपंथियों की पुरानी  लीक पर चल निकला है । 

कश्मीर का राग पाक का पुराना राग है जो दोस्ती के रिश्तो में सबसे बड़ी दीवार है । ऐसे दौर में हमें पाक पर ज्यादा ध्यान देने की जरुरत है । हमारी सेना को ज्यादा से ज्यादा अधिकार सीमा से सटे इलाको में मिलने चाहिए । सीमा पार खराब हालातो के चलते  अब भारत को पाक के साथ सख्ती से पेश आना चाहिए । उसे किसी तरह की ढील नहीं मिलनी चाहिए । पाक  हमारे धैर्य  की परीक्षा ना ले अब ऐसे बयान देकर काम नहीं चलने वाला क्युकि हाल के बरसों में  सीमा पार की गोलाबारी की घटनाओ ने  हमारे  सैनिकॊ  के मनोबल को   गिराने का काम किया है । पाक के साथ भारत को अब किसी तरह की नरमी नहीं बरतनी चाहिए और कूटनीति के जरिये अंतर्राष्ट्रीय स्तर  पर उसके खिलाफ माहौल बनाना  चाहिए  साथ ही अमेरिका सरीखे मुल्को से बात कर यह बताना  चाहिए  आतंक के असल सरगना पकिस्तान में  पल रहे हैं और आतंकवाद के नाम पर दी जाने वाली हर मदद का इस्तेमाल पाक दहशतगर्दी फैलाने में कर रहा है । इस समय पाक को  तकरीबन 3 अरब से ज्यादा की सालाना  इमदाद अमेरिका के आसरे मिल रही है जिससे पाक की माली हालत कुछ सुधरी है अन्यथा वहां की अर्थव्यवस्था तो पटरी से उतर चुकी है । आर्थिक विकास  दर  जहाँ लगातार घट रही है वहीँ आतंक के माहौल के चलते कोई नया निवेश नहीं हो पा रहा है । घरेलू गैस से लेकर तेल की बड़ी कीमतों ने संकट बढाया  है |   अगर पाक को विदेशो से मिलने वाली मदद इस दौर में बंद हो जाए तो उसका दीवाला निकल जायेगा । ऐसी सूरत में कट्टरपंथियों के हौंसले भी पस्त हो जायेंगे । तब भारत  पी ओ के में चल रहे आतंकी शिविरों को अपना निशाना बना सकता है ।  माकूल कार्यवाही के लिए यही समय बेहतर होगा ।  अब समय आ गया है जब पाक के खिलाफ भारत बातचीत के विकल्पों से इतर कोई बड़ी कार्यवाही की रणनीति  अख्तियार करे क्युकि एक के बाद एक झूठ  बोलकर पाक हमें धोखा दे रहा है और कश्मीर के मसले के अन्तरराष्ट्रीयकरण  के पक्ष में खड़ा है । 

 आज तक हमने पाक के हर हमले का जवाब बयानबाजी से ही दिया है । भारत सरकार धैर्य , संयम  की दुहाई देकर हर बार लोगो के सामने सम्बन्ध सुधारने की बात दोहराती रहती है ।  इसी नरम रुख से पाक का दुस्साहस इस कदर बढ  गया है  कभी वह हमारे जवानो के शव धड से अलग कर अंतरराष्ट्रीय नियमो का उल्लंघन करता है तो कभी गुरदासपुर और पठानकोट के जरिये हमारे मनोबल को गिराने की कोशिश करता है  । यह साफ़ है कि  गुरदासपुर और पठानकोट जैसे हमलों को बिना सघन तैयारी के अंजाम नहीं दिया जा सकता । चूँकि इन दोनों हमलों पर भारतीय सेना को सीधा निशाना बनाया गया जिससे यह बात तो साफ़ हो चुकी है इन हमलों का सीधा मकसद भारतीय सैन्य ताकत को सीधी  चुनौती देना था । 
 
यह दौर नमो सरकार के लिए भी  असली परीक्षा का है  क्युकि  उसी की नीतियां अब पाक के साथ भारत के भविष्य को ने केवल तय कर सकती है बल्कि अंतरराष्ट्रीय  मोर्चे पर यह मामला उसकी कूटनीति के आसरे दुनिया तक पहुच सकती  है । | प्रचंड जनादेश हासिल कर मोदी  गदगद हैं | वह पूरी दुनिया घूमकर भारत के अनुकूल नीतियों को बनाने में लगे हैं | उनकी विदेश नीति  पर इस बार पूरी दुनिया की नजर  है |  ऐसे में पाकिस्तान को लेकर अब पठानकोट के बाद  उनकी नीतियों पर  सबकी  नजर है ।   अब देखना होगा भारत  सरकार कश्मीर  को लेकर अपना क्या रुख आने वाले दिनों में अपनाएगी ताकि सांप भी मर जाए और लाठी भी ना टूटे ?