Sunday, 13 March 2022

उत्तराखंड में खिला कमल , पुष्कर सिंह धामी ही होंगे नए सीएम


                                     हार के बाद भी पुष्कर सिंह धामी  भाजपा के लिए जरूरी 

                                      2022 का उत्तराखंड विधानसभा भाजपा के लिए शुभ साबित हुआ है । पहाड़ से लेकर मैदान तक चले मोदी मैजिक ने यहाँ उसकी फिर से एक बार सरकार बना दी है ।  राज्य गठन के बाद से ही इस राज्य में हर पांच साल में सत्ता बदलती रही है लेकिन इस बार ये परंपरा टूट गई है । सूबे के विधान सभा चुनावों में स्थानीय और राष्ट्रीय मुद्दों का असर साफ़ दिखाई दिया ।पहाड़ में मोदी की प्रचंड आंधी जहाँ चली है वहीँ मैदानी इलाकों में महंगाई और किसान आन्दोलन जैसे मुद्दों ने अपना आंशिक  असर दिखाया है । प्रदेश में एक बार फिर भाजपा अपनी वापसी कर रही है लेकिन भाजपा के जहाज के असली सेनापति पुष्कर सिंह धामी चुनाव हार गए हैं ।  धामी को कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष भुवन कापड़ी के हाथों पराजय का मुंह देखना पड़ा है ।

 

सिटिंग सी एम के कुर्सी बचाने का मिथक नहीं टूटा

मुख्यमंत्री पुष्कर धामी सिटिंग सी एम के कुर्सी बचाने के मिथक को नहीं तोड़ पाए ।  पहले बी सी खंडूडी फिर हरीश रावत और अब पुष्कर सिंह धामी मुख्यमंत्री की कुर्सी में रहते हुए चुनाव हार गए । पुष्कर ऐसे तीसरे मुख्यमंत्री हैं जो कुर्सी में रहते हुए चुनाव हारे हैं । इससे पहले भाजपा ने 2012 में खंडूडी हैं जरूरी के नारों के साथ चुनाव लड़ा। उन्होनें भी भाजपा को जीत के करीब पहुँचाया लेकिन खुद कोटद्वार सीट बचाने में कामयाब नहीं हो पाए । इसी तरह 2017 में हरीश रावत की अगुवाई में कांग्रेस ने अपना चुनाव लड़ा और वह दो सीट से चुनाव लड़े लेकिन दोनों सीटों से उनको पराजय का सामना करने पर मजबूर होना पड़ा ।  अब इस बार  भी भाजपा ने पुष्कर सिंह धामी के नाम के साथ चुनाव लड़ा और कम समय में उनके द्वारा किये गए कामों को अपना आधार बनाया जिसमें वह पूरी तरह से सफल भी हुई  लेकिन उसके सिटिंग सीएम को खटीमा से हार का मुंह देखना पड़ा । 2017 के चुनावों में भाजपा प्रचंड बहुमत से चुनाव जीतकर आई थी ।  तब त्रिवेन्द्र सिंह रावत को मुख्यमंत्री बनाया गया था लेकिन अपने कार्यकाल से पहले ही उन्हें पार्टी ने चलता किया जिसके बाद 10 मार्च 2021 को पौड़ी गढ़वाल से सांसद तीरथ सिंह रावत को राज्य की बागडोर सौंपी गई थी लेकिन वे भी तीन महीनों तक इस पद पर बने रहे ।  इसके बाद 3 जुलाई को पुष्कर सिंह धामी की ताजपोशी की गई थी । 

 

कई मिथक टूटे तो कुछ मिथक बरकरार

इस बार के चुनाव ने कई दिग्गजों को आईना दिखाने का काम किया वहीँ अब तक के कई मिथकों को तोड़ने का काम किया है । सरकार फिर से रिपीट न होने का मिथक जहाँ टूटा है वहीँ बदरीनाथ , गंगोत्री , कोटद्वार , रानीखेत के मिथक भी टूटे हैं । देखा गया है इन जगहों से जिस पार्टी का विधायक निर्वाचित होता है, उत्तराखंड में  उसी की सरकार बनती है । इसी तरह राज्य गठन के बाद ये देखा गया है शिक्षा मंत्री और पेयजल मंत्री दुबारा चुनाव नहीं जीत पाते हैं लेकिन अरविन्द पाण्डे और  बिशन सिंह चुफाल की जीत ने इस मिथक को भी तोड़ डाला है। हरक सिंह रावत को राज्य में सबसे बड़ा मौसम विज्ञानी कहा जाता है । इस बार तो उन्होनें ऐलान भी कर दिया था भाजपा उत्तराखंड से जा रही है । वो हवा का रुख भांप लिया करते हैं ऐसा गाहे –बगाहे कहा जाता रहा है लेकिन इस बार भाजपा से निष्कासित होने के बाद उन्होनें कांग्रेस की शरण ली लेकिन अपनी बहू अनुकृति को कांग्रेस के टिकट पर  जिताने में कामयाब नहीं हो सके ।

 

हरीश रावत के लिए जोर का झटका

पूर्व सी एम हरीश रावत के लिए भी इस बार का चुनाव बड़ा झटका है । उनको कांग्रेस ने अपनी कैम्पेन कमेटी का चेयरमैन बनाया था । वह अपनी सीट लालकुआँ को बचाने में कामयाब नहीं हो सके ।  2017 के चुनावों में भी रावत को हरिद्वार ग्रामीण और किच्छा से हार का सामना करना पड़ा था ।

इस बार भी कांग्रेस पार्टी के सीएम पद के चेहरे के रूप में  उन्हें देखा जा रहा था ।  पहले कांग्रेस ने उन्हें रामनगर से प्रत्याशी बनाया था । बाद में उनकी सीट बदल दी और उन्हें लालकुंआ से प्रत्याशी बनाया गया था लेकिन यहाँ भी उनको हार का मुंह देखा पड़ा । इससे पहले हरदा लोक सभा चुनावों में भी अपनी सीट नहीं बचा पाए थे । कांग्रेस के टिकट पर वह नैनीताल से लोकसभा चुनाव भी  लड़े जहाँ अजय भट्ट ने उनको पराजित किया । 

ऋतु खंडूडी ने लिया जनरल की हार का बदला

ऋतु यमकेश्वर विधान सभा सीट से 2017 में विधायक निर्वाचित हुई । वो पूर्व मुख्यमंत्री जनरल बी सी खंडूडी की बेटी हैं । भाजपा ने पहले तो उनको यमकेश्वर से टिकट नहीं दिया लेकिन अंतिम समय में कोटद्वार से अपना प्रत्याशी बनाया जहाँ उनके सामने बड़ी चुनौती थी । 2012 में उनके पिता को कांग्रेस के सुरेन्द्र नेगी के हाथों पराजित होना पड़ा था । ऐसे में इस बार उनके लिए यह चुनाव ख़ास रहा जहाँ उन्होंने अपनी पिता की हार का बदला लिया ।

 

अनुपमा रावत ने भी हरिद्वार हार का लिया बदला

पूर्व सीएम हरदा लालकुँआ से खुद तो चुनाव हार गए लेकिन हरिद्वार ग्रामीण सीट से उनकी बेटी अनुपमा रावत  ने चुनाव जीतकर उनके पिता की हार का बदला ले लिया । 2017 में भाजपा ने यतीश्वरानंद ने उनके पिता हरीश रावत को इस सीट से पराजित किया था । यतीश्वरानंद पुष्कर धामी की सरकार में कैबिनेट  मंत्री रहे लेकिन इस बार अपनी सीट बचाने में कामयाब नहीं हो सके।

पुष्कर धामी ही फिर से संभालेंगे उत्तराखंड की कमान

उत्तराखंड में भाजपा तो जीत गई लेकिन सीएम पुष्कर धामी चुनाव हार गए जिसके बाद से नए सीएम को लेकर चर्चाएं और दावेदारों की रस्साकसी शुरू हो गई है । फिलहाल भाजपा में जैसे संकेत दिल्ली से मिल रहे हैं उसके मुताबिक पीएम मोदी और अमित शाह इस पद पर अपने भरोसेमंद नेता को कमान देने के इच्छुक बताये जा रहे हैं । अपनी चुनावी रैलियों में भी इन सभी नेताओं ने पुष्कर के ही भाजपा के अगले मुख्यमंत्री होने का ऐलान किया था। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है भाजपा फिर से धामी पर दांव लगा रही है ।   भाजपा में पुष्कर सिंह धामी की हार के बाद जिस तरह एक अनार सौ बीमार वाली स्थिति उत्पन्न हुई है और दावेदारों की सक्रियता तेज हुई है, उसके मद्देनजर आलाकमान पुष्कर सिंह धामी को दुबारा कमान देने का मूड लगभग बना चुका है । वह यहाँ पूर्व में घटित हुए घटनाक्रमों से सबक लेते हुए इस बार इस राज्य को प्रयोगशाला बनाने से बचना चाह रहा है । राज्य के प्रभारी प्रहलाद जोशी भी चुनावों में मिली शानदार जीत के लिए पुष्कर धामी  की पीठ थपथपा चुके हैं । उन्होंने इस जीत के लिए युवा  धामी की मेहनत और 6 माह में उनके कार्यकाल के दौरान जनता के हित में लिए कई फैसलों को जिम्मेदार बताया है जिसकी सार्वजनिक मंच से सराहना भी की है । इन संकेतों को डिकोड करें तो लगता है भाजपा आलाकमान चाहकर भी पुष्कर धामी को नजरअंदाज नहीं कर सकता क्योंकि त्रिवेन्द्र सिंह रावत के दौर में गर्त में जाती भाजपा को उन्होनें अपने साहसिक फैसलों और नीतियों से नया जीवन देने का काम किया है। भाजपा को ख़राब दौर से उबारने में पुष्कर धामी की मेहनत और व्यक्तित्व की बड़ी भूमिका रही है । उन्होनें सभी विधानसभा सीटों पर भाजपा के प्रत्याशियों के लिए पसीना बहाया और दिन रात एक किया जिसकी बदौलत ही भाजपा आज यहाँ तक पहुँच पायी है । ऐसा देखा गया है भाजपा में पार्टी के भीतर पुराने दिग्गज नेताओं का एक ऐसा गठबंधन बना हुआ है जो पुष्कर की लोकप्रियता से बहुत चिंतित है क्योंकि कम समय में पीएम मोदी और गृह मंत्री अमित शाह , राष्ट्रीय अध्यक्ष जे पी नड्डा  के साथ ही राज्य के प्रभारी प्रहलाद जोशी का दिल जीतकर पुष्कर सिंह धामी ने उनके सियासी भविष्य और मुख्यमंत्री बनने के सपनों पर ग्रहण लगाने का काम किया है जिसके चलते पुष्कर उनके लिए बड़ा सरदर्द बन चुके है इसलिए राज्य भाजपा के कुछ दिग्गज नेता उन्हें निबटाना चाह रहे थे । इन नतीजों के आने के बाद शायद भीतरघातियों और बड़े नेताओं पर पार्टी शायद कुछ न कुछ बड़ा एक्शन जरूर लेगी। 

इधर चम्पावत से भाजपा विधायक कैलाश गहतोड़ी ने अपनी सीट धामी के लिए छोड़ने का ऐलान सार्वजनिक रूप से कर इस सम्भावना को जिन्दा रखा है जीत का असली सेनापति धामी हैं । विधायक गहतोड़ी ने कहा है मुख्यमंत्री धामी दुर्भाग्य से चुनाव हारे हैं लेकिन भाजपा को बहुमत में लाने में उनकी बड़ी भूमिका है। धामी को 6 महीने का छोटा सा कार्यकाल मिला लेकिन उनकी नीतियों ने आज भाजपा को विजयश्री दिलवाई है ।

 जिस सेनापति के कारण भाजपा आज यहाँ तक पहुंची है और उस सेनापति ने भाजपा का किला बचाने में सफलता पाई है उसे शायद पार्टी एक मौका और देकर पार्टी में मुख्यमंत्री पद के अन्य सभी सक्रिय दावेदारों की दावेदारी एक झटके में खत्म कर दे ऐसी संभावनाएं अभी भी जिन्दा हैं । वैसे भी राजनीती संभावनाओं का खेल है । वैसे भी भाजपा के पास बहुमत से कई अधिक सीटें इस समय हैं,  साथ ही उसकी नजर निर्दलियों पर भी टिकी हैं । भाजपा किसी निर्दलीय विधायक को पार्टी में शामिल करवाकर वहां से धामी को उपचुनाव भी लड़ा सकती है । ऐसी सूरत में  6 माह के अन्दर पुष्कर सिंह धामी को चुनाव जीतना पड़ेगा जो बहुत मुश्किल आज की सूरत में नहीं है । बड़े पैमाने पर भाजपा में विधायकों का एक तबका इस समय युवा पुष्कर धामी के साथ चट्टान की तरह खड़ा है । अगर केंद्र से भेजे गए आब्जर्वरों के रायशुमारी की नौबत भी आती है तो वे सभी पुष्कर सिंह  धामी के साथ खड़े होंगे ऐसे संकेत मिल रहे हैं । पुष्कर का काम आज बोल रहा है । असल समस्या भाजपा के दिग्गज नेताओं की तरफ से आ रही है जो किसी भी कीमत पर पुष्कर सिंह धामी की राह फिर एक बार फिर से रोकने का काम कर सकते हैं ।

भीतरघातियों का कुछ होगा

इस चुनाव में मतदान सम्पन्न होने के बाद से भाजपा और कांग्रेस में भीतरघात की बातें जोर शोर के साथ उठी हैं । पुष्कर सिंह धामी की खटीमा सीट पर भी ये आशंका है यहाँ उन्हीं की पार्टी के कई बड़े दिग्गज नेताओं ने ऐसा जाल बुना जिससे वो खटीमा में पराजित हो जाएँ । हरिद्वार ग्रामीण में भी उनके करीबी यतीश्वरानंद को हार का सामना करना पड़ा । इसी तरह उनके करीबी किच्छा से राजेश शुक्ला , संजय गुप्ता भी इस चुनाव में हार गए जिसके बाद से यह देखा जा रहा है भाजपा में कुछ नेताओं के निशाने पर पुष्कर धामी और उनके करीबी थे । ये नेता किसी भी कीमत पर उन्हें और उनके करीबियों को जीतता हुआ नहीं देखना चाहते थे । ये तो कुछ सीटों की बात है । ऐसा खेला राज्य की कई विधान सभा सीटों पर जमकर हुआ है । यही हाल कांग्रेस का भी है । रानीखेत , जागेश्वर , लालकुआँ, नैनीताल  सरीखी कई सीटों पर कांग्रेस की कहानी भी इससे जुदा नहीं है । ऐसी कई सीटें पहाड़ से लेकर मैदान तक हैं जहाँ  दोनों पार्टियाँ पार्टी हारी नहीं बल्कि यहाँ हरवाने के लिए भीतरघाती सक्रिय रहे । इन सबके चलते यह भी देखना होगा क्या चुनाव निपटने के बाद दोनों पार्टियाँ आत्ममंथन करते हुए भीतरघातियों पर कोई एक्शन लेंगी ?

पहाड़ में चला मोदी मैजिक

कुमाऊँ की 29 में से 18 सीटें अपने नाम कर भाजपा ने फिर एक बार साबित किया यहाँ के वोटरों पर आज भी मोदी का जादू चलता है । कांग्रेस को पिछली बार कुमाऊँ में केवल 4 सीट ही मिल पाई थी इस बार उसकी 6 सीटें बढ़कर 10 हुई हैं । पिथौरागढ की 4 सीटों में से 2 भाजपा और 2 कांग्रेस के नाम रही । अल्मोड़ा में 3 भाजपा तो 1 कांग्रेस के पास गई ।  बागेश्वर में दो सीटें भाजपा के पास वहीँ चम्पावत में 1 सीट भाजपा तो एक कांग्रेस ने अपने नाम की ।  नैनीताल में भी भाजपा का बेहतर प्रदर्शन रहा ।  उधमसिंह नगर में भाजपा की संभावनाओं पर ग्रहण लगाने का काम किसान आन्दोलन ने किया ।  जसपुर , बाजपुर , किच्छा, नानकमत्ता कांग्रेस के खाते में गई । 

 मनहूस बंगले का हर सी एम को अभिशाप

उत्तराखंड का जो भी मुख्यमंत्री  न्यू कैंट रोड स्थित 10 एकड़ में फैले  इस आवास में अपना आशियाना बनाता है वह अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया।  नारायण दत्त तिवारी के दौर में गढ़ी कैंट में पहाड़ी शैली के आलीशान भव्य बंगले का निर्माण किया गया । इसमें एक बैडमिन्टन कोर्ट , स्विमिंग पूल , कई लान , सीएम और उनके स्टाफ के लिए कार्यालय और कई लान मौजूद हैं।

2007 में कांग्रेस के हाथ से सत्ता निकली तो बी सी खंडूडी ने भी इस बंगले को अपना आशियाना बनाया लेकिन ढाई बरस में ही सी एम की कुर्सी गंवानी पड़ी । इसके बाद निशंक ने भी इसी बंगले से अपनी बिसात बिछाई वह भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए । 2012 में कांग्रेस सत्ता में आई तो विजय बहुगुणा को भी यह बंगला भाया लेकिन इस बंगले ने उन्हें भी पूर्व सी ऍम बनाने में देरी नहीं की । तंत्र , मंत्र में भरोसा रखने वाले हरदा तो डर के मारे इस बंगले में नहीं घुसे और बीजापुर गेस्ट हाउस से ही अपना कामकाज चलाया फिर भी उनकी कुर्सी सलामत नहीं रही और वह भी दो सीटों से पराजित हुए । 2017 में काफी ना- नुकुर के बाद त्रिवेन्द्र सिंह रावत भी  इस बंगले में गए । वहां जाने से पहले उन्होनें हवन के कार्य किये और गाय की पूजा तक की । साढ़े 4 साल तक तो सब ठीक- ठाक रहा लेकिन ये बंगला उनकी कुर्सी भी बीच कार्यकाल में खा गया । उसके बाद गढ़वाल सांसद तीरथ सिंह रावत को सूबे की कमान भाजपा ने सौंपी । उनको भी इस बंगले का का भय था लिहाजा उन्होनें भी बीजापुर गेस्ट हाउस से ही अपनी सरकार चलाना ठीक समझा । फिर एकाएक रामनगर में पार्टी के अधिवेशन के चलते समय उनको दिल्ली तलब कर लिया गया और दिल्ली से वापसी के बाद उनकी मुख्यमंत्री की कुर्सी भी चली गई । 6 माह पूर्व पुष्कर धामी को जब मुख्यमंत्री बनाया गया तो उन्होंने खुद को आशावादी और सकारात्मक बताया और इस बंगले के वास्तु दोषों तक को कई दिनों तक दूर किया । इसके साथ ही हवन और पूजा -पाठ भी करवाई । लग रहा था इसके बाद इस बंगले का अभिशाप अब मानो खत्म हो गया है लेकिन मुख्यमंत्री  पुष्कर सिंह धामी को  भी  राजनीती की पिच पर इस बंगले ने क्लीन बोल्ड कर दिया है।

 

 

 

 

 

 

 

Friday, 11 February 2022

राष्ट्रीय ध्वज के जनक पिंगली वैंकैया


 

अंग्रेजों की गुलामी से आज़ाद होने के लिए असंख्य लोगों ने अपना बलिदान दिया । उनमें से अनेक लोगों को आज हम विस्मृत कर चुके हैं । देश की आन , बान और शान तिरंगा किस तरह वजूद में आया ये भी आज शायद गिने  चुने लोगों को याद होगा ।


 तिरंगे झंडे का जब भी जिक्र आएगा तो पिंगली वैंकैया के नाम का नाम स्मरण किए बिना शायद वो अधूरा रहे । भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस की एक बैठक 1921 में विजयवाड़ा में हुई तो उसमें महात्मा गांधी जी ने पिंगली वैंकैया द्वारा तैयार किए गए राष्ट्रीय ध्वज के चित्रों की जानकारी दी । इसी बैठक में पिंगली द्वारा बनाए गए राष्ट्रीय ध्वज की डिजाइन को महात्मा गांधी ने मान्यता दी ।

 राष्ट्रीय ध्वज की डिजाइन तैयार करने वाले पिंगली का जन्म आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिले की दीवी तहसील के भताला पेनमरु गाँव में 2 अगस्त 1878 को हुआ था । प्रारम्भिक शिक्षा भटाला पेनमरु एवं मछलीपट्टनम से प्राप्त करने के बाद 19 वर्ष की उम्र में वो मुंबई चले गए । वहाँ जाकर उन्होनें सेना में नौकरी कर ली जहां से उनको दक्षिण अफ्रीका भेज दिया गया । 1899 से 1902 के बीच उन्होनें अफ्रीका के बायर युद्ध में भाग दिया वहीं पर उनकी मुलाक़ात महात्मा गांधी जी से हुई और वे उनके विचारों से बहुत अधिक प्रभावित हुए । स्वदेश वापस लौटने पर मुंबई में गार्ड की नौकरी में लग गए । इसी बीच मद्रास में प्लेग के चलते कई लोगों की मौत हो गई इससे उनका मन बहुत अधिक व्यथित हुआ और उन्होनें वह नौकरी छोड़ दी । वहाँ से मद्रास में प्लेग रोग उन्मूलन में इंस्पेक्टर के पद पर तैनात हो गए । पिंगली की संस्कृत, उर्दू और हिन्दी भाषा में अच्छी पकड़ थी । इसके साथ ही वो भू विज्ञान और कृषि के भी अच्छे जानकार थे। बात 1904 की है जब जापान ने रूस को हरा दिया । इस समाकर को सुनकर वो इतना प्रभावित हो गए कि उन्होनें जापानी भाषा सीख ली ।

उधर महात्मा गांधी का खेड़ा सत्याग्रह चल रहा था । इस आंदोलन ने पिंगली का मन बदल दिया । उसी दौरान उन्होनें अमरीका से कंबोडिया नामक कपास के बीज का आयात किया और इस बीज को भारत के कपास के बीज के साथ अंकुरित कर भारतीय संकरित कपास का बीज तैयार किया जिसे (उनके इस शोध कार्य के लिए ) बाद में वैंकैया कपास के नाम से भी जाना जाने लगा । उधर ब्रिटिश सरकार ने पिंगली वैंकैया को रायल एग्रीकल्चर  सोसायटी आफ लंदन के सदस्य के रूप में मनोनीत कर उनका गौरव बढ़ाया ।

1906 में भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस का अधिवेशन कलकत्ता में हुआ जिसकी अध्यक्षता दादा भाई नौराजी ने की थी । इस सम्मेलन में दादाजी ने पिंगली के कार्यों की सराहना की । बाद में उन्हें राष्ट्रीय काँग्रेस का सदस्य मनोनीत कर दिया गया । काँग्रेस के इस अधिवेशन में यूनियन जैक फहराया गया जिसे देखकर पिंगली वैंकैया का मन द्रवित हो उठा । उसी दिन से वे भारतीय राष्ट्रीय ध्वज की संरचना में लग गए । 1916 में उन्होनें ए नेशनल फ्लैग आफ़ इंडिया नामक पुस्तक प्रकाशित की जिसमें उन्होनें राष्ट्रीय ध्वज के 30 नमूने प्रकाशित किए थे । पाँच साल बाद भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस की बैठक 1921 में विजयवाड़ा में हुई तो उसमें गांधी जी ने सभी को पिंगली के द्वारा तैयार राष्ट्रीय ध्वज के चित्रों की जानकारी दी । इसी बैठक में गांधी जी ने पिंगली के द्वारा बनाए गए राष्ट्रीय ध्वज को मान्यता दी । इस संदर्भ में महात्मा गांधी के ‘यंग इंडिया ’ में अपने संपादकीय में ‘अवर नेशनल फ़्लैग ’ शीर्षक से लिखा राष्ट्रीय ध्वज के लिए हमें बलिदान देने को तैयार रहना चाहिए । मछलीपट्टनम के आंध्र कालेज के पिंगली ने देश के झंडे के संदर्भ में एक पुस्तक भी प्रकाशित की जिसमें उन्होनें राष्ट्रीय ध्वज से संबन्धित अनेक चित्र प्रकाशित किए ।

गांधी जी ने अपने संपादकीय में आगे लिखा ‘जब मैं विजयवाड़ा के दौरे में था उस दौरान पिंगली ने मुझे हरे और लाल रंगों से बने  बिना चरखे वाले कई चित्र बनाकर दिये थे । हर झंडे की रूप रेखा पर उन्हें कम से कम 3 घंटे तो लगे ही थे । मैंने उन्हें एक झंडे के बीच में सफ़ेद रंग कि पट्टी डालने कि सलाह दी जिसका उद्देश्य था कि सफ़ेद रंग सत्य व अहिंसा का होता है । उन्होनें इसे तुरंत मान लिया’ । इसी के बाद पिंगली द्वारा तैयार किए गए झंडे का नाम झण्डा वैंकैया लोगों के बीच  लोकप्रिय हो गया । 4 जुलाई 1963 को पिंगली का निधन हो गया । भारतीय डाक विभाग ने 12 अगस्त 2009 को पूरे 46 बरस बीतने के बाद पिंगली पर 5 रू का डाक टिकट जारी किया ।



                   नई उम्मीदों के शिखर पर  टी -लॉजी स्टार्ट-अप





 


देश में जब भी चाय की चर्चा होती है तो आमतौर पर सड़क के किनारे ढाबों में मिलने वाली चाय, होटल या फिर घर की बात होती है। कभी किसी कंपनी का जिक्र लोगों की जुबान पर नहीं आता  लेकिन अब चाय के स्टार्ट अप भी धूम मचा रहे हैं। एक अच्छा विचार और सही नीति किसी भी व्यवसाय को परवान चढ़ा सकती है। मध्य प्रदेश के शाजापुर जिले के  अभयपुर गाँव के रहने वाले अजय पाटीदार और धाराखेड़ी के शुभम पाटीदार के जेहन में भी ऐसा ही विचार आया  जिसे उन्होंने एक स्टार्टअप का रूप देकर नए मुकाम पर  पहुंचा दिया।

 चाय आज भी अधिकतर भारतीयों के जीवन का हिस्सा है। सुबह की शुरुवात अगर बेहतर चाय की चुस्कियों के साथ हो जाए तो  पूरा दिन अच्छा निकल जाता है। इसी चाय को एक स्टार्ट अप का रूप देकर मध्य प्रदेश के प्रतिभाशाली युवा अजय पाटीदार और शुभम पाटीदार ने देश भर में  अपनी एक नई पहचान बनाई है। उनकी सफलता आज देश के युवाओं के लिए प्रेरणा का काम कर रही है। 

गांव के कुल्हड़ में चाय का स्वाद 

अजय कहते हैं उनको घूमने फिरने का खूब शौक है। एक बार  प्रवास के दौरान  एक गांव में कुल्हड़  चाय का स्वाद  लिया  जो उनके मन को भा गया। फिर  इंदौर में ठेले पर लोगों को चाय पीते देखा तो चाय पर ही  कुछ नया करने का मन बनाया। कुम्हारों  के हाथ से बने कुल्हड़  में जब उन्होंने घर पर चाय पी तो उसके स्वाद का अंदाज निराला लगा।  इस छोटे से विचार ने उनकी  जिंदगी को सही मायनों में बदलकर रख दिया। इसे देखकर  चाय को कुल्हड़ में पेश करते हुए वे इसे  लोगों के बीच पहुंचे ।

कुल्हड़ कैफे से टी लॉजी की शुरुआत

अजय और शुभम बताते हैं वे दोनों पढ़ाई करने के लिए जब इंदौर गए तो उन्हें पढ़ाई रास नहीं आई और  कुल्हड़ कैफे  शुरू करने की ठान ली। महज 3 साल के भीतर देश के 100 शहरों में अपने  आउटलेट खोलकर 85 करोड़  का टर्न ओवर हासिल  कर उन्होनें अपने सपनों को नए पंख लगाए हैं । इस काम में उन्हें दोस्तों का  भरपूर सहयोग मिला। आज  इन दोनों युवाओं का नाम सबकी जुबान पर चढ़ने लगा है क्योंकि  देश भर  में इनकी चाय की खुशबू  अपना रंग बिखेर रही है।
 
एक अकेले से ये रस्म अदा नहीं होती
दोस्ती की शुरुआत ही “दो” से होती है

 
संघर्ष से पाया मुकाम

 अजय और शुभम दोनों युवाओं को शाजापुर से स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण करने के  बाद  एमबीए  की पढ़ाई  के लिए इंदौर जाना पड़ा। तब उन्हें दोनों ने कुल्हड़ के विचार को नया आयाम देने की ठानी लेकिन इसमें पूंजी जुटाने की सबसे बड़ी बाधा थी। साथ में पठन पाठन का खर्च जुटाने की बड़ी चुनौती उनके सामने थी। तब दोनों के लिए कालेज के दोस्तों ने मदद जुटाई। शुभम ने अपनी एमबीए  की पढ़ाई का खर्चा इसमें लगाया  वहीँ तो अजय की मदद के लिए भी दोस्तों ने एक पल में ही  हामी  भर दी।

2018 के शुरुआती दिनों में दोनों की दिनचर्या  संघर्षपूर्ण रही।दोस्तों की मदद से 5 लाख रुपए जुटाकर किसी तरह से कैफे का आईडिया नए आकार  का रूप  लेना शुरू  हुआ।  इन सबके बीच  उनके पास अपने  मकान के किराये को चुकाने के लिए भी रुपये नहीं थे लेकिन दोस्ती की खुषबू की महक उनके चाय के स्टार्ट अप पर नया रंग घोल रही थी।   अजय और शुभम के साथ  भी ऐसा ही हुआ। दोनों के पास दोस्तों की ऐसी  पूंजी थी जिसके बूते उन्होनें कुछ वर्षों में ही अपने व्यवसाय को  बाजार में स्थापित करने में सफलता हासिल कर ली। अलग अलग फ्लेवरों में परोसी गई उनकी चाय की मिठास ने अपने  दोस्तों का भी  दिल जीत लिया। 

दोस्त हौंसलों के दर्जी  होते हैं
वो मुफ्त में रफू कर देते हैं

 
इस दौरान उन्हें मकान किराया चुकाने के लिए भी दोस्तों से ही मदद लेना पड़ी, लेकिन   कैफे का स्वाद लोगों की जुबान पर ऐसा चढ़ा कि उनसे अन्य लोग जुड़ते चले गए और देखते ही देखते  देश भर में टी-लॉजी कैफे के माध्यम से अजय व शुभम ने 100  आउटलेट खोल दिए। 2018 से अब तक  इंदौर के साथ ग्वालियर, बंगलूरू ,  अहमदाबाद, गांधीनगर, वडोदरा, भोपाल , देहरादून ,  मसूरी , ऋषिकेश , पंजाब , हैदराबाद , दिल्ली , फरीदाबाद  जैसे कई शहरों में   कंपनी के 100 आउटलेट  मुनाफा दिला रहे  हैं। कंपनी का व्यवसाय अब तेजी से अपने पैर पसार रहा है। 

वही काम वही करें जिससे मिले संतुष्टि

अजय पाटीदार कहते हैं पढ़ाई के बाद मैंने अपने कदम प्रॉपर्टी के व्यवसाय की दिशा में भी बढ़ाये लेकिन उसमें मुझे संतुष्टि नहीं मिल रही थी। इसके बाद मैंने स्टार्टअप की शुरुआत शुभम के साथ की। पहले तो हमने अपने घर वालों को इस बारे में कुछ  जानकारी नहीं दी लेकिन जब हमारा स्टार्ट -अप शुरू हो गया तो वे बहुत नाराज भी हुए। चाय के बिजनेस का नाम सुनकर उनको बुरा लगा लेकिन जब इसी चाय ने उनको शोहरत दिला दी तो वे सभी दिल से हमारे  आईडिया को पसंद करने लगे। 

अब विदेशी धरती में भी धूम मचाएगी चाय

 अजय और शुभम  कहते हैं अब उनका इरादा विदेशों में नए आउटलेट शुरू करने का है जिस पर फिलहाल काम चल रहा है।  कनाडा , अबूधाबी और दुबई में कुछ  दिनों में उनके आउटलेट्स  शुरू हो रहे हैं। साथ ही आस्ट्रेलिया , अमरीका और यूरोप के कई देशों में फ्रेंचाइजी के साथ उनकी बातचीत चल रही है। फ्रांस के प्रसिद्ध एफिल टावर के पास भी उनकी लोकेशन को लेकर बात चल रही है। बहुत जल्द  देश की  मिट्टी का स्वाद विदेशों में भी ले जाने के लिए दुबई और ऑस्ट्रेलिया में भी टी-लॉजी के आउटलेट शुरू करने की तैयारी हो गई है।

एक हजार  लोगों को दिया रोजगार

प्रत्येक आउटलेटस  के लिए औसतन 5  से 6 नए लोगों को काम का मौका मिलता है।  देश भर में स्थापित उनके 100 आउटलेटस से 600 से अधिक  युवाओं की आजीविका चल रही है । साथ ही 250 कुम्हार परिवारों को कुल्हड़ बनाने का  काम भी मिला है जिससे  पहले की तुलना उनकी आमदनी में कई गुना इजाफा हुआ है। हजारों लोगों की आजीविका उनके इस  आउटलेट्स  से आज चल रही है।  अजय कहते हैं किसी काम को शुरू करना तो आसान है लेकिन उसे अंजाम तक पहुँचाना मुश्किल।उन दोनों के साथ भी शुरुआत में यही हुआ लेकिन युवाओं के सहयोग से वह आज जिस  मुकाम पर पहुंचे हैं उसके लिए वो दोस्तों के आभारी हैं। 

सरकार युवाओं को सहयोग कर रही है

अजय और शुभम  कहते हैं शुरुआती वर्षों में लोग स्टार्ट अप को नहीं समझ पाते थे लेकिन अब धीरे -धीरे लोग इस व्यवसाय को समझ रहे हैं। देश भर में स्टार्ट अप में आज युवा रूचि ले रहे हैं। इनकी ग्रोथ को देखते हुए सरकार भी भरपूर सहयोग कर रही है। मध्य प्रदेश सरकार भी युवाओं के हितों के लिए लगातार  काम कर रही है। आज फ्रेंचाइजी पार्टनर्स भी हमसे सीधे जुड़ रहे हैं। सरकार का सहयोग सभी को मिल रहा है। 

सकारात्मक विचार के साथ युवा आगे आएं

अजय और शुभम  कहते हैं देश के युवाओं में कुछ अलग कर गुजरने की तमन्ना है।  इसके लिए सकारात्मक ऊर्जा के साथ आगे बढ़ने की जरूरत है। सरकार युवाओं को आगे बढ़ने और कुछ नया करने के लिए लगातार प्रेरित कर रही है। टी- लॉजी ऐसी ही नई  सोच के साथ आगे आया है और अपनी कामयाबी का शोर मचा रहा है। टी -लॉजी स्टार्ट-अप अगर आज विदेशों में भी अपने कदम बढ़ा रहा है तो इसका कारण सरकार का भरपूर सहयोग और प्रोत्साहन है। 

आज के दौर में धन कमाने के नए-नए तरीके खोज रहे लोगों के पास एक से बढ़कर एक स्टार्टअप के बहुत सारे  विचार हैं  लेकिन लीक से अलग हटकर चलते हुए  बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जो अपनी नई सोच के दम पर देश के लिए बेहतर  करना चाहते हैं। इंदौर  से  शुरू हुआ टी -लॉजी स्टार्ट-अप आज मध्य प्रदेश के साथ ही देश के युवाओं को प्रेरणा देने का काम  बखूबी कर रहा है। मध्यप्रदेश में साल 2016 में सिर्फ 7 डीपीआईआईटी से मान्यता प्राप्त स्टार्ट-अप थे।  आज प्रदेश सरकार की स्टार्ट-अप नीति और सहयोग से  1900 से अधिक डीपीआईआईटी से मान्यता प्राप्त स्टार्टअप हो चुके हैं।
 

Sunday, 6 February 2022

अलविदा 'स्वर कोकिला '


 


स्वर कोकिला  लता मंगेशकर आज सुबह हमसे  दूर चले गई। मुंबई के अस्पताल में सुबह उन्होनें अपनी अंतिम सांस ली ।  उनकी मखमली और जादुई आवाज की दुनिया दीवानी थी । उनकी आवाज़ दिल को छूती नहीं, बल्कि दिल में बस जाती थी, हर दिल अजीज लता मंगेशकर ने अपनी आवाज से हिंदी सिनेमा की गायकी में ऐसे चार चाँद लगाए कि हर कोई उनका मुरीद हुए बिना नहीं रह पाया । सही मायनों में  हिंदी सिनेमा की गायकी की दुनिया को लता ने अपने मधुर स्वर से नई दिशा देने का काम किया  । लता दीदी की वो आवाज हर किसी के  दिल के तारों को आज भी  झंकृत कर देती है । हिंदी सिनेमा के 100 बरस से अधिक के सफ़र में लता दीदी की गायकी सिल्वर स्क्रीन पर चार चाँद लगा देती है ।  ऐसी  आवाज हिन्दी फ़िल्म संगीत में हमेशा के लिए अमर रहेगी । 

लता मंगेशकर का जन्म 28 सितंबर 1929 को मध्यप्रदेश के इंदौर शहर में पंडित दीनानाथ मंगेशकर के मध्यवर्गीय परिवार में हुआ था। लता पांच भाई बहनों में सबसे बड़ी थी ।  लता मंगेशकर का जन्म के वक्त नाम 'हेमा' रखा गया था  लेकिन कुछ साल बाद अपने थिएटर के एक पात्र 'लतिका' के नाम पर, दीनानाथ जी ने उनका नाम 'लता' रखा ।

लता मंगेशकर के पिता पंडित दीनानाथ मंगेशकर एक क्लासिकल सिंगर और थिएटर आर्टिस्ट थे । लता की तीन बहनें मीना, आशा, उषा और एक भाई हृदयनाथ मंगेशकर थे । पांच साल की उम्र में ही लता जी ने अपने पिता से संगीत की शिक्षा लेनी शुरू कर दी थी और थिएटर में एक्टिंग किया करती थी । जब वो स्कूल गयी तो वहां के बच्चों को संगीत सिखाने लगी लेकिन जब लता जी को अपनी बहन 'आशा' को स्कूल लाने से मना किया गया तो उन्होंने स्कूल जाना छोड़ दिया ।
 
सुरों की मल्लिका लता मंगेशकर का भी बॉलीवुड में सफर इतना आसान नहीं था ।  काफी समय तक उन्हें कोई प्रोजेक्ट नहीं मिला । प्रोजेक्ट नहीं मिलने की दो वजहें थीं।  एक तो साल 1940 के दौर में जब उन्होंने फिल्मी दुनिया में एंट्री ली बॉलीवुड में नूर जहां और शमशाद का दबादबा था और दूसरा लता की आवाज़ की पिच काफी हाई थी और आवाज़ पतली, ऐसे में उस दौर के चलन में चल रहे गानों के मुताबिक आवाज भी फिट नहीं बैठती थी।  
 
प्रोड्यूसर सशधर मुखर्जी ने लता मंगेशकर की आवाज को 'पतली आवाज' कहकर अपनी फिल्म 'शहीद' में गाने से मना कर दिया था ।  फिर म्यूजिक डायरेक्टर गुलाम हैदर ने लता मंगेशकर को फिल्म 'मजबूर' में 'दिल मेरा तोडा, कहीं का ना छोड़ा' गीत गाने को कहा जो काफी सराहा गया । लता मंगेशकर के पिता नहीं चाहते थे कि वो फ़िल्मों के लिये गाने गाये लेकिन लता मंगेशकर बचपन से ही गायक बनना चाहती थीं।  लता ने वसंग जोगलेकर द्वारा निर्देशित एक फ़िल्म कीर्ती हसाल के लिये पहली बार गाना गाया था लेकिन उनके पिता नहीं चाहते थे कि लता फ़िल्मों के लिये गाये इसलिये इस गाने को फ़िल्म से निकाल दिया गया लेकिन वसंत जोगलेकर लता की प्रतिभा से काफी प्रभावित हुये। साल 1942 में उनके पिता इस दुनिया को छोड़ गए और लता मंगेशकर के कंधों पर परिवार को संभालने की सारी ज़िम्मेदारी आ गई ।
 
पिता की मौत के बाद लता को पैसों की बहुत किल्लत झेलनी पड़ी और काफी संघर्ष करना पड़ा ।  इसी वज़ह से लता मंगेशकर ने 1942 से लेकर 1948 तक करीब 8 हिंदी और मराठी फिल्मों में काम किया । 40 के दशक में लता मंगेशकर जब फिल्मों में गाना शुरू किया तो वो लोकल पकड़कर अपने घर मलाड जाती थी। वहां से उतरकर पैदल स्टूडियो बॉम्बे टॉकीज जाती। रास्ते में किशोर दा भी मिलते लेकिन वो एक दूसरे को नहीं पहचानते थे। किशोर कुमार लता मंगेशकर की ओर देखते रहते। कभी हंसते। कभी अपने हाथ में पकड़ी छड़ी घुमाते रहते। लता मंगेशकर को किशोर कुमार की ये हरकत अजीब लगती थी ।हिंदी सिनेमा में उन्होंने पहला गाना साल 1943 में गाया ।   ये गाना था फिल्म 'गजाभाऊ' का और इसके बोले थे माता एक सपूत की दुनिया बदल दे तू ।हालांकि इस गाने से लता को कुछ खास पहचान नहीं मिली ।  लता मंगेशकर खेमचंद प्रकाश की एक फिल्म में गाना गा रही थी। एक दिन किशोर दा भी उनके पीछे-पीछे स्टूडियो पहुंच गए। लता मंगेशकर ने किशोर कुमार की खेमचंद से शिकायत की। तब खेमचंद ने लता को बताया कि किशोर कुमार अशोक कुमार के छोटे भाई हैं।
 
1948 में म्यूज़िक कंपोज़र गुलाम हैदर ने लता के बड़ा ब्रेक दिया, जिसके बाद उनका संघर्ष का दौर खत्म हुआ और फिल्मी दुनिया में ऐसा सिक्का चला कि लोग उनकी आवाज के दीवाने हो गए । आज भी लता की गायकी सिल्वर स्क्रीन में चार चाँद लगा देती है |  फिल्म 'मजबूर' में लता मंगेशकर ने 'दिल मेरा तोड़ा मुझे कहीं का न छोड़ा' गाना गया । 1949 में उन्होंने फिल्म 'महल' में गाया उनका गाना 'आएगा आनेवाला' बेहद पसंद किया गया।  इसके बाद उन्होंने 'दुलारी', 'बरसात' और 'अंदाज़' में अपनी आवाज़ का जादू बिखेरा । चंद महीनों में ही लता के प्रति लोगों का नजरिया बदला और उन्होंने अपनी अलग पहचान बना ली और फिर इसके बाद उन्हें मुड़कर पीछे नहीं देखना पड़ा । लता मंगेशकर ने फिल्म इंडस्ट्री के सभी दिग्गज म्यूज़िक डायरेक्टर्स और सिंगर्स के साथ काम किया ।1942 से अब तक वो 1000 से भी ज्यादा हिंदी फिल्मों और 36 से भी ज्यादा भाषाओं में गाना गा चुकी हैं । लता मंगेशकर ने 1950 के दौर में कई सुपरहिट फिल्मों में अपनी रूहानी आवाज़ का जादू बिखेरकर सुनने वालों को सुकून पहुंचाया । लता मंगेशकर ने 1950 के दौर में कई सुपरहिट फिल्मों में अपनी रूहानी आवाज़ का जादू बिखेरकर सुनने वालों को सुकून पहुंचाया । उस दौरान उन्होंने बैजू बावरा, मदर इंडिया, देवदास और मधुमति जैसी हिट फिल्मों में गाने गाए. फिल्म 'मधुमति' के गाने 'आजा रे परदेसी' के लिए 1958 में लता मंगेशकर को पहला फिल्मफेयर मिला ।
 
60, 70 और 80 के दशक में गाए गए लता मंगेशकर के ज्यादातर गाने ऑल टाइम हिट्स की कैटगरी में आते हैं । कहा जाता है कि बड़े-बड़े प्रोड्यूसर्स, म्यूज़िक डायरेक्टर्स और एक्टर्स उनके साथ काम करने के लिए होड़ लगाया करते थे । साल 1977 में आई फिल्म 'किनारा' में लता मंगेशकर 'नाम गुम जायेगा, चेहरा ये बदल जायेगा, मेरी आवाज़ ही, पहचान है, गर याद रहे' गीत गाया । लता मंगेशकर की ये लाइनें उनके हर चाहने वाले को हमेशा याद रहेंगी । लता मंगेशकर ने 1950 के दौर में कई सुपरहिट फिल्मों में अपनी रूहानी आवाज़ का जादू बिखेरकर सुनने वालों को सुकून पहुंचाया । उस दौरान उन्होंने बैजू बावरा, मदर इंडिया, देवदास और मधुमति जैसी हिट फिल्मों में गाने गाए ।फिल्म 'मधुमति' के गाने 'आजा रे परदेसी' के लिए 1958 में लता मंगेशकर को पहला फिल्मफेयर मिला ।
 
 60, 70 और 80 के दशक में गाए गए लता मंगेशकर के ज्यादातर गाने ऑल टाइम हिट्स की कैटगरी में आते हैं । कहा जाता है कि बड़े-बड़े प्रोड्यूसर्स, म्यूज़िक डायरेक्टर्स और एक्टर्स उनके साथ काम करने के लिए होड़ लगाया करते थे । साल 1977 में आई फिल्म 'किनारा' में लता मंगेशकर 'नाम गुम जायेगा, चेहरा ये बदल जायेगा, मेरी आवाज़ ही, पहचान है, गर याद रहे' गीत गाया । लता मंगेशकर की ये लाइनें उनके हर चाहने वाले को हमेशा याद रहेंगी।उस दौरान उन्होंने बैजू बावरा, मदर इंडिया, देवदास और मधुमति जैसी हिट फिल्मों में गाने गाए । फिल्म 'मधुमति' के गाने 'आजा रे परदेसी' के लिए 1958 में लता मंगेशकर को पहला फिल्मफेयर मिला ।
 
  लता मंगेशकर को साल 2001 में 'भारत रत्न' से भी नवाजा गया था । लता दीदी को इसके पहले पद्म भूषण (1969), पद्म विभूषण(1999) और दादा साहब फाल्के अवार्ड (1989) पुरस्कार से भी नवाजा जा चुका है । सुर साम्राज्ञी के बर्थडे लता मंगेशकर ने ताउम्र शादी नहीं की । इसकी वजह बताते हुए वो कहती थी  कि पिता की मौत के बाद घर के सभी सदस्यों की जिम्मेदारी उन पर थी। ऐसे में कई बार शादी का ख्याल आता भी तो उस पर अमल नहीं कर सकती थी। बेहद कम उम्र में ही वो काम करने लगी थी। बहुत ज्यादा काम उनके पास रहता था। सोचा कि पहले सभी छोटे भाई बहनों को व्यवस्थित कर दूं। फिर कुछ सोचा जाएगा। फिर बहन की शादी हो गई। बच्चे हो गए। तो उन्हें संभालने की जिम्मेदारी आ गई। और इस तरह से वक्त निकलता चला गया।  
 
लता ही एकमात्र ऐसी जीवित व्यक्ति थी जिनके नाम से पुरस्कार दिए जाते हैं। कई राज्य सरकारें उनके नाम से पुरस्कार देती हैं । मध्यप्रदेश सरकार ने 1984 में लता मंगेशकर पुरस्कार शुरू किया। इस पुरस्कार के लिए चयनित कलाकारों को दो-दो लाख रूपए की राशि, सम्मान पट्टिका, शाल-श्रीफल से अलंकृत किया जाता है । राष्ट्रीय लता मंगेशकर सम्मान मध्य प्रदेश शासन के संस्कृति विभाग द्वारा विभिन्न कलाओं और साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए दिया जाता है। ‘लता मंगेशकर सम्मान’ ‘सुगम संगीत’ के लिए दिया जाने वाला राष्ट्रीय अलंकरण है।
 
1992 से शुरू होने वाले महाराष्ट्र सरकार द्वारा जारी एक लता मंगेशकर पुरस्कार भी है। यह आधिकारिक रूप से "जीवनकाल में उपलब्धि के लिए लता मंगेशकर पुरस्कार" के रूप में भी जाना जाता है। आंध्र प्रदेश सरकार द्वारा एक और पुरस्कार दिया जाता है। लता यूँ ही सबकी हर दिल अजीज नहीं थी।  


उन पुरस्कारों पर एक नज़र डालें जिनसे उन्हें सम्मानित किया गया था-

1959: सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायिका का फिल्मफेयर पुरस्कार (मधुमति)
1963: सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायिका का फिल्मफेयर पुरस्कार (बीस साल खराब)
1964-91: 15 बंगाल फिल्म पत्रकार संघ पुरस्कार
1966: सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायक (खानदान) के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार
1966: ‘आनंदघन’ नाम के तहत साध मानस (मराठी) के लिए सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक
1966: साध मनसा के लिए सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायिका
1969: पद्म भूषण
1970: सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायक का फिल्मफेयर पुरस्कार (जीने की राह)
1972: फिल्म परिचय के गीतों के लिए सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायिका का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार।
1974: वह रॉयल अल्बर्ट हॉल में प्रदर्शन करने वाली पहली भारतीय बनीं।
1974: लता मंगेशकर ने 1974 में गिनीज रिकॉर्ड में भारतीय संगीत के इतिहास में सबसे अधिक दर्ज की गई कलाकार होने का गौरव प्राप्त किया।
1974: फिल्म कोरा कागजी के गीतों के लिए सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायिका का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार
1977: जैत रे जैतो के लिए सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायक
1980: जॉर्ज टाउन, गुयाना, दक्षिण अमेरिका के शहर की प्रस्तुत कुंजी
1980: सूरीनाम गणराज्य, दक्षिण अमेरिका की मानद नागरिकता
1985: टोरंटो, ओंटारियो, कनाडा में उनके आगमन के सम्मान में 9 जून को एशिया दिवस के रूप में घोषित किया गया
1987: ह्यूस्टन, टेक्सास में संयुक्त राज्य अमेरिका की मानद नागरिकता
1989: लता मंगेशकर को 1989 में दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
1989: पद्म विभूषण
1990 – श्री राजा-लक्ष्मी फाउंडेशन, चेन्नई द्वारा राजा-लक्ष्मी पुरस्कार
1990: फिल्म लेकिन के गीतों के लिए सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायिका का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार।
1993: लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड
1994: फ़िल्मफ़ेयर विशेष पुरस्कार
1996: स्टार स्क्रीन लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड।
1996 – राजीव गांधी राष्ट्रीय सद्भावना पुरस्कार
1997: राजीव गांधी पुरस्कार
1997: महाराष्ट्र भूषण पुरस्कार
1998 – साउथ इंडियन एजुकेशनल सोसाइटी द्वारा लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड
1998: साउथ इंडियन एजुकेशनल सोसाइटी द्वारा लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड
1999: लाइफटाइम अचीवमेंट्स के लिए ज़ी सिने अवार्ड
1999: एनटीआर राष्ट्रीय पुरस्कार
2000: आईफा लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड
2001: हीरो होंडा और फ़ाइल पत्रिका “स्टारडस्ट” द्वारा मिलेनियम (महिला) की सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायिका
2001: उन्हें भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया।
2001: महाराष्ट्र रत्न (पहला प्राप्तकर्ता)
2002: आशा भोंसले पुरस्कार (प्रथम प्राप्तकर्ता)
2002: वर्ष के ‘स्वर रत्न’ के लिए सह्याद्री नवरत्न पुरस्कार।
2004: फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री द्वारा लिविंग लीजेंड अवार्ड
2004: फ़िल्मफ़ेयर विशेष पुरस्कार
2004: फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (फिक्की) द्वारा लिविंग लीजेंड अवार्ड।
2007: फ्रांस सरकार ने उन्हें 2007 में अपने सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार (ऑफिसर ऑफ द लीजन ऑफ ऑनर) से सम्मानित किया।
2008: लाइफटाइम अचीवमेंट के लिए वन टाइम अवार्ड
2009: एएनआर राष्ट्रीय पुरस्कार
2011: पुणे नगर निगम द्वारा स्वरभास्कर पुरस्कार (प्रथम प्राप्तकर्ता)
2019: भारत सरकार ने सितंबर 2019 में उनके 90वें जन्मदिन पर उन्हें डॉटर ऑफ द नेशन अवार्ड से सम्मानित किया

इसमें कोई दो राय नहीं दिल को छू जाने वाली आवाज की मलिका और भारतरत्न लता मंगेशकर ने भारतीय सिनेमा को संगीत के क्षेत्र में अतुलनीय योगदान दिया है। एक से बढ़कर एक सुपरहिट गाने देने वाली लता आज भी सभी सिंगर और सिंगिंग की दुनिया में करियर बनाने वालों के लिए आदर्श हैं।  आज भले ही वो हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी आवाज का जादू लम्बे समय तक भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में रंग भरता रहेगा । मेरी अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि ,शत शत नमन !


Saturday, 5 February 2022

खेती बनी वरदान, शिव के 'राज ' में मुस्कुराया अन्नदाता किसान

 





 मध्य प्रदेश की बड़ी आबादी आज भी गाँवों में बसती है जिसकी जीविका कृषि , पशुधन और कृषि से सम्बद्ध अन्य क्षेत्रों पर निर्भर है। जो कृषि आज प्रदेश में रोजगार का बड़ा माध्यम बनी है वो कृषि पिछली सरकारों में अनेक विसंगतियों का शिकार रही है। नीति नियंताओं की अदूरदर्शी नीतियां प्रदेश में किसानों पर बोझ बन गई थी जिसके चलते कृषि की तमाम समस्याओं का हल खोज पाने में हम कामयाब नहीं हो पाए।


राजनीति में किसानों के हर दुःख और दर्द में सहभागी बनने की कोई परंपरा भी देखने को नहीं मिलती लेकिन पिछले कुछ महीनों में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपनी पूरी सरकारी मशीनरी के साथ खेती की तमाम समस्याओं का निदान खोजने में लगे हैं ,वह अभूतपूर्व है। किसानों के दर्द के प्रति संवेदना जगाने का ये प्रयास मुख्यमंत्री अपने अंदाज में कर रहे हैं। खेती को लाभ का सौदा बनाने में की दिशा में वो शिद्दत के साथ जुटे हुए हैं। किसी भी मुख्यमंत्री द्वारा किसानों के दर्द में इस प्रकार के फैसले लेना एक बड़ी मिसाल है। मध्यप्रदेश ने 7 बार राष्ट्रीय स्तर पर कृषि कर्मण अवार्ड लेकर कृषि के क्षेत्र में अपनी शानदार उपलब्धियां हासिल कर पूरे देश में अपना मान बढ़ाया है । यह मुख्यमंत्री शिवराज की किसानों की समस्याओं के प्रति गहरी समझ और किसानों के प्रति संवेदनशीलता का ही परिचायक है कि वे दिन –रात किसानों के जीवन स्तर को ऊपर उठाने की दिशा में रहकर सारे प्रयास कर रहे हैं।


कोरोना काल की विषम चुनौतियों के बीच प्रदेश के मुखिया शिवराज ने किसानों के चेहरों पर  सही मायनों में  मुस्कुराहट लाने का काम किया है। किसान पुत्र मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की कृषि को लेकर दिखाई गई विशेष दिलचस्पी के चलते आज प्रदेश का किसान जहां खुशहाल नजर आता है वहीं उसे फसलों का सही मूल्य भी मिल रहा है। बीते साल कोविड कोरोना लॉकडाउन के कारण प्रदेश की अर्थव्यवस्था की स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी। किसानों की फसलों को समर्थन मूल्य पर खरीदना बहुत बड़ी चुनौती थी। कोरोना संक्रमण उस समय चरम पर था। दिन पर दिन कोरोना के  केस बढ़ते जा रहे थे, ऐसे में कोरोना से बीच बचाव करते हुए फसलें खरीद लेने और उन्हें मंडी तक लाने की विकराल चुनौती सरकार के सामने खड़ी थी। ऐसी विषम परिस्थितियों में भी मुख्यमंत्री ने किसानों के साथ खड़ा होकर उन्हें सरकार का समर्थन दिलवाया ।


एक ओर किसानों के  ट्रैक्टर , फसल कटाई, , हार्वेस्टर, कृषि उपकरणों के सुधार  आदि की  पहल सरकार द्वारा  की गई वहीं हर दिन किसानों को एस.एम.एस भिजवाकर खरीदी केंद्रों पर सोशल डिस्टेंसिंग, सेनेटाईजेशन आदि करवाकर समर्थन मूल्य पर खरीदी का कार्य शुरू किया गया। इतनी विषम परिस्थिति में भी मध्यप्रदेश ने गेहूं का ऑलटाइम रिकार्ड उपार्जन किया। मध्यप्रदेश ने पंजाब जैसे कृषि प्रधान राज्य को भी गेहूं खरीदी में पीछे छोड़ दिया। प्रदेश में एक करोड़ 29 लाख 34 हजार 500 मीट्रिक टन गेहूं की खरीदी 16 लाख किसानों से की गई और  उन्हें करीब 24 हजार करोड़ रूपये का भुगतान किया गया। किसानों के लिए सरकार ने शून्य प्रतिशत ब्याज पर ऋण उपलब्ध कराने की सुविधा प्रारंभ कराई । साथ ही पिछले वर्षों की फसल बीमा की लगभग 2990 करोड़ रुपये की राशि किसानों के खातों में अंतरित की गई।किसानों को उनकी उपज का अधिकतम मूल्य दिलाए जाने के लिए मंडी अधिनियम में संशोधन किया गया, जिससे किसानों को मंडी और सौदा पत्रक के माध्यम से अपनी फसल बेचने की सुविधा दी गई । राज्य में किसान उत्पादक संगठन  को स्व-सहायता समूहों की तरह सशक्त बनाने की भी तैयारी भी उनके द्वारा की गई। गरीब तबके को हर प्रकार की सहायता देने के लिए संबल योजना पुन: प्रारंभ की गई जो आज गरीबों का सुरक्षा कवच बनकर सामने आई है।


किसान हितैषी मुख्यमंत्री के प्रयासों से प्रदेश के किसान का डंका आज पूरे देश में बज रहा है । 1 करोड़ 29 लाख मीट्रिक टन गेहूं का उपार्जन कर प्रदेश का किसान आज उत्पादन के मामले में मध्य प्रदेश, हरित क्रांति के अगुवा राज्य पंजाब को पीछे छोड़ चुका है वहीं कोविड के दौर में 5.11 लाख हेक्टेयर मूंग, उड़द और धान आदि की बोवनी करा चुका है। इसी दौरान  मूंग के  5.76 लाख मीट्रिक टन उत्पादन और किसानों को दी मंडियों के बाहर सौदा पत्रक से उपज बेचने की सुविधा भी दी गयी जिसके परिणाम बेहतरीन रहे हैं । समर्थन मूल्य पर उपार्जन हेतु एक दिन में किसान से खरीदी की अधिकतम सीमा 25 क्विटंल को समाप्त कर असीमित खरीदा जाना भी  शिवराज सरकार की एक बड़ी उपलब्धि रही है । एक ही बार में पूरी उपज का सौदा  होने से किसान के  समय और धन दोनों की हुई बचत हो रही है और उसे बेवजह  मंडियों के चक्कर नहीं काटने पड़ रहे हैं । पिछले साल अतिवृष्टि और कीट प्रकोपों से जब प्रदेश प्रभावित हुआ तो सरकार द्वारा राहत राशि के रूप में 3 हजार 500 करोड़ रुपये की सहायता किसानों को दे गई। सरकार ने सहकारी बैंकों की सेहत में सुधार के लिए 800 करोड़ की सहायता भी दी। प्रधानमन्त्री किसान सम्मान निधि , प्रधान मंत्री फसल बीमा योजना , किसान क्रेडिट कार्ड योजना को प्रदेश में बेहतरीन ढंग से लागू किया गया है ।प्रधानमंत्री किसान कल्याण योजना के माध्यम से अब तक 111 हजार 889 करोड़ रु का भुगतान किसानों को किया जा चुका है।  शून्य ब्याज दर पर ऋण देने वाले प्रदेशों में आज  मध्य प्रदेश का नाम शुमार हुआ है । अब तक 26000 करोड़ से अधिक का ऋण किसानों को दिया गया है ।  


 किसानों के प्रति मुख्यमंत्री की दूरगामी नीतियों का असर ही रहा, उनके रहते प्रदेश में हर स्तर पर किसानों की समस्याओं को सुना गया और विभिन्न फसलों के बीज की उपलब्धता सुनिश्चित करने और पहली बार प्रदेश में किसानों की विभाग से संबंधित समस्याओं के निराकरण के लिये 'कमल सुविधा केंद्र'  की स्थापना सुनिश्चित की गयी  जहां पर  शिकायतों का  त्वरित निराकरण हुआ।  अब तक कई हजार समस्याओं का निराकरण बेहद कम समय में पूरा हुआ है। प्रधानमंत्री मोदी के मार्गदर्शन में केन बेतवा परियोजना का निर्माण शुरू हुआ है।  ये परियोजना प्रदेश में सिंचाई व्यवस्था को मजबूत बनाने का काम भविष्य में करेगी।  आज भी कृषि के क्षेत्र में एग्रीकल्चर इन्फ्रास्टेक्चर फंड परियोजना के माध्यम से कृषि में बुनियादी सुधारों को अमली जामा पहनाया जा रहा है। 150 नए ऍफ़.पी. ओ के गठन से प्रदेश में किसानों के लिए नई लकीर खींचने की कोशिशें शुरू हुई हैं। आज प्रदेश में कृषि विकास दर जहाँ दहाई के अंक में पहुँच चुकी है वहीँ प्रदेश का कुल कृषि उत्पादन बढ़कर 6 करोड़ मीट्रिक टन पार कर चुका है। पिछले 17 बरस में सिंचित क्षेत्र भी 42 लाख हेक्टेयर तक पहुँच गया है ।  इस दौर में प्रदेश सरकार ने किसानों को बिजली के कनेक्शन देने के लिए 20 हजार करोड़ रुपये से अधिक का अनुदान भी दिया है ।    


शिवराज सरकार का एकमात्र संकल्प प्रदेश के किसानों की समृद्धि है ।  इसी को ध्यान में रखते हुए वर्ष 2018 में 9.51 लाख किसानों को खरीफ का 1987.27 करोड़ रु. वर्ष 2018-19 में 8.94 लाख किसानों को रबी का 1241 करोड़ रु.,  खरीफ 2019 का 24.54 लाख किसानों को 5,531  करोड़ रुपये की बीमा राशि का भुगतान कराया गया। इस प्रकार कुल  44 लाख किसानों को 8,891 करोड़ रु. की राशि का भुगतान बीमा कंपनियों द्वारा कराया गया। कोरोना के बढ़ते संक्रमण को देखते  हुए खरीफ वर्ष 2020-21 के लिए फसल बीमा की अंतिम तारीख 31 जुलाई के स्थान पर  पिछले साल एक माह बढ़ाकर 31 अगस्त की गई । बाढ़ प्रभावित पांच जिलों के लिए तारीख आगे बढ़ाकर 7 सितंबर तक  की गई जिससे प्रदेश में खरीफ फसल के लिए 44 लाख 53 हजार से ज्यादा किसानों ने बीमा पंजीयन कराया।प्रदेश में मूंग फसल क्षेत्र 2021 में बढ़कर 8.35 हेक्टेयर पहुँच चुका है जिसमें पिछले साल के मुकाबले दुगनी वृद्धि हुई है ।


भारत सरकार द्वारा माह दिसम्वर 2018 से प्रधानमंत्री किसान सम्मान  निधि योजना प्रारंभ की गई जिसमें  प्रतिवर्ष कृषकों को एक वर्ष में तीन समान किश्तों  में कुल राशि 6 हजार का भुगतान किया जाता है। इस योजना अंतर्गत  अब तक प्रदेश में 81 लाख 49 हजार  किसानों को 1492  करोड़ रूपये की राशि का वितरण किया गया है। मुख्य्मंत्री किसान कल्याण योजना प्रदेश में  22 सितम्वर 2020 से  शुरू हुई जिसके तहत वित्तीय वर्ष में 2 समान किश्तों  में पात्र किसानों को 4 हजार रूपये का भुगतान किया जाता है। मुख्यमंत्री किसान कल्याण योजना के अंतर्गत 2020-21 में जहाँ 74 लाख 50 हजार किसानों के खातों में लगभग 1 हजार 492 करोड़ रुपये की राशि का भुगतान किया गया है वहीँ 2021-22 के लिए पहली किश्त के रूप में 75 लाख किसानों को 1 हजार 500 करोड़ रुपये वितरित किये जा चुके हैं। वर्ष 2021-22 में प्रस्तु त बजट में मुख्यमंत्री किसान कल्यानण योजना अंतर्गत 3200.00 करोड़ रूपये राशि का प्रावधान किया गया है।   इसी प्रकार वन ग्रामों को राजस्व ग्राम में शामिल कराकर वन अधिकार पट्टेधारियों को फसल बीमा योजना का लाभ दिलाया गया है। पूर्व में सरसों का उपार्जन 13 क्विंटल प्रति हेक्टेयर के मान से तथा चना का उपार्जन 15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर . के मान से किया जा रहा था, जिसे बढ़ाकर प्रदेश सरकार के द्वारा 'जितना उत्पादन-उतना उपार्जन' के मान से 20-20  क्विंटल   प्रति हेक्टेयर तक चना तथा सरसों की उपार्जन मात्रा नियत  किया गया। इससे चना एवं सरसों उत्पादक किसानों को अपनी उपज के बेहतर मूल्य प्राप्त हुए हैं। समर्थन मूल्य पर उपार्जन हेतु एक दिन में एक किसान से खरीदी की अधिकतम सीमा 25 क्विंटल को समाप्त कर असीमित  पंजीयन अनुसार एक साथ असीमित खरीदा जाना निश्चित किया गया जिससे किसान  के धन और समय की एक साथ बचत हुई है। बीज ग्राम कार्यक्रम किसानों को नई किस्मों के बीज दिलाने के लिए भारत सरकार  के सहयोग से चलाया जा रहा है । 2021-22 में रबी की फसल हेतु मसूर, सरसों , अलसी बीज का मिनी किट बीज का वितरण  प्रदेश में निशुल्क किया जा रहा है । मोटे अनाजों के मूल्य संवर्धन हेतु अनुसूचित जनजाति क्षेत्रों के लिए मिलेट मिशन योजना चलाई जा रही है जिससे किसानों की आय निश्चित रूप से बढ़ेगी ।कृषि अधोसंरचना निधि के अंतर्गत वर्ष 2020-21 में  प्रदेश को 7500 करोड़ रूपये का आवंटन प्राप्त हुआ है। इसका उपयोग आधुनिक मंडियों की स्थापना, फूड पार्क, शीत गृहों की श्रृंखला स्थापित करने के साथ-साथ साइलोस एवं वेयर हाउस के निर्माण में किया जाएगा । रबी विपणन बर्ष 2021-22 हेतु चना, मसूर, सरसों का उपार्जन गेहूं के उपार्जन से पहले किए जाने का निर्णय भी प्रदेश सरकार के द्वारा किया गया ।


प्रदेश के सभी 52 जिलों में भूमि के भू अभिलेख आनलाइन प्रदान करने की सुविधा भी प्रदेश सरकार ने शुरू की है। प्रदेश में कोर्स तकनीक के माध्यम से किसी भी मौसम में सटीकता के साथ सर्वेक्षण और सीमांकन करने की सुविधा भी दी गई है । नए सीमांक एप के माध्यम से स्मार्टफोन के माध्यम से भूखंड को नापकर राजस्व अभिलेख के माध्यम से उसका मिलान किया जा सकता है । इस एप की प्रदेश में लोकप्रियता अपने चरम पर है ।केंद्र सरकार के द्वारा देश के समस्त किसानों के लिए वन स्टाप पोर्टल का निर्माण किया गया है । इसी तर्ज पर प्रदेश सरकार ने किसानों को एकल खिड़की उपलब्ध कराई है, जहाँ सभी समस्याओं का समाधान निकालने की कोशिशे हो रही हैं । साथ ही सरकारी प्रयासों की निगरानी के लिए एक पारदर्शी निगरानी तंत्र की व्यवस्था सरकार ने सुनिश्चित की है  सरकारी नीतियों को लागू करते समय किसानों की राय को भी लिया जाता है जिसके चलते अन्नदाताओं की तमाम समस्याओं का बेहतर निदान किया जा सका है। सरकारी नीतियों का निर्माण लोक मंगल की भावनाओं के साथ किया जा चाहिए। अच्छी बात ये है मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपने इस कार्यकाल में किसानों के हितों के लिए बड़े फैसले लेने से नहीं हिचकिचा रहे हैं और उनकी प्राथमिकताओं के केंद्र में सत्ता सँभालने के पहले दिन से ही प्रदेश के किसान हैं ।

 प्रदेश सरकार की इस उपलब्धि में किसानों की अथक मेहनत के साथ ही कृषि मंत्री  कमल पटेल ने भी किसानों के हित में हर वो जतन किया है जिससे किसानों की आर्थिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त हो। इन्ही प्रयासों से तरक्की और उन्नति की नई इबारत मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व वाली सरकार की ओर से किसानों के हित में चलाई जा रही योजनाएँ प्रदेश के करोड़ों किसानों की आँखों में खुशी , जिंदगी में खुशहाली की गारंटी हैं । मुख्यमंत्री शिवराज खुद किसान हैं लिहाजा उनके पास किसानों का ऐसा सुरक्षा कवच है जो दशकों से बिचौलियों के चंगुल में फंसे किसानों को आजादी दिलाने में मील का पत्थर साबित होंगे । आज राज्य में खेती का रकबा जहाँ बढ़ा है वहीँ किसानों को सिंचाई की बेहतर सुविधाएं भी मिल रही हैं।  पहले की अपेक्षा उन्हें आज 24 घंटे बिजली पूरे प्रदेश में मिल रही है।

मध्यप्रदेश के अन्नदाता का मान  शिवराज सरकार के आने से बढ़ा है। आज मध्यप्रदेश अनाज के उत्पादन में सर्वश्रेष्ठ राज्य बन गया है । वैसे भी शिवराज सिंह चौहान किसानों के प्रति सदैव संवेदना से भरे रहे हैं। वे खुद को भी किसान परिवार का बेटा बताने में पीछे नहीं रहे हैं। अन्नदाता की हर समस्या को लेकर वो पूरी सक्रियता से काम को अंजाम तक पंहुचा रहे हैं । किसानों को  कोई कष्ट न हो इसके लिए  उनकी सरकारी मशीनरी हर समय तत्पर रहती है पिछले साल सत्ता में आते ही उन्होंने जिस तरह ताबड़तोड़ फैसले  किसान हित में लिए हैं उसने यह साबित किया कि वे मुश्किल समय में अपना धैर्य नहीं खोते मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान  की यही पहचान अन्य नेताओं से उनको अलग करती है । मुख्यमंत्री शिवराज किसान हितैषी सी एम के तौर पर पूरे देश में जाने जाते हैं। राज्य को कृषि क्षेत्र में  नित ऊंचाईयों पर ले जाने का श्रेय निश्चित ही उन्हें जाता है।   


Monday, 20 December 2021

लोगों से कई बार भूल और चूक हो जाती है - मयूख महर

 

        


 

मयूख महर की छवि पिथौरागढ़ विधान सभा क्षेत्र में चहुंमुखी विकास करने वाले नेता की बनी है। जिला पंचायत अध्यक्ष के अपने कार्यकाल में मयूख महर ने गाँव- गाँव तक विकास की किरण पहुंचाई। वह परिसीमन से पूर्व जिले की कनालीछीना विधानसभा सीट का भी प्रतिनिधित्व कर चुके हैं,  जहां उन्होनें उत्तराखंड क्रांति दल के दिग्गज नेता काशी सिंह ऐरी को पटखनी दी । 2012 के विधान सभा चुनावों में उन्होनें पिथौरागढ़ सीट से भाजपा नेता स्वर्गीय प्रकाश पंत को पराजित कर अपनी धमक राजधानी देहरादून में दिखा दी । अपने इस कार्यकाल में मयूख महर ने अपनी विकास की नई सोच के साथ  पिथौरागढ़ की तस्वीर बदलने का काम किया जिसे जनता ने भी खासा सराहा  लेकिन  मेगा  विकास कार्यों को अंजाम दिये जाने के बाद भी उत्तराखंड के पिछले विधानसभा चुनावों में मयूख महर को हार का सामना करना पड़ा । चुनावों के दौरान माहौल तो पूरी तरह से उनके पक्ष में था लेकिन कुछ दिन पहले हुई प्रधानमंत्री मोदी की सभा ने पूरी चुनावी बाजी को  पलट कर रख दिया। घुमा फिराकर बात करना उनके अंदाज में शुरुवात से शामिल नहीं रहा है। वह सिर्फ और सिर्फ अपने काम पर फोकस रखते हैं और प्रचार- प्रसार से खुद को दूर रखते हैं। अपने संसाधनों से कई बार वो विकास कार्यों को अंजाम देने में पीछे नहीं रहते हैं।  मयूख  महर की काम करने की शैली अन्य जनप्रतिनिधियों से अलहदा रही है । जनता के हर दर्द में सहभागी बनते हैं और उनकी समस्याओं का त्वरित समाधान भी करते हैं ।

  स्वर्गीय प्रकाश  पंत की मृत्यु के बाद 2019 में जब इस सीट पर उपचुनाव हुआ तो मयूख महर ने काँग्रेस का प्रत्याशी बनने से साफ इंकार कर दिया लेकिन 2022 के चुनाव में मयूख महर पिथौरागढ़ सीट से काँग्रेस के मजबूत प्रत्याशी हैं । इस बार रण कुछ अलग होगा । कुछ इसी अंदाज में नई थीम के साथ मयूख इस बार 2022 की चुनावी पिच पर बैटिंग करने के लिए तैयार हैं। काँग्रेस के लिए मयूख महर की क्या अहमियत है ये इस बात से समझा जा सकता है काँग्रेस महासचिव  हरीश रावत ने इस बार उन्हें जिले की चारों विधान सभा सीटें जिताने की बड़ी ज़िम्मेदारी सौंपी है । मयूख महर को आगे कर काँग्रेस पार्टी के कार्यकर्ताओं में न केवल जोश भरना चाह रही है बल्कि जिले की सभी सीटें अपने खाते में डालने की तैयारी में है । मयूख महर अपने बेबाक अंदाज के कारण जाने जाते हैं । हर्षवर्धन पाण्डे के साथ हुई विशेष बातचीत में उन्होनें आगामी चुनावों, काँग्रेस की भूमिका , पिथौरागढ़ विधानसभा सीट पर अपने कार्यकाल में किए गए कामों जैसे कई विषयों पर खुलकर अपनी राय को रखा है । 

प्रस्तुत है इस बातचीत के मुख्य अंश :  

 

 उत्तराखंड राज्य का गठन हुए 21 बरस से अधिक का समय बीत चुका है शहीदों के सपनों का उत्तराखंड आज तक नहीं बन पाया है। आप कनालीछीना और पिथौरागढ़ विधान सभा सीटों का प्रतिनिधित्व एक दौर में कर चुके हैं । 2 बार के विधायक रह चुके हैं । एक अनुभवी नेता के तौर पर इस सफर को आप कैसे देखते हैं ?

  अब तक राज्य का 21 साल का सफर बड़ा कांटो भरा सफर है । जिन मुद्दों को लेकर ये राज्य बना था उसमें बहुत सारे लोगों ने शहादत दी थी,  वो सपने आज तक पूरे नहीं हो पाये हैं । बाकी पहाड़ी राज्य के सपने को हम कहीं से कहीं तक लागू नहीं कर पाये हैं । न हम पहाड़ में अपनी राजधानी बना पाये हैं , न ही हम अपनी मातृभाषा कुमाऊनी और गढ़वाली को एक मान्यता दे पाये हैं , न ही पहाड़ के दूरस्थ क्षेत्रों में बसने वाले उन लोगों को जिन्होनें विकास  को अब तक देखा ही नहीं हैउन तक विकास की किरण पहुंचा पाये हैं और हमारे यहाँ जो शिक्षा व्यवस्था का हाल है वो किसी  से छुपा नहीं है। मैं तो ये मानूँगा कि 21 साल सारी राजनीतिक पार्टियों का ये घालमेल था जो इन्होनें अपने राजनीतिक स्वार्थों के लिए 21 साल  तक इसका प्रयोग किया । इस दौर में पार्टियां जरूर मोटी हुई हैं , मजबूत हुई हैं लेकिन जनता लुटी की लुटी रह गई हैं ।

 हाल के बरसों में ये राज्य मुख्यमंत्री उत्पादक प्रदेश बनकर रह गया है। चाहे भाजपा हो या आपकी पार्टी काँग्रेस , दोनों के हालात एक जैसे हैं। मुख्यमंत्री की संख्या  भले ही आपकी पार्टी  में भाजपा से कम है लेकिन बार बार मुख्यमंत्री बदलने से तो विकास कार्य प्रभावित होते हैं ?

सीएम बदलने का जो पैटर्न देश में चल चुका है वैसे तो ये पूरे देश में चल रहा है लेकिन अपने उत्तराखंड में ये तो ज्यादा हो गया है। कर्नाटक में गुजरात में तीन सीएम  बदले गए हैं । यहाँ पर भी 3 सीएम बदल गए हैं लेकिन ये जो पैटर्न चल रहा है इससे निश्चित ही नुकसान होता है । चूंकि सीएम विकास करने के लिए ही बनता है न कि अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए बनता है उसका दुष्परिणाम प्रदेश की जनता को झेलना पड़ता है। चूंकि पाँच साल चुने जाने वाले जनप्रतिनिधि वो अपने को स्थापित करने के लिए चाहे मंत्री के रूप में हों , या सीएम के रूप में उसी लड़ाई में लड़ते रहते हैंजनता की ओर उनका ध्यान नही होता है । जनता के संसाधनों का उसमें दुरुपयोग किया जाता है । निश्चित रूप से मैं जो बात आपसे कर रहा हूँ आप बखूबी समझ ही रहे हैं। तो ये सी एम बदलने का जो पैटर्न चला है उससे भी हमारे राज्य को बहुत नुकसान हुआ है। इसमें राजनीतिक पार्टियां जो बीते 21 सालों से यहाँ  पर राज कर रही हैं दोनों उतना ही दोषी भी हैं। किसी एक पार्टी को हम इसका दोषी नहीं मान सकते । तो ये प्रथा अब राज्य में बदलनी चाहिए। अब जनता को ये सोचना चाहिए और सोच समझकर ही वोट करना चाहिए क्योंकि कुछ लोगों ने ऐसा माहौल बना दिया है ये राजनीति उनकी बपौती है। वो राजनीति में हमेशा चिरायु रहेंगे और जब तक जनप्रतिनिधि को जनता उठाती नहीं बैठाती है तब तक उसमें कोई परिवर्तन नहीं आता क्योंकि जब तक वो हारेगा नहीं तब तक काम नहीं करेगा क्योंकि वो तो ये सोचता है मैं तो जीतकर आया हूँ मुझे अब काम करने की क्या जरूरत है ।  किन तरीकों से वो जीतता है वो किसी से छिपा नहीं है और वो जीतता है ।  

लूट- खसोट और भ्रष्टाचार इस राज्य का पर्याय बन चुका है। भाजपा सत्ता में आती है तो वो कहती है हम काँग्रेस के 56 घोटालों की जांच कराएंगे।  काँग्रेस सत्ता में आती है तो वो भी भाजपा के घोटालों की जांच की बात कहती हुई दिखाई देती है लेकिन लोकायुक्त के मसले पर सत्ता में आने के बाद मामला आगे नहीं बढ़ पाता । भाजपा ने पिछले चुनाव में सत्ता में आने पर 100 दिन में लोकायुक्त लाने का वादा किया था लेकिन अब तक ये ठंडे बस्ते में है। आपकी काँग्रेस की  सरकार भी इस पर आगे नहीं बढ़ पायी ?  ऐसा क्यों ?

लोकायुक्त ऐसा नाम है जो पूरे देश को ढकने के लिए यूज किया जाता है। जनता की भावनाओं को भड़काने के लिए और उनको वेवकूफ बनाने के लिए लोकायुक्त शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। आप जरा देखिये केंद्र में कोई लोकायुक्त नहीं है। अन्ना हज़ारे कहते थे लोकायुक्त आना चाहिए लेकिन लोकायुक्त नहीं आया और इस प्रदेश में भी लोकायुक्त की बातें कभी धरातल में आई ही नहीं । जो आया भी वो कठपुतली टाइप व्यक्ति आया और उसने क्या किया जनता को ये कुछ पता नहीं चल पाया और जहां तक भ्रष्टाचार का मसला है चाहे काँग्रेस हो या भाजपा एक मुहावरा है चोर चोर मौसरे भाई उससे ही बहुत कुछ साफ हो जाता है ।

पलायन पहाड़ों में एक बड़ा मसला है। कोविड काल में कई प्रवासी अपने गांवों में आए लेकिन यहाँ ज़मीनें औने पौने दामों में बिक चुकी हैं। विकास की चमक मैदानों में नजर आती है पहाड़ों में वही हाल है जो यूपी में हुआ करता था। शिक्षा , स्वास्थ्य , पेयजल जैसी समस्याओ के लिए जनता तरस रही है ?

आज हमारा युवा जो यहाँ का मूल निवासी है उसके पास अपनी छोटी जमीन है , आज पहाड़ में कोई ऐसा नहीं होगा जिसके पास कुछ जमीन न हो, कच्चा पक्का मकान न हो, एक तोला सोना न हो। आप उसे उतना गरीब नहीं कह सकते,  यहाँ के संसाधनों से अपना घर न चला सके । आज हमारा युवा मैदानी इलाकों में जाकर होटलों में बर्तन धोना पसंद करता है । अपने पुश्तैनी खेत को जोतना , बगीचों को चलना पसंद नहीं करता। घरों में रहना पसंद नहीं करता तो इसका दोषी उतना ही है जितना हमारी सरकारें । हम लोगों की मानसिकता को नहीं बदल पाये हैं तो वे भी उतना ही दोषी हैं क्योंकि हम पाने पहाड़ों को छोड़कर जा रहे हैं , खेती को छोड़ रहे हैं , वीरान बंजर ज़मीनें छोड़ रहे हैं। हम आरोप लगाते हैं जंगली जानवर खेतों को नष्ट कर दे रहे हैं।फसलों को नुकसान पहुंचा रहे हैं पर हम अपनी थाती को छोड़कर जाएंगे तो उसके दुष्परिणाम तो भुगतने ही पड़ेंगे। आज हमको मैदानी इलाकों में बर्तन धोने तक की सुविधा नहीं मिल पा रही है । कोविड आया तो अंत में हम उसी जगह शरण लेने को मजबूर हुए ज्सिकों छोड़कर हम गए थे । जो हमारी सबसे बड़ी चूक है । हम अपनी पुश्तैनी थाती को छोड़कर जा रहे हैं जिसके दुष्परिणाम हमें भोगने पड़ेंगे ।

क्या इस बार के चुनाव में काँग्रेस पूरी मजबूती से एकजुट होकर  चुनाव लड़ेगी ? काँग्रेस के बारे में कहा जाता है अपने ही काँग्रेस को हराते हैं। राज्य में विकास पुरुष स्वर्गीय तिवारी जी के दौर से ही काँग्रेस में गुटबाजी का दौर देखने को मिला है। आपको क्या लगता है क्या काँग्रेस अभी संक्रमण काल से गुजर रही है ?

काँग्रेस संक्रमण काल से गुजर रही है ये आप राष्ट्रीय परिपेक्ष्य में कह सकते हैं लेकिन उत्तराखंड में पार्टी साख के दौर से गुजर रही है आज हमारी पार्टी में नेता चुनाव जीतने के बजाय खुद को सीएम के रूप में प्रोजेक्ट करने में लगे हुए हैं जहां हर आदमी मंत्री बनना चाहेगा तो उस पार्टी का बंटाधार तो होना ही है और काँग्रेस उस दौर को खत्म कर दे तो प्रदेश में भारी बहुमत से अपनी सरकार बना लेगी।  इस प्रदेश को एक अच्छा नेतृत्व देगी , ऐसा मेरा मानना है क्योंकि पिछले 5 साल डबल इंजन सरकार ने कुछ काम इस प्रदेश में नहीं किया है । तीन  सीएम बदले जा चुके हैं । प्रचंड बहुमत और 57 विधायक होने के बाद भी ये ताजुब्ब करने वाली बात है । ऐसा काम को भाजपाई ही कर सकते हैं । ये प्रदेश अब किस स्थिति में जा रहा है जनता समझ रही है । जनता फिर से सत्ता में काँग्रेस पार्टी को देखना चाहती है । हमारी पार्टी के बड़े नेता जो स्वार्थवश अपने को बड़े पद की दौड़ में रखे हुए हैं वो इस स्थिति को बिगाड़ भी सकते हैं,  ऐसा मेरा मानना है ।

आप लंबे समय से काँग्रेस पार्टी से जुड़े हुए हैं । व्यक्तिगत रूप से आज आपसे जानना चाहूँगा 2016 में प्रदेश काँग्रेस में जो बड़ी टूट हुई उसके बाद कहीं न कहीं काँग्रेस राज्य में कमजोर हुई है ? कहीं ना कहीं जो जान फूंकने की जो कोशिशें होनी चाहिए थी वो नहीं हुई और विपक्ष की भूमिका तो हरीश रावत निभा रहे हैं । साढ़े चार साल तक वो धरना प्रदर्शन कर रहे थे । लोकतन्त्र में पक्ष के साथ विपक्ष की भूमिका भी जरूरी है

मुझे नहीं लगता 2016 की टूट के बाद से काँग्रेस राज्य में कहीं कमजोर हुई है क्योंकि आज भी काँग्रेस का बड़ा जनाधार है और ये जनाधार दो या चार साल का नहीं है । ये एक लंबी शताब्दी की मेहनत के बाद जनाधार बना है । आज भी हम जैसे नेता भी इसी जनाधार के बूते खड़े हुए हैं ।  काँग्रेस का एक कैडर वोट है। अगर आप कह रहे हैं 2016 में जो नेता काँग्रेस छोड़कर गए उनके जाने से पार्टी कमजोर हुई है तो अगर वो वापस आ गए तो काँग्रेस मजबूत होगी ।  मुझे तो ये लगता है उनके जाने से न फर्क पड़ा है न आने से फर्क पड़ेगा ।  

जो चेहरे शुरुवात में बाहर गए क्या वे फिर से काँग्रेस में वापस आएंगे ?

शुरुवात हो चुकी है आप देख ही रहे हैं । एक महीने में वो दो चार औरों को भी बटोर कर ले आएंगे ।  

पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने कुछ महीने पहले बयान दिया था कुछ समय बाद राज्य में तेजी से परिस्थितियाँ बदलेंगी ? क्या लग रहा है आपको वो तो ये भी कह रहे हैं काँग्रेस के कई चेहरे भाजपा में आने की तैयारी कर रहे हैं । 

आप मुझे एक बात बताइये विजय बहुगुणा जी ने कहा 10-15 दिन में क्या होगा आप देखिये ।  10-15 दिन में तो वे भी काँग्रेस जॉइन कर सकते हैं। उसका एक मतलब तो ये भी निकाला जा सकता है। अगर आप देख रहे हैं काँग्रेस टूटेगी और भाजपा से जुड़ेगी तो भाजपा से भी टूटकर कई कांग्रेस में आयंगे इसका ये मतलब भी निकाला जा सकता है। ये जो घुमावदार बातें बहुगुणा जी ने कही हैं उसका कोई विश्वास मायने नहीं रखता ।

आप काँग्रेस की चुनावी कोर कमेटी से भी जुड़े हुए हैं। तो क्या किसी चेहरे को आगे करके पार्टी को ये आगामी चुनाव लड़ना चाहिए । भाजपा को सीएम के रूप में पुष्कर धामी को प्रोजेक्ट कर चुकी है लेकिन काँग्रेस ने अपना चेहरा अभी तक नहीं दिया है । मैदान में जाने से पहले कोई न कोई चेहरा तो देना ही होगा ? राष्ट्रीय स्तर पर परिस्थितियाँ अलग हैं लेकिन राज्य में किसी न किसी चेहरे के साथ तो आगे जाना ही होगा ?

जहां तक मेरा मानना है इसका निर्धारण तो पार्टी हाईकमान करेगा और जहां तक मैं समझता हूँ हमारे पास कई नेता हैं। उन सभी के सामूहिक नेतृत्व में हमको लड़ना चाहिए और जो नए युवा चेहरे कन्हैया कुमारजिग्नेश , हार्दिक पटेल जैसे लोग पार्टी से जुड़ रहे हैं वो अपनी ऊर्जा इस प्रदेश को भी देंगे। ये सभी युवा हैं। इनके ओजस्वी विचार हैं। एक्सपोजर भी है इनके पास और भविष्य की सोच और ताकत भी है। तो ऐसे लोगों को आगे लाकर हमको चुनाव लड़ना चाहिए ताकि एक नया सोच और समझ देश को दे सकें ।

राष्ट्रीय परिपेक्ष्य की बात मैं करूँ तो काँग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर कोई नहीं आया है । यहाँ उत्तराखंड में आपने चार चार कार्यकारी अध्यक्ष बना दिये हैं । टिकटों के चयन में उस समय परेशानी तो नहीं होगी जब इन सभी के अपने अपने गुट होंगे और वे टिकट लेने की होड में नजर आएंगे ?

टिकटों का बंटवारा कैसे किया जाता है ये पार्टी हाईकमान तय करेगा । जो चार अध्यक्ष की बात आप कर रहे हैं वो तो एक प्रक्रिया है अपनी पार्टी में । हर पार्टी अपने अपने लोगों को बांधे रखती है । उस सोच के साथ ये चार अध्यक्ष हमने बनाए । मुझे व्यक्तिगत रूप से लगता है ये सभी टिकटों को लेकर दखलंदाजी नहीं कर पाएंगे ।

एकजुट होकर अगर उत्तराखंड में काँग्रेस लड़ती है तो परिस्थितियाँ बदल भी सकती हैं । चार कार्यकारी अध्यक्ष बनाने के बाद भी परिवर्तन यात्रा नेताओं के दिलों में परिवर्तन नहीं ला सकती है और कामयाब होती नहीं दिखाई दे रही । इसे आप कैसे देख रहे हैं ?

परिवर्तन धरातल पर नहीं दिखाई दिया जो आप कह रहे हैं । निसंदेह आप अगर आज आम आदमी को कुरेदने का प्रयास करें तो पहले ही वो काँग्रेस को उतना प्रमोट नहीं करे , न बोले लेकिन वो खुलकर भाजपा के खिलाफ बोल रहे हैं जो पाँच साल में उनका शोषण , अत्याचार , उत्पीड़न हुआ उससे वो त्रस्त हो गए हैं जिसके बाद वो किस निर्दलीय की तरफ नहीं जा सकते । किसी ऐसी पार्टी की तरफ भी नहीं जा सकते जो भाजपा की बी टीम हो तो उनका रुझान काँग्रेस की तरफ ही होगा । काँग्रेस पार्टी का सत्तर वर्षों का कार्यकाल ऐतिहासिक है । कुछ करप्शन हर जगह होता है । स्वार्थी हर जगह होते हैं लेकिन काँग्रेस पार्टी द्वारा किए गए कार्यों  को जनता आज भी भुला नहीं पाई है और इस देश को फिर से काँग्रेस पिछली राह पर ले जाना चाह रही है तो निसंदेह काँग्रेस का भविष्य उज्जवल है और जनता लौटकर काँग्रेस की तरफ ही आएगी ।

पंजाब पर आना चाहता हूँ । कुछ समय पहले वहाँ चरणजीत सिंह चन्नी के रूप में बड़ा बदलाव हुआ । तब पंजाब के प्रभारी हरीश रावत ने कहा उत्तराखंड में भी वे एक दलित को मुख्यमंत्री  की कुर्सी में देखना चाहते हैं । इसे व्यक्तिगत  रूप से आप कैसे देख रहे हैं ? क्या परंपरागत वोट जो काँग्रेस का कोर वोटर है उसकी तरफ जाने की कोशिश हो रही है ?

परंपरागत वोट और कोर वोट आप ऐसे शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं जो आज की राजनीति में निरर्थक हो चुके हैं । आज महिलाएं हों या युवा , मजदूर हों वो सब जागरूक हैं । हरीश रावत जी दलित को सीएम बनाना चाह रहे हैं तो ये उनकी अच्छी सोच है । मैं इस बात  को मानता हूँ लेकिन  उस समय क्या हालत बनते हैं ? क्या समीकरण होते हैं ? किन परिस्थितियों से पार्टी गुजरती है ये उस समय तोला जाएगा । किसको बनाया जाए किसको नहीं ?  

पिथौरागढ़ विधान सभा में वही मुद्दे हैं जो राज्य गठन से पहले के हैं ।  उसके बाद भी विकास कहीं दिखता नहीं है । एक टेंडेंसी है श्रेय लेने और उदघाटन करने की,  एक होड मची हुई है ।  इस विधानसभा क्षेत्र की जनता भी कन्फ़्यूज्ड नजर आती है ।  इस बारे में आपका क्या कहना है ?

पुराने मुद्दे जैसे आप बताइये ?

नैनी सैनी को ही ले लें,  9 सीटर विमान की ट्रायल लैंडिंग हुई उसके बाद विमान ही नहीं उड़ रहा । उदघाटन पर उदघाटन होते जा रहे हैं । इसी तरह स्पोर्ट्स कालेज का मामला भी लटका है ? ऐसे कई मामले आपको आज गिना सकता हूँ

मैं तो यही सुनना चाह रहा हूँ आपसे । आप नैनी सैनी की बात कर रहे हो ।  थोड़ी देर के लिए स्पोर्ट्स कालेज , मेडिकल कालेज की भी बात करोगे। पेयजल की भी भी बात करोगे , सड़कों की भी , अस्पताल की भी बात करोगे । आधे आधे समय यहाँ दोनों पार्टियों को कम करने को मिला । पाँच साल स्वर्गीय एन डी तिवारी जी ने गुजारे।  उन पर कोई आक्षेप नहीं लगा सकता , विकास नहीं हुआ। दूसरे कार्यकाल में मुझे सौभाग्य मिला यहाँ नेतृत्व करने का। आप ये देखिये हमने उनके प्रस्तावों की नीव रखीसाथ ही धरातल में उसको मूर्त  रूप भी दिया । जब तक संचालन करने की या क्रियान्वयन की बात आई सरकार बदल गई । हम हार गए । आज ये प्रश्न उनसे पूछा जाना चाहिए जिसने हमारे बाद के 5 साल निरर्थक बिता दिये । हम चंडाक तक पानी ले आए थे । आंवलाघाट योजना का वो पानी नहीं बाँट पाये । हम बेस अस्पताल जंगल से उठाकर लाये वो आज तक बेस को चला नहीं पाये । हमने मेडिकल कालेज की घोषणा करवाई,  200 करोड़ स्वीकृत करवाए केंद्र से , वो आज तक 200  करोड़ खर्च नहीं कर पाए इस कालेज के नाम पर । हमने अपने कार्यकाल में हवाई पट्टी बनाई । आपको याद होगा अपने कार्यकाल में 2 महीने तक स्टेट प्लेन से फ्री सेवा पिथौरागढ़ वासियों को दी । याद है ना आपको,  पर वो टिकट लेकर भी जहाज नहीं चला पाए । बहुत सारी ऐसी कई चीजें हैं । हमने पार्किंग बनाईआज तक वो पार्किंग व्यवस्थित नहीं है । उससे पैसा अर्जित करने की कोशिश ये नहीं कर पाए हैं । नर्सिंग कालेज हमने जिले को दिया ये आज भी पाल कालेज हल्द्वानी से संबन्धित है । यहाँ क्लास नहीं चल पा रही है । स्पोर्ट्स कालेज हम लेकर आए उसको ये आज तक शुरू नहीं करवा पाए । आज भी ये स्टेडियम से ही संचालित हो रहा है । तो ये सारी चीजें काँग्रेस के कार्यकाल में मेरे विधायक रहते हुए हुई थी जिससे पिथौरागढ़ का चहुंमुखी विकास हुआ । अंधा आदमी ही ऐसा होगा जो कहेगा उस दौर में यहाँ विकास नहीं हुआ । विकास एक सतत प्रक्रिया है । हमने जो काम किए थे , उसको आगे बढ़ाने के बजाए उसको इन्होनें ठंडे बस्ते में डालने का काम किया है । जिनके पास प्रचंड बहुमत था केंद्र और राज्य में प्रश्न उनसे पूछा जाना चाहिए । आज ये हमारे एक काम को धरातल पर आगे नहीं उतार पाए हैं ।  ये सारी ज़िम्मेदारी भाजपा की है ।  

थरकोट झील तो बन गई ।  रई झील का मसला लटका है । आपका क्या कहना है इस विषय में ?

रई झील का कोई मसला था ही नहीं। जब भाजपा की सरकार थी तब ये मामला बार बार उठता था। काँग्रेस की सरकार आई तो ये ठंडे बस्ते में चला गया। मेरे कार्यकाल में एक मसखिरा आदमी गाड़ी में नाव लेकर घूमता था। जब तक उस भूमि में हम मकान बनने से नहीं रोकेंगे , तब तक झील कैसे बनेगी। आज चप्पे- चप्पे पर मकान वहाँ बन चुके हैं। झील कैसे बनेगी अब वहाँ। हमारे कार्यकाल में उस पर सर्वे हुआ। टोकन मनी भी जारी हुई । सबसे बड़ी समस्या सैन्य भूमि की थी। सेना ने कहा हमारी जमीन से 25 किलोमीटर तक आप  कोई निर्माण कार्य नहीं करेंगे। रई में चटकेश्वर मंदिर के पास लाक किया जा सकता था । एक बड़ी तकनीकी समस्या थीअगर हम ऊपर  बंद करते तो बड़ा खतरा था। झील से ज्यादा खर्च उसे लाक करने में आताउस पर बात अटक गई।  जहां तक थरकोट की बात है । थरकोट झील का जीओ हमने जारी किया। टोकन मनी हमने जारी करवाई । अभी उन्होनें काम शुरू किया । 5 साल में थरकोट झेल भी वहीं की वहीं पड़ी हुई है। खाली लीपापोती हो रही है। कुछ काम  नहीं हो रहा है। आप देख सकते हैं ।  

आंवलाघाट योजना भी आपका ही ड्रीम प्रोजेक्ट था । उसके बाद भी पिथौरागढ़ शहर की बड़ी आबादी को पानी नहीं मिल पा रहा है । आपने अपने दौर में 20-30 गांवों को भी इसमें शामिल करने का ब्लू प्रिंट तैयार किया था । घाट से  अगर उस समय  नई पेयजल योजना बनती तो क्या ये बेहतर होता । बड़ी आबादी की प्यास बुझा सकती थी ?

आंवलाघाट के साथ घाट पेयजल योजना को भी चलना चाहिए था । घाट को चलाया इन लोगों ने । आप जानते हैं कौन मंत्री थे ? कौन नेतृत्व कर रहे थे यहाँ का । 5 साल तक आल वेदर रोड के नाम पर कितना धन इनके द्वारा लिया,  ये आप पता कर सकते हैं । आज भी घाट में मोटर में पानी नहीं आ रहा । जहां तक आंवलाघाट की बात आपने की है तो ये हमने अपने कार्यकाल में प्रस्तावित किया । हमने वहाँ तक रोड पहुंचाई । लाइन बिछाई । हमने चंडाक में 50 लीटर का टैंक बनाया और ट्रायल करवाया पूरे शहर  में ।  अब जब पानी आपके पास है , स्टोरेज है सब कुछ तो उसके बाद पहल प्रशासन को जनप्रतिनिधियों को करनी चाहिए । आप मेरे पहले 5 साल को देखिये 2012- 2017 तक आप किसी भी आदमी से जाकर पूछिये किसी ने भी पानी  को लेकर कभी किसी तरह की कोई शिकायत नहीं की । मेरा समय में तो ठूलीगाढ़ ही था । पानी सुचारु आता था तब शहर में । उस समय तो आंवलाघाट  भी नहीं था । कभी हड़ताल ,तालाबंदी की नौबत भी नहीं आई । वो तो व्यवस्था पर है,  जनप्रतिनिधि कितनी ईमानदारी से जनता तक पहुँचने  की अपनी ज़िम्मेदारी को महसूस करता है ।

क्या आपको लगता है जनप्रतिनिधियों से  सवाल अब सीधे जनता को करने का समय आ गया है । 5 साल अगर जनता ने आपको बनाया है तो आपने क्या -क्या काम किए ?  ये सवाल पूछने की कुव्वत जनता को होनी चाहिए ?

इस देश को पीछे धकेलने का काम जनता ही कर रही है । अगर जनता सवाल पूछने लग जाएगी । जब जनप्रतिनिधि से सीधे  जवाब मांगने लगेगी तो वो भी सही रास्ते पर चलेगा और काम करेगा । अगर जनता नहीं होगी तो जनप्रतिनिधि का अस्तित्व कहाँ पर है ?  ये आप सोच सकते हैं।  जनता ही उसे बनाती है जनता ही उसे बिगाड़ती है । जनता अगर ज़िम्मेदारी समझ लेगी तो कोई भी नेता गलत काम करने से डरेगा क्योंकि उसे अपना वर्तमान भी दिखेगा और भविष्य भी । ऐसे में वो गलत काम नहीं करेगा और जनता के हितों से भी सरोकार रखेगा ।

बहुमंजिला पार्किंग भी आपका ड्रीम प्रोजेक्ट था लेकिन इस पार्किंग का लाभ नहीं मिल पा रहा है । आए दिन जाम की समस्या से जूझना पड़ रहा है ? सीसीटीवी कैमरे भी आपने अपनी विधायक निधि से लगाए लेकिन ये आज शहर से गायब हैं ?

जब किसी योजना में किसी व्यक्ति विशेष  का स्वार्थ आ जाता है तो वो योजना जनता को कहाँ पर लाभ दे सकती है ? बहुमंजिला पार्किंग  के लिए हमने बहुत मेहनत की । हमने जमीन के लिए एनओसी ली । इसे मल्टी स्टोरेज बनवाया। हम एक बढ़िया खूबसूरत मार्केट भी वहाँ बनाना चाहते थे ताकि शहर की जनता को नए शहर को देखने का मन करे । लोग उसमें घूम फिर सकें । हम इसे नैनीताल के भोटिया मार्केट जैसा बनाना चाहते थे । जैसे ही हम हटे तो दुकानों को बदल दिया गया । आधी पार्किंग काट दी गई । उसके ठेकेदार से अनेक प्रकार की वसूलियाँ होने लगी । पाँच साल उसने बिल्डिंग बनाने में लगा दिये । अभी भी उसका भुगतान नहीं हो पा रहा है । दुकान पालिका बेचे या प्रशासन,  मैं नहीं जानता लेकिन जब स्वार्थ किसी चीज में आ जाता है तो पार्किंग कैसे चलेगी ? आज नगर पालिका अपने आदमी को बैठाकर वसूली करती है तो दूसरे दिन प्रशासन उसे हटा देता है। अब प्रशासन और पालिका ये तय नहीं कर पा रहे हैं ,  कहाँ से इसका उपयोग होगा ?  करोड़ों की लागत से बनी ये पार्किंग स्वार्थ के चक्कर में बेकार साबित हो रही है ।

अपने कार्यकाल में आपने जिला अस्पताल में बैड बढ़ाने की बात भी की थी। आज की सूरते-हाल में भले ही बैड बढ़े नहीं हों लेकिन दोनों अस्पतालों का विलय हो चुका है ।

हमारे कार्यकाल में 50 महिला और 50 पुरुष  अस्पताल में बैड बढ़ाने की बात हुई थी जिसका जीओ भी जारी हो चुका था शायद कहीं चूक हो गयी इसका क्रियान्वयन सही से नहीं हो पाया । आज उस जीओ को मर्ज कर दिया गया है । अब जो आदमी विरोध करते थे महिला और पुरुष अस्पताल को मर्ज कर बेस अस्पताल बनना चाहिए । जो सदन में इसका जीओ फाड़ते थे वो अपने कार्यकाल में उन दोनों कों मर्ज कर एक अस्पताल बना रहे हैं क्योंकि वो अपनी ज़िम्मेदारी से भाग रहे हैं । वो दवाई नहीं दे पा रहे हैं।  तकनीकी स्टाफ नहीं दे पा रहे हैं । वहाँ पर डाक्टरनर्स नहीं दे पा रहे हैं। वहाँ पर बैड नहीं दे पा रहे हैं । जनता की नजरों से बचाने के लिए उन्होनें दोनों का एकीकरण कर दिया है । महिलाओं की बीमारियाँ  दूसरी तरह की होती हैं पुरुषों की अलग । कई बीमारियों का उपचार तो  महिला चिकित्सक की कर सकती हैं । उन्होनें ऐसा रायता फैला दिया है वो अस्पताल न तो दवाखाना रहा और न ही अस्पताल ।

आईसीयू भी 2018 में बनकर तैयार हुआ लेकिन उसमें स्टाफ़ , डाक्टर आज तक तैनात नहीं हो पाये हैं । सब कागजी घोषणाओं में नजर आता है । ट्रामा सेंटर खोलने की बात भी इसमें दर्ज है । स्वास्थ्य सेवाएँ तो जिला मुख्यालय में ही जर्जर हैं आप देख ही रहे हैं ?

ये सरकार दान में मिले आईसीयू को भी नहीं चला पा रही है। मंगला माता ने जो आईसीयू दान में दिया था , उसका भी नाश मार दिया है । मुख्यालय के लोगों को आज भी आई सी यू के लिए हल्द्वानीबरेलीलखनऊ का मुंह ताकना पड़ता है। सीधे -सीधे सरकार की ये ज़िम्मेदारी है जनप्रतिनिधियों की है सब कुछ होते हुए भी दान में मिले आईसीयू को ये नहीं चला पा रहे हैं । ट्रामा सैंटर का भी चलना यहाँ जरूरी है । ये पिथौरागढ़ का दुर्भाग्य है ।

पिथौरागढ़ में अभी महिला जनप्रतिनिधि है और महिलाओं के वोट ज्यादा हैं। आपको क्या लगता है आने वाले समय में महिलाओं के वोट क्या यहाँ के चुनावी समीकरणों को प्रभावित करेंगे ? महिलाओं से जुड़े मुद्दों की उपेक्षा भी यहाँ हुई है ?

आज मैं आपसे यह बात पूछना चाहता हूँपिथौरागढ़ विधान सभा सीट से महिला विधायक है , गंगोलीहाट में भी महिला हैजिला पंचायत अध्यक्ष में भी महिला है । 8 ब्लाक में 7 पदों पर महिला प्रमुख हैं। उसके बाद भी महिलाएं यहाँ दर्द भोग रही हैं । उनकी समस्याओं का निदान नहीं हो पा रहा है । महिला ही महिला की सबसे बड़ी दुश्मन बनकर उभरी हैं ।

3 आईटीआई जिले में बंद पड़े हुए हैं । नई शिक्षा नीति में कौशल विकास की बातें कहीं गई हैं । तकनीकी शिक्षा का तो बेड़ा गर्क हो गया है ?

अपने यहाँ जाख पुरान , बड़ाबे , गौड़ीहाट , मडमानले , गुरना पाँच जगह आईटीआई हैं लेकिन ये सब बंद पड़े हैं । इनका फर्नीचर तक हटा दिया गया है । आप कहते हैं हमारे बच्चों को रोजगार मिलना चाहिए।  काम कैसे मिलेगा जब तक स्किल नहीं होगा । अकुशल मजदूर मिट्टी फोड़ेगा उसके पास रोज काम नहीं होगा लेकिन स्किल के पास हुनर जरूर होगा चाहे वो मोटर मैकेनिक हो ,या इलेक्ट्रिशियन । हमने युवाओं के हुनर को तराशने के लिए ये सब खोले थे जिससे हुनर आयेगा और युवा रोजगार खुद पैदा कर लेगा । मैंने अपने कार्यकाल में पिथौरागढ़ में 2 पालिटेक्निक और 2 आईटीआई खुलवाई थी वो सब आज धराशाई हो चुके हैं । केन्द्र सरकार के पग चिन्हों पर राज्य सरकार भी चल रही है । आज नौबत इन्हें बंद करने की आ गई है ।

आपके कार्यकाल में स्वीकृत परियोजनाओं का बजट जारी हुआ है क्या अभी तक ?

हमारा झगड़ा सीएम से उस दौर में ये था , सवित्त जीओ जारी करवाते थे । हमने अपने प्रोजेक्टों में सभी के लिए एक बजट स्वीकृत करवाकर विभागों को आवंटित करवाया था । काम पूरे हुए पर उनको संचालित करने के लिए दुबारा वित्त विभाग में जाना पड़ता था । हमारे पूर्ववर्ती वित्त मंत्री उनको स्वीकृत नहीं करा पाये तो ये उनका दुर्भाग्य है ।

चुनाव का मौसम आ रहा है तो काँग्रेस को सैनिक भी याद आ रहे हैं । पिछले दिनों आपने बिण में पूर्व सैनिकों का एक सम्मेलन आयोजित करवाया जिसमें पूर्व सीएम और काँग्रेस महासचिव हरीश रावत ने भी प्रतिभाग किया । अब आप 20 प्रतिशत टिकट पूर्व  सैनिकों को भी देने की बात कर रहे हैं । भाजपा आपकी टाइमिंग पर सवाल उठा रही है,  साथ ही कह रही है वन रैंक वन पैंशन हम लेकर आए?

मैंने उस सम्मेलन में मंच से ही कहा था इस सम्मेलन के कोई कयास नहीं निकाले जाएँ । हमने सम्मेलन बुलाया एक तो सरकार ये माहौल  बना रही है काँग्रेस सरकार ने पूर्व सैनिकों के लिए कुछ नहीं किया । मैंने विस्तार से मंच से काँग्रेस सरकार के योगदान को बताया । दूसरा वो ये कहते हैं नेहरू ने देश को बर्बाद कर दिया । मैंने उनके कार्यकाल की तमाम बातें लोगों के सामने रखी।  हमने राजनीति करने के लिए ये सम्मेलन नहीं रखा । सैनिकों के वोट पाने के लिए भी नहीं । वन रैंक वैन पेंशन में भी कई खामियाँ हैं । कई पूर्व सैनिकों और पैरामिलिट्री फोर्सेज को इसका लाभ आज तक नहीं मिल पाया है ।

सेना की भर्ती लंबे समय से जिले में नहीं हो पा रही है । अगर भविष्य में काँग्रेस सत्ता में आई तो इस दिशा में आपके द्वारा प्रयास होंगे ?

मीडिया इस देश में सबसे बलशाली है । मैं आपसे कहूँगा पहले काँग्रेस को सत्ता में लाएँ हम धरातल पर इसे उतारेंगे ।

भाजपा कहती है राज्य में 5 साल भाजपा और 5 साल काँग्रेस आने का पुराना मिथक हम तोड़ेंगे ?

 वो तो कुछ भी तोड़ सकते हैं । जब देश तोड़ने के लिए तैयार बैठे हैं तो मिथक भी तोड़ देंगे ।

किन मुद्दों को लेकर आप जनता के बीच जाएंगे ?

 मैं अपने व्यक्तिगत कामों को लेकर जाऊंगा ।

क्या मयूख महर अपने पुराने विजन को आगे बढ़ाएँगे या इस बार कुछ नया अलग होगा क्योंकि आपकी थीम 2022 के चुनावों के लिए है ‘ इस बार रण कुछ अलग होगा’ ?

मेरी सोच अलग है । मैं पिथौरागढ़ को शिक्षा में नंबर वन बनाना चाहता हूँ ताकि यहाँ अपने बच्चों को भेजकर माँ बाप गर्व महसूस कर सकें । गर्व के साथ हमारा पर्यटन यहाँ पर बढ़ेगा,  व्यापार बढ़ेगा । हमारी हवाई सेवा चलेगी।हमारा मेडिकल कालेज बन जाएगा तो अच्छी आबोहवा में इलाज कराने लोग आएंगे। आने वाले समय में इन सब चीजों पर हम विशेष ध्यान देंगे । अगर शिक्षा है तो सब कुछ संभव है ।

क्या मयूख महर इस बार छवि बदलने की छटपटाहट में हैं। व्यक्तिगत तौर पर जानना चाहता हूँ क्योंकि कार्यकर्ताओं की राय है आप संवाद कम करते हैं वहीं जनता की राय है आप  विकास तो करते हैं लेकिन जनता से सीधे कनेक्ट नहीं कर पाते हैं। राजनीति में परसेप्शन जरूरी है । क्या इस धारणा को इस बार आप तोड़ेंगे ?

एक बात बता रहा हूँ। नेता या तो काम ही कर ले या तो बात ही कर ले। 20 साल आपने बात करने वाले नेता को दिये । 5 साल काम करने वाले नेता को दिये । शायद पिथौरागढ़ की जनता को मेरा काम पसंद नहीं आया तभी 5 साल वाले नेता को उन्होनें हटा दिया और 20 साल वाले नेता को फिर से बुला लिया । अब मैं ये सोच रहा हूँ या तो मैं गप्पी बन जाऊँ नमस्ते करूँ या मैं काम करूँ?  या यूपीएससी का सेंटर , यूनिवर्सिटी लाऊं अपनी विधानसभा के लिए। कोरोना ने युवाओं का पूरा साल खराब कर दिया है। मैं युवाओं को उस दुख से उतारना चाहता हूँ । जनता पसंद करेगी तो फिर मौका देगी , पसंद नहीं करेगी तो फिर से घर बैठ जाएंगे क्या परेशानी है ?

हरीश रावत ने पिछले दिनों आपको पिथौरागढ़ जिले की सारी विधानसभा सीटें जीतने की ज़िम्मेदारी दे है । इसे कितना बड़ा मानते हैं आप ?

आप रावत जी को अच्छी तरह से जानते हैं । मैं भी जानता हूँ । वो बहुत मंझे हुए नेता हैं । वो करेंगे तो अपने मन की , लेकिन मंच से मेरा नाम लेकर उन्होनें सारा झगड़ा मेरे सिर डाल दिया है । अब जिस प्रत्याशी को टिकट नहीं मिलेगा वो सोचेगा मयूख ने टिकट काट दिया  । जिसको टिकट मिलेगा वो सोचगा मयूख ने रावत से कहकर टिकट दिलाया है । ये बड़ा राजनीतिक पैंतरा है जिसे चालाकी से चला गया है । ज़िम्मेदारी मुझे ही दे गई है ।

क्या पिथौरागढ़ जिले में भी इस बार मिथक टूटेंगे ?

अगर टिकट सही ढंग से बांटे गए और देश , काल , परिस्थिति का ध्यान रखा गया तो 4 सीटें आ जाएंगी  

भाजपा वाले अक्सर हरीश रावत को ही घेरने में लगे रहते हैं । आपकी पार्टी में और भी कई नेता हैं लेकिन कभी भी घेरते हुए नहीं देखा । क्या  आपको लगता है इस बार उन्हें हरीश रावत जी से ही खतरा लग रहा है ?

एक बात बताओ आज भाजपा वाले हरीश रावत जी को घेर रहे हैं । आज भी मरने के 50 साल बाद भी भाजपा नेहरू को घेर रही है क्योंकि जिसका कद होगा जिसमें दम होगा उसी को घेरेंगे  । आज हरीश रावत में अगर दम है । उन्हें  डर है अगर वो आ गया तो पार्टी को  खड़ा कर देगा तभी घेर रही है । मोदी आज जैसे ही नेहरू के कद को  छोटा कर रहे हैं वैसे ही रावत जी के कद को भाजपा वाले कम कर रहे हैं  । रावत ऐसे नेता हैं  जो अपने बूते राज्य में काँग्रेस की सरकार बना सकते हैं ।

आपने अपने दम पर पिथौरागढ़ में विकास कार्यों को अंजाम दिया लेकिन उसके बाद भी आप चुनाव हार गए ? क्या अब विकास जीत  का पैमाना नहीं रहा ?

विकास अगर जीत का पैमाना नहीं है तो आने वाले वक्त में कोई विकास नहीं करेगा । विकास जीत का पैमाना नहीं है तो आने वाले वक्त में कोई विकास नहीं करेगा । विकास ही जीत का पैमाना है। लोगों से कई बार भूल और चूक हो जाती है , पर अगर जनप्रतिनिधि विकास को लेकर नहीं चलेगा तो आने वाले समय में लोकतन्त्र की जो व्यवस्था है यह चकनाचूर हो जाएगी । हम हारेहमारे कामों को भी किनारे कर दिया गया फिर भी हम हमारे लोगों के बीच  जा रहे हैं । हम उन लोगों की भूल को भूलकर फिर काम करेंगे।

2017 में पिथौरागढ़ सीट पर माहौल आपके पक्ष में था । लेकिन ऐन वक्त में मोदी जी की सभा ने खेल खराब कर दिया । हरीश रावत जी भी दो दो सीटों से चुनाव हार गए

राजनीति है ये। चलता है सब