Saturday, 12 September 2020

दरिया भी मैं ...दरख़्त भी मैं ... झेलम भी मैं ... चिनार भी मैं


 
'स्टार बेस्टसेलर्स’ और 'चाणक्य’ जैसी टीवी सीरीज में नजर आने  वाला वह मेंढक जैसी बड़ी आंखों वाला अभिनेता  सिल्वर  स्क्रीन पर देश की सबसे रईस फिल्मी प्रोफाइल वाला सेलेब्रिटी बनता जा रहा था । खुद सोचिए अगर ऐसा नहीं होता तो आंग ली जैसे दुनिया के सबसे  प्रशंसित  निर्देशक की बहुप्रतीक्षित फिल्म 'लाइफ ऑफ पी’ में  वह क्यों लिया जाता?  स्पाइडरमैन फ्रैंचाइजी की  फिल्म 'द अमेजिंग स्पाइडरमैन’ के लिए जब सिर्फ एक फिल्म पुराने निर्देशक मार्क वेब ने कास्टिंग करनी शुरू की तो उसे ही क्यों चुना? वह एक्टर  बड़े परदे पर इस बार जब उतरा  तो ख्यात एथलीट और कुख्यात डकैत पान सिंह तोमर बनकर उसने सबके रोंगटे ही खड़े कर दिए । पान सिंह का इंटरव्यू लेने कोई जर्नलिस्ट आती है। पूछती है, “डकैत कैसे बने” तो वह कहता है, “आपको समझ नहीं आया। बीहड़ में बागी होते हैं, डकैत मिलते हैं पार्लियामेंट में”।  सिंह, मा****। याद रखना, अगर हार गया तो तुझे मार-मारकर यहीं के यहीं गाड़ दूंगा।" जब पान सिंह जीत जाता है तो रंधावा बड़े राजी होते हैं, शाबासी देते हैं, पर वह कुछ नाराज है। रंधावा जब उससे पूछते हैं, तो वह रुआंसा होकर कहता है, "कोच साब आप गुरू हैं, लेकिन दोबारा मां की गाली नहीं देना। हमारे गांव में मां की गाली देने वाले को हम गोली मार देते हैं।" इतना कहकर वह रंधावा के पैर छू लेता है। और वो उसे गले लगा लेते हैं।पान सिंह नेशनल बाधा दौड़ के ट्रैक पर दौड़ रहा है। कोच रंधावा (राजेंद्र गुप्ता) को जब लगता है कि वह धीरे दौड़ रहा है तो चिल्लाकर कहते हैं, "ओए पान अब देखिए कि कितना सहज लेकिन धमाकेदार सीन है। ये फिल्म कुछ ऐसी ही है।

 "दि लंच बॉक्स" में खाने और लंच बॉक्स के माध्यम से संचार और सहज इंसानी भावों को वह  दर्शकों के सामने इतनी सहजता से निभाता है  कि आप अपने आस-पास कहीं किसी लंच बॉक्स में ऐसी ही कहानी ढूढ़ने लग जाते हैं। फिल्म "कारवां" में गमगीन परिस्थिति में वे किसी आम व्यक्ति की तरह मदद करने की कोशिश करते हैं। वहीं "करीब-करीब सिंगल" में जिंदादिल आदमी का किरदार वे इतनी शिद्दत से निभाते हैं कि आप उनके फैन हो ही जाते हैं।  ‘हासिल’ का डायलॉग “और जान से मार देना बेटा, हम रह गये ना, मारने में देर नहीं लगायेंगे,भगवान कसम आज भी लोगों कि जुबान पर चढ़ जाता है ।"अंग्रेज़ी मीडियम" के ट्रेलर इंट्रो में वे कहते हैं- “हैलो भाईयों एवं बहनों, ये फिल्म अंग्रेज़ी मीडियम मेरे लिए बहुत खास है। सच, यकीन मानिये कि मेरी दिली इच्छा थी कि इस फिल्म को उतने ही प्यार से प्रमोट करूं जितने प्यार से हम लोगों ने इसे बनाया है। लेकिन मेरे शरीर के अंदर कुछ अनवांटेड मेहमान बैठे हुए हैं, उनसे वार्तालाप चल रहा है, देखते हैं किस करवट ऊंट बैठता है। जैसा भी होगा, आपको इत्तला कर दी जाएगी।"इरफ़ान आगे कहते हैं- "कहावत है  सच में जब जिंदगी आपके हाथ में नींबू थमाती है तो शिकंजी बनाना बहुत मुश्किल हो जाता है लेकिन आपके पास और चॉयस भी क्या है, पॉजिटिव रहने के अलावा। फिलहाल, हाथ में नींबू की शिकंजी बना पाते हैं या नहीं बना पाते हैं. यह आप पर है | यह सकारात्मकता ही इमरान को इतने बड़े अभिनेता के रूप में स्थापित करती है।   'हासिल' फ़िल्म  इलाहाबाद विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति पर बनी थी और इरफ़ान का जीवंत अभिनय देखने लायक था "...और जान से मार देना बेटा, हम रह गये ना, मारने में देर नहीं लगायेंगे, भगवान कसम!" ये हैं इरफान खान की एक्टिंग जिसका तोड़ फिलहाल किसी के पास नहीं है । 

 इरफ़ान ने कुछ समय पहले अपना अंतिम पत्र लिखा जिसमें कहा 'कुछ महीने पहले अचानक मुझे पता चला कि मैं न्यूरोएन्डोक्राइन कैंसर से जूझ रहा हूं, मेरी शब्‍दावली के लिए यह बेहद नया शब्‍द था, इसके बारे में जानकारी लेने पर पता चला कि यह एक दुर्लभ कैंसर की बीमारी है और इसपर अधिक शोध नहीं हुए हैं। अभी तक मैं एक बेहद अलग खेल का हिस्‍सा था। मैं एक तेज भागती ट्रेन पर सवार था, मेरे सपने थे, योजनाएं थीं, आकांक्षाएं थीं और मैं पूरी तरह इस सब में बिजी था। तभी ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरे कंथे पर हाथ रखते हुए मुझे रोका। वह टीसी था: 'आपका स्‍टेशन आने वाला है, कृपया नीचे उतर जाएं। ' मैं परेशान हो गया, 'नहीं-नहीं मेरा स्‍टेशन अभी नहीं आया है.' तो उसने कहा, 'नहीं, आपका सफर यहीं तक था, 'कभी-कभी यह सफर ऐसे ही खत्‍म होता है'।इस सब के बीच मुझे बेइंतहां दर्द हुआ | इस सारे हंगामे, आश्‍चर्य, डर और घबराहट के बीच, एक बार अस्‍पताल में मैंने अपने बेटे से कहा, 'मैं इस वक्‍त अपने आप से बस यही उम्‍मीद करता था कि इस हालत में मैं इस संकट से न गुजरूं । मुझे किसी भी तरह अपने पैरों पर खड़े होना है। मैं डर और घरबाहट को खुद पर हावी नहीं होने दे सकता। यही मेरी मंशा थी... और तभी मुझे बेइंतहां दर्द हुआ।

 दुनिया में महज़ एक ही चीज निश्चित है वो अनिश्चि‍तता है ।  'जब मैं दर्द में, थका हुआ अस्‍पताल में घुस रहा था, तब मुझे एहसास हुआ कि मेरा अस्‍पताल लॉर्ड्स स्‍टेडियम के ठीक सामने है। यह मेरे बचपन के सपनों के 'मक्‍का' जैसा था. अपने दर्द के बीच, मैंने मुस्‍कुराते हुए विवियन रिचर्ड्स का पोस्‍टर देखा। इस हॉस्‍पिटल में मेरे वॉर्ड के ठीक ऊपर कोमा वॉर्ड है। मैं अपने अस्‍पताल के कमरे की बालकॉनी में खड़ा था, और इसने मुझे हिला कर रख दिया। जिंदगी और मौत के खेल के बीच मात्र एक सड़क है। एक तरफ अस्‍पताल, एक तरफ स्‍टेडियम। मैं सिर्फ अपनी ताकत को महसूस कर सकता था और अपना खेल अच्‍छी तरह से खेलने की कोशिश कर सकता था । इस सब ने मुझे अहसास कराया कि मुझे परिणाम के बारे में सोचे बिना ही खुद को समर्पित करना चाहिए और विश्‍वास करना चाहिए, यह सोचा बिना कि मैं कहां जा रहा हूं, आज से 8 महीने, या आज से चार महीने, या दो साल । अब चिंताओं ने बैक सीट ले ली है और अब धुंधली से होने लगी हैं। पहली बार मैंने जीवन में महसूस किया है कि 'स्‍वतंत्रता' के असली मायने क्‍या हैं.'एक उपलब्धि का अहसास। इस कायनात की करनी में मेरा विश्वास ही पूर्ण सत्य बन गया। उसके बाद लगा कि वह विश्वास मेरे हर सेल में पैठ गया। वक़्त ही बताएगा कि वह ठहरता है कि नहीं! फ़िलहाल, मैं यही महसूस कर रहा हूं।

इस सफ़र में सारी दुनिया के लोग...सभी, मेरे सेहतमंद होने की दुआ कर रहे हैं, प्रार्थना कर रहे हैं, मैं जिन्हें जानता हूं और जिन्हें नहीं जानता, वे सभी अलग-अलग जगहों और टाइम ज़ोन से मेरे लिए प्रार्थना कर रहे हैं। मुझे लगता है कि उनकी प्रार्थनाएं मिल कर एक हो गयी हैं… एक बड़ी शक्ति… तीव्र जीवनधारा बन कर मेरे स्पाइन से मुझमें प्रवेश कर सिर के ऊपर कपाल से अंकुरित हो रही है।अंकुरित होकर यह कभी कली, कभी पत्ती, कभी टहनी और कभी शाखा बन जाती है… मैं खुश होकर इन्हें देखता हूं। लोगों की सामूहिक प्रार्थना से उपजी हर टहनी, हर पत्ती, हर फूल मुझे एक नयी दुनिया दिखाती है।अहसास होता है कि ज़रूरी नहीं कि लहरों पर ढक्कन (कॉर्क) का नियंत्रण हो… जैसे आप क़ुदरत के पालने में झूल रहे हों!

 इरफान ने सिनेमाई स्क्रीन  में जो मुकाम हासिल किया, उसके पीछे काम के प्रति उनका  गहरा जूनून  रहा । बहुत कम लोगों को यह बात मालूम है कि इरफान बचपन में एक दौर में  क्रिकेटर हुआ करते थे और क्रिकेटर  बनना चाहते थे  जिसके लिए वह सी के नायडू  ट्राफी भी  खेल चुके थे लेकिन क्रिकेट के चौके और छक्कों के बीच उन्होंने अभिनय में भी दो दो हाथ करने की ठानी और गली-मोहल्ले में नुक्कड़ नाटक करने लगे  ।  इरफान का ये शौक उन्हें जयपुर के रबीन्द्र मंच से  दिल्ली के मशहूर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) में ले आया ।  एनएसडी से एक्टिंग की ट्रेनिंग लेने के बाद इरफान सीधे  मुंबई पहुंचे और यहां के संघर्ष से उन्हें  नई पहचान मिली ।  एक दौर ऐसा था कि रोजी-रोटी के लिए इरफान हर तरह के किरदार करने लगे, कई टी.वी. शो में उन्होंने छोटे रोल किए ।  1990 में आई फिल्म ‘एक डॉक्टर की मौत’ में उनका एक छोटा सा रोल मिला लेकिनं ख़ास पहचान नहीं मिल पाई । इरफान ने 1994 में सीरियल 'द ग्रेट मराठा नजीबुद्दौला' में रोहिल्ला सरदार और 1992 में सीरियल 'चाणक्य' में सेनापति भद्रसाल का किरदार निभाया था। 2002 में रिलीज हुई आसिफ कपाड़िया की फिल्म ‘द वारियर’ ने  इरफान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई।  इसके बाद 2003 में आई इरफान की फिल्म ‘हासिल’ और 2004 में ‘मकबूल’ रिलीज हुई जिसने  इरफान को हिंदी सिनेमा में न सिर्फ शोहरत दिलाई बल्कि उनके अभिनय की धाक जमाई ।

 

इसके बाद तो  इरफान ने  बॉलीवुड ही नहीं हॉलीवुड में भी अपने अभिनय का लोहा मनवाया । अमेजिंग स्पीडर मैन, ए माइटी हार्ट में इरफ़ान ने अपनी  एक्टिंग से सबका दिल जीत लिया। हॉलीवुड की ‘द अमेजिंग स्पाइडरमैन‘ (2012) में इरफान ने एक विलेन का रोल किया था। 2007 में आयी एंजेलिना जोली की ‘ए माइटी हार्ट‘ हो, 2015 में आयी ‘जुरैसिक पार्क‘ हो या फिर ‘द नेमसेक‘ हो इरफान ने अपने फैंस के दिलों को जीतने में कोई कमी नहीं छोड़ी।इरफान ने लगभग सभी किरदार निभाये फिर चाहे वो छोटा किरदार हो या बड़ा, किसी चोर-चरसी का किरदार हो, चाहे पुलिस वाला या सड़कछाप गुंडा हो, नवाब या डकैत से लेकर एक प्रेमी, एक मंगेतर, एक पति तक। इसी दौर में 'लाइफ इन अ मेट्रो', 'स्लमडॉग मिलेनियर', 'न्यूयॉर्क' जैसी फिल्मों ने इरफ़ान की  प्रतिभा को सबके सामने लाने का काम किया ।  किस्सा , दी वारियर , न्यू यॉर्क , ब्लेकमेल , साहेब बीवी और गैंगेस्टर , ये साली जिन्दगी , पीकू , कारवां , मदारी , फेवरेट , तलवार , बिल्लू बारबर, पार्टीशन, नाक आउट , इनफैरनो,    हैदर" और "तलवार  में उनके दमदार अभिनय की दुनिया भर में सराहना हुई ।    इन सभी फिल्मों में  इरफ़ान  की एक्टिंग देखने लायक थी । आस्कर जीतनेवाली फ़िल्म "स्लमडॉग मिलियनेयर" (2008) में पुलिस इंस्पेक्टर का छोटा किरदार भी जिया ।  ओम पुरी के बाद इरफ़ान  अकेले ऐसे अभिनेता थे जिनका डंका विश्व सिनेमा में बजता था ।  ” द वारियर ” ( आसिफ कपाड़िया, 2001), ” द नेमसेक ” ( मीरा नायर, 2006) ” ” अ माईटी हार्ट” ( विलियम विंटरबाटम, 2007),” “स्लमडाग मिलिनायर”( डैनी बायले, 2008), ” लाइफ आफ पाई”(अंग ली, 2012) , ” किस्सा ” ( अनूप सिंह, 2014), ” इनफरनो “( रोन हावर्ड, 2016) आदि कई अंतरराष्ट्रीय फिल्मों में उनका काम बेमिसाल रहा ।

 इरफान बीते बरस ही लंदन से इलाज करवाकर लौटे थे और लौटने के बाद के डॉक्टरों की देखरेख में  चेकअप करवा रहे थे। 2018 में उन्होंने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर बताया था कि वह न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर से पीड़ित हैं जिसके बाद वह  लंदन अपने इलाज के लिए रवाना हुए और लम्बे समय लंदन में रहकर  इलाज  करा रहे थे  । हाल ही में इरफ़ान ख़ान की मां सईदा बेगम का जयपुर में निधन हो गया। लॉकडाउन की वजह से इरफ़ान अपनी मां की अंतिम यात्रा में शरीक नहीं हो पाए थे और वीडियो कॉल के ज़रिए ही उन्होंने मां के जनाज़े में श‍िरकत की थी।  मां की मौत  के महज  चार दिन बाद ही  इरफान खान का इंतकाल हो गया । इरफान 2018 से न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर नामक बीमारी से जूझ रहे थे। कैंसर की बीमारी से निजात पाने के बाद पिछले साल उन्होंने फिल्म ‘अंग्रेजी मीडियम’ के जरिए वापसी की थी। यह फिल्म इस 13 मार्च को रिलीज हुई थी लेकिन होली के बाद लगे  लॉकडाउन के चलते यह सिनेमाघरों में ज्यादा दिन नही चल पाई थी।  

 अपने तीन दशक के करियर में उन्होनें 50 से अधिक राष्ट्रीय फिल्मों और धारावाहिकों में अभिनय किया है।  इतने कम समय में ही इरफान का नाम विशिष्ट कहे जाने वाले अभिनेताओं की श्रेणी में आ गया था।यह सब उनकी मेहनत और लगन का नतीजा है  । 2004 में हासिल मूवी में  खलनायक की भूमिका के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार मिला  वहीँ 2008 में इरफान को फ़िल्म "लाइफ इन ए मेट्रो" के लिए फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड में सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का पुरस्कार से नवाजा गया  ।     60वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार 2012 में इरफ़ान खान को फिल्म "पान सिंह तोमर" में अभिनय के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार मिला वहीँ 2018 में हिंदी मीडियम के लिए उनको फिल्मफेयर  सर्वश्रेष्ठ  अभिनेता का पुरस्कार मिला  ।  

 विशाल भारद्वाज की फिल्म ‘हैदर’ में इरफान खान का एक डायलॉग हैः

“दरिया भी मैं, दरख्त भी मैं

झेलम भी मैं, चिनार भी मैं

दैर  हूं, हरम भी हूं

शिया भी हूं, सुन्नी भी हूं

मैं हूं पंडित… मैं था, मैं हूं और मैं ही रहूंगा.”

 सही में कम समय में इरफ़ान को  इतना बड़ा ओहदा उन्हें विरासत में नहीं मिला बल्कि यह उनकी लगन  और मेहनत से  हासिल किया ।  मृत्यु एक शाश्वत सत्य है जिस पर किसी का नियंत्रण नहीं है  ।   सिनेमा जगत के लिए  उनके निधन की भरपाई करना आसान नहीं होगा |  उनके निधन की खबर से अभी तक उनके तमाम प्रशंसक और परिवार वाले सदमे में हैं। इरफान खान अपने पीछे पत्नी सुतापा सिकदर और दो बेटे अयान और बाबिल खान को छोड़ गए हैं।आज  इरफान हमारे बीच नहीं हैं लेकिन अपनी फिल्मों से  भावी  पीढ़ी यह जान पायेगी  कि इरफान खान होने के क्या मायने थे | आज भले ही वे इस दुनिया को छोड़ गए लेकिन अपने जीवंत अभिनय से इरफान ने अपनी अलहदा पहचान कायम की |    इरफान चाहे वास्तविक तौर पर यहां अब शायद मौजूद न हो लेकिन वो हमेशा लाखों करोड़ों के दिलों में जिंदा रहेंगे। उनके किरदार  और डायलाग हमेशा के लिए अमर रहेंगे ।

जार्ज तुम सा नेता नहीं देखा

 

 

26 जून 1975 की  तपती दोपहरी  सभी की  नजर इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले पर जाती है जब इंदिरा ने आपातकाल लगाने का फैसला किया लेकिन आपातकाल की याद देश के पूर्व रक्षा मंत्री और दिवंगत समाजवादी नेता जार्ज फर्नांडिस की जंजीरों वाली तस्वीर के बिना अधूरी रह जाती है।  ट्रेड यूनियन लीडर के रूप में सियासी करियर शुरू करने वाले धुर समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नांडिस भले ही इस दुनिया से रुखसत हो गए हों  लेकिन आजादी के बाद  इमरजेंसी के दौर की उनकी बेड़ियों से जकड़ी तस्‍वीर लोगों के जेहन में अभी भी कैद है। जब भी आपातकाल के क्रूर दौर का जिक्र होगा, उस दमन के विरोध के प्रतीकस्‍वरूप 'बागी' नेता जॉर्ज फर्नांडिज की उस तस्‍वीर का भी जिक्र होगा।  इसी कारण जॉर्ज को विद्रोही तेवर का नेता कहा गया । 1971 के आम चुनाव में 'गरीबी हटाओ' के नारे के साथ प्रचंड बहुमत 518 सीटें हासिल करने वाली इंदिरा गांधी ने जब उसी साल के अंत में पाकिस्‍तान को युद्ध में शिकस्‍त दी और बांग्‍लादेश दुनिया के नक्‍शे पर आया तो किसी दौर में 'गूंगी गुडि़या' कही जाने वाली इंदिरा गांधी को 'मां दुर्गा' कहा गया । उनको 'आयरन लेडी' कहा गया लेकिन अगले कुछ वर्षों के भीतर ही इंदिरा गांधी की सत्‍ता का इकबाल जाता रहा लिहाजा 25 जून, 1975 की आधी रात को देश में आपातकाल  की घोषणा कर दी गई ।  

मामला 1971 में हुए लोकसभा चुनाव का था, जिसमें उन्होंने अपने मुख्य प्रतिद्वंदी राज नारायण को पराजित किया  लेकिन चुनाव परिणाम आने के चार साल बाद राज नारायण ने हाईकोर्ट में चुनाव परिणाम को चुनौती दी। इंदिरा गांधी ने चुनाव में सरकारी मशीनरी का दुरूपयोग किया, तय सीमा से अधिक खर्च किए और मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए गलत तरीकों का इस्तेमाल किया । अदालत ने इन आरोपों को सही ठहराया इसके बावजूद इंदिरा गांधी टस से मस नहीं हुईं । आपातकाल लागू होते ही आंतरिक सुरक्षा क़ानून मीसा के तहत जिन राजनीतिक विरोधियों की गिरफ़्तारी की गई  उनमें जॉर्ज फ़र्नांडिस का नाम बड़े नेता के तौर पर शामिल था । इंदिरा गांधी ने जब आपातकाल लगाया तो इसके विरोध में सभी पार्टियों ने देशभर में आंदोलन छेड़ दिया। जॉर्ज फर्नांडिस उस समय मजदूर नेता के रूप में उभरे थे ।वे अमेरिकी सम्राज्यवाद और विदेशी पूंजी के घोर विरोधी रहे लेकिन उन्होंने ही गुप्त रूप से सीआईए से मदद मांगी । ये बात बाद में विकीलीक्स के ज़रिए खुलकर समाने आ गई।

 जॉर्ज फर्नांडीस का जन्म  कर्नाटक के मंगलूर में  3 जून, 1930 को हुआ था।  जॉर्ज फर्नांडीस की  मां जॉर्ज पंचम की बहुत बड़ी प्रशंसक थी लिहाजा उन्होंने अपने सबसे बड़े बेटे का नाम जॉर्ज रखा। जॉर्ज अपने 6 बहन-भाई में सबसे बड़े थे। जॉर्ज को 16 साल की उम्र में पादरी बनने की शिक्षा लेने के लिए एक क्रिश्चियन मिशनरी में भेजा गया। लेकिन उनका मन इस शिक्षा में लगा नहीं और 18 साल की उम्र में वे चर्च छोड़ गए। इसके बाद रोजगार की तलाश में मुंबई पहुंचे जहाँ उन्हें जीवन का व्यवहारिक अनुभव हुआ। यहां वे चौपाटी पर सोया करते थे। अभावों में जीते हुए वे सोशलिस्ट पार्टी और ट्रेड यूनियन आंदोलनों के कार्यक्रम में भी लागतार भागीदारी करते थे। उस समय मुखर वक्ता डाक्टर राम मनोहर लोहिया उनके लिए प्रेरणा थे। श्रमिक आंदोलनों में भागीदारी करते हुए वर्ष 1950 के दौरान जॉर्ज फर्नांडिस टैक्सी ड्राइवर यूनियन के अग्रणी नेता बन गए। उनके नेतृत्व में ऐतिहासिक मजदूर आंदोलन हुए। इन आंदोलनों की बदौलत वे गरीबों के हीरो कहे जाने लगे।कहा तो यहां तक जाता है हिंदी फिल्मों के "ट्रेजिडी किंग " दिलीप कुमार को उनसे बहुत प्रेरणा मिला करती थी। अपनी फिल्मों की शूटिंग से पहले वह जार्ज की  सभाओ में जाकर अपने को तैयार करते थे।

 जार्ज को समझने ले लिए हमको 50 के दशक की तरफ रुख करना होगा। इसी दौर में  एक मजदूर नेता के तौर पर उन्होंने अपना परचम महाराष्ट्र की राजनीती में लहराया। यही वह दौर था जब उनकी राजनीति परवान पर गयी। 1950 आते-आते वे टैक्सी ड्राइवर यूनियन के बेताज बादशाह बन गए । बिखरे बाल, और पतले चेहरे वाले फर्नांडिस, तुड़े-मुड़े खादी के कुर्ते-पायजामे, घिसी हुई चप्पलों और चश्मे में खांटी एक्टिविस्ट लगा करते थे । कुछ लोग तभी से उन्हें ‘अनथक विद्रोही’ कहने लगे थे । आज की नयी नवेली पीढ़ी के पास इतनी भी फुर्सत नहीं कि वह उस दौर को जी ले जिसमें जॉर्ज जनता के सरोकारों की राजनीति करते  देश की राजनीति के पोस्टर बॉय के रूप में उभरे। वह भी एक दौर था जब देश की राजनीति का असली बैरोमीटर मुजफ्फरपुर हुआ करता था। यह भी एक दौर है जब मोदिनोमिक्स की बिसात तले समूची सियासत 360 डिग्री घूम चुकी है। 1967 के लोकसभा चुनावों में वे उस समय के बड़े कांग्रेसी नेताओं में से एक एसके पाटिल के सामने मैदान में उतरे । जार्ज को असली पहचान उस समय मिली जब 1967 में उन्होंने मुंबई में कांग्रेस के सबसे बड़े नेता एस के पाटिल को पराजित कर दिया। लोकसभा में पाटिल जैसे बड़े नेता को हराकर उन्होंने उस समय लोक सभा में दस्तक दी। इस जीत ने जार्ज को राजनीति का महानायक बना दिया।बॉम्बे साउथ की इस सीट से जब उन्होंने पाटिल को हराया तो लोग उन्हें ‘जॉर्ज द जायंट किलर’ भी कहने लगे ।  बाद में अपने समाजवाद का झंडा बुलंद करते हुए 1974  में वह रेलवे संघ के मुखिया बना दिए गए। उस समय उनकी ताकत को देखकर तत्कालीन सरकार के भी होश उड़ गए थे। जार्ज जब सामने हड़ताल के नेतृत्व के लिए आगे आते थे तो उनको सुनने के लिए मजदूर कामगारों की टोली से सड़के जाम हो जाया करती थी। बात 1974 की है, जब जॉर्ज फर्नांडिस ऑल इंडिया रेलवे मैन फेडरेशन के अध्यक्ष थे । उस दौरान उन्होंने रेलकर्मियों की मांगों को लेकर सबसे बड़ी हड़ताल कराई थी  ।उनकी मांगें पूरी नहीं की जा सकती थीं और जॉर्ज झुकने को तैयार नहीं हुए । श्रीपाद डांगे की सीपीआई की यूनियन एटक के हाथ से जॉर्ज ने आंदोलन बड़ी बड़ी मांगें करके अपने हाथ में ले लिया और जो सबसे बड़ी हड़ताल थी वो सबसे असफल हड़ताल भी बनी क्योंकि मज़दूरों की मांगें पूरी नहीं हो सकी जिससे 15 लाख से अधिक रेलकर्मियों के शामिल होने से मानो देश ही ठहर गया था । 30000 मज़दूर गिरफ्तार हुए लेकिन अति उत्साह में जॉर्ज ने हर समझौते से इनकार कर दिया । इस  दौरान हजारों को नौकरी और रेलवे की सरकारी कॉलोनियों से बेदखल कर दिया गया । कई जगह तो सेना  बुलानी पड़ी । इस निर्ममता का असर दिखा और तीन हफ्ते के अंदर हड़ताल खत्म हो गई  लेकिन इंदिरा गांधी को इसका हर्जाना भी भुगतना पड़ा और फिर वे जीते-जी कभी मजदूरों-कामगारों के वोट नहीं पा सकी। 

 जॉर्ज की सियासत को समझने के लिए हमें उस दौर में जाना होगा जब ट्रेड यूनियन आंदोलन को नयी धार देने में वह आगे न केवल रहे बल्कि जेपी के आंदोलन को अंजाम तक पहुंचाने और इंदिरा के खिलाफ आक्रोश को हवा देने में वह नई लकीर खींचते नजर आये। यही नहीं नीतीश कुमार, शरद यादव को मोहरा बनाकर लालू प्रसाद को राजनीति की बिसात में चेक देने से लेकर गैर कांग्रेस वाद का झंडा बुलंद करने में जॉर्ज हमेशा आगे रहे। वह मानते थे कि नेहरू परिवार देश की दुर्गति का सबसे बड़ा कारण है इसलिए समाजवादी पार्टी के कलकत्ता अधिवेशन में डॉ लोहिया ने पहली बार जब गैर-कांग्रेस का नारा दिया तो गैर-कांग्रेसवाद का झंडा बुलंद करने वालों में जॉर्ज फर्नांडिस आगे थे। जॉर्ज फर्नांडिस पर आरोप लगा कि वो किसी भी कीमत पर कांग्रेस पार्टी को सत्ता से उखाड़ना चाहते थे। इसके लिए उनपर रेल की पटरियों को डाइनामाइट से उड़ाने का षड़यंत्र रचने का आरोप लगाया गया। डायनामाइट का इस्तेमाल कर जॉर्ज और उनके साथ सरकार के प्रमुख संस्थाओं और रेल पटरियों को उखाड़कर पूरे सिस्टम को हिला देना चाहते थे।

 फर्नाडीस को 10 जून, 1976 को कोलकाता में गिरफ्तार कर उन पर बहुचर्चित बड़ौदा डायनामाइट मामले में केस चलाया गया था। उन पर तत्कालीन इंदिरा सरकार का तख्तापलट करने की कोशिश में सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ने का भी मुकदमा चलाया गया था। जॉर्ज फर्नांडिस ने भारत सरकार के खिलाफ खुले आम अमेरिका की जासूसी संस्था सीआईए और फ्रांस सरकार से भारत सरकार के खिलाफ मदद मांगी थी. विकिलीक्स के दस्तावेजों के मुताबिक, आपातकालीन विरोधी आंदोलन के तहत, जॉर्ज फर्नांडिस सरकारी संस्थानों को डायनामाइट से उड़ाना चाहते थे ।  अमेरिका विरोध के बाद भी 1975 में जॉर्ज फर्नांडिस ने कहा था कि वे इसके लिए सीआई से भी धन लेने के लिए तैयार हैं.विकिलीक्स ने बाकायदा खुलासा किया था कि पूर्व रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस ने अपातकाल के दौरान अमेरिकी खुफिया एजेंसी 'सीआईए' और फ्रांस सरकार से आर्थिक मदद मांगी थी ।  जॉर्ज फर्नांडिस उस समय भूमिगत थे और सरकार विरोधी आंदोलन चला रहे थे।फर्नाडीस सरकार की गैरसंवैधानिक नीतियों का सशस्त्र विरोध करने के पक्षधर थे। इसके लिये हथियार की जरूरत थी और हथियार जुटाने के लिए जॉर्ज फर्नांडिस ने पुणे से मुंबई जाने वाली ट्रैन को लूटने का प्लान बनाया। दरअसल इस ट्रेन से सरकारी गोला बारूद भेजा जाता था।

आपातकाल के दौरान उन्होंने मुजफ्फरपुर की जेल से अपना नामांकन भरा और जे पीका समर्थन किया। तब जॉर्ज के पोस्टर मुजफ्फरपुर के हर घर में लगा करते थे। लोग उनके लिए मन्नते माँगा करते थे और कहा करते थे जेल का ताला टूटेगा हमारा जॉर्ज छूटेगा।

1977 में मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बनी तो उनको उद्योग मंत्री बनाया गया। उस समय उनके मंत्रालय में जया जेटली के पति अशोक जेटली हुआ करते थे। उसी समय उनकी जया जेटली से पहचान हुई। बाद में यह दोस्ती में बदल गयी और वे उनके साथ रहने लगी। लैला कबीर और जॉर्ज के किस्से राजनीति में सुने जाते हैं। लैला कबीर उनकी जिन्दगी में उस समय आ गयी थी जब वह मुम्बई में संघर्ष कर रहे थे। तभी उनकी मुलाकात तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री हुमायू कबीर की पुत्री लैला कबीर से हुई जो उस समय समाज सेवा से जुडी हुई थी। लैला के पास नर्सिंग का डिप्लोमा था और वह इसी में अपना करियर बनाना चाहती थी। बताया जाता है तब जॉर्ज ने ही उनकी मदद की और उनके साथ यही निकटता प्रेम सम्बन्ध में बदल गयी और 21 जुलाई 1971 को वो परिणय सूत्र में बढ़ गए।  इसके बाद कुछ वर्षो तक दोनों के बीच सब कुछ ठीक चला लेकिन जैसे ही जॉर्ज मोरार जी की सरकार में उद्योग मंत्री बनाये गए तो लैला कबीर जॉर्ज से दूर होती गईं। जॉर्ज अपने निजी सचिव अशोक जेटली की पत्नी जया जेटली के ज्यादा निकट चले गए। इस प्रेम को देखते हुए लैला कबीर ने अपने को जॉर्ज से दूर कर लिया और 31 अक्टूबर 1984 से दोनों अलग अलग रहने लगे | इसके बाद लैला दिल्ली के पंचशील पार्क में रहने लगी। वहीँ  जॉर्ज कृष्ण मेनन मार्ग में बिहार के मुख्यमंत्री के तौर पर एक दौर में लालू अपराजेय मान लिए गए थे।

 आपातकाल समाप्त होने के ठीक बाद 1977 में जेल से मुजफ्फरपुर से चुनाव लड़ने वाले जॉर्ज भारी मतों से जीते थे। यह चुनाव तानाशाही बनाम लोकशाही के रूप में जाना जाता था। जॉर्ज के खिलाफ कांग्रेस के नेता नीतेश्वर प्रसाद सिंह चुनाव लड़े थे। जॉर्ज की हथकड़ी लगी तस्वीर की चर्चा पूरे देश में रही। पूरा मुजफ्फरपुर इस तस्वीर से पाट दिया गया था।  1980 में जॉर्ज ने फिर मुजफ्फरपुर से चुनाव लड़ा। उनके खिलाफ कांग्रेस के रजनी रंजन साहू उम्मीदवार थे। इस बार भी जॉर्ज फर्नांडीस चुनाव जीते। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद वर्ष 1984 के चुनाव में जॉर्ज साहब ने मुजफ्फरपुर का चुनावी मैदान छोड़ दिया और बेंगलुरु से भाग्य आजमाया लेकिन वह हार गए। वर्ष 1989 के चुनाव में जॉर्ज साहब फिर मुजफ्फरपुर लौटे और पूर्व केन्द्रीय मंत्री व कांग्रेसी उम्मीदवार ललितेश्वर प्रसाद शाही और 1991 में कांग्रेसी उम्मीदवार रघुनाथ पाण्डेय को पराजित किया। जॉर्ज वीपी सिंह सरकार में रेल मंत्री  रहे। उनके रक्षा मंत्री रहते पोखरण में परमाणु परीक्षण हुआ1996 के लोकसभा चुनाव में जॉर्ज ने नालंदा कूच किया और राजद उम्मीदवार विजय कुमार यादव को धूल चटाई  जॉर्ज  अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में रक्षा मंत्री भी रहे। उनके रक्षा मंत्री रहते पोखरण में परमाणु परीक्षण हुआ वहीँ  1999 में वामपंथी उम्मीदवार गया सिंह को पराजित किया। वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव में जॉर्ज साहब ने फिर मुजफ्फरपुर का रुख किया और  लोजपा के उम्मीदवार भगवानलाल सहनी को पराजित किया परन्तु  2009 के चुनाव में जयनारायण निषाद से से पराजित हो गए।

 15वीं लोकसभा का जब भी जिक्र होगा तो यह जॉर्ज के बिना अधूरा रहेगा। असल में मुजफ्फरपुर से जार्ज फर्नांडीज अक्सर चुनाव लड़ा करते थे लेकिन 15वीं लोकसभा में उनका पत्ता कट गया। नीतीश और शरद यादव की जोड़ी ने उनको टिकट देने से साफ़ मना कर दिया। इसके बाद यह संसदीय इलाका पूरे देश में चर्चा में आ गया था।  तब  नीतीश ने तो साफ़ कह दिया था अगर जार्ज यहां से चुनाव लड़ते है तो वह चुनाव लड़कर अपनी भद करवाएंगे।  पर जार्ज कहां मानते? उन्होंने निर्दलीय चुनाव में कूदने की ठान ली। आखिरकार इस बार उनकी नहीं चल पायी और उनको पराजय का मुंह देखना पड़ा।  जार्ज के चलते मुजफ्फरपुर में विकास कार्य तो तेजी से हुए लेकिन निर्दलीय मैदान में उतरने से उनकी राह आसान नही हो पायी।  लालू के शासन के तीसरे साल में जब जॉर्ज ने उन्हें सत्ता से नेस्तनाबूद करने की ठानी तो किसी को सहसा यकीं नहीं हुआ।  वह भी एक दौर आया जब 1995 के विधानसभा चुनाव में समता पार्टी महज सात सीटों पर सिमट गई तो यही कहा गया कि जॉर्ज की सियासत का अंत हो जायेगा। लेकिन ऐसा हुआ नहीं।  पराजय के बाद शरद और नीतीश कुमार ठोस रणनीति के साथ मैदान में आए जिसमें लालू की जंगलराज की सियासत को घेरने का ब्रह्मास्त्र जॉर्ज ने ही छोड़ा। लालू के दुर्ग पर फतह पाने के लिए उन्होंने  भाजपा से दोस्ती की और एनडीए के संयोजक भी बने जिसमें बाजपेयी के साथ कई पार्टियों का कुनबा 1998 में जुड़ा। पहली बार विचाराधारा से इतर कोई दल एनडीए का घटक बना तो वह जॉर्ज की समता पार्टी थी। इसके बाद जॉर्ज एनडीए के संयोजक बने और उन्होंने कई दलों को एनडीए में लाने में अहम भूमिका निभाई। जॉर्ज की स्वीकार्यता ज्यादा होने के कारण उन्हें एनडीए का संयोजक बनाया गया और इस प्रकार कई दल एनडीए का हिस्सा बने। एनडीए के भीतर और बाहर दोनों जगह वाजपेयी के बाद उनकी स्वीकार्यता सर्वाधिक थी। 1998 से 2004 के बीच दो बार एनडीए की सरकार के गठन और विभिन्न मौकों पर उत्पन्न परिस्थितियों एवं मतभेदों के समाधान में जॉर्ज फर्नांडिस अहम भूमिका निभाते थे। इस प्रकार कांग्रेस के खिलाफ तीसरे मोर्चे की विफलता से जो स्थान रिक्त हो रहा था, उसे एनडीए ने पूरा किया। 1999 में रक्षामंत्री रहते हुए उन्होंने कारगिल से पाक सैनिकों को खदेड़ने में अहम भूमिका निभाई थी। वीपी सिंह की राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार में 1989 में वह रेल महकमे के ही मंत्री बने थे। इस सरकार में अधिकांश वामपंथी नेता थे। संघ विरोधी पर अटल सरकार में रहे जॉर्ज फर्नाडीस आरएसएस के कट्टर आलोचक थे लेकिन उन्होंने अटल सरकार में 1998 व 1999 में रक्षा मंत्री पद संभाला था। उन्हीं के नेतृत्व में भारत ने कारगिल युद्ध लड़ा और 1998 में पोकरण में परमाणु परीक्षण किए थे।जॉर्ज की छवि रक्षा सौदों में दलाली से लेकर तहलका तक में बहुत धूमिल हुई। 2000 आते-आते लालू प्रसाद की सत्ता को चुनौती मिली और बिहार में यह जुमला कहा जाने लगा समोसे में रहेगा आलू पर बिहार में नहीं रहेंगे लालू।  जार्ज के दौर में ही यह मिथक टूट गया था कि लालू अपराजेय हैं। केंद्रीय मंत्री के रूप में जॉर्ज हमेशा दो फैसलों के लिए जाने रहेंगे । 1977 में उन्होंने कोका कोला व आईबीएम को भारत से बाहर कर दिया था और 2002 में देश की दूसरी सबसे बड़ी तेल कंपनी एचपीसीएल को बेचने की प्रक्रिया में अड़ंगा लगाया था। 2002 में हुए ताबूत घोटाले में भी जॉर्ज फर्नांडिस पर आरोप लगे. ये ताबूत भी अमेरिका से खरीदे गए ।  आरोप लगा कि इन ताबूतों को लिए 13 गुना ज्यादा कीमत तय की गई  ।  ये ताबूत सैनिकों के शव लाने ले जाने के लिए कारगिल युद्ध के बाद खरीदे गए थे लेकिन जार्ज अपनी स्पष्ट वादिता और मूल्यों की राजनीति के लिए हमेशा जाने जाते रहेंगे।  रक्षा सौदों में दलाली के मसले पर विपक्ष  ने उनको खूब घेरा लेकिन जॉर्ज इस्तीफ़ा देने से नहीं घबराये।  ऐसा कहा जाता है तहलका दाग लगाने में जया जेटली की बड़ी भूमिका रही। यही नही जॉर्ज को मुजफ्फरपुर से लोकसभा चुनाव लड़वाने  की रणनीति भी खुद जया की थी। इस हार के बाद उनको राज्यसभा में भेजने की कोई जरुरत नहीं थी।वैसे भी एक दौर में जॉर्ज कहा करते थे समाजवादी कभी राज्यसभा के रास्ते "इंट्री" नहीं करते।इन सब बातों के बावजूद भी उनका राज्यसभा जाना मेरे मन में कई बार सवालों को पैदा करता था। यही नहीं शरद-नीतीश की जोड़ी का हाथ पकड़कर उनको राज्यसभा पहुंचाना कई बार उनकी समाजवादी उनकी छवि पर ग्रहण लगाता था।जॉर्ज भारत के एकमात्र रक्षामंत्री रहे जिन्होंने  सियाचिन ग्लेशियर का 18 बार दौरा किया था । मंत्री रहते हुए जॉर्ज के बंगले के दरवाजे कभी बंद नहीं होते थे और अपने काम स्वयं किया करते थे  । जॉर्ज भले ही आज भले ही हमारे बीच में नहीं हैं लेकिन भारतीय राजनीति के इतिहास में हमेशा उनको संघर्षशील , जिंदादिल और सादगीपूर्ण और शालीन नेता के तौर पर याद किया जाता रहेगा जिसने अपनी राजनीति से जनता के सरोकारों की हमेशा फ़िक्र की।

Saturday, 4 July 2020

पत्रकारिता के दिवाकर प्रोफ़ेसर संजय





बादशाह तो मैं कहीं का भी बन सकता हूँ
पर तेरे  दिल की नगरी में  हुकूमत का मजा कुछ और है

देश के जाने-माने पत्रकार एवं ख्याति प्राप्त मीडिया शिक्षक प्रो. संजय द्विवेदी को अखिल भारतीय जनसंचार संस्थान का महानिदेशक बनाये जाने का समाचार उमस में ठंडी हवा के झोंके जैसा बेहद सुखद है । अभी महीने पहले उनको माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय  भोपाल का प्रभारी कुलपति नियुक्त किया गया है । इससे पहले वे दो बार  विश्वविद्यालय के कुलसचिव की जिम्मेदारी का निर्वहन कर चुके हैं ।  

बहुमुखी  प्रतिभा  के धनी , सरस्वती के उपासक , मीडिया शिक्षण को अपनी पुस्तकों और शोध पत्रों के माध्यम से नई दिशा देने वाले संजय के आई आई एम सी में महानिदेशक बनाये जाने के फैसले की हर तरफ सराहना हो रही है।  अखिल भारतीय जनसंचार संस्थान (आई आई एम सी ) देश का प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान है जो सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय  के अंतर्गत काम करता  है और बेहद कम समय में  महानिदेशक के पद पर पर पहुँचकर संजय  ने एक  नया  मुकाम हासिल किया है  ।

उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के एक मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखने वाले संजय बचपन से लेखन में सक्रिय  रहे हैं  और अपने आसपास घटित होने वाली घटनाओं  पर अपने नाम के अनुरूप दिव्य दृष्टि  कलम  के माध्यम से देते रहे हैं। उनके पिता परमात्मानाथ  द्विवेदी अपने दौर के कुशल शिक्षक और लेखक रहे हैं । संजय बस्ती के सुशिक्षित और सुसंस्कृत संपन्न परिवार से  हैं जिस कारण  अनुशासन और सुसंस्कारों के धनी उनके पिता के सभी संस्कार संजय में देखे जा सकते हैं । शिक्षण और लेखन में जिस एकाग्रता की  जरुरत होती है , वह संजय को अपने पिता से प्राप्त हुई ।  उसी एकाग्रता ने संजय को लेखन और पत्रकारिता में अपनी पूंजी को बटोरने में समर्थवान बनाया ।  होनहार बिरवान के होत चिकने पात को सही मायनों में उन्होंने बचपन में ही साबित कर दिया, तब बालसुमन जैसी कई पत्रिकाओं का संपादन उन्होंने खुद के बूते कर दिखाया ।  इंटर की पढाई अपने गृह जनपद में पूर्ण करने के बाद स्नातक की पढाई लखनऊ   विश्वविद्यालय  से पूरी करने के बाद वह भोपाल के माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विवि पहुँचते हैं जहाँ उनके पत्रकारिता के सपने को नई उड़ान मिलती है । यहीं रहते हुए सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ,  बाबूराव विष्णु पराड़कर , माधव राव सप्रे और माखनलाल चतुर्वेदी को पढ़ते पढ़ते वे उनके लेखन के मुरीद बन गए । भोपाल से पत्रकारिता का प्रशिक्षण लेकर वह दिल्ली , मुंबई , बिलासपुर , रायपुर जा पहुचे और अपनी कलम  के जरिये समाज से जुड़े मुद्दों को आवाज देते रहे ।

संजय जिस संस्थान में भी गए उसे अपने काम  और मेहनत के बूते स्थपित  करने  में कोई कसर  नहीं छोड़ी ।  छत्तीसगढ़ में  स्वदेश को जमाने में उनकी भूमिका अहम रही  वहीँ रायपुर  में हरिभूमि और दैनिक भास्कर को बड़ा  ब्रांड  बनाने में उनके योगदान को कोई भूल नहीं  सकता  । रायपुर  में जी 24 घंटे राज्य के पहले सेटेलाइट समाचार चैनल को भी पहले पायदान  पर काबिज कराने में परदे के पीछे उनकी बड़ी भूमिका रही । देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में भी अपनी पत्रकारिता की धमक दिखाई । टीवी न्यूज चैनल की इस पारी के बाद उन्होंने अकादमिक  दुनिया में कदम रखा । बिलासपुर में गुरु घासीदास विवि में अतिथि शिक्षक की नई बदली हुई भूमिका में नजर आये । कुशाभाऊ ठाकरे विवि रायपुर में पत्रकारिता  विभाग को न केवल अपने प्रयासों से स्थापित किया बल्कि  वहां कुछ समय संस्थापक विभागाध्यक्ष  के तौर पर भी काम किया जिसके बाद 2009 में उनका आगमन एशिया के एकमात्र पत्रकारिता विश्वविद्यालय में होता है जिसे देश में पत्रकारिता का बड़ा देवालय कहा जाता है । माखनलाल पत्रकारिता विवि में आने पर संजय जनसंचार  विभागाध्यक्ष  बनाये जाते हैं  । दस बरस  विभागाध्यक्ष के बाद वे कार्यवाहक कुलसचिव की भूमिका में नजर आते हैं । उसके बाद कुलसचिव की पूर्ण भूमिका में उनका नया अवतार होता है । मध्य प्रदेश में कांग्रेस की कमलनाथ सरकार के आने के बाद उनको कुलसचिव की  कुर्सी से हाथ धोना पड़ा । साथ ही उनके कई करीबियों को भोपाल से दूर कर दिया गया जिसके बाद भी वह विरोधियों के प्रति सदाशयता दिखाने से पीछे नहीं हटे । कर्मों में कुशाग्रता , सकारात्मक व्यवहार ,मन में निश्चलता और हृदय में एकाग्रता ,विनम्रता , स्पष्टवादी हंसमुख स्वभाव सहित तमाम नीति निपुणता उनकी विशेषता को सुन्दर बनाती है और यही अलहदा पहचान संजय  को अन्य प्रोफेसरों से अलग करती है  ।

संजय के लेखन में सत्यनिष्ठता, ईमानदारी  और भारतीय विचारधारा का विलक्षण समन्वय है । विनम्रता का भाव उनमें पूरी प्रतिष्ठा रखता है। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय भोपाल में कुलपति के शीर्ष पद पर पहुँचने के बाद भी उनमें जरा सा भी घमंड नहीं आया है । वह अपने गुरुजनों , विद्यार्थियों और सहकर्मियों के साथ आज भी बड़ा आदरभाव रखते हैं और हर किसी से गर्मजोशी के साथ मिलते हैं ।एक राजनीतिक विश्लेषक के तौर पर उन्होंने दशकों से राजनीतिक विश्लेषण और लेखन किया और हर विषय पर खुलकर लिखकर अपनी बात रखी । उनको राजनीती के हर खेमे से तारीफ ही तारीफ मिली । संजय को चाहने  वाले  हर राजनीतिक दल में मौजूद हैं जिनके साथ उनके घनिष्ठ सम्बन्ध आज तक बने हुए हैं । संजय ने जहाँ जहाँ नौकरी की  वहां उन्होंने अपने काम और व्यवहार से अपने  आसपास चाहने वाले प्रशंसकों की बड़ी फ़ौज खड़ी कर ली और सबका दिल जीत लिया । संजय एक दशक से भी अधिक समय तक अपने हजारों भाषाई नवयुवक पत्रकारों  की  भारी फ़ौज  तैयार कर चुके हैं । सबसे बड़ी बात यह है वो आज की युवा पीढ़ी के लिए किसी रोल माडल से कम नहीं हैं  । उन्होंने अपने छात्रों  को एक ही मंत्र दिया है  खूब  पढ़ो और खूब लिखो। संजय अपने पत्रकारिता विभाग के विद्यार्थियों को हमेशा सच के साथ खड़े होने के गुर सिखाते हैं। साथ ही अपनी संवेदनाओं से समाज को देखने का नया नजरिया विकसित करने पर जोर देते हैं। वो मानते हैं मीडिया को मूल्यानुगत  होना चाहिए । वो पत्रकारिता  की पढाई  को डिग्री लेने का माध्यम भर नहीं , समाज के दुःख दर्द को संबल प्रदान करने वाला  बेहतरीन जरिया मानते हैं । सूचनाओं  के साथ वर्तमान दौर की  मिलावट को वो  पत्रकारिता के भविष्य के लिए ठीक नहीं मानते । एजेंडा आधारित पत्रकारिता के बजाय वह मूल्य और  तथ्य आधारित पत्रकारिता पर बल देने की बात दोहराते रहे हैं ।

समाज के लोग  संजय द्विवेदी को  आज एक प्रतिबद्ध शिक्षक, एक कुशल  प्रशासक , विद्वान शिक्षाविद , भारतीय चिन्तक , गहन मनीषी के रूप में जानते हैं तो इसका कारण उनका लेखन है जिसने सामाजिक जीवन के व्यवहारिक  पक्षों को अपनी लेखनी के माध्यम से नया स्वर दिया है ।  हमें  उनसे शिक्षा प्राप्त करने का अवसर तो नहीं मिला लेकिन उनके विशाल वटवृक्ष के नीचे जो भी आया उसे देश , दुनिया और समाज की बेहतर समझ हो जाती है । संजय  कभी भी सिस्टम के गुलाम नहीं रहे  हैं । आमतौर पर यह कहा जाता है आज के दौर में गाइड जहाँ शोधार्थियों को परेशान करते हैं और अपने निजी काम उनके मार्फत करवाते हैं वहीँ शोध निर्देशन की भूमिका में संजय  शोधार्थियों के लिए हमेशा सहयोगी बने  रहे हैं । ऐसा उनके साथ शोध करने वाले लोग बताते हैं ।

संजय की संवाद शैली उन्हें एक कुशल संचारक बनाती है । वह जब बोलते हैं तो आपको अपनी चिर परिचित मुस्कान के साथ मंत्रमुग्ध कर देते हैं और जब वह लिखते हैं तो बेहद संतुलित भाषा का इस्तेमाल करते हैं । अब तक देश के तमाम समाचार पत्र पत्रिकाओं में उनके समसामयिक , राजनीतिक , सामजिक विषयों पर हजारों लेख भी प्रकाशित हो चुके हैं । इसके साथ ही तमाम विमर्शों में वह टेलीविजन चैनलों का अहम चेहरा भी बन चुके हैं।  मीडिया विमर्श नाम की संजय की त्रैमासिक पत्रिका ने बीते 14 बरसों से शैक्षणिक जगत में एक ख़ास पहचान बनायी है जो मीडिया शोधार्थियों , अध्यापकों , विद्यार्थियों  लिए बहुत उपयोगी साबित हुई है । समय समय पर विभिन्न विषयों पर इस पत्रिका के विशेषांक निकलते रहे हैं जिसे पढ़कर हर कोई ज्ञान के महासागर में गोते लगा सकता है।  समाज हित में साहित्यिक मशाल जलाते हुए संजय मीडिया विमर्श के बैनर तले कई बरस से साहित्यिक पत्रकारिता को संबल प्रदान करते हुए अपने दादा पंडित बृजलाल द्विवेदी की याद में अखिल भारतीय साहित्यिक पत्रकारिता सम्मान समारोह प्रतिवर्ष फरवरी में आयोजित करते रहे  हैं ।   यही नहीं बीते बरस ही संजय मूल्यानुगत मीडिया अभिक्रम के अध्यक्ष बने हैं और  वर्तमान में  वह देश के तमाम विश्वविद्यालयों  की अकादमिक समितियों सदस्य  भी हैं।

संजय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ,प्रभाष जोशी , अच्युतानंद मिश्र , एस पी सिंह पर किताब लिख चुके हैं ,वहीँ मीडिया नया दौर नई चुनौतियां , मीडिया शिक्षा : मुद्दे और अपेक्षाएं , उर्दू पत्रकारिता का भविष्य , सोशल नेटवर्किंग : नए समय का संवाद , मीडिया भूमंडलीकरण और समाज , हिंदी मीडिया के हीरो , कुछ भी उल्लेखनीय नहीं , मीडिया की ओर देखती स्त्री , ध्येय पथ , राष्ट्रवाद , भारतीयता और पत्रकारिता , मोदी युग , उनकी कुछ चर्चित पुस्तकें रही हैं । अब तक वह 25 पुस्तकें लिख चुके हैं । इसी बरस उनकी नई पुस्तक  नए समय में अपराध पत्रकारिता सामने आई है जो खासी सुर्खियाँ  बटोर रही है । इसे  उन्होंने दिल्ली विवि की प्रोफ़ेसर  वर्तिका नंदा के साथ मिलकर लिखा है।  अपराध पत्रकारिता विषय में रूचि रखने वाले पाठकों और भावी  पत्रकारों के लिए यह किसी दस्तावेज से कम नहीं है ।संजय की मानें तो हर युवा को जीवन में सपने देखने चाहिए और उन सपनों को पूरा करने के लिए दौड़ लगानी चाहिए साथ ही अपेक्षित परिश्रम भी करना चाहिए  । वह मानते हैं अगर आप सपने देखते हैं और उनको पूरा करने के लिए आपके अन्दर जज्बा है तो वो अवश्य ही पूरे होते हैं ।
आई आई एम सी जैसे प्रतिष्ठित संस्थान को उनके जैसे विराट व्यक्तित्व का लाभ अवश्य मिलेगा और उम्मीद है वह अखिल भारतीय जनसंचार संस्थान को   भाषाई पत्रकारिता का बड़ा केंद्र बनाने के साथ ही इसे  पत्रकारिता का बड़ा विश्वविद्यालय बनायेंगे जिससे यहाँ शोध गतिविधियों को नया आयाम मिलेगा | पत्रकारिता के शिक्षण की बेहतरी और पत्रकारिता के भविष्य को उज्जवल करने के लिए आप हमेशा की तरह कुछ नया करेंगे इसी आशा के साथ आपको इस महीने आ रहे जन्मदिन की अशेष शुभकामनाएं । आप  सदैव निरोगी और प्रसन्न रहें ।  सत्यमेव जयते । जिस इंसान ने वास्तव में सत्यमेव जयते शब्द को अपने जीवन में अपना लिया हो और वह इन वाक्यों को ब्रह्मवाक्य समझकर जीवन में आगे बढ़ता है तो वास्तव में वह इंसान खूब तरक्की करता है । संजय द्विवेदी उसी इंसान का नाम है ।