Thursday, 23 January 2025

आज़ादी के महानायक सुभाष चंद्र बोस

सुभाष चंद्र बोस भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान नेता थे। उनका नाम भारतीय आज़ादी के संघर्ष सुनहरे अक्षरों में लिखा गया है। वे न केवल भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के प्रमुख नेता थे, बल्कि अपनी संघर्षशीलता के चलते दुनिया भर में प्रेरणा के स्रोत बने। उनका व्यक्तित्व बहुआयामी था। उन्होंने न केवल भारतीय स्वतंत्रता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए बल्कि एक ऐसे नेता के रूप में उभरे जिन्होंने अपनी नीतियों, साहस और समर्पण से भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा दी।

 सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को कटक, उड़ीसा में एक प्रतिष्ठित बंगाली परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम जानकीनाथ बोस और माता का नाम प्रभावती देवी था। वे परिवार के नौवें और अंतिम संतान थे। अपनी प्रारम्भिक शिक्षा पूरी कर सुभाष ने 1915 में बीमारी के बावजूद इंटरमीडिएट परीक्षा दी और द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण की जिसके बाद 1919 में बी.ए. आनर्स प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कर कलकत्ता विश्वविद्यालय में दूसरा स्थान प्राप्त किया। अपनी अध्ययनशीलता के कारण वह  कालेज में हमेशा अव्वल दर्जे के छात्र रहे। उन्होंने इंग्लैंड में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त की। भारत माता को ब्रिटिश शासन सत्ता से मुक्ति के लिए हुए स्वाधीनता संघर्ष में भाग लिया। 

छात्र जीवन में ही सुभाष ने विवेकानन्द साहित्य का अध्ययन कर लिया था जिसने उन्हें राष्ट्रीय चेतना से समृद्ध किया और चिंतन-मनन करने की सुदृढ़ जमीन दी। पुत्र को आईसीएस बनाने की पिता की इच्छा का मान रखते हुए सुभाष 1919 में ब्रिटेन के  लिए रवाना हुए और आईसीएस परीक्षा न केवल उत्तीर्ण की बल्कि अंग्रेजों की चाकरी को स्वीकार न कर भारत माता की सेवा-साधना का पथ अंगीकार किया। सेवा से त्यागपत्र देकर जून 1921 में भारत वापस आकर राजनीति में सक्रिय रूप से भाग लिया। वे चित्तरंजन दास की स्वराज पार्टी से जुड़े और फारवर्ड समाचार पत्र का संपादन भी किया। 1923 में उन्हें अखिल भारतीय युवा कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया। उनके क्रांतिकारी आन्दोलनों के चलते उन्हें 1925 में मांडले जेल भी भेजा गया जहाँ उन्हें तपेदिक की बीमारी हो गई थी। 1938 में बोस भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए। उस दौर को याद करें तो सुभाष की लोकप्रियता जबरदस्त रही। कांग्रेस के 51वें अधिवेशन में  कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में दिया गया उनका भाषण दुनिया के सर्वश्रेष्ठ  भाषणों में शुमार किया जाता है। कांग्रेस में सुभाष के बढ़ते प्रभाव से कुछ वषों में ही कांग्रेस के अन्दर के नेताओं का प्रभामंडल कमजोर होने लगा। इस दौर में गांधी जी से  उनका मतभेद भी हुआ। इसका परिणाम यह हुआ कि 1939 के त्रिपुरा अधिवेशन में अध्यक्ष के मनोनयन की परम्परा के उलट कांग्रेस को चुनाव करवाना पड़ा। देश और कार्यकर्ताओं की पहली पसंद सुभाष थे लेकिन गांधी जी ने अपने प्रत्याशी के रूप में पट्टाभि सीतारमैया को सुभाष के विरुद्ध खड़ा कर जिताने की अपील की किन्तु सुभाष ने सीतारमैया को पराजित कर दिया जिस पर गांधी जी इस टिप्पणी कि सीतारमैया की हार मेरी हार है। सक्रिय  सुभाष बहुत दुखी हुए और उन्होंने अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे दिया। उन्होंने 1928 में नेशनल कांग्रेस के महासचिव के रूप में कार्य किया लेकिन उनकी नीतियों से असहमति होने पर वे कांग्रेस से अलग हो गए। विदेश प्रवास के दौरान सुभाष ने कांग्रेस के भीतर फारवर्ड ब्लॉक बनाकर अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष  किया तब उन्हें कांग्रेस से निकाल दिया गया।

 बापू के सुझाव पर सुभाष कोलकता आकर देशबंधु जी के साथ काम करने लगे। दास ने कोलकता महापालिका का चुनाव लड़ा और जीत अर्जित कर महापौर बने। तब उन्होंने सुभाष को महापालिका का मुख्य कार्यकारी अधिकारी बनाया। यहां पर सुभाष ने की कार्यशैली ने सबका दिल जीत लिया और जनता के दिलों में अलहदा पहचान बनाने में सफलता हासिल की। आजादी की लड़ाई के दौरान वह 11 बार जेल भी गए। 1933 से 1936 तक जब स्वास्थय लाभ लेने के लिए वे यूरोप में रहना रहे तो मुसोलिनी और आयरलैण्ड के नेता डी. बलेरा से भेंट कर सहयोग का वचन लिया। आस्ट्रिया में चिकित्सा प्राप्त करने के दौरान पुस्तक लिखने हेतु टाईपिस्ट एमिली शेंकेल से प्रभावित हुए और  उनसे विवाह कर लिया। हालाँकि अपनी राजनीतिक छवि को ठेस न पहुंचे इसलिए उन्होनें इस रिश्ते को बड़ा गोपनीय रखा। 29 नवम्बर 1942 को अनीता बोस के रूप में  उन्हें  पुत्री मिली जिससे वे कभी मिल नहीं सके। 

जनवरी 1941 में नजरबंदी के दौरान ही ब्रिटिश पुलिस और जासूसों को चकमा देकर वे जर्मनी पहुंचे। हिटलर एवं जर्मनी के अन्य नेताओं से भेंट कर आजाद हिन्द रेडियो की स्थापना की। वहां से जापान पहुंच कर जनरल तोजो से भेंट की और जापानी संसद को सम्बोधित किया। जापान के सहयोग से रासबिहारी बोस के मार्गदर्शन में आजाद हिन्द फौज का गठन कर सिपाहियों और नागरिकों का आह्वान किया कि तुम मूझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा। 5 जुलाई 1943 को सिंगापुर में टाउन हॉल के सामने आजाद हिन्द फौज के सम्मुख ओजस्वी भाषण देते हुए पहली बार 'दिल्ली चलो' का नारा दिया था। उनकी फौज ने बर्मा, कोहिमा, इम्फाल के मोर्चे पर अंग्रेजी सेना से मुकाबला कर दुश्मनों के दांत खट्टे कर दिए। नेताजी ने स्वतंत्रता आंदोलन को जन-जन तक पहुंचाने के लिए जर्मनी के बर्लिन में फ्री इंडिया सेंटर की स्थापना के साथ ही आज़ाद हिन्द रेडियो की भी शुरुआत की। इस रेडियो के माध्यम से आज़ादी के आंदोलन से जुड़े समाचार और कार्यक्रम प्रसारित किये जाते थे। अंग्रेजी सरकार सुभाष चन्द्र बोस से इतनी भयभीत थी कि सुभाष और आजाद हिन्द फौज के विरुद्ध दुष्प्रचार करने हेतु एक एंटी इंडिया रेडियो की स्थापना की थी।

21 अक्टूबर 1943 को सुभाष ने आजाद हिन्दुस्तान की अंतरिम सरकार बनाई जिसमें राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और युद्धमंत्री का दायित्व स्वयं निर्वहन किया। इस आजाद हिन्द सरकार को जर्मनी, जापान, फिलीपींस, कोरिया, चीन, इटली, आयरलैण्ड आदि  देशों ने मान्यता प्रदान की थी। दूसरे विश्वयुद्ध में जापान की हार के बाद सुभाष आजादी की लड़ाई हेतु आवश्यक संसाधन जुटाने हेतु रूस जाने का निश्चय कर 18 अगस्त 1945 को हवाई जहाज से निकले किन्तु रास्ते में ही वे लापता हो गये। कहा गया कि उनका हवाई जहाज रास्ते में दुर्घटनाग्रस्त हो गया जिसमें बोस की मृत्यु हो गई। हालांकि ताईवान सरकार ने मुखर्जी आयोग को बताया था कि उस दिन ताईवान के आकाश में कोई विमान दुर्घटना हुई ही नहीं।

 सरकारी दस्तावेजों के अनुसार 18 अगस्त 1945 को बोस का निधन हुआ। नेताजी जापान जा रहे थे और उनका विमान ताइहोकू हवाई अड्डे के पास क्रैश हो गया जिस हादसे में वो बुरी तरह से जल गए और ताईहोकू अस्पताल में उनकी मृत्यु हो गई। हालाँकि उनका शव नहीं मिला लेकिन मृत्यु पर सवाल आज तक उठ रहे हैं। उनके मौत के रहस्य को सुलझाने के लिए देश में दो आयोग भी बने जिन्होंने विमान हादसे को मौत का कारण माना जबकि तीसरे आयोग ने 1999 में ये दावा किया कि 1945  में कोई विमान दुर्घटना ही नहीं हुई थी। सरकार द्वारा ये रिपोर्ट अस्वीकार कर दी गई। बोस की मृत्यु आज भी रहस्य बनी हुई है लेकिन उनका योगदान आज़ादी के संग्राम में अमिट रहेगा। पहले सुभाष चंद्र बोस का जन्मदिन 23  जनवरी को बोस जयंती के रूप में मनाया जाता रहा लेकिन 2021 में प्रधानमंत्री मोदी ने स्वतंत्रता संग्राम में नेताजी के अविस्मरणीय योगदान को देखते हुए इस दिन को पराक्रम दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की।

सुभाष जीवित रहे या विमान दुर्घटना का शिकार हुए यह सत्य तो काल के गर्भ में है लेकिन माँ भारती की सेवा में उनके योगदान को नहीं भुलाया जा सकता। उनका विचार था कि भारतीय समाज में व्याप्त जातिवाद, धर्मनिरपेक्षता, और असमानता को समाप्त कर एक मजबूत और समृद्ध राष्ट्र की नींव रखी जा सकती है। उनका उद्देश्य था कि भारत को आत्मनिर्भर बनाने के साथ-साथ उसे ब्रिटिश साम्राज्यवाद से मुक्त कराया जाए।


 

Monday, 23 December 2024

राजनीति के अजातशत्रु ' अटल '

         

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय राजनीति के एक अद्वितीय और प्रभावशाली नेता रहे। उन्होनें  न केवल भारतीय राजनीति में अपनी अलहदा पहचान बनाई बल्कि वैश्विक स्तर पर भी सम्मान अर्जित किया। अटल को राजनीति का अजातशत्रु कहा जाता है क्योंकि उन्होंने अपने जीवन में कभी  किसी से द्वेष नहीं रखा और हर विचारधारा का सम्मान किया। उनका जीवन सिद्धांतों, नैतिकता और समर्पण का प्रतीक था। 

अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म 25 दिसम्बर 1924 को ग्वालियर, मध्य प्रदेश में हुआ था। उनके पिता श्री कृष्ण बिहारी वाजपेयी एक स्कूल शिक्षक थे, जिन्होंने उन्हें शिक्षा और जीवन के मूल्यों की अहमियत सिखाई। अटल जी ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा ग्वालियर से प्राप्त की और फिर दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग से स्नातक की डिग्री प्राप्त की। उन्होंने राजनीति विज्ञान में भी गहरी रुचि ली और एक अच्छे वक्ता के रूप में अपनी पहचान बनाई।अटल बिहारी वाजपेयी का राजनीतिक जीवन भारतीय जनसंघ से जुड़कर शुरू हुआ। वे भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी से प्रेरित थे और उनकी विचारधारा को अपनाया। 1957 में, वे पहली बार लोकसभा के सदस्य चुने गए। इसके बाद, उनका राजनीतिक करियर लगातार उन्नति की ओर बढ़ता गया। वे भारतीय जनता पार्टी (भा.ज.पा.) के संस्थापक सदस्य रहे और पार्टी को एक नई दिशा देने में उनकी भूमिका अहम रही।

अटल बिहारी वाजपेयी का प्रधानमंत्री के रूप में कार्यकाल भारतीय राजनीति के एक स्वर्णिम अध्याय के रूप में याद किया जाता है। वे 1996, 1998 और 1999 में तीन बार प्रधानमंत्री बने। उनके कार्यकाल में 1998 में पोखरण में परमाणु परीक्षण हुआ । विदेश मंत्री के रूप में संयुक्त राष्ट्र में हिंदी में भाषण देने वाले देश के वो पहले नेता थे  जिसने अपनी भाषण कला से दुनिया  का दिल जीत लिया। 1996 के लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़े दल के रूप में उभरी और अटल जी 13 दिन तक देश के प्रधानमंत्री रहे। 1998 में  वाजपेयी दूसरी बार देश के प्रधानमंत्री बने। 13 महीने के इस कार्यकाल में अटल बिहारी वाजपेयी ने पोखरण में पाँच भूमिगत परमाणु परीक्षण विस्फोट कर सम्पूर्ण विश्व को भारत की ताकत  का अहसास कराया। अमेरिका और यूरोपीय संघ समेत कई देशों ने भारत पर कई तरह के प्रतिबंध लगा दिए लेकिन उसके बाद भी भारत अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भारत किसी के आगे नहीं झुका।  

अटल ने ही 1999 में दिल्ली से लाहौर तक बस सेवा शुरू कराई और पड़ोसी  पाक  के साथ एक नए युग की शुरुआत की लेकिन ये मित्रता अधिक दिनों तक नहीं चल सकी।  पाकिस्तानी सेना ने कारगिल क्षेत्र में बड़ी घुसपैठ की जहाँ  पाक को हार का सामना करना पड़ा।  इस विजय का  श्रेय अटल बिहारी वाजपेयी को गया और 1999 के लोकसभा चुनाव में भाजपा फिर  सबसे बड़ी पार्टी बनी और  सरकार बनायी। अटल जी ने भारत-पाकिस्तान संबंधों में भी सकारात्मक बदलाव की कोशिश की। 1999 में उन्होंने अपनी बस से भारत और पाकिस्तान के बीच संवाद का नया रास्ता खोला ।

अटल जी की  विदेश नीति जबरदस्त रही। उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद भारत ने कई वैश्विक मंचों पर अपनी ताकत दिखाई। उनके नेतृत्व में भारत  वैश्विक राजनीति के केंद्र में स्थापित हुआ जहाँ  राष्ट्रीय सुरक्षा को प्राथमिकता मिली। अटलबिहारी वाजपेयी  गठबंधन की राजनीती के सबसे बड़े जनक रहे। दो दर्जन से अधिक दलों  को  साथ लेकर सरकार चलाना बहुत कठिन काम उस दौर में समझा गया लेकिन अटल जी ने अपनी दूरदृष्टि से यह संभव कर दिखाया। उनकी सरकार ने गठबंधन की राजनीति को एक नई राह दिखाई। अटल में  सबको साथ लेकर चलने की  जबरदस्त कला थी जो उन्होनें अपनी गठबंधन सरकार के कुशल  नेतृत्व के माध्यम से देश को दिखाया।  अटल बिहारी वाजपेयी का व्यक्तित्व  एक उदार चरित्र का प्रतीक था। उनके भाषणों में गहरी सोच दिखाई देती थी साथ ही उनका कवि दिल  बड़ा था और वे समाज के वंचित और शोषित तबके की आवाज को मुखरता के साथ उठाया करते  थे। अटल  ने अपने पूरे जीवन में राजनीति को एक साधन के रूप में देखा। उनकी राजनीती में सुशासन,  ईमानदारी के गुण दिखाई देते थे। वे अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद प्रति भी सम्मान का भाव रखते थे शायद यही वजह रही  कि उन्हें राजनीति के अजातशत्रु कहा गया। अटल ने भारत के चारों कोनों को सड़क मार्ग से जोड़ने के लिए तत्कालीन  केन्द्रीय भूतल परिवहन मंत्री  बी. सी. खंड़ूडी के नेतृत्व में स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना की शुरुआत की। उनकी सरकार ने सुशासन को सही मायनों में साबित करके दिखाया और गाँव के अंतिम छोर  तक विकास की किरण पहुंचाने का काम किया। 

अटल की सरकार ने के रहते देश में हर क्षेत्र में विकास की नई गौरवगाथा लिखी गई। 2004 में जब  लोकसभा चुनाव हुआ और भाजपा के नेतृत्व वाले राजग ने  उनके नेतृत्व में शाइनिंग इंडिया का नारा देकर चुनाव लड़ा लेकिन इन चुनावों में किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला और  मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यूपीए की सरकार बनी और भाजपा को विपक्ष में बैठना पड़ा। इसके बाद लगातार अस्वस्थ्य रहने के कारण अटल बिहारी वाजपेयी ने राजनीति से सन्यास ले लिया।अटल जी की कविता, भाषण करने की  कला, नेतृत्व क्षमता ने राजनीति को एक नई ऊँचाई पर पहुंचाया। वे भारतीय राजनीति के ऐसे सितारे  कहे जा सकते हैं जिनकी चमक हमेशा बनी रहेगी। तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने 2015 में भारत के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को उनके घर जाकर सम्मानित किया। भारतीय राजनीति के युगपुरुष, अजातशत्रु  अटल  जी का 16 अगस्त 2018 को 93 साल की उम्र में दिल्ली के एम्स में इलाज के दौरान निधन हो गया। उनका व्यक्तित्व हिमालय के समान विराट था। सही मायनों में अगर कहा जाए तो  अटल बिहारी वाजपेयी  भारतीय राजनीति के शिखर पुरुष थे। देश अटल जी के योगदान को कभी भुला नहीं पायेगा।  

Sunday, 22 December 2024

मोहम्मद रफ़ी का जन्म शताब्दी वर्ष

 मोहम्मद रफ़ी भारतीय संगीत और सिनेमा के अद्वितीय गीतकार, गायक और संगीतकार एक ऐसी शख्सियत हैं जिनका योगदान अविस्मरणीय है। आज भी ऐसा लगता है मानो उनका संगीत और आवाज़ भारतीय सिनेमा की आत्मा में समाहित हो गए हैं। रफ़ी साहब के व्यक्तित्व का प्रभाव सिर्फ उनके गीतों के माध्यम से ही नहीं बल्कि उनकी सरलता, विनम्रता और पेशेवर अंदाज  में भी महसूस किया जा सकता था। 

 रफ़ी का जन्म 24 दिसम्बर 1924 को पंजाब (अब पाकिस्तान) के अमृतसर जिले के कोटला सुलतान सिंह गांव में हुआ था। उनका परिवार संगीत के प्रति स्नेह रखने वाला था। इनके बड़े भाई की नाई दुकान थी। रफ़ी जब सात साल के थे तो वे अपने बड़े भाई की दुकान से होकर गुजरने वाले एक फकीर का पीछा किया करते थे जो उधर से गाते हुए जाया करता था। उसकी आवाज रफ़ी को पसन्द आई और रफ़ी उसकी नकल किया करते थे। उनकी नकल में अव्वलता को देखकर लोगों को उनकी आवाज भी पसन्द आने लगी। लोग नाई दुकान में उनके गाने की प्रशंसा करने लगे।  उनके मन में संगीत का बीज एक भीख मांगने वाले फ़कीर को देखकर  अंकुरित हुआ। तब उनके मन में भी उस फ़कीर जैसे गाने की इच्छा जगी।  जब उन्होनें गाना शुरू किया तो पिता ने ही सबसे पहले विरोध  किया जिसके लिए उनकी पिटाई भी हुई  लेकिन संगीत को मन में  बसाने की तमन्ना लिए रफ़ी कभी भी अपने लक्ष्य से नहीं डिगे।  लाहौर में कुन्दनलाल सहगल जब अपना स्टेज शो करने निकले तब रफ़ी महज 13 बरस की उम्र में उनको सुनने गए।  वहां मंच पर लाइट चली गई  तो भीड़ शांत करने के लिए एक नौजवान को गाने का मौका मिला।  रफ़ी ने ऐसा गाना उस स्टेज में गाया सब देखते रहे और सबको झूमने पर मजबूर कर दिया। तब संगीतकार श्यामसुन्दर ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और मायानगरी में आकर प्लेबैक गायक बनने का मौका दिया और पंजाबी फिल्म गुल बलोच में गाना गाया।यह गाना रफी का ज़ीनत बेगम के साथ एक युगल गीत था जिसके बोल थे : नी सोहनिये नी हीरिये तेरी याद ने। इनके बड़े भाई मोहम्मद हमीद ने इनके संगीत के प्रति इनकी रुचि को देखा और उन्हें उस्ताद अब्दुल वाहिद खान के पास संगीत शिक्षा लेने को कहा। उनका रुझान शास्त्रीय संगीत की ओर तेजी से बढ़ा और उनका गायक बनने का सपना साकार होने की दिशा में कदम बढ़ने लगे। रफी साहिब की गायन-प्रतिभा को पहचानते हुए संगीतकार फिरोज़ निज़ामी ने रफी को आल इंडिया रेडियो लाहौर में नौकरी दिलवा दी। 

रफ़ी की  हिन्दी गायकी की असल शुरुआत 1941 में हुई जब उन्होंने पहली बार रेडियो पाकिस्तान के लिए  गाना गाया  लेकिन उनका बॉलीवुड में प्रवेश 1944 में हुआ जब उन्होंने "सोनिये नी हीरिये", "तू हिंदू बनेगा मुसलमान बनेगा" और अन्य छोटे-छोटे गीतों के माध्यम से हिंदी सिनेमा में अपनी अलहदा पहचान  बनाने की दिशा में तेजी से अपने कदम बढ़ाये।  हालांकि उन्हें असली पहचान 1946 में फिल्म "गांव की गोरी" से मिली जिसमें उनका गीत "सोनिये नी हीरिये" काफी हिट हुआ। भारत का वो दौर याद करें जब  देश विभाजन के सदमे की त्रासदी से उबर ही रहा था।  राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की गोली मार कर हत्या कर दी गई थी।  उस दौर में  राजेंद्र कृष्ण के लिखे गीत 'सुनो सुनो ए दुनिया वालों, बापू की ये अमर कहानी' को हुस्नराम भगत राम ने अपना संगीत से कालजयी बना डाला। इस नग्मे को 'रफ़ी साहब' ने अपनी दिलकश आवाज़ से झंकृत करने का काम बखूबी किया। उस दौर में रफ़ी होने के मायने आप इस बात से समझ सकते हैं कि  इस गीत को सुनने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने ख़ासतौर से 'रफ़ी साहब' को  अपने दिल्ली  निवास स्थान पर आमंत्रित किया और इस  गीत सुनकर नेहरू की आँखें भी नम हो गई। भारत की आज़ादी की पहली वर्षगाँठ पर नेहरू ने उस दौर में रफ़ी को चाँदी का एक छोटा सा  मेडल भेंट किया तब  मोहम्मद रफ़ी की उम्र महज 24 बरस की रही जो उनके लिए किसी बड़े  सम्मान से कम नहीं था। 

रफ़ी साहब ने अपनी गायकी में विविधता और प्रयोग की कोई कमी नहीं छोड़ी। चाहे वह रोमांटिक गीत हों या फिर देशभक्ति गीत हों या फिर दर्द भरे नग्मे, रफ़ी की दिलकश आवाज़ में वह ताकत थी कि हर गीत  उस दौर में अपनी पूरी कहानी खुद बयां कर देता था। उन्होंने अपने करियर के दौरान लगभग 28,000 से अधिक गीत गाए जो आज भी हर संगीत प्रेमी के दिल में गूंजते हैं। उनके गायन में जो मिठास थी वह अनमोल मानी जाती है। 

रफ़ी साहब के गाने सिर्फ सुरों और शब्दों का मिलाज नहीं होते थे बल्कि उन गीतों में जो भावनात्मक गहराई थी जो उस दौर के रेडियो सुनंने वालों को  दिल में उतार देती थी। "तेरा मुझसे है पहले का नाता कोई" (नौशाद द्वारा संगीतबद्ध), "कुछ तो लोग कहेंगे"(शंकर जयकिशन), "आजकल पाँव ज़मीन पर नहीं" (आर.डी. बर्मन) जैसे गीतों में रफ़ी की आवाज़ ने न केवल गीतों को संजीवनी दी बल्कि ये सभी  गीत  हिंदी  सिनेमा की अनमोल धरोहर बन गए। रफ़ी ने हिन्दी सिनेमा के लिए बिना फीस लिये या बेहद कम पैसोँ लेकर भी नायाब गीत गाए। उनका कहना था, "मेरा काम घास - घोड़ा चिल्लाना नहीं है।  मेरा काम इंसानों के काम आना है। इंसानो से दोस्ती करने का है। मेरा शौक, मेरी इबादत संगीत है। वह करना मुझे अच्छा लगता है इसलिए मैं कभी भी पैसे के लिए नहीं गाता। न मैंने कभी भी किसी से पहले से कोई समझौता किया जिसने जो दे दिया मैंने अपनी रोजी-रोटी समझकर रख लिया क्योंकि गायिकी मेरी अपनी जागीर नहीं थी।  खुदा की दी हुई नायाब नेमत है"। 

 रफ़ी की गायकी का एक महत्वपूर्ण पहलू यह था कि वे हर प्रकार के गीत गाने में माहिर थे। उन्होंने शास्त्रीय संगीत, सुगम संगीत, भक्ति गीत, भजन, ग़ज़ल, रोमांटिक गीत, हास्य गीत और यहां तक कि फ़िल्मी गानों के साथ भी प्रयोग किया। "मन तड़पत हरि दर्शन को" (बैजू बावरा), "सारे जहाँ से अच्छा" (पाकिस्तान दिवस पर गाया गया गीत) जैसी विविधताएं दर्शाती हैं कि रफ़ी का गायन सिर्फ एक शैली तक सीमित नहीं था। रफ़ी की आवाज़ में वह सहजता और सरलता थी जो उन्हें एक आम आदमी से जोड़ देती थी। उनकी आवाज़ में गंभीर सादगी नजर आती  थी जो श्रोताओं के दिलों के भीतर उतर जाती थी। रफ़ी के  संगीतकारों के साथ सम्बन्ध भी बड़े सौहार्दपूर्ण रहे। उन्होंने नौशाद, शंकर जयकिशन, ओ.पी. नैय्यर, एस.डी. बर्मन, आर.डी. बर्मन, और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जैसे महान संगीतकारों के साथ काम किया। रफ़ी और नौशाद की जोड़ी ने हिंदी सिनेमा को कई कालजयी गीत दिए हैं। नौशाद की फ़िल्म "बैजू बावरा" में रफ़ी की गायकी ने सिनेमा जगत को एक नया मोड़ दिया। रफ़ी साहब की पहचान एक संगीतकार से अधिक एक कलाकार के रूप में थी। वे न केवल अपने गीतों के लिए प्रसिद्ध थे बल्कि उनके व्यक्तित्व की विनम्रता भी लोगों के दिलों में बसी थी। उनकी आवाज़ ने सैकड़ों अभिनेता-अभिनेत्रियों की फिल्मों में जान डाली। 

1945 से जब से गोल्डन एरा शुरू हुआ तब से ही हर अभिनेता की इच्छा होती थी कि रूपहले पर्दे पर मुझे महान रफ़ी साहब की रूहानी मिलें।  ख़ासकर देव, दिलीप, शम्मी कपूर, राजेन्द्र कुमार, धर्मेंद्र, शशि कपूर, धर्मेंद्र, अमिताभ बच्चन, राजेश खन्ना सरीखे कई अदाकारों आदि की कामयाबी में सबसे बड़ा रोल रफ़ी का रहा। हिन्दी सिनेमा में रफ़ी  ने सबसे ज्यादा शम्मी के लिए गाया। क्लासिकल ग़ज़ल के उस्ताद रफ़ी साहब शम्मी कपूर की इमेज का पूरा ख्याल रखते थे। ‘शंकर-जयकिशन’ का संगीत और मोहम्मद रफी की आवाज में लिखे जो खत तुझे’- कन्यादान का गाना आज भी उतना  चर्चित है जितना यह 1968 में था। आशा पारेख और शशि कपूर पर शूट किया गया यह गाना मोहम्मद रफ़ी की बेहतरीन पेशकश में से एक है। मुगल-ए-आजम फिल्म को भला कौन भूल सकता है। सलीम और अनारकली की प्रेम कहानी की लोकप्रियता को देखते हुए ही आगे चलकर इस फिल्म को कलर रूप दिया गया। इसके गाने आज भी बहुत  पॉपुलर हैं । मोहम्मद रफ़ी ने सबसे ज्यादा गाने शम्मी कपूर के लिए गाए थे। मोहम्मद रफ़ी  और शम्मी कपूर के नाम कई हिट ‘बदन पे सितारे’, ‘तुमसे अच्छा कौन है’,‘चाहे कोई मुझे जंगली कहे’ हैं। शम्मी कपूर अपने आप को मोहम्मद रफ़ी के बिना अधूरा मानते थे। मोहम्मद रफ़ी और शम्मी कपूर की जोड़ी ने कई हिट गाने दिए हैं। इन्हीं में एक गाना था ‘जंगली’ फिल्म का ‘सुकु-सुकु’।ये गाना आज भी उतना ही खुशमिजाज लगता है जितना उस दौर में लगता था। 

रफ़ी को उनके योगदान के लिए कई सम्मान प्राप्त हुए। उन्हें 1967 में "पद्मश्री" और 1977 में "पद्मभूषण" जैसे उच्चतम सम्मान प्राप्त हुए। साथ ही उन्हें 6 फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिले। मोहम्मद रफ़ी का आखिरी गीत फिल्म 'आस पास' के लिए था जो उन्होंने लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के लिए अपने निधन से ठीक दो दिन पहले रिकॉर्ड किया था। गीत के बोल थे 'शाम फिर क्यों उदास है दोस्त'...। संगीत जगत में रफ़ी जिस मुकाम पर थे शायद यदि कोई और होता तो उसे सफल होने का घमंड होता लेकिन रफ़ी  का व्यक्तित्व सहज और सरल था। वो किसी का हक मारने में विश्वास नहीं रखते थे। वे बहुत ही नेकदिल  इंसान थे।

आज भी रफ़ी का संगीत सिनेमा प्रेमियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उनके गाए गीत आज की नई पीढ़ी की जुबां पर उतरते हैं। रफ़ी की दिलकश आवाज़ ने भारतीय सिनेमा को वह रूप दिया है जिसे सिनेमा प्रेमी सदियों तक याद करेंगे। रफ़ी के जन्म शताब्दी वर्ष पर यह कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी कि रफ़ी सरीखे गायक हजार बरस में एक बार पैदा होते हैं। रफ़ी साहब जब दुनिया रुखसत कर गए तो संगीत के सिरमौर नौशाद ने रफी पर कसीदे पढ़ते हुए सच ही कहा था

कहता है कोई दिल गया दिलबर चला गया

साहिल पुकारता है समुन्दर चला गया

लेकिन जो बात सच है, वो कहता नहीं कोई

दुनिया से मौसकी का, पयम्बर चला गया



Saturday, 12 October 2024

'शक्ति 'और 'विजय' का उत्सव विजयादशमी

     

आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से शारदीय नवरात्र शुरू होते हैं जो नौ दिनों तक चलते हैं।  शुक्लपक्ष की दशमी का बड़ा विशेष महत्व है।  विजयादशमी, जिसे दशहरा भी कहा जाता है भारतीय संस्कृति में एक महत्वपूर्ण पर्व है जो  हर वर्ष आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की दशमी को मनाया जाता है। विजयादशमी का अर्थ है  'विजय का दसवां दिन' और यह दिन रावण के खिलाफ भगवान राम की विजय का प्रतीक है। यह त्योहार न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। विजयादशमी का त्यौहार भगवान राम की कथा से जुड़ा हुआ है। रावण एक महापराक्रमी लेकिन अधर्मी राजा था जिसने  माता सीता का हरण किया था। राम के द्वारा रावण का वध न केवल धर्म की विजय का प्रतीक है, बल्कि यह यह भी दर्शाता है कि अंततः सत्य और न्याय की विजय होती है। इस दिन को मनाने के लिए रावण, मेघनाद और कुम्भकर्ण के पुतले जलाए जाते हैं, जो बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक होते हैं।विजयादशमी केवल राम की विजय का पर्व नहीं है, बल्कि यह नवरात्रि के पर्व का अंतिम दिन भी है। नवरात्रि में देवी दुर्गा की पूजा की जाती है और विजयादशमी के दिन देवी की शक्ति और संहारक रूप की विजय का जश्न मनाया जाता है। यह पर्व हमें सिखाता है कि बुराई चाहे कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, अंततः सत्य और धर्म की विजय होती है।  इस दिन दशहरा पूरे देश भर में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है।

विजयादशमी के दिन श्रीराम, मां दुर्गा, श्री गणेश, विद्या की देवी सरस्वती और हनुमान जी की आराधना करके परिवार के मंगल की कामना की जाती है। दशहरा या विजयादशमी सर्वसिद्धिदायक तिथि मानी जाती है इसलिए इस दिन सभी शुभ कार्य फलकारी माने जाते हैं। विजयादशमी या शस्त्र पूजा हिंदुओं का एक प्रमुख त्यौहार है। अश्विन मास  के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को इसका आयोजन होता है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम ने इसी दिन  लंकेश रावण का वध किया था। इस पर्व को असत्य पर सत्य की विजय के रूप में मनाया जाता है इसलिए इस दशमी को विजयादशमी के नाम से जाना जाता है। दशहरा पर्व  वर्ष की तीन अत्यंत शुभ तिथियां में से एक है। अन्य दो हैं  चैत्र शुक्ल की  प्रतिपदा और कार्तिक शुक्ल की प्रतिपदा। इस दिन का भारतीय सनातन संस्कृति में बड़ा महत्व है जब सभी  लोग अपना  नया कार्य प्रारंभ करते हैं और शस्त्र पूजा भी करते हैं। इस दिन को विशेष रूप से शस्त्र पूजा के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है, खासकर उन लोगों के लिए जो सैन्य, सुरक्षा, या विभिन्न प्रकार के व्यवसायों से जुड़े होते हैं।शस्त्र पूजा का उद्देश्य अपने अस्त्र-शस्त्रों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करना और उन्हें पवित्र मानना है। यह पूजा विशेष रूप से सैनिकों, पुलिसकर्मियों, और उन लोगों के लिए की जाती है जो विभिन्न प्रकार के उपकरणों का उपयोग करते हैं। शस्त्र पूजा से यह संदेश मिलता है कि युद्ध और हिंसा का उपयोग केवल जब आवश्यक हो तब किया जाए, और उससे पहले अपने अस्त्रों का सम्मान किया जाए।विजयादशमी पर शस्त्र पूजा का आयोजन न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक धरोहर को भी दर्शाता है। यह हमें याद दिलाता है कि हम अपने शस्त्रों का उपयोग केवल आवश्यकता के समय करें और सदैव शांति और सद्भाव की भावना को प्राथमिकता दें

विजयादशमी के त्योहार मनाने के पीछे एक दूसरी भी पौराणिक मान्यता प्रचलित है। महिषासुर नाम के एक दैत्य ने सभी देवताओं को पराजित करते हुए उनके राजपाठ छीन लिए थे। महिषासुर को मिले वरदान और पराक्रम के काण उसके सामने कोई भी देवता टिक नहीं पा रहा था। तब महिषासुर के संहार के लिए ब्रह्रा, विष्णु और भोलेनाथ ने अपनी शक्ति से देवी दुर्गा का सृजन किया। मां दुर्गा और महिषासुर दैत्य के बीच लगातार 9 दिनों तक युद्ध हुआ और युद्ध के 10वें दिन मां दुर्गा ने असुर महिषासुर का वध करके उसकी पूरी सेना को परास्त किया था। इस कारण से शारदीय नवरात्रि के समापन के अगले दिन दशहरा का पर्व मनाया जाता है और पांडालों में स्थापित देवी दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है।

प्राचीन काल में राजा लोग इस दिन विजय की प्रार्थना कर अपनी विजय  यात्रा के लिए प्रस्थान करते थे। इस दिन को उत्साव का रूप दिया गया है जब  पूरे देश में विशेष आकर्षण देखा जा सकता है।  जगह-जगह मेले लगते हैं और  रामलीलाओं का आयोजन होता है।   दशहरे के अवसर पर रावण का विशाल पुतला बनाकर उसे जलाया भी जाता है। दशहरा अथवा विजयदशमी भगवान रघुनाथ जी की विजय के रूप में मनाया जाए अथवा दुर्गा पूजा के रूप में दोनों ही रूपों में यह शक्ति पूजा की उपासना का पर्व है और शस्त्र पूजन की तिथि है जो  एक तरह से  हर्ष , उल्लास  और  विजय का पर्व है। भारतीय संस्कृति वीरता की पूजक और शक्ति की उपासक है। व्यक्ति और समाज के रक्त में वीरता प्रकट हो इसलिए दशहरे का उत्सव  पर्व के रूप में रखा गया है। दशहरा का पर्व 10 प्रकार के पापों काम. क्रोध,  लोभ , मोह ,मद , मत्सर,  अहंकार ,  हिंसा और चोरी के परित्याग की सदप्रेरणा प्रदान करता है। 

दशहरे का एक सांस्कृतिक पहलू भी है। भारत कृषि प्रधान देश है और जब किसान अपने खेत में   फसल उगाकर अनाज रूपी संपत्ति को अपने घर लाता है तो इससे  उसके उल्लास और उमंग का कोई ठिकाना नहीं रहता। इस ख़ुशी  के अवसर को वह भगवान की कृपा मानता है और उसे प्रकट करने के लिए वह उसका पूजन करता है। समस्त भारतवर्ष में यह पर्व विभिन्न प्रदेशों में विभिन्न प्रकार से मनाया जाता है। महाराष्ट्र में इस अवसर पर सिलंगण  के नाम से सामाजिक महोत्सव के रूप में भी से मनाया जाता है। सायं काल के समय पर सभी ग्रामीण जन सुंदर वस्त्रों से सुसज्जित होकर गांव की सीमा पार कर शमी वृक्ष के पत्ते के रूप में स्वर्ण मानकर उसे  अपने ग्राम में वापस आते हैं और फिर उस पत्ते  का परस्पर आदान-प्रदान किया जाता है।

दशहरे के  भारत के विभिन्न प्रदेशों में अलग-अलग  रूप  दिखाई देते  हैं।  दशहरा अथवा विजयदशमी राम की विजय के रूप में मनाया जाए अथवा दुर्गा की पूजा के रूप में दोनों में यह शक्ति और विजय का उत्सव  है। हिमाचल प्रदेश के कल्लू का दशहरा बहुत प्रसिद्ध है। अन्य स्थानों की भांति यहां पर 10 दिन अथवा एक सप्ताह पूर्व इसकी तैयारी आरंभ हो जाती हैं। स्त्रियां  और पुरुष सभी सुंदर कपड़ों  से सुसज्जित होकर  तुरही ,बिगुल , ढोल , नगाड़े , बांसुरी आदि  जिसके पास जो भी वाद्य यंत्र होता है उसे  लेकर अपने घरों से  बाहर  निकलते हैं।  हिमाचल के पहाड़ी लोग इस मौके पर अपने कुलदेवता का धूमधाम से समरण  कर जुलूस निकालकर उसकी आराधना करते हैं। देवताओं की मूर्तियों को बहुत आकर्षक और सुंदर ढंग में सजाया जाता है और पालकी में बिठाया जाता है, साथ ही वे अपने  मुख्य देवता  रघुनाथ जी की भी पूजा करते हैं।  इस विशाल जुलूस में प्रशिक्षित नर्तक नटी नृत्य करते हुए लोगों को झूमने पर मजबूर कर देते हैं।  इस प्रकार जुलूस बनाकर के मुख्य मार्गों से होते हुए नगर परिक्रमा करते हैं और कल्लू नगर में देवता रघुनाथ जी की वंदना से दशहरे के उत्सव को शुरू करते हैं। दशमी के दिन इस उत्सव की शोभा बड़ी निराली होती है।

 पंजाब में दशहरा नवरात्रि की 9 दिन का उपवास रखकर मनाते  हैं। इस दौरान यहां आगुंतकों का स्वागत पारंपरिक मिठाई और उपहार से किया जाता है। यहां भी रावण दहन के अनेक आयोजन होते हैं और मैदान पर मेले  भी लगते हैं।  छत्तीसगढ़ के आदिवासी अंचल बस्तर में  भी दशहरे  पर विशेष आकर्षण देखने को मिलता है।  बस्तर में दशहरे के मुख्य कारण को  राम की रावण पर विजय न मानकर लोग इसे मां दंतेश्वरी की आराधना को समर्पित एक उत्सव के रूप में मनाते हैं। दंतेश्वरी माता बस्तर अंचल के निवासियों की आराध्य देवी है जो दुर्गा का ही एक  रूप है। ये आयोजन यहाँ पर  पूरे 75 दिन चलता है। यहां दशहरा श्रावण मास की अमावस से आश्विन शुक्ल की त्रयोदशी तक चलता है। प्रथम दिन  जिसे 'काछिन गादि'  कहते हैं, देवी से समारोह आरंभ करने की अनुमति ली जाती है। देवी एक कांटो की सेज पर विराजमान रहती है। यह  कन्या एक अनुसूचित जाति की कन्या  है  जिससे बस्तर के राज परिवार के व्यक्ति अनुमति देते हैं। यह समारोह लगभग 15 वीं शताब्दी से शुरू हुआ था।  इसके बाद जोगी -बिठाई होती है और इसके बाद भीतर 'रैनी  विजयदशमी 'और बाहर ' रैनी रथ यात्रा' और अंत में ' मुरिया'  दरबार लगता  है। इसका समापन आश्विन शुक्ल त्रयोदशी को 'ओहाड़ी' पर्व से होता है।   बंगाल, उड़ीसा और असम में यहां पर दुर्गा पूजा के रूप में मनाया जाता है। यह पर्व बंगाल, उड़ीसा और असम के लोगों का सबसे प्रमुख त्यौहार है। पूरे बंगाल में  सप्ताह भर से अधिक दिन तक इस पर आयोजन किये जाते हैं।  उड़ीसा और असम में 4 दिन तक त्यौहार चलता है। यहां देवी को भव्य  रूप में सुसज्जित  पांडालों  में विराजमान करते हैं। देश के नामी कलाकारों को  दुर्गा की मूर्ति तैयार  करने के लिए बुलाया जाता है।  इसके साथ ही  अन्य देवी, देवताओं की भी कई मूर्तियां भी  बनाई जाती है। त्योहार के दौरान शहर में छोटे-स्टॉल भी लगाए जाते हैं जो  मिठाइयों की मिठास से भरे रहते हैं।यहां षष्टी के दिन दुर्गा देवी का भजन, आमंत्रण और  प्राण प्रतिष्ठा आदि का आयोजन भी  किया जाता है। उसके उपरांत अष्टमी और नवमी के दिन प्रातः और सायंकाल दुर्गा की पूजा में व्यतीत होते हैं। अष्टमी के दिन महापूजन और  बलि  भी दी जाती है। दशमी के दिन विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है और प्रसाद  चढ़ाने के साथ ही   प्रसाद का वितरण और भंडारे का आयोजन भी किया जाता है। पुरुष आपस में आलिंगन करते हैं जिसे 'कोलाकुली' कहते हैं। स्त्रियां देवी के माथे पर सिंदूर चढ़ाती हैं और देवी को अश्रुपूरित  विदाई देती हैं।  इसके साथ ही वे आपस में सिंदूर भी  लगाती हैं  है और सिंदूर से खेलती भी हैं। इस दिन यहां नीलकंठ पक्षी को देखना बहुत ही शुभ माना जाता है। इसके पश्चात देवी देवताओं को बड़े-बड़े  ट्रकों में भरकर विसर्जन के लिए ले जाया जाता है। विसर्जन की ये यात्रा बड़ी सुहानी और दर्शनीय होती है। तमिलनाडु ,आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में दशहरा पूरे 10 दिनों तक चलता है जिसमें तीन देवियां लक्ष्मी ,सरस्वती और दुर्गा देवी की पूजा की जाती है। पहले तीन दिन लक्ष्मी, धन और समृद्धि की देवी का पूजन होता है। अगले तीन दिन सरस्वती, कला और विद्या की देवी की पूजा अर्चना की जाती है और अंतिम दिन देवी दुर्गा की शक्ति की देवी स्तुति की जाती है। पूजन स्थल को अच्छी तरह फूलों और दीपकों से सजाया जाता है लोग एक दूसरे को मिठाई और कपड़े देते हैं। यहां दशहरा बच्चों के लिए शिक्षा या कला संबंधी नया कार्य सीखने  के लिए बहुत ही शुभ समय होता है। 

कर्नाटक में मैसूर का दशहरा विशेष उल्लेखनीय है। मैसूर में दशहरे के समय पूरे शहर की गलियों को रोशनी से सजाया जाता है और हाथियों का श्रृंगार करके पूरे शहर में एक विशाल जुलूस  निकाला जाता है। इस समय प्रसिद्ध मैसूर महल को दीपमालाओं  से दुल्हन की तरह सजाया जाता है और इसके साथ ही शहर में लोग टॉर्च लाइट के साथ  नृत्य और संगीत की शोभा यात्रा का आनंद लेते हैं।इन द्रविड़ प्रदेशों में भी रावण दहन का आयोजन नहीं किया जाता है।

गुजरात में मिट्टी सुरभि रंगीन घड़ा देवी का प्रतीक मानी जाती है और इसको कुंवारी लड़कियां सिर  पर रखकर एक लोकप्रिय नृत्य करती हैं जिसे गरबा कहा जाता है। गरबा नृत्य इस पर्व की शान होती है।  पुरुष और स्त्रियां दो छोटे रंगीन डंडों को संगीत की लय पर  आपस में बजाते  हुए घूम-घूम कर नृत्य करते  हैं। इस अवसर पर भक्ति, फिल्म और पारंपरिक लोक संगीत सभी का सुन्दर समन्वय  देखने को मिलता है। पूरा गुजरात गरबे के रंग से सरोबार होता है और इन दिनों प्रदेश की रौनक देखते ही बनती है।  पूजा और आरती के बाद डांडिया रास का आयोजन पूरी रात तक चलता है जिसमें सभी थिरकने से अपने को नहीं रोक पाते हैं। नवरात्रि में सोने और गहनों  की खरीद को बहुत ही शुभ माना जाता है।

 महाराष्ट्र में नवरात्रि के 9 दिन मां दुर्गा को समर्पित रहते हैं जबकि दसवें  दिन ज्ञान की देवी सरस्वती की वंदना की जाती है।  इस दिन विद्यालय में जाने वाले बच्चे अपनी पढ़ाई में आशीर्वाद पाने के लिए मां सरस्वती की पूजा करते हैं। किसी भी चीज को प्रारंभ करने के लिए खासकर विद्या की आराध्य देवी के लिए यह  दिन काफी शुभ माना जाता है। महाराष्ट्र के लोग इस दिन विवाह, गृह प्रवेश और नए घर खरीदने को शुभ मुहूर्त समझते हैं। कश्मीर के अल्पसंख्यक भी  हिंदू नवरात्र के पर्व को बहुत श्रद्धा से मनाते हैं। परिवार के सभी सदस्य वयस्क 9 दिन तक सिर्फ पानी पीकर उपवास करते हैं। अत्यंत पुरानी परंपरा के अनुसार 9 दिनों तक लोग माता खीर  भवानी के दर्शन करने के लिए जाते हैं और एक मंदिर एक झील के बीचों- बीच बना हुआ है। ऐसा माना जाता है की देवी ने अपने भक्तों से कहा हुआ कि यह यदि कोई अनहोनी होने वाली होगी तो सरोवर का पानी काला हो जाएगा। कहा जाता है कि इंदिरा गाँधी की हत्या के ठीक एक दिन पहले और भारत पाक युद्ध के पहले यहाँ का पानी सचमुच काला  हो गया था।  

दशहरे का उत्सव शक्ति और विजय का  उत्सव है। नवरात्रि के 9 दिन आदिशक्ति  जगदंबा की उपासना करके शक्तिशाली बना हुआ मनुष्य भी विजय प्राप्ति के लिए तत्पर रहता है और इस दृष्टि से दशहरे का बहुत महत्व है जिसे विजय के  प्रस्थान  उत्सव के रूप में मान्यता मिली हुई है।  भारतीय संस्कृति सदा से ही वीरता और शक्ति की समर्थक रही है। प्रत्येक व्यक्ति और समाज के रक्त में वीरता का प्रादुर्भाव होने के कारण से ही दशहरे  का उत्सव मनाया जाता है।  यदि कभी युद्ध अनिवार्य ही हो तब शत्रु के आक्रमण की प्रतीक्षा न कर उसका पराभव करना ही कुशल राजनीति की निशानी है। भगवान राम के समय से यह दिन विजय प्रस्थान का प्रतीक  है। भगवान राम ने रावण से युद्ध हेतु भी इसी दिन प्रस्थान किया था। मराठा रत्न  शिवाजी ने भी औरंगजेब के विरुद्ध इसी  दिन प्रस्थान करके सनातन हिंदू धर्म की रक्षा की थी। ऐसे अनेकों  उदाहरण हमारे इतिहास में हैं जब हमारे हिंदू राजाओं ने इस दिन विजय के रूप में प्रस्थान किया करते थे।इस पर्व को भगवती के विजया नाम पर विजयदशमी भी कहते हैं। ऐसा माना जाता है कि अश्विन शुक्ल दशमी को तारा उदय होने के समय विजय नामक मुहूर्त होता है। यह कार्य सर्वकार्य सिद्धिदायक होता है इसलिए भी इसे विजयदशमी कहते हैं। ऐसा माना गया है कि शत्रु पर विजय पाने के लिए इसी समय प्रस्थान करना चाहिए। इस दिन श्रवण नक्षत्र का योग उसे और भी शुभ बनता है। 

युद्ध करने का प्रसंग ना होने पर भी इस काल में राजाओं ने महत्वपूर्ण पदों पर पदासीन लोगों की  सीमा का उल्लंघन किया । दुर्योधन ने पांडवों को जुए  में पराजित कर 12 वर्ष के वनवास के साथ 13 वर्ष में अज्ञातवास की शर्त दी थी। 13वें वर्ष का  पता उन्हें अगर  लग जाता तो उन्हें फिर से  12 वर्ष का वनवास भोगना पड़ता। इसी अज्ञातवास में अर्जुन ने अपना टुनीर धनुष एक शमी वृक्ष पर रखा था और स्वयं वृहन्नला के वेश  में राजा विराट के यहां नौकरी शुरू कर ली थी। जब गौ रक्षा के लिए विराट के पुत्र और द्रौपदी  के भाई  धृष्टद्युम्न  ने  अर्जुन को अपने साथ रख लिया तब अर्जुन ने शमी वृक्ष से अपने  हथियार उठाकर शत्रुओं पर प्रचंड विजय प्राप्त की थी।  विजयादशमी के दिन भगवान श्रीराम चंद्र जी लंका पर चढ़ाई करने के लिए प्रस्थान करते समय शमी वृक्ष ने भगवान की विजय का उद्घोष किया था इसीलिए इस विजय काल के उत्सव में में शमी  का पूजन बहुत ही महत्वपूर्ण साबित हुआ जो आज भी बड़ा फलदायी  है। भगवान राम को मिले 14 वर्ष के वनवास के दौरान लंका के राजा रावण ने माता सीता का अपहरण कर लिया था। तब भगवान राम, लक्ष्मण, हनुमानजी और वानरों की सेना ने माता सीता को रावण से मुक्त कराने के लिए भीषण  युद्ध किया था। कई दिनों तक भगवान राम और रावण के बीच भयंकर युद्ध हुआ था। भगवान राम ने 9 दिनों तक देवी दुर्गा की उपासना करते हुए 10वें दिन रावण का वध किया था। आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि पर मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम ने लंकापति रावण का वध किया था और रावण के बढ़ते अत्याचार और अंहकार के कारण भगवान विष्णु ने राम के रूप में अवतार लिया और रावण का वध कर पृथ्वी को रावण के अत्याचारों से मुक्त कराया।

विजयादशमी केवल राम की विजय का पर्व नहीं है, बल्कि यह नवरात्रि के पर्व का अंतिम दिन भी है। नवरात्रि में देवी दुर्गा की पूजा की जाती है और विजयादशमी के दिन देवी की शक्ति और संहारक रूप की विजय का जश्न मनाया जाता है। विजयादशमी पर शस्त्र पूजा का आयोजन बुराई पर अच्छाई की विजय के प्रतीक के रूप में किया जाता है। यह हमें सिखाता है कि हमें अपने अस्त्रों और औजारों के प्रति सम्मान और जिम्मेदारी रखनी चाहिए। विजयादशमी पर्व  हमें आत्मविश्वास, साहस और नैतिकता का पाठ  पढ़ाता  है, जिससे हम अपने समाज की भलाई के लिए कार्यरत रह सकें। यह पर्व हमें सिखाता है कि बुराई चाहे कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, अंततः सत्य और धर्म की ही  विजय होती है।


Sunday, 22 September 2024

सुशासन के संकल्पों को साकार करती 'मोहन सरकार '

शासन की संपूर्ण व्यवस्थाओं में जनता के प्रति जवाबदेही,पारदर्शिता और सेवा-भाव से सभी को समर्पित कार्यप्रणाली सुनिश्चित करना सुशासन का मूलमंत्र है। भारतवर्ष में आदिकाल से ही सुशासन की परंपरा रही है। आदिकाल की इसी परंपरा का निर्वहन करते हुए डॉ. मोहन यादव के दूरदर्शी नेतृत्व में मध्य प्रदेश  भी सुशासन के नए अध्याय लिख रहा है। 

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री  डॉ. मोहन यादव ने 13 दिसम्बर 2023 को प्रदेश की बागडोर संभाली। उनके बागडोर संभालते ही प्रदेश में सुशासन का सूर्यादय हुआ है। प्रदेश सरकार सबका साथ-सबका विकास, सबका प्रयास और सबका विश्वास के मूलमंत्र को लेकर आगे बढ़ रही है। मुख्यमंत्री के दूरदर्शी नेतृत्व में 9 माह की अल्पावधि में कई जनहितकारी फैसलों से समाज के हर वर्ग के उत्थान के लिए प्रदेश सरकार ने अनेक कदम उठाए गए हैं। सरकार की मजबूत इच्छाशक्ति का प्रतिफल है कि आज प्रदेश के हर कोने में मोहन सरकार की लोकप्रियता का ग्राफ तेजी से बढ़ रहा है। इसका मुख्य कारण  स्वच्छ और ईमानदार प्रशासन और सरकारी काम-काज में पारदर्शिता लाना रहा है। आम आदमी की जिंदगी में बदलाव लाना मुख्यमंत्री डॉ. यादव का मुख्य उद्देश्य है। अल्प अवधि में  मोहन सरकार ने जनता से किए गए वादे पूर्ण करने की दिशा में कई ठोस कदम उठाए हैं, जिसके कारण प्रदेश में विकास का नया दौर शुरू हुआ है। सेवा, सुशासन, सुरक्षा एवं विकास के संकल्प को लेकर प्रदेश सरकार जनता की सेवा में दिन-रात लगी हुई है।  

मुख्यमंत्री डा.मोहन यादव ने अपने छोटे से कार्यकाल में अपने काम से न केवल जनता का दिल जीता है बल्कि अपने सख्त निर्णयों के माध्यम से राष्ट्रीय नेतृत्व के सामने भी अपनी अलहदा पहचान बनाने में सफलता पाई है। उन्होनें योग्य अफसरों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां देकर अपने बुलंद इरादों को सभी के सामने जता दिए। इस छोटे से कार्यकाल में उन्होनें अपनी खुद की नई टीम बनाई और सीएम आवास से लेकर मंत्रालय, संभाग और जिलों में बड़ी प्रशासनिक सर्जरी करने से भी परहेज नहीं किया। हर समय एक्शन में रहने वाले डा. मोहन यादव के तेवरों को देखकर आज प्रदेश में पूरी नौकरशाही सहमी हुई है। मंत्रालय का वल्लभ भवन एक दौर में दलालों का अड्ड़ा बना था।  वहाँ पर भी ताबड़तोड़ तबादलों से मुख्यमंत्री डा. मोहन यादव ने खलबली मचा दी । हर किसी अधिकारी  के ट्रैक रिकार्ड को न केवल  खंगाला बल्कि कार्यक्षमताओं के अनुरूप सभी को नए कार्यों का प्रभार सौंपा। ख़ास बात ये है इस सरकार में  बेलगाम नौकरशाही पर भी नकेल कसी गई है जिस कारण  मध्यप्रदेश का डबल इंजन विकास के पथ पर तेजी से आगे बढ़ रहा है। नए मुखिया की  तीव्र गति से निर्णय लेने की क्षमताओं से  मध्यप्रदेश में एक  बदलाव  की नई  बयार देखने को मिल रही है। नई विकेन्द्रीकरण की व्यवस्था होने से अब प्रदेश के विकास कार्यों में न केवल तेजी आयी है बल्कि समय -समय पर  मॉनीटरिंग  किये जाने से जनता के हित में  तेजी से निर्णय लिये जा रहे हैं।

साइबर तहसील डिजिटल इंडिया की दिशा में प्रदेश के नागरिकों को सुविधा प्रदान करने की दिशा में की गई बड़ी पहल है। इसके जरिए लोगों को कई कामों को करने में आसानी हुई है। खासतौर से  भूमि या भूखंड खरीदी बिक्री के बाद आने वाली कठिनाइयों को साइबर तहसील के जरिये काफी आसान कर दिया गया है।  इससे लोगों को भाग दौड़ से निजात मिल रही है और समय की भी बचत हो रही है। साइबर तहसील खोले जाने का सबसे प्रमुख उद्देश्य सरकारी कामकाज में पारदर्शिता और लोगों को सुविधा पहुंचना है।  साइबर तहसील बनने के बाद रजिस्ट्री होने पर बिना किसी आवेदन के नामांतरण प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। साइबर तहसील में सार्वजनिक नोटिस की प्रक्रिया को भी सरल किया गया है। क्रेता- विक्रेता और गांव के निवासियों को एसएमएस के माध्यम से सार्वजनिक नोटिस जारी किया जाता है। इसके अलावा आपत्तियों को लेकर भी ऑनलाइन प्रक्रिया का पालन किया जाता है। एसएमएस में 10 दिनों के अंदर ऑनलाइन आपत्तियां दर्ज करने के लिए लिंक भी प्रदान किया जाता है। साइबर तहसील में पटवारी की सकारात्मक रिपोर्ट और कोई आपत्ति नहीं होने पर तुरंत नामांतरण आदेश जारी किया जाता है।  इसके अलावा भू अभिलेख अपडेट करने को लेकर भी रियल टाइम में तुरंत खसरा, नक्शा जैसे भू अभिलेख ऑनलाइन दर्ज हो जाते हैं। इतना ही नहीं प्रमाणित प्रति भी व्हाट्सएप और ईमेल के माध्यम से तुरंत भेज दी जाती है।   

मुख्यमंत्री की शपथ लेने के तुरंत बाद डा. मोहन यादव का पहला फैसला मध्यप्रदेश में धार्मिक स्थानों पर जोर से लाउड स्पीकर बजाने और खुले में मांस और अंडे की बिक्री पर सख्ती से रोक का रहा। इस फैसले का सभी ने तहे दिल से स्वागत किया। अपराधियों के घरों पर मोहन  सरकार  भी अपनी बुलडोजर नीति पर चल रही है जिससे अपराधियों के मन में खौफ बैठ गया है।मुख्यमंत्री डा.मोहन नई बसाहट के साथ  काम करना चाहते हैं जो त्वरित निर्णय ले सके। 

मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने अपने 100 दिनों के कार्यकाल में पहली बार हुकुमचंद मिल इंदौर के 4 हजार 800 श्रमिकों को उनका हक दिलाया। तीस वर्ष से अटके इस मामले को डॉ. मोहन यादव ने एक ही बैठक में निपटा दिया। मध्यप्रदेश  सरकार, राजस्थान सरकार और केंद्र सरकार के बीच 28 जनवरी को श्रमशक्ति भवन स्थित जल शक्ति मंत्रालय के कार्यालय में संशोधित पार्वती-कालीसिंध-चंबल-ईआरसीपी लिंक परियोजना के त्रिपक्षीय समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर हुए जिससे मध्यप्रदेश के चंबल और मालवा अंचल के 13 जिलों की आम जनता को मिलेगा। कई बरसों से लटके इस मामले को  मुख्यमंत्री डा. मोहन यादव ने जयपुर में एक ही बैठक में निपटा दिया। 

मप्र में राजस्व महाअभियान चला जिसमें  सीएम के निर्देश पर लाखों  प्रकरणों का निपटारा हुआ। अभियान्तर्गत डिजिटल क्रॉप सर्वेक्षण भी किया गया। किसानों और आमजन की सहूलियत के लिये पटवारी अपने  दायित्वों का निर्वहन  कर रहे हैं। अविवादित नामांतरण प्रकरणों का निराकरण 30 दिन में, विवादित नामांतरण प्रकरणों का निराकरण 150 दिन में किया जायेगा। बंटवारा प्रकरणों के निराकरण की समय-सीमा 90 दिन है और सीमांकन प्रकरणों को 45 दिन में निराकृत करने के निर्देश दिये गये हैं। राजस्व महाअभियान में उत्कृष्ट कार्य करने वाले अधिकारी कर्मचारियों को अब प्रदेश में  सम्मानित भी किया जा रहा है। राजस्व महा अभियान में  सही ढंग से मॉनीटरिंग भी की जा रही है। 

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने श्रीराम पथ गमन न्यास की पहली बैठक में  अयोध्या की तर्ज पर  चित्रकूट में भी विकास कार्य करवाए जाने की बड़ी घोषणा की। जिन स्थानों से भगवान राम गुजरे और कृष्ण के कदम जहाँ जहां पड़े , सरकार ने उन स्थानों को सड़क मार्ग से जोड़ने का  ऐलान कर सनातन प्रेमियों का दिल जीतने का काम किया है।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकसित भारत 2047 के विजन को आगे बढ़ाने के लिए मध्यप्रदेश की डॉ. मोहन यादव की सरकार ने  महाकाल की नगरी  उज्जैन, जबलपुर  ग्वालियर में ‘रीजनल इंडस्ट्रियल कॉन्क्लेव’ के सफल आयोजन किया जिसके माध्यम से प्रदेश में बड़ा निवेश आया है और रोजगार की दिशा में मोहन सरकार का यह बड़ा कदम है। किसानों के कल्याण के लिए मध्य प्रदेश सरकार  संकल्पित  नजर आती है। उसने सदैव किसानों की चिंता की है।  मोहन सरकार ने सोयाबीन के दाम 4892 रुपए समर्थन मूल्य पर करने का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा था जिसे मोदी सरकार ने पास कर दिया है।  हाल ही में मध्यप्रदेश को फिर से  सोया स्टेट का दर्जा भी मिला है। मध्य प्रदेश राजस्थान और महाराष्ट्र को पीछे छोड़कर सोया स्टेट बना है।  

मध्यप्रदेश के गरीब और मध्यमवर्ग के परिवारों ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा परिवार में कोई सदस्य  अगर बीमार पड़ गया तो उसे एयर एम्बुलेंस जैसी सुविधा मिलेगी लेकिन डॉ. मोहन ने अपने कार्यकाल में प्रदेश की जनता को इसकी  बड़ी सौगात दी।  मुख्यमंत्री डा.मोहन यादव ने अपने गुड गवर्नेंस के मॉडल को सभी के सामने पेश किया है जिसमें जनता  के हितों की अनदेखी होनी  फिलहाल तो मुश्किल दिखाई दे रही है। नया 'मोहन मॉडल 'सबकी जुबान पर चढ़ रहा है। एमपी की जनता भी उनके  निर्णयों पर हामी भरती नजर आ रही है। पक्ष और विपक्ष भी उनकी नीतियों और काम करने के अलहदा अंदाज का का तोड़ नहीं निकाल पा रहा है। मोहन सरकार की अब तक की दिशा देखकर स्पष्ट नजर आता है कि वह  पार्टी के संकल्प पत्र में किये गए वायदों को पूरा करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं।  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा संचालित योजनाओं के बेहतर क्रियान्वयन  और मोदी की हर गारंटी पूरा करने के लिए डॉ. मोहन यादव ने अपनी पूरी ऊर्जा लगा दी है। हालाँकि सरकार का 9 माह का कार्यकाल बहुत छोटा होता है लेकिन मोहन यादव ने अपने छोटे से कार्यकाल में इस बात को प्रदेश के भीतर स्थापित कर दिया है उन्हें कमतर आंकने की भूल कोई भी नहीं करे, वह मध्यप्रदेश की राजनीती नहीं बल्कि देश की सियासत में भी लम्बी रेस के घोड़े साबित होंगे।

Saturday, 21 September 2024

पितरों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का अनुष्ठान है श्राद्ध

पूर्वजों की आत्मा की शांति पूजा के लिए वर्ष के 15 दिन बहुत खास माने जाते हैं, इन्हें पितृ पक्ष कहा जाता है। शास्त्रों में बताया गया है कि पितृपक्ष के दौरान हमारे पूर्वज पितृलोक से धरती लोक पर आते हैं इसलिए इस दौरान पितरों के निमित्त श्राद्ध, तर्पण या पिंडदान आदि करने का विधान है।  पितृ पक्ष में सोलह श्राद्ध करने से पितरों की आत्मा तृप्त होती है और पूर्वज परिजन को खुशहाली का आशीर्वाद  देते हैं।  मान्यता है कि पितृ पक्ष में श्राद्ध करने से पितरों का ऋण चुकता हो जाता है और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है।वह परिवारजन को खुशहाली का आशीर्वाद प्रदान करते हैं।  

ऋषियों ने हमारे संपूर्ण जीवन चक्र को सोलह संस्कारों में बांधा है। जहां गर्भदान  प्रथम संस्कार है वहीँ  अंत्येष्टि अंतिम। भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण अमावस्या तक सोलह दिनों को पितृ पक्ष कहा जाता है। शास्त्रों में मनुष्यों पर उत्पन्न होते ही तीन ऋण बताए गए हैं- देव ऋण, ऋषिऋण और पितृऋण। श्राद्ध के द्वारा पितृ ऋण से निवृत्ति प्राप्त होती है इसलिए पितृ पक्ष के दौरान भक्ति पूर्वक तर्पण (पितरों को जल देना) करना चाहिए।

हिंदू धर्म में श्राद्ध और तर्पण को अत्यधिक महत्व दिया गया है। यह प्रक्रिया पितरों (पूर्वजों) के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का एक तरीका है। शास्त्रों के अनुसार, श्राद्ध और तर्पण से पितरों की आत्मा को शाति मिलती है और उनकी कृपा से परिवार में सुख, शांति, और समृद्धि आती है।  पितृ पक्ष के दौरान श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान बड़ी संख्या में किया जाता है।  सही मायनों में कहा जाए तो श्राद्ध का उद्देश्य पितरों की आत्मा को तृप्ति प्रदान करना है। मान्यता है कि पितरों का आशीर्वाद न मिलने से रक्त संबंधित व्यक्ति और उसके परिवार में समस्या आ सकती है।  ब्रह्म पुराण और विष्णु पुराण सहित अन्य पुराणों के अनुसार, श्राद्ध और तर्पण के माध्यम से हम पितरों को जल. अन्न और अन्य सामग्री अर्पित करते हैं, जिससे उनको आत्मा संतुष्ट होती है।   विशेष रूप से पितृ पक्ष (सोलह श्राद्ध) में यह प्रक्रिया को जाती है।  

 भारतीय पुराणों में तीन ऋणों का उल्लेख है- देव ऋण , मनुष्य ऋण और पितृ ऋण।   देव पूजन जितना आवश्यक है पितरों के निमित्त श्राद्ध कर्म करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।   सभी 18 महापुराणों में श्राद्ध, तर्पण और पितरों के पूजन का विभिन्न रूपों में उल्लेख मिलता है।  शास्त्रों में विशेष तिथि श्राद्ध के दिन दैहिक कर्म करने के बाद विभिन्न प्रकार के श्राद्ध होते हैं जैसे कि एकोदिष्ट श्राद्ध, नित्य श्राद्ध, नैमित्तिक श्राद्ध, सोरस श्राद्ध (सोलह बाद्ध) और महालय श्राद्ध इन्हें समय-समय पर किया जाना चाहिए क्योंकि पितरों की अपेक्षाएं और भावनाएं हमारे साथ जुड़ी होती हैं।यदि पितर अतृप्त होते हैं तो उनके रक्त संबंधी या करीबी को प्रभावित करते हैं जिससे उन्हें समस्याओं और कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। श्राद्ध के प्रतीक कुश, तिल, गाय, कौआ, कुत्ते को श्राद्ध के तत्व के प्रतीक के रूप में माना जाता है । कुश के अग्रभाग में ब्रह्मा, मध्य भाग में विष्णु,मूल भाग में भोलेशंकर भगवान का निवास माना गया है ।कौआ  यम का प्रतीक है जो दिशाओं का फलक बताता है। गौ माता तो हिंदू धर्म में सारी वैतरणी को पार लगाने वाली माता के रूप में देखा जाता है। दिन की शुरुआत से पहले गाय को पहली रोटी देने की परम्परा अपने देश में बरसों से चली आ रही है।  

 धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पितृपक्ष  या श्राद्ध पक्ष में दान का विशेष महत्व माना गया है जिससे पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है। कहते हैं पितृ पक्ष के इन 15 दिनों में अपने पितरों के नाम का दान जरूर करना चाहिए जिससे महापुण्य की प्राप्ति होती है लेकिन कुछ ऐसी भी चीजें हैं जिनका पितृ पक्ष में दान नहीं करना चाहिए।  पितृ पक्ष में लोहे से बने बर्तनों का कभी भी दान नहीं करना चाहिए इसके अलावा आप चाहें तो पीतल, सोने और चांदी के बर्तनों का दान कर सकते हैं।  पितृ पक्ष में चमड़े से बनी चीजों या वस्तुएं का इस्तेमाल निषेध है। माना जाता है कि पितृ पक्ष में चमड़े का प्रयोग बहुत अशुभ होता है।  

इसके अलावा, पितृ पक्ष में पुराने कपड़े भी दान में देना अच्छा नहीं माना जाता है। पितृ पक्ष में हमेशा ब्राह्मणों को नए वस्त्र ही दान करने चाहिए।   हिंदू पूजा और सभी अनुष्ठानों में काले रंग का इस्तेमाल करना निषेध होता है, साथ ही अशुभ भी होता है इसलिए पितृ पक्ष में काले रंग के वस्त्र दान करने से बचें। पितृ पक्ष में किसी भी तरह का तेल दान में नहीं करना  चाहिए। सरसों के तेल के दान से बचना चाहिए।इसी तरह से  श्राद्ध पक्ष में पितरों को सिर्फ शुद्ध एवं ताजा भोजन ही अर्पित करना चाहिए।  पितरों को गलती से भी झूठा या बचा खाना नहीं देना चाहिए।  पितृ  पक्ष में अगर कोई जानवर या पक्षी आपके घर आए, तो उसे भोजन जरूर कराना चाहिए। मान्यता है कि  है कि पूर्वज इन रुपूण में कभी भी आपके घर आ सकते हैं। हमारे पुराने घरों में चिड़ियाँ को दाना डालने की भी पुराणी परंपरा रही है।  पितृ  पक्ष में पत्तल पर भोजन करें और ब्राह्राणों को भी पत्तल में भोजन कराएं, तो यह फलदायी होता है।  पूजा-अनुष्ठान, उद्यापन, कथा, विवाह आदि में चाहे ब्राह्मणों की परीक्षा न करें, लेकिन पितृ कार्य में अवश्य करें। समस्त लक्षणों से युक्त, हाथ का सच्चा, व्याकरण का विद्वान, शील एवं सद्गुणों से युक्त, तीन पीढ़ियों से विख्यात ब्राहाणों के द्वारा संयत रहकर श्राद्ध सम्पन्न करे तो यह परिवार के लिए फलदायी रहता है ।

 श्राद्ध पांच प्रकार के होते हैं जिनमें पितृपक्ष के श्राद्ध पार्वण श्राद्ध कहलाते हैं। इन में अपराह्न व्यापिनी तिथि की प्रधानता है। जिनकी मृत्यु तिथि का ज्ञान न हो, उनका श्राद्ध अमावस्या को करना चाहिए। श्राद्ध हमेशा मृत्यु होने वाले दिन करना चाहिए। अग्नि में जलकर, विष खाकर, दुर्घटना में या पानी में डूबकर, शस्त्र आदि से जिनकी मृत्यु हुई हो उनका श्राद्ध चर्तुदशी को करना चाहिए। आश्विन कृष्ण पक्ष में सनातन संस्कृति को मानने वाले सभी लोगों को प्रतिदिन अपने पूर्वजों का श्रद्धा पूर्वक स्मरण करना चाहिए, इससे पितर संतृप्त हो कर हमें आशीर्वाद देते हैं। आज की नई पीढ़ी इन सब चीजों को ढकोसला बताती है जो सही नहीं है।  भारतीय कर्मकांड को आज  विज्ञान  भी मान रहा है। आश्विन मास का कृष्ण पक्ष पितरों के लिए महापर्व का समय है। इसमें ये पिंडदान और तिलांजलि की आशा लेकर पृथ्वी लोक पर आते हैं इसलिए श्राद्ध का कभी भी परित्याग न करें, अपने पितरों को संतुष्ट जरूर करें तभी आपके जीवन में खुशहाली  आ सकती है ।

 पुराणों में भी श्राद्ध और तर्पण का विशेष  उल्लेख मिलता है।  विष्णु पुराण में पितरों के श्राद्ध और तर्पण का महत्त्व बताया गया है।  इसमें कहा गया है कि पितरों को अर्पित जल और अन्न से उनकी आत्मा को शांति मिलती है।  इसी तरह से  ब्रह्म पुराण  में  पितरों के लिए श्राद्ध की विधियों का विवरण इस पुराण में मिलता है जिसमें  यह भी बताया गया है कि पितरों की आत्मा को शांति प्रदान करने के लिए विशेष तिथि पर श्राद्ध करना आवश्यक है।  शिव पुराण में श्राद्ध की प्रक्रिया और इसके लाभों का उल्लेख मिलता है।  भागवत पुराण में पितरों के तर्पण और श्राद्ध की विधियां और उनका महत्व वर्णित है।  इसमें पितरों को अर्पित सामग्री की विधि भी बताई गई है।  मत्स्य पुराण में  पितरों के श्राद्ध की विभिन्न विधियों, जैसे एकोदिष्ट और नित्य श्राद्ध, का विवरण इस पुराण में मिलता है।  नारद पुराण में भी पितरों के प्रति श्राद्ध की विधियां और इसके महत्व का विस्तृत वर्णन किया गया है।  वामन पुराण में  पितरों के श्राद्ध और तर्पण की प्रक्रिया का उल्लेख मिलता है जिसमें पितरों को शांति देने के उपाय बताए गए हैं। कूर्म पुराण में  पितरों की आत्मा को शांति देने के लिए श्राद्ध की प्रक्रियाओं का वर्णन  किया गया है।  इसी तरह से लिंग पुराण में पितरों के श्राद्ध और तर्पण की विधियों का वर्णन किया गया ‌ है और यह बताया गया है कि इससे पितरों को शांति मिलती है।गरुड़ पुराण, श्रीभगवत पुराण, सत्यम्बुधि पुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण, स्मृति पुराण, प्रदीप पुराण, अग्नि पुराण, श्री भागवत पुराण और कालिक पुराण में भी पितरों के श्राद्ध की विधियां, आत्मा को शाति देने के लिए प्रक्रियाओं और धार्मिक महत्व के बारे में बताया गया है।

 आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में उनकी मृत्यु तिथि को (मृत्यु किसी भी मास या पक्ष में हुई हो) जल, तिल, चावल, जौ और कुश पिंड बनाकर या केवल सांकल्पिक विधि से उनका श्राद्ध करना, गौ ग्रास निकालना और उनके निमित्त ब्राह्मणों को भोजन करा देने से पितृ प्रसन्न होते हैं और उनकी प्रसन्नता हमें जीवन में पितृ ऋण और पितृ दोषों से मुक्त करा देती है। शास्त्रों के अनुसार, पितरों की आज्ञा का पालन और उनके लिए श्राद्ध करना संतान की सार्थकता को सिद्ध करता है। यह भी कहा गया है कि एक बार गया श्राद्ध करने से संतान होना सार्थक होता है. पितरों के निमित्त श्राद्ध एक महत्वपूर्ण अंग है, जो परिवार में शांति और समृद्धि का कारण बनता है।  श्राद्धकर्ता  को पितृपक्ष में क्षौर कर्म यानी बाल या नाखून नहीं कटवाने चाहिए। ब्रह्मचर्य का पालन, पान खाना, किसी भी प्रकार के नशीले पदार्थों का सेवन, तेल मालिश और परान्न भोजी ये सात बातें श्राद्धकर्ता के लिए वर्जित हैं। श्राद्ध के अंत में क्षमा प्रार्थना जरूर करें।      



Thursday, 19 September 2024

प्रधानमंत्री मोदी के स्वच्छता के संकल्पों को साकार कर रहा है मध्यप्रदेश



प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छता  भारत मिशन के संकल्प को साकार करने के दिशा में मध्यप्रदेश ने उल्लेखनीय प्रगति की है।  मध्यप्रदेश ने इस मिशन के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। स्वच्छ भारत मिशन का उद्देश्य भारत को साफ-सुथरा बनाना है, जिसमें प्रमुख रूप से खुले में शौच से मुक्ति और ठोस और तरल कचरे का उचित प्रबंधन शामिल है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में शुरू हुए इस मिशन के तहत मध्यप्रदेश ने अपने स्वच्छता लक्ष्यों को पूरा करने के लिए ठोस नीतियां और योजनाएं बनाई हैं। 

 प्रदेश में प्रधानमंत्री मोदी के जन्मदिवस  17 सितंबर से “स्वच्छता ही सेवा-2024” अभियान शुरू हुआ है जो इस वर्ष  गांधी जयंती तक पूरे प्रदेश में चलाया जाएगा। यह अभियान ‘स्वभाव स्वच्छता-संस्कार स्वच्छता’ थीम पर केन्द्रित है  जिसमें जन-भागीदारी के अभियान से अधिक से अधिक लोगों को जोड़ने की कोशिश रहेगी। स्वच्छता अभियान में इस वर्ष  स्थानीय निकायों की भागीदारी पर भी विशेष जोर  सरकार द्वारा दिया गया है। स्वच्छता को जन -जन अपने व्यवहार में आत्मसात करे , इस हेतु  प्रदेश में वृहद स्तर पर विभिन्न गतिविधियाँ  भी संचालित की  जा रही हैं । प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव का कहना है  कि प्रदेश में स्वच्छता ही सेवा अभियान की इस वर्ष की थीम स्वभाव स्वच्छता-संस्कार स्वच्छता रखी गई है। 'स्वच्छता ही सेवा' अभियान के शुभारंभ अवसर पर मंत्रीगण अपने-अपने प्रभार के जिलों में शामिल हुए हैं  जिसने इस अभियान को  एक नई गति देने का काम किया है। अभियान की शुरूआत में 17 सितम्बर को प्रदेश में किफायती दाम पर दवाईयाँ उपलब्ध कराने वाले जनऔषधि केन्द्रों का शुभारंभ भी किया गया । 'स्वच्छता ही सेवा' अभियान का समापन 2 अक्टूबर "महात्मा गांधी जयंती" पर प्रदेश भर में होगा। इस दिन महात्मा गांधी के स्वच्छता संबंधी विचारों को जन-जन तक पहुंचाने के प्रयास किये जायेंगे। राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर होने वाले कार्यक्रमों से ऑनलाइन अधिक से अधिक लोगों को जोड़ने का प्रयास होगा। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के अवसर पर सफाई कर्मचारियों के लिए एक महत्वपूर्ण घोषणा की है। मुख्यमंत्री ने कहा कि, सफाई कर्मचारियों को स्टार रेटिंग प्रणाली के आधार पर पुरस्कृत किया जाएगा। खास बात यह है कि सफाई कर्मचारियों द्वारा अर्जित प्रत्येक स्टार के लिए उन्हें एक हजार रुपए का नकद पुरस्कार दिया जाएगा। यानी एक स्टार पाने वाले कर्मचारी को एक हजार रुपए और सात स्टार पाने वाले प्रत्येक कर्मचारी को सात-सात हजार रुपए दिए जाएंगे।

मध्यप्रदेश ने खुले में शौच से मुक्ति प्राप्त करने में महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं। राज्य ने ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में शौचालय निर्माण पर जोर दिया है। पंचायतों और नगरपालिकाओं के सहयोग से, हजारों व्यक्तिगत स्वच्छता शौचालयों का निर्माण किया गया है। इसके साथ ही, स्वच्छता के प्रति लोगों में जागरूकता फैलाने के लिए व्यापक अभियानों का संचालन भी किया गया है। वर्ष 2014 से वर्ष 2019 तक सरकार और जनता की सक्रिय भागीओदारी के माध्यम से प्रदेश में स्वच्छ भारत मिशन के तहत पहले चरण में 70 लाख से अधिक घरों में नए शौचालय बने जिससे सभी 51 हजार ग्राम तय समय सीमा से पहल खुले में शौच से मुक्त हुए।  इस अभियान में 50 हजार से अधिक स्थानीय स्वच्छताकर्मियों  ने प्रेरक भूमिका निभाई।  इसी तरह प्रदेश में वर्ष 2020 से स्वच्छ भारत का दूसरा चरण शुरू हुआ जिसमें 2024 तक सरकार ने सभी ग्रामों को शौच से मुक्त बनाये रखते हुए ठोस और तरल अपशिष्ट के प्रबंधन मॉडल द्वारा मॉडल श्रेणी में ओडीएफ प्लस बनाने का लक्ष्य रखा गया। इसके लिए प्रदेश में अभी तक 8  लाख से अधिक नए शौचालय बनाने के साथ ही 16 हजार से अधिक सामुदायिक स्वच्छता परिसर बनाये गए और 41 हजार से अधिक गाँवों को ओडीएफ प्लस मॉडल बनाया गया है।  मध्यप्रदेश ने ठोस और तरल कचरे के प्रबंधन में भी कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। राज्य सरकार ने कचरे को सेग्रीगेट करने, उसका पुनर्चक्रण करने, और उसे कम करने के लिए कई योजनाएं लागू की हैं। खासकर बड़े शहरों जैसे भोपाल, इंदौर, और जबलपुर में स्वच्छता प्रबंधन को बेहतर बनाने के लिए उन्नत तकनीकों और प्रणालियों का उपयोग किया गया है। 25 हजार से अधिक स्वच्छता मित्रों को इस कार्य में शामिल किया गया साथ ही 900 स्वसहायता समूहों को शामिल करने के साथ ही उनकी आजीविका में भी वृद्धि हुई। वर्तमान में प्रदेश के भीतर ग्रामों में प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन के लिए एमआरएफ  बनाये जा रहे हैं जिसमें  शहरी निकायों का भी निरंतर सहयोग मिल रहा है। पशुओं के गोबर से खाद और बायो गैस बनाने की दिशा में गोवर्धन योजना से भी  विशेष लाभ मिल रहा है।  

 इंदौर की गिनती आज देश के सबसे स्वच्छ शहरों में अगर हो रही है तो इसका कारण स्वच्छता का संकल्प ही रहा है जिसने कचरा प्रबंधन के क्षेत्र में विशेष पहचान बनाई है। इंदौर ने देश में हुए 'स्वच्छता सर्वेक्षण' में लगातार सातवीं  बार  शीर्ष स्थान प्राप्त किया है, जिससे स्पष्ट होता है कि यहाँ के नागरिक और प्रशासन दोनों मिलकर स्वच्छता के लिए प्रतिबद्ध हैं। इंदौर को साफ बनाने में वहां के  नगर निगम जनभागीदारी की  बड़ी भूमिका रही है। आज इंदौर की सफाई प्रणाली पूरे देश को प्रेरणा देने का काम कर रही है। इंदौर शहर से निकले वाले कचरे से गैस  बनाई जाती है जिससे शहर में सीएनजी बसों का परिचालन होता है। कचरे से गैस बनाने के लिए इंदौर में एशिया का सबसे बड़ा प्लांट है, जिसका उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था।

एमपी के जन- भागीदारी मॉडल ने  हाल के वर्षों में देश में  विशेष पहचान  बनाई है।  स्वच्छता के उद्देश्यों को साकार करने में मध्यप्रदेश के नागरिकों की भागीदारी भी बड़ी महत्वपूर्ण है। मध्यप्रदेश ने स्थानीय समुदायों को स्वच्छता अभियानों में शामिल करने के लिए कई कार्यक्रम चलाए हैं। स्वच्छता संबंधी कार्यशालाएं, जागरूकता अभियानों और स्कूलों में स्वच्छता शिक्षा जैसी विशिष्ट पहल के माध्यम से, राज्य ने नागरिकों को इस मिशन में सक्रिय भागीदार बनाया है। आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रेरणा से  'एक पेड़ माँ के नाम' जैसे  पौध-रोपण के कार्यक्रम भी  प्रदेश के हर कोने में आयोजित किए जा रहे हैं जिसका लोगों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। स्वच्छता संबंधी चुनौतियों के  समाधान हेतु राज्य सरकार ने  स्मार्ट सिटी परियोजनाओं और कचरा निस्तारण के लिए नई तकनीकों का भी उपयोग किया है। मध्यप्रदेश सरकार भविष्य में स्वच्छता मिशन को अधिक प्रभावी बनाने के लिए कई योजनाएं बना रही है। सतत विकास लक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए सरकार  डिजिटल तकनीक, नवाचार और जनभागीदारी के मॉडल के जरिये अपने स्वच्छता लक्ष्यों को  साकार करने की दिशा में तेजी से अग्रसर है।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी के स्वच्छता संकल्प को साकार करने के लिए मध्यप्रदेश ने उत्कृष्ट प्रयास किए हैं। स्वच्छ भारत मिशन के तहत राज्य की योजनाएं और पहल न केवल स्वच्छता के मानक स्थापित कर रही हैं, बल्कि  आम नागरिकों के जीवन स्तर को भी ऊपर उठाने का काम कर रही है। मध्यप्रदेश की प्रतिबद्धता और योजनाओं से यह स्पष्ट है कि प्रधानमंत्री मोदी की प्रेरणा और मार्गदर्शन से  राज्य भविष्य में स्वच्छता के क्षेत्र में और भी नई ऊँचाइयों को छूने के लिए तैयार है।