मध्यप्रदेश को प्रकृति ने न केवल मुक्त हस्त से संवारा है बल्कि नैसर्गिक सौंदर्य और हरियाली से आच्छादित किया है, वहीं प्रदेश सरकार ने भी वन्य प्राणी संरक्षण एवं प्रबंधन पर विशेष ध्यान देकर इसे वन्य प्राणी समृद्ध प्रदेश बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। पिछले डेढ़ दशक के दौरान श्रेष्ठ और सतत वन्य प्राणी प्रबंधन के प्रयासों के चलते आज मध्यप्रदेश देश और दुनिया में अग्रणी प्रदेश बना है। मध्यप्रदेश को भारत का ‘टाइगर स्टेट’ कहा जाता है और वन्य जीव संरक्षण की दिशा में देश के हृदयप्रदेश मध्यप्रदेश की प्रतिबद्धताओं के चलते यह खिताब आज पहले से कहीं अधिक मजबूत हो चुका है। यह गर्व की बात है कि मध्यप्रदेश के जंगलों में टाइगर की दहाड़ लगातार गूंज रही है। वर्ष 2022 में हुई बाघों की गणना के अनुसार प्रदेश में 785 बाघ थे, जो देश में सबसे अधिक हैं। अब वन्य अधिकारी और विशेषज्ञ यह अनुमान लगा रहे हैं कि यह संख्या एक हजार के पार पहुँच चुकी है जो बाघों के संरक्षण और संवर्धन कि दिशा में एक बड़ी सफलता है।
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बाघों की जातियों की घटती संख्या, उनके अस्तित्व और संरक्षण संबंधी चुनौतियों के प्रति जन-जागृति के लिए अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस 29 जुलाई को प्रतिवर्ष मनाया जाता है। विश्व बाघ दिवस 29 जुलाई को मनाए जाने का निर्णय वर्ष 2010 में सेंट पीटर्सबर्ग बाघ सम्मेलन में किया गया था। इस सम्मेलन में बाघ की आबादी वाले देशों ने वादा किया था कि बहुत जल्द वे बाघों की आबादी दोगुनी कर देंगे। इस लक्ष्य को प्राप्त करने में मध्यप्रदेश ने तेजी से काम किया और प्रबंधन में निरंतरता दिखाते हुए पूरे देश में वन्यजीवों के संरक्षण और संवर्धन में अपनी महत्वपूर्ण उपस्थिति करने में सफलता पाई है। मध्यप्रदेश में 2022 में हुई पिछली गणना के अनुसार 785 बाघ हैं, जो देश में सर्वाधिक हैं। इसके बाद 563 बाघों के साथ कर्नाटक दूसरे और 560 बाघों के साथ उत्तराखंड तीसरे नंबर पर है। 2010 में मध्यप्रदेश में बाघों की संख्या मात्र 257 थी। 2014 में यह 308, 2018 में 526 और 2022 में 785 हो गई। 2014 से 2022 के बीच लगभग 155 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जो राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है। भारत में कुल बाघों की संख्या 2022 में 3,682 आँकी गई थी, जिसमें मध्यप्रदेश का सबसे बड़ा योगदान रहा। अभी 2026 की नई गणना चल रही है। इस बार प्रदेश में पहली बार कुछ नए टाइगर रिजर्व भी शामिल किए गए हैं जिसके बाद से यहाँ पर बाघों की संख्या बढ़ाने का सहज ही अनुमान लगाया जा रहा है।यह बढ़ोतरी संयोग नहीं, बल्कि वन्य जीव संरक्षण की दिशा में प्रदेश सरकार द्वारा किए गए निरंतर प्रयासों का प्रतिफल है। मध्यप्रदेश के टाइगर रिजर्व के कोर क्षेत्रों से दो सौ से अधिक गाँवों का पुनर्वास किया गया। इससे बाघों को बिना मानव हस्तक्षेप के घूमने और शिकार करने का बड़ा क्षेत्र मिला। पुराने खेत घास के मैदान बन जाने से जंगलों में शिकार की उपलब्धता बढ़ी।पिछले वर्षों में वन विभाग ने सैकड़ों शिकारियों को भी पकड़ा। कैमरा ट्रैप, डीएनए तकनीक और आधुनिक निगरानी व्यवस्था सरीखी अत्याधुनिक तकनीकों ने बाघों की गणना और सुरक्षा दोनों को मजबूत करने का काम किया है। बाघ की दहाड़ अब प्रदेश के टाइगर रिजर्व के बाहर भी सुनाई दे रही है। राजधानी भोपाल के शहरी इलाकों में भी बाघों की आवाजाही अब देखी जा सकती है। बाघों को मध्यप्रदेश की आबोहवा इस कदर रास आ रही है कि आने वाले दिनों में इनकी टेरिटरी बढ़ने की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता।
प्रदेश का पहला टाइगर रिजर्व 1973 में कान्हा टाइगर बना। मध्यप्रदेश में 9 टाइगर रिजर्व हैं, जिसमें कान्हा किसली, बांधवगढ़, पेंच, पन्ना बुंदेलखंड, सतपुड़ा नर्मदापुरम, संजय दुबरी सीधी, नौरादेही, माधव नेशनल पार्क और डॉ. विष्णु वाकणकर टाइगर रिजर्व (रातापानी) शामिल हैं। मध्यप्रदेश के बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में सबसे अधिक बाघ हैं। यह रिजर्व मध्यप्रदेश का सबसे प्रसिद्ध टाइगर रिजर्व है। बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान उमरिया जिले में स्थित पार्क है जो देश में सर्वाधिक बाघ घनत्व के लिए प्रसिद्ध है। बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व एक ऐसी जगह है, जहां बाघों की भरमार है और आसानी से पर्यटक इनका दीदार कर सकते हैं। यही वजह है कि बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में पर्यटक काफी तादात में आते हैं और साल दर साल पर्यटकों की संख्या को लेकर बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व नए-नए कीर्तिमान बनाता जा रहा है।
कान्हा राष्ट्रीय उद्यान मध्य प्रदेश का सबसे बड़ा और पहला राष्ट्रीय उद्यान है जो मंडला और बालाघाट जिलों में फैला है। माधव राष्ट्रीय उद्यान शिवपुरी जिले में स्थित है। पेंच राष्ट्रीय उद्यान सिवनी और छिंदवाड़ा जिलों में स्थित है जो रुडयार्ड किपलिंग की जंगल बुककी प्रेरणा बना। पन्ना राष्ट्रीय उद्यान पन्ना और छतरपुर जिलों में फैला हुआ बाघ आरक्षित क्षेत्र है। सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान नर्मदापुरम जिले में स्थित घने जंगलों वाला क्षेत्र है। संजय-दुबरी राष्ट्रीय उद्यान सीधी और सिंगरौली जिलों में स्थित है। कूनो राष्ट्रीय उद्यान श्योपुर जिले में स्थित है जो वर्तमान में अफ्रीका से लाए गए चीतों के पुनर्वास के कारण पूरी दुनिया में चर्चाओं के केन्द्र में है। इसके अलावा मध्यप्रदेश में 24 अभयारण्य हैं। अभयारण्य के रूप में पचमढ़ी, पनपथा, बोरी, पेंच-मोगली, गंगऊ, संजय- दुबरी, बगदरा, सैलाना, गांधी सागर, करेरा, नौरादेही, राष्ट्रीय चम्बल, केन, नरसिहगढ़, रातापानी, सिंघोरी, सिवनी, सरदारपुर, रालामण्डल, केन घड़ियाल, सोन चिड़िया अभयारण्य घाटीगांव, सोन घड़ियाल अभयारण्य, ओरछा और वीरांगना दुर्गावती अभयारण्य अपनी विशिष्ट पहचान के लिए देश में जाने जाते हैं। भारत में सबसे अधिक राष्ट्रीय उद्यान मध्य प्रदेश में ही स्थित हैं, जिसके कारण इसे वन्य जीव पर्यटन का प्रमुख केन्द्र और टाइगर स्टेट भी कहा जाता है।
यह सुखद है कि अब मध्यप्रदेश के भीतर बाघों की संख्या टाइगर रिजर्व की सीमाओं के बाहर भी तेजी से बढ़ रही है और बाघों की हलचल शहरी इलाकों की इंसानी आबादी के बीच भी महसूस की जा रही है। सतना से लेकर सीधी, शहडोल से अमरकंटक ,डिंडौरी के लेकर मंडला तक में भी बाघों का कुनबा नई चहलकदमी कर रहा है। तीन बार टाइगर स्टेट का दर्जा हासिल करने के साथ ही राष्ट्रीय उद्यानों और संरक्षित क्षेत्रों के प्रभावी प्रबंधन में भी देश में सबसे आगे है। इन राष्ट्रीय उद्यानों में कुशल प्रबंधन और अनेक नवाचारी तौर तरीकों को अपनाया गया है। प्रदेश के टाइगर रिजर्व क्षेत्रों और चिड़ियाघरों में भी बाघ हैं, जहां इनका संरक्षण और प्रजनन होता है। जहाँ एक तरफ हाल के वर्षों में प्रदेश सरकार ने ईको विकास समितियों को प्रभावी ढंग से पुनर्जीवित किया है वहीँ वाटरहोल बनाने और घास के मैदानों के रखरखाव और वन्य-जीव निवास स्थानों को रहने लायक बनाने के अनेक कार्यक्रम समय- समय पर भी चलाये हैं जिसका जमीनी असर अब दिखाई दे रहा है।
मध्यप्रदेश राष्ट्रीय उद्यानों और संरक्षित क्षेत्रों के प्रभावी प्रबंधन में भी देश में आगे है। सतपुड़ा टाइगर रिजर्व को यूनेस्को की विश्व धरोहर की संभावित सूची में शामिल किया गया है। भारत सरकार द्वारा समय- समय पर जारी की जाने वाली टाइगर रिज़र्व के प्रबंधन की प्रभावशीलता मूल्यांकन रिपोर्ट में एमपी ने देश में नया मुकाम हासिल किया है। बांधवगढ़, कान्हा, पेंच टाइगर रिजर्व,संजय और सतपुड़ा टाइगर रिजर्व को सर्वश्रेष्ठ प्रबंधन वाला टाइगर रिजर्व माना गया है। इन सभी राष्ट्रीय उद्यानों में अनुपम प्रबंधन योजनाओं और नवाचारी तरीकों को अपनाया गया है। खुली जगह के साथ ही वन्यजीवों को तनावमुक्त वातावरण और उचित आहार की भी जरूरत होती है जिस दिशा में प्रदेश में बेहतरीन कार्य हुआ है जिसके चलते मध्यप्रदेश में बाघों की संख्या तेजी से बढ़ी है। जहाँ एक तरफ हाल के वर्षों में प्रदेश सरकार ने बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व ने बाघ पर्यटन द्वारा प्राप्त राशि का उपयोग कर ईको विकास समितियों को प्रभावी ढंग से पुनर्जीवित किया है वहीँ वाटरहोल बनाने और घास के मैदानों के रखरखाव और वन्य-जीव निवास स्थानों को रहने लायक बनाने का कार्यक्रम भी चलाया है। कान्हा-पेंच वन्य-जीव विचरण कारीडोर भारत का पहला ऐसा कारीडोर है, जिसमें कारीडोर का प्रबंधन स्थानीय समुदायों, सरकारी विभागों, अनुसंधान संस्थानों और नागरिक संगठनों द्वारा सामूहिक रूप से किया जाता है। प्रदेश में बाघों की संख्या बढ़ाने में इन सभी राष्ट्रीय उद्यानों के बेहतर प्रबंधन की मुख्य भूमिका है। राज्य शासन की सहायता से कई सौ गाँवों का विस्थापन किया गया जिससे बहुत बड़ा भू-भाग जैविक दबाव से मुक्त हुआ है। संरक्षित क्षेत्रों से गाँवों के विस्थापन के फलस्वरूप वन्य-प्राणियों के रहवास क्षेत्र का विस्तार हुआ है। कान्हा, पेंच और कूनो पालपुर के कोर क्षेत्र से सभी गाँव को विस्थापित किया जा चुका है।
बाघों की सुरक्षा के प्रति भी मध्यप्रदेश सरकार संवेदनशील है। वन्य जीवों के संरक्षण के लिए सरकार अनेक नवाचारी डिजिटल तकनीक का प्रयोग कर रही है जिससे बाघों की हर गतिविधि पर नजर रखी जा रही है। बाघ संरक्षण में अत्याधुनिक तकनीकी का इस्तेमाल करने की पहल करते हुए प्रदेश के टाइगर रिजर्व ने “ड्रोन स्क्वाड” का संचालन किया है जिसके माध्यम से निगरानी रखने, वन्यजीवों की खोज और बचाव करने, जंगल की आग का पता लगाने और उससे रक्षा करने और मानव-पशुओं के संघर्ष को कम करने के लिये की गई है जिससे जैव-विविधता के दस्तावेज़ीकरण में भी मदद मिल रही है। बांधवगढ़, कान्हा, पेंच, संजय और सतपुड़ा टाइगर रिजर्व राष्ट्रीय उद्यानों में अनुपम प्रबंधन योजनाओं और नवाचारी तरीकों को अपनाया गया है। बाघों की सुरक्षा के लिए बघीरा एप की सहायता से जंगल में सफारी की गतिविधि को ट्रैक किया जाता है। टाइगर रिजर्व में अनूठी प्रबंधन रणनीतियों को अपनाया जाता है। यहाँ पर आधुनिक तकनीकों का भी उपयोग हो रहा है। ड्रोन सर्विलांस, कैमरा ट्रैप और सैटेलाइट मॉनिटरिंग से अब हर बाघ की गतिविधि पर नजर रखी जाती है। इसके अलावा, जंगल में आग और शिकार की घटनाओं पर रोक लगाने के लिए वन विभाग लगातार गश्त भी करता है। वन्य जीव संरक्षण में अत्याधुनिक तकनीकी का इस्तेमाल करने की पहल करते हुए प्रत्येक महीने “ड्रोन स्क्वाड” संचालन की मासिक कार्ययोजना तैयार की जाती है। इससे वन्य जीवों की खोज, उनके बचाव, जंगल की आग का स्त्रोत पता लगाने और उसके प्रभाव की तत्काल जानकारी जुटाने, संभावित मानव-पशु संघर्ष के खतरे को टालने और वन्य जीव संरक्षण संबंधी कानूनों का पालन करने में मदद मिल रही है।
मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि प्रदेश के राष्ट्रीय उद्यानों में बेहतर प्रबंधन से जहाँ एक ओर वन्य प्राणियों को संरक्षण मिलता है, वहीं बाघों के प्रबंधन में लगातार सुधार भी हुए हैं। मुख्यमंत्री डॉ.यादव ने अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस पर जंगलों में बाघों के भविष्य को सुरक्षित करने और प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने के लिए एकजुट होकर कार्य करने की प्रतिबद्धता को दोहराया है। बाघों की उपस्थिति सिर्फ जैव विविधता के लिए ही नहीं बल्कि पर्यावरणीय संतुलन के लिए भी बेहद जरूरी है। बाघ जितने स्वस्थ रहेंगे, उतना ही हमारा पर्यावरण और जंगल सुरक्षित रहेंगे। यही कारण है कि एमपी में बाघों की निगरानी की मजबूत व्यवस्था बनाई गई है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की पहल पर मध्यप्रदेश में बाघों के संरक्षण के लिये कई नवाचार किये जा रहे हैं। मध्यप्रदेश में बाघों की जीन टेस्टिंग करने की योजना है, जिससे उनकी सटीक पहचान की जा सकेगी। गुजरात के बनतारा जू और रेस्क्यू सेंटर की तर्ज पर प्रदेश में उज्जैन और जबलपुर में रेस्क्यू सेंटर बनाये जा रहे हैं।
मध्यप्रदेश ने साबित कर दिया है कि बेहतर ढंग से प्रबंधन, स्थानीय लोगों के सहयोग और प्रशासन के सहयोग से बाघों का कुनबा बढ़ सकता है। बाघ सिर्फ जंगल का राजा नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र का संकेतक है। जब बाघ सुरक्षित होंगे, तो जंगल भी हरे-भरे रहेंगे और स्थानीय अर्थव्यवस्था को पर्यटन से भी लाभ मिलेगा। मध्य प्रदेश अपने नवाचारों के माध्यम से आज पूरी दुनिया के सामने बाघ संरक्षण और संवर्धन की अनुपम मिसाल पेश कर रहा है।
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