गुरुवार, 13 नवंबर 2008

मार्गरेट आंटी का इस्तीफा


रात का समय था। मैं सोने की तैयारी कर रहा था, कि अचानक दिल्ली से अपने एक मित्र की कॉल मेरे पास आयी। वह मुझ को बता रहा था " कांग्रेस महासचिव मार्गरेट अल्वा ने एक टीवी चैनल से बातचीत में यह कह दिया की कांग्रेस में टिकिट बिकते है"। क्योंकि उस रात मै समाचार नहीं सुन पाया था। जिस कारण मैं इस ख़बर के बारे मैं कुछ नहीं कह सकता था। क्योंकि मेरे यह मित्र दिल्ली से थे और मुझे कई बार चुनावों के दौरान होने वाली पल पल की खबरों से मुझे पहले अवगत करवाते रहे हैं , जिस दौरान मैं चुनावों की स्टोरी किया करता था, सो मुझे उनकी बात पर यकीन करना पड़ा। मैंने उनसे कह दिया " अल्वा के ऐसे बयान 6 राज्यों के चुनावों से पूर्व कांग्रेस के लिए गले के हड्डी बन जायेंगे । हुआ भी ऐसा ही। अगले ही रोज जैसे ही नींद खुली..तो समाचार पत्रों की लीड स्टोरी यही थी। अल्वा के बयानों ने ठण्ड में चुनावी पारा गरमा दिया है । उस रोज अल्वा के बयानों पर सभी टीवी चैनल्स प्रोग्राम दिखा रहे थे। मैंने भी उसको देखा। बहस गरमा गरम हो रहे थी।

बेचारी अल्वा आंटी ने टीवी चैनल से यह कह दिया " कांग्रेस में टिकिट बिकते है। बस इसके बाद तो टी वी चैनल्स को मसाला मिल गया। ब्रेकिंग न्यूज़, फ्लैश ; सबसे तेज का सिलसिला चल पड़ा। 6 राज्यों के विधान सभा चुनावों से पूर्व के 1 माह की संध्या पर अल्वा आंटी के "मास्टर स्ट्रोक" ने कांग्रेसियों की फजीहतो को बढ़ा दिया । जिस कारण देश की सबसे पुरानी पार्टी के धुरंधर टीवी रिपोर्टर्स के सामने अपना मुह खोलने से बचते रहे सारी नजर इस बार भी १० जनपथ पर लगी रही वैसे भी कांग्रेस में हाई कमान ही सबका माँ बाप हुआ सभी उसे के निर्णय को सुनते है प्रेजिडेंट से लेकर प्रधानमंत्री, चीफ मिनिस्टर से लेकर जनरल मेनेजर सब उसकी अनुसंसा पर बनाये जाते है इस बार भी यही कहानी दोहराई गयी बड़े नेताओ ने जबान पर ताला लगा दिया मोइली जहा अनुसासन हीनता के कसीदे पड़ते रहे वही पार्टी के सिपेसालर "सोनिया सरनामगचामी" की माला जपते रहे लेकिनअपने आंटी के सुप्पोर्ट में साउथ के प। शिवशंकर और जल्लापा आए दोनों ने आंटी के सुर में सुर मिलाया और बोले" मिले सुर मेरा तुम्हारा कांग्रेस में होता है टिकेट आवंटन में धन का बटवारा" किसी ज़माने में दोनों की केन्द्र में व्ही हैसियत रही है जो अभी सेण्टर में शिवराज पाटिल की रही है हा, यह अलग बात है दोनों में से एक अब कांग्रेस छोड़ चुके है लेकिन अर्जुन के "राहुल बाबा" की भी सुने वह बोले टिकेट वितरण की प्रोसेस से वह नाराज नही है नेता बनकर नेतागिरी पर उतारू हो गए है अपने राहुल बाबा भी जरा गौर करे कैसा झूट बोल रहे है अपने युवराज कर्नाटका के चुनावो से पहले आप कह चुके है टिकेट वितरण की प्रोसेस असंतोष जनक रही है अब अपने बयान से ही यु टार्न ले लिया.... आप भी कमाल के है राहुल बाबा कब कहा क्या कह जाए इसका कुछ भरोसा नही है उप के चुनावो में रोड शो में उतरे तो बोल दिया यदि नेहरू परिवार सत्ता में होता तो बाबरी को नही गिराया जाता अब कोई आप पर भरोसा क्यों करे आप पर ? अब जरा माता जी को सुनते जाए सोनिया से जब रिपोर्टरों ने पुचना सुरू किया तो वह बोली आप बार बार हमारे परिवार के वंशवाद पर ही क्यों अंगुली क्यों उठाते है? लो कर लो बात खैर छोड़ो इन सब बातो को एक समय अपने भगवा ब्रिगेड वाले सोनिया के पीछे हाथ धोकर पड़ गए विदेसी मूल का मुद्दा उताह दिया कमल कीचड़ में पिचले लोक सभा चुनाव में नही खिल पाया हाथ ने उसको उखाड़ डाला "फील गुड" इंडिया उदय" नारू की हवा निकल गयीसोनिया के पास सत्ता आने पर भी बीजेपी ने हो हल्ला बंद नही किया कहा "एक विदेसी प्रधानमंत्री नही बन सकता हालाँकि जनता ने बीजेपी के विदेसी मूल के नारू की भी हवा निकाल दी तब बीजेपी को भी ओप्पोजिसन में समय बिताना पड़ा तब सोनिया ने मनमोहन को अपना
"यस् बॉस " बनाया अब देखना होगा इस बार अपने "अल्वा आंटीकी स्पार्किंग देश के जनता पर क्या असर छोड़ती है? मुद्दा कांग्रेस की पुरानी पार्टीके साथ साथ प्रिस्टेज से भी जुड़ गया है मतदाताओ पर इसका चुनावू में असर ग़लत पड़ सकता है कहा जा रहा है "अल्वा आंटी " ने कर्नाटक चुनावू से ही बारूद बना लिया था कांग्रेस के संसदीय बोर्ड ने उनके अपने लाडले राजकुमार"निवेदित" को टिकेट नही दिया गया जबकि पार्टी के कई दिग्गी नेता हाई कमान के सामने टिकेट अपने नाते रिस्तेदारू को दिलवाने की मंत्रणा करते रहे करीबियों को तो टिकेट दे दिया गया जिसमे जमकर खरीद फ़रोख्त हुई लेकिन आंटी के राजकुमार को टिकेट नही मिला जिस कारण वह पार्टी में अपनी उपेक्षा से आहत थी तभी से उन्होंने नए विकल्प की तलाश शुरू कर दी जिस कारण से ठान ली पार्टी को सबक सिखाएंगी जो उन्होंने आज कर दिखाया है अब सोनिया ने उनका इस्तीफा मंज़ूर भी कर दिया है
एक बड़ा धंदा बन गया है... आज ॥ राजनीती ..देश का वह नौजवान चाहकर भी इसमे नही आ सकता क्युकी उसके पास पैसे नही है टिकेट खरीदनेके लिए आज राज्नीते से सुचिता , ईमानदारी चीजे गायब हो गयी है सभी दल अपने अपने रिस्तेदारू को टिकेट दिलवाकर चुनाव पीच पर बैटिंग के लिए उतावले हो चले है ऐसे मै उनका क्या होगा जिनका राज्नीते में कोई माँ बाप नही है? चुनाव जीतने में एन दिनों तरह तरह के हथकंडे अपनाए जाने लगे है पिचली दिनों जब उत्तराखंड की यात्रा पर था तो एक महानुभाव ने बस में बताया यहाँ के विधान सभा के चुनावू में प्रत्यासियों का खर्चा लाखो करोडो में गया कहने का अर्थ यह है के चुनाव लड़ने के लिए मोटी रकम चाहिए फिर प्रचार में तरह तरह के हथकंडे अपनाए जाते है तभी जीतसुनिश्चित हो पाती है राजनीती एक बड़ा धंदा बन गया है यहाँ आने के लिए कोई योग्यता नही चाहिए बस आपके पास जेब गर्म करने की कैपेसिटी होनी चाहिए खैर बात बात मै क्या बोल जाता हूँ पता नही.... अब विषय पर आते है .... यार अपने दोस्त भी कहा करते है तू बहुत बोलता है....... जर्नलिस्ट का तो काम ही बोलना पड़ना होता है
अल्वा आंटी ने अपने स्ट्रोक से बता दिया है सच किसी से नही छुपता वत्स " आंटी ने कांग्रेस की दुखती रग पर पर हाथ रख दिया है ......कम से कम कांग्रेस को अब तो अपनी गलती से सीख लेने की जरूरत है पर वह इसको भी नही मान रही
इधर म्प में बीजेपी खुश है अल्वा आंटी के स्टेटमेंट को आधार बनाकर होअर्डिंग बनाये जा रहे है शिव , रमन की जोड़ी खुश है॥ पार्टी के नेता भी मस्त कह रहे है कांग्रेस में आतंरिक लोकतंत्र नही है
बीजेपी में टिकेट नही बिकता है
अपने पी ऍम वेटिंग साहब तो उचल कूद कर रहे है उनकी नज़र प्रधानमंत्री की कुर्सी पर लगी है वैसे भी आडवानी जी का यह अन्तिम वर्ल्ड कप है....८१ के हो चुके है सत्ता का भरोसा जो नही हुआ अगर मिल गयी तो ठीक .....नही तो फिर ५ साल के बाद बैटिंग करने नही आ पाएंगे... टायर्ड हो जायेंगे अडवाणी ओबामा की सफलता से खुश है उसी को वह अब यहाँ भी करना चाहते है उनकी यह तमन्ना पूरी होती है या नही यह मार्च के बाद पता चलेगा लेकिन वह अभी से अपने साथ कई पार्टी को लेने में लग गए है " रजनीकांत"
पर डोरे दाल रहे है..... अब चुताला भी आ चुके है.... आ गए है साथ में .....अडवाणी बंगाल के साथ साउथ में लगे है दिल्ली से आ रही ख़बर कह रही है अपने अरुण जेटली साहब कर रहे है नया मैनेजमेंट.... उनकी कोसिस है है "कांग्रेस की"अल्वा आंटी" बीजेपी के पास में आ जाए इसके लिए वह अपने साथ बात करने में लगे है आशा है बात बन जाए वैसे भी बीजेपी पर एस समय पूरे देश में कंधमाल और कर्णाटक में ईसाई विरोधी होने होने का दाग लग रहा है यह दाग अल्वा के पार्टी में आने से धुल सकता है अब देखना होगा अल्वा की राजनीती किस और जाती है वैसे इस बात के भी ॥ कयास लग रहे है अपनी उप की बहिन जी " भी अल्वा को अपने पास बुला रही है माया की कोसिस है अल्वा को बसपा में लाकर पार्टी का का जनाधार सकता है और वह प्रधानमंत्री की कुर्सी पा सकती है फिर माया के साथ एक और सतीश मिश्रा एक और अल्वा आंटी साथ हाथी में सवार होंगे" अल्वा आंटी" किसके साथ जाती है ?

कोई टिप्पणी नहीं: